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Itihas Ka Shav

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हिन्दी व्यंग्य के निर्माताओं में परसाई और शरद जोशी के साथ रवीन्द्रनाथ त्यागी का भी नाम एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में लिया जाता है। केवल हास्य पर निर्भर न रहकर उन्होंने भी व्यंग्य को सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में प्रयोग किया। ‘इतिहास का शव’ उनकी चर्चित व्यंग्य कृतियों में से एक है। उसमें संकलित दो दर्जन से ज़्यादा व्यंग्य-लेख, टिप्पणियाँ और निबन्ध उनकी मौलिक शैली और अपने अनूठे अन्दाज़ का नमूना हैं। सरकारी नौकरी के सर्व स्वीकृत ढर्रे पर टिप्पणी करते हुए व्यंग्य में वे कहते हैं : अपने लम्बे सरकारी जीवन के आधार पर आपको यह सूचना देते हुए हर्ष होता है कि सरकार के ज़्यादातर अधिकारी और शेष कर्मचारी मूर्ख नहीं हैं। वे कम से कम काम करते हैं, और सरकार का जादू यह है कि वह फिर भी चलती रहती है। यही तुर्शी हमारे परिवेश के अन्य घटकों को लक्षित उनके अन्य आलेखों में भी है। इस पुस्तक में कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं जो सिर्फ़ व्यंग्य नहीं हैं, बल्कि हमारा ज्ञानवर्द्धन करनेवाले हैं। मिसाल के तौर पर ‘प्रेमचन्द और प्रसाद : कुछ रोचक प्रसंग’, ‘हिन्दी की कुछ श्रेष्ठ व्यंग्य-कविताएँ’, ‘कश्मीरी और डोगरी के कुछ दिलचस्प लोकगीत’, ‘अपराधी साहित्यकार’ और ‘विश्व के महान राजनेताओं का हास्य-व्यंग्य’ आदि। इन आलेखों में उन्होंने कुछ ऐसी सूचनाओं को उपलब्ध कराया है जिनका ऐतिहासिक महत्त्व भी है।

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हिन्दी व्यंग्य के निर्माताओं में परसाई और शरद जोशी के साथ रवीन्द्रनाथ त्यागी का भी नाम एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में लिया जाता है। केवल हास्य पर निर्भर न रहकर उन्होंने भी व्यंग्य को सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में प्रयोग किया। ‘इतिहास का शव’ उनकी चर्चित व्यंग्य कृतियों में से एक है। उसमें संकलित दो दर्जन से ज़्यादा व्यंग्य-लेख, टिप्पणियाँ और निबन्ध उनकी मौलिक शैली और अपने अनूठे अन्दाज़ का नमूना हैं।

सरकारी नौकरी के सर्व स्वीकृत ढर्रे पर टिप्पणी करते हुए व्यंग्य में वे कहते हैं : अपने लम्बे सरकारी जीवन के आधार पर आपको यह सूचना देते हुए हर्ष होता है कि सरकार के ज़्यादातर अधिकारी और शेष कर्मचारी मूर्ख नहीं हैं। वे कम से कम काम करते हैं, और सरकार का जादू यह है कि वह फिर भी चलती रहती है। यही तुर्शी हमारे परिवेश के अन्य घटकों को लक्षित उनके अन्य आलेखों में भी है।

इस पुस्तक में कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं जो सिर्फ़ व्यंग्य नहीं हैं, बल्कि हमारा ज्ञानवर्द्धन करनेवाले हैं। मिसाल के तौर पर ‘प्रेमचन्द और प्रसाद : कुछ रोचक प्रसंग’, ‘हिन्दी की कुछ श्रेष्ठ व्यंग्य-कविताएँ’, ‘कश्मीरी और डोगरी के कुछ दिलचस्प लोकगीत’, ‘अपराधी साहित्यकार’ और ‘विश्व के महान राजनेताओं का हास्य-व्यंग्य’ आदि। इन आलेखों में उन्होंने कुछ ऐसी सूचनाओं को उपलब्ध कराया है जिनका ऐतिहासिक महत्त्व भी है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
1993
Weight
220 grams
ISBN-13
9788126703272
Pages
195
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
12.5 × 18.5 cm
Language
Hindi

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