Kavi Ki Manohar Kahaniyan
Author:
Yashwant VyasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Satire0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
भाषा का क्या अनूठा खेल है, प्रयोग की क्या मोहक ताजगी! </p>
<p style="padding-left: 80px;"> <strong>—</strong><strong>विश्वनाथ त्रिपाठी</strong></p>
<p>यशवंत का मास्टर-पीस है। कुछ अंश तो इस क़दर ईर्ष्या पैदा करनेवाले हैं कि काश ये हमने लिखे होते। </p>
<p style="padding-left: 80px;"> <strong>—</strong><strong>ज्ञान चतुर्वेदी</strong></p>
<p>ये भीतर उतर जानेवाली अद्भुत काव्यकथाएँ हैं। क्या गजब है कि इनका कवि गहन पाखंड को भी विचार की तरह पेलता है। </p>
<p style="padding-left: 80px;"> <strong>—</strong><strong>सुधीश पचौरी</strong></p>
<p>मोती कितने गहरे जाकर मिलते हैं, यह जानना हो तो हर एक को यह किताब जरूर पढ़ना चाहिए।</p>
<p style="padding-left: 80px;"> <strong>—</strong><strong>प्रेम जनमेजय</strong></p>
<p>ये हमारी जनरेशन की भाषा है। इसके हैशटैग से पिस्तौल चलती है। असली-नक़ली की लाइन क्लियर, तबीयत साफ़ हो जाती है। </p>
<p style="padding-left: 80px;"><strong>—</strong><strong>ट्विटर से</strong></p>
<p>गुनाह इतने शायराना कभी न थे। </p>
<p style="padding-left: 80px;"><strong>—</strong><strong>इंस्टाग्राम से</strong></p>
<p>कवि की मनोहर कहानियाँ रिबूट होकर और भी कातिल हो गई हैं। </p>
<p style="padding-left: 80px;"><strong>—खटाक कमेंट बॉक्स से</strong>
ISBN: 9788119092062
Pages: 192
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Lateefe
- Author Name:
Anuradha Sharma
- Book Type:

- Description: शाइरों और अदीबों की हाज़िरजवाबी, तंज और मजाहिया गुफ़्तगू में भी शाइरी और इल्म की गहरी बातें छिपी होती हैं| ये चीज़ें किसी भाषा के अदब का अनौपचारिक विस्तार ही नहीं होतीं, उस साहित्य और समाज की आत्मा में झाँकने का एक खूबसूरत झरोखा हैं| इस किताब में शामिल लतीफ़ों से लगभग दो सौ सालों के महान शाइरों, संपादको, सियासी शख्शियतों और पत्रकारों का किरदार उभरता है| साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप का बौद्धिक परिदृश्य बनता दिखाई पड़ता है|
Bhadrapad Ki Sanjh
- Author Name:
Ravindranath Tyagi
- Book Type:

- Description: रवीन्द्रनाथ त्यागी ने न तो शुद्ध हास्य लिखा, न शुद्ध व्यंग्य और न शुद्ध ललित-निबन्ध। तीनों की मिली-जुली विशेषताओं को लेकर उन्होंने अपने ख़ास रंग को शोख़ व चटख बनाया। उनके लेखन से जो आनन्द मिलता है, वह इधर के बहुत सारे लेखन से नहीं मिलता। जो लेखन एक ‘ज्वॉय’ दे, एक ‘एक्सटेसी’ दे, उसकी अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी जितना वैविध्य रवीन्द्रनाथ त्यागी में है, उतना उनके समकालीन किसी भी व्यंग्यकार के पास नहीं है। —डॉ. धनंजय वर्मा रवीन्द्रनाथ त्यागी को पढ़ना मुश्किल है क्योंकि बीच-बीच में हँसना पड़ता है। मुझे हँसते देखकर घर के सयाने बच्चे और विद्वान् अनुसन्धित्सु मेरी हँसी उड़ाते हैं और पुस्तक को मेरे हाथ से छीनकर पढ़ने लगते हैं। जब वे भी हँसने लगते हैं तो मैं इस शून्यकाल का फ़ायदा उठाकर पुस्तक फिर पढ़ने लगता हूँ। त्यागी जी की भाषा नटखट, प्रभावशाली व सुखकारी है। मैं उनके साहित्य को व्यंजना-कौशल की बारीकियों की दृष्टि से ‘व्यंग्य’ कहता हूँ। उन्होंने साहित्य का गम्भीर अध्ययन किया है और बुहमुखी सन्दर्भशीलता भी उनके साहित्य में है। ‘व्यंग्य’ का मूलतत्त्व है भाषा में अभिव्यंजना की एक विशेष शक्ति पैदा करना। रवीन्द्रनाथ त्यागी तथा श्रीलाल .शुक्ल के अतिरिक्त किसी और हिन्दी-व्यंग्यकार के पास अध्ययन-गर्भित प्रजातीय संस्कृति की भाषा-संश्लिष्टता और बहुविद्या के साथ-साथ शब्द-मुद्रा में विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करते हुए कथन-काक के द्वारा व्यंग्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं है। —डॉ. शुकदेव सिंह रवीन्द्रनाथ त्यागी का गद्य मुझे अच्छा ही नहीं, वरन् बहुत अच्छा लगता है। उनके लेखन में व्यंग्य व लालित्य—दोनों हैं। उनके अनुभव का आयाम बहुत विस्तृत है। मैं तो चाहता हूँ कि इसी शैली में वे अपनी आत्मकथा लिखें। —डॉ. कुबेरनाथ राय
Neki Kar, Akhbar Main Dal
- Author Name:
Alok Puranik
- Book Type:

-
Description:
तमाम दरियाओं की गन्दगी देखकर पता लगता है कि लोग अब दरियाओं में नेकी तो नहीं डालते। कोई वक़्त रहा होगा, जब नेकी दरिया में डाली जाती थी। कोई वक़्त रहा होगा, जब साधु-सन्त प्रवचन करते थे, अब प्रवचनों की मार्केटिंग होती है। रामकथा की मार्केटिंग होती है। राम की मार्केटिंग होती है। राम के चाकर तुलसीदास ने लिखा था कि बड़ी मुश्किल से खाने का इन्तज़ाम हो पाता है, मस्जिद में सोना पड़ता है। अब राम के चाकर एक मस्जिद छोड़, पचास मस्जिद भर की जगह क़ब्ज़ा कर लें। राम की चाकरी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी के रिटर्न इधर समान हो गए हैं। राम की चाकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नौकरी में लगे सीनियर लोग भी मर्सिडीज में चल रहे हैं। राम का कारोबार इधर बहुत रिटर्न वाला हो गया है। ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि बाज़ार सिर्फ़ वहाँ नहीं है, जहाँ वह दिखाई पड़ता है। बाज़ार वहाँ भी है, जहाँ वह दिखाई नहीं पड़ता है।
बाज़ार के इस छद्म को पकड़ने की चुनौती ख़ासी जटिल है। यह किताब इस छद्म को समझने में महत्त्वपूर्ण मदद करती है। व्यंग्य के लपेटे से कुछ भी बाहर नहीं है, इस कथन की पुष्टि इस किताब में बार-बार होती है।
Dulari Chachi
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
- Book Type:

- Description: ‘दुलारी चाची’ रोज-रोज बदल रहे भारतीय ग्रामीण समाज का आख्यान है। दिलचस्प यह है कि परिवर्तन की यह कथा उन तमाम जड़ताओं को अनावृत करती चलती है जो इस समाज की प्रगति की राह में सदियों से रोड़ा बनी हुई हैं। जाति के आधार पर ऊँच-नीच का वर्चस्ववादी विभाजन; धर्म, संस्कृति और परम्परा के नाम पर के नाम पर कुरीतियों का महिमामंडन, स्त्रियों की परवशता और उपेक्षा ऐसे ही रोड़े हैं जिनको लेखक ने खासे व्यंग्यात्मक अन्दाज में वर्णित किया है। वह दिखलाता है कि हमारे समाज की कथित महानताओं की नींव इन्हीं रोड़ों-पत्थरों पर टिकी हुई है, वास्तविक प्रगति के लिए उन्हें जल्द से जल्द उखाड़ फेंकना आवश्यक है। यह उपन्यास उस सत्ता-संरचना को करीने से उजागर करता है जिसमें उच्चासन पर बैठी जमात के वर्चस्व के पारम्परिक हथियारों की धार, बदल रहे वक्त के दबाव में, भोथरी होती जा रही है जबकि हमेशा से दबाए गए लोग अब मुखर हो रहे हैं। विशेष यह कि इस बदलाव की वाहक हैं वे स्त्रियाँ जो अब तक अपने मायके के गाँव और पति-पुत्र के नाम से ही अस्तित्व पाती रही हैं, जिन्हें ताउम्र उनके नाम से पुकारा तक नहीं गया। यह चन्द्रकिशोर जायसवाल की लेखनी का कौशल है कि इस उपन्यास में यथार्थ और स्वप्न एक-दूसरे से बिल्कुल घुलमिल गए हैं। यथार्थ जो असहज करता है, बेचैन करता है और स्वप्न जो आश्वस्त करता है, प्रेरित करता है। वस्तुतः ‘दुलारी चाची’ केवल वर्तमान का अंकन नहीं करता बल्कि उन रास्तों को भी रेखांकित करता चलता है जो हमारे समाज को इच्छित भविष्य तक ले जाने वाला है। एक अत्यन्त पठनीय और संग्रहणीय कृति।
Pratinidhi Vyang : Harishankar Parsai
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: हरिशंकर परसाई हिन्दी के पहले रचनाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के-फुल्के मनोरंजन की परम्परागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी पैदा नहीं करतीं, बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने खड़ा करती हैं, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असम्भव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन-मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान-सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा-शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सिर पर नहीं, सामने ही बैठा है।
Pret Katha
- Author Name:
Gyan Chaturvedi
- Book Type:

- Description: ज्ञान चतुर्वेदी ने हिन्दी व्यंग्य को एक नए सिरे से स्थापित किया है। अपने उपन्यासों, निबन्धों और स्तम्भों में वे एक-सी निर्ममता से अपने समय और उसकी सामाजिक-राजनीतिक व नैतिक गाँठों की चीर-फाड़ करते रहे हैं। ‘प्रेत कथा’ उनका पहला व्यंग्य-संग्रह है जो पहली बार 1985 में छपा था और लगभग तभी से अनुपलब्ध भी था। इस संकलन में उनकी कतिपय लम्बी व्यंग्य-रचनाएँ हैं जिन्हें वे खुद भी अपने व्यंग्यकार की आधार-भूमि मानते हैं। ‘धर्मयुग’ के लिए धर्मवीर भारती के आग्रह पर लिखे गए ‘आत्म-व्यंग्य’ से आरम्भ होकर इस संग्रह में लगभग पचास निबन्ध संकलित हैं जो भारतीय समाज में लम्बे समय से जड़ पकड़ते अमानवीयकरण को गहराई से अंकित करते हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप देखेंगे कि अब भी बदला कुछ नहीं है, बल्कि पहले से बदतर ही हुआ है। ‘प्रेत कथा’ के पहले संस्करण पर प्रकाशित डॉ. धनंजय वर्मा की यह टीप ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य को और बेहतर ढंग से समझाती है कि वे इसलिए भी उल्लेखनीय हैं कि ‘उन्होंने सपाट विवरण और चालू नुस्खों के बजाय भारतीय कथा-परम्परा से अपने व्यंग्य की रचना-विधि को समृद्ध किया है। ...रूपक, दृष्टान्त और फैंटेसी के माध्यम से उन्होंने समकालीन यथार्थ को अधिक व्यापक, सांकेतिक और प्रभावशाली ढंग से प्रतिबिंबित किया है।
Rashtriya Naak
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

-
Description:
विष्णु नागर का व्यंग्य सबसे पहला हमला हमारी आदतों और ‘कंडीशनिंग्स’ पर करता है—वे आदतें जो हमारे ‘सामान्य नागरिक’ होने के अहं का निर्माण और पोषण करती हैं और जिनके आधार पर हमारी सुविधा और हमारा यथास्थितिवाद खड़ा होता है। यह व्यंग्य हमारे मुहावरों को विचलित कर देता है और हम यकायक, विकल होकर देखते हैं कि हमारे दैनिक जीवन की जो चीज़ें हमें तक़रीबन ‘परम’ प्रतीत होती हैं, सवाल उन पर भी उठाया जा सकता है, और सबसे बड़ी बात कि, उन पर हँसा भी जा सकता है।
स्थितियों के भीतर व्यंग्य की इस उपस्थिति को पकड़ने के लिए कई बार विष्णु नागर का व्यंग्यकार कल्पना और अतिरंजना का सहारा भी लेता है, लेकिन यह उनका यथार्थ से हटना या कटना नहीं है, बल्कि यथार्थ की एक सुलभ परत से आगे जाकर उसकी कुछ दुर्लभ और दुरूह छवियों तक पहुँचने की कोशिश करना है, इसीलिए कई बार ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ और ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ जैसे मुहावरे भी उनकी व्यंग्य–रचना के प्रस्थान बिन्दु हो सकते हैं जो किसी व्यंग्य का निशाना होने के लिए इतने निरीह, निर्दोष और निष्पक्ष दिखाई देते हैं लेकिन विष्णु नागर उनसे भी अपना लक्ष्य साध लेते हैं।
Balam, Tu kahe Na Hua N.R.I
- Author Name:
Alok Puranik
- Book Type:

-
Description:
आलोक पुराणिक हमारे रोज़मर्रा जीवन की विसंगतियों की शल्य-क्रिया करनेवाले व्यंग्यकार हैं।
‘बालम, तू काहे न हुआ एन.आर.आई.’ उनका महत्त्वपूर्ण व्यंग्य-संग्रह है। इसमें उन्होंने देश-विदेश एवं मिथकीय सन्दर्भों से जहाँ आज के सामाजिक जीवन की विद्रूपताओं को रेखांकित किया है, वहीं राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार पर प्रकाश डालने के साथ अपने स्वार्थों में लिप्त धार्मिक पाखंडियों का भी पर्दाफ़ाश किया है।
व्यंग्य के बहाने लेखक हमारे जीवन से जुड़े उन विरोधाभासों को परत-दर-परत खोलता चलता है जिनका सामना हमें जीवन में क़दम-क़दम पर करना पड़ता है और जहाँ हम नाटकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। स्वार्थों और चालाकियों की भेंट चढ़े रिश्ते हों या बहुराष्ट्रीयता के प्रहसन के सामने अपनी साख बचाती स्थानीयता या फिर स्वतंत्रता बाद के भारत की राजनीति हो, यह सब उनकी लेखनी के दायरे में आते हैं, और इतने स्वाभाविक चुटीलेपन के साथ कि पाठक भावोद्वेलित हुए बिना नहीं रह सकता।
Khabron Ki Jugali
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘ख़बरों की जुगाली’ विख्यात रचनाकार श्रीलाल शुक्ल के लेखन का नया आयाम है। यह न केवल व्यंग्य लेखन के नज़रिए से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि समाज में चतुर्दिक व्याप्त विद्रूपों के उद्घाटन की दृष्टि से भी बेमिसाल है। साठ के दशक में श्रीलाल शुक्ल ने अपनी कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ में जिस समाज के पतन को शब्दबद्ध किया था, वह आज गिरावट की अनेक अगली सीढ़ियाँ भी लुढ़क चुका है। उसकी इसी अवनति का आखेट करती हैं ‘ख़बरों की जुगाली’ की रचनाएँ।
ये रचनाएँ वस्तुत: नागरिक के पक्ष से भारतीय लोकतंत्र के धब्बों, ज़ख़्मों, अन्तर्विरोधों और गड्ढों का आख्यान प्रस्तुत करती हैं। हमारे विकास के मॉडल, चुनाव, नौकरशाही, सांस्कृतिक क्षरण, विदेश नीति, आर्थिक नीति आदि अनेक ज़रूरी मुद्दों की व्यंग्य-विनोद से सम्पन्न भाषा में तल्ख़ और गम्भीर पड़ताल की है ‘ख़बरों की जुगाली’ की रचनाओं ने।
जुगाली को स्पष्ट करते हुए श्रीलाल शुक्ल बताते हैं—“यह जुगाली बहुत हद तक लेखक, पाठकों की ओर से, उनकी सम्भावित शंकाओं और प्रश्नों को देखते हुए कर रहा था। वे प्रश्न और शंकाएँ अभी भी हमारा पीछा कर रही हैं।” इस सन्दर्भ में ख़ास बात यह है कि उन प्रश्नों और शंकाओं के पनपने की वजह मौजूदा सामाजिक व्यवस्था का सतर्क, सचेत ढंग से पीछा कर रही है श्रीलाल शुक्ल की लेखनी।
Thithurata Huaa Gantantra
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

-
Description:
परसाई हँसाने की हड़बड़ी में नहीं होते। वे पढ़नेवाले को देवता नहीं मानते, न ग्राहक, सिर्फ़ एक नागरिक मानते हैं, वह भी उस देश का जिसका स्वतंत्रता दिवस बारिश के मौसम में पड़ता है और गणतंत्र दिवस कड़ाके की ठंड में। परसाई की निगाह से यह बात नहीं बच सकी तो सिर्फ़ इसलिए कि ये दोनों पर्व उनके लिए सिर्फ़ उत्सव नहीं, सोचने-विचारने के भी दिन हैं। वे नहीं चाहते कि इन दिनों को सिर्फ़ थोथी राष्ट्र-श्लाघा में व्यर्थ कर दिया जाए, जैसा कि आम तौर पर होता है।
देखने का यही नज़रिया परसाई को परसाई बनाता है और हिन्दी व्यंग्य की परम्परा में उन्हें अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करता है। प्रचलित, स्वीकृत और उत्सवीकृत की वे बहुत निर्मम ढंग से चीर-फाड़ करते हैं। इसी संग्रह में 'इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर' शीर्षक व्यंग्य में वे भारतीय पुलिस की स्थापित सामाजिक सत्ता को ढेर-ढेर कर देते हैं। परसाई को राजनीतिक व्यंग्य के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है, लेकिन इस संग्रह में उनके सामाजिक व्यंग्य ज़्यादा रखे गए हैं। इन्हें पढ़कर पाठक सहज ही जान सकता है कि सिर्फ़ राजनीतिक विडम्बनाएँ ही नहीं, समाज ने जिन दैनिक प्रथाओं और मान्यताओं को अपनी जीवन-शैली माना है, उनकी खाल-परे छिपे पिस्सुओं को भी वे उतने ही कौशल से देखते और झाड़ते हैं।
परसाई का अपना एक बड़ा पाठक वर्ग हमेशा से रहा है जो उनकी तीखी बातें सुनकर भी उन्हें पढ़ता रहा है। इस संग्रह की यह प्रस्तुति निश्चय ही उन्हें सुखद लगेगी।
Vikalang Shraddha Ka Daur
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: हरिशंकर परसाई ने अपनी एक पुस्तक के लेखकीय वक्तव्य में कहा था–‘व्यंग्य’ अब ‘शूद्र’ से ‘क्षत्रिय’ मान लिया गया है। विचारणीय है कि वह शूद्र से क्षत्रिय हुआ है, ब्राह्मण नहीं, क्योंकि ब्राह्मण ‘कीर्तन’ करता है। निस्सन्देह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता, पर कीर्तन को और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है। कैसे-कैसे अवसर, कैसे-कैसे वाद्य और कैसी-कैसी तानें–जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा विकलांग श्रद्धा का (यह) दौर। विकलांग श्रद्धा का दौर के व्यंग्य अपनी कथात्मक सहजता और पैनेपन में अविस्मरणीय हैं, ऐसे कि एक बार पढक़र इनका मौखिक पाठ किया जा सके। आए दिन आसपास घट रही सामान्य-सी घटनाओं से असामान्य समय-सन्दर्भों और व्यापक मानव-मूल्यों की उद्भावना न सिर्फ रचनाकार को मूल्यवान बनाती है बल्कि व्यंग्य-विधा को भी नई ऊँचाइयाँ सौंपती है। इस दृष्टि से प्रस्तुत कृति का महत्त्व और भी ज्यादा है।
Chhalkat Jaye Gyan Ghat
- Author Name:
K. D. Singh
- Book Type:

- Description: जब ढोल की बात चल ही पड़ी है, तो एक और खास बात है जिस पर आपको गौर करना चाहिए। ... और वह यह है कि, जो ढोल जितनी गहन, गम्भीर आवाज करता है, वह अन्दर से उतना ही खोखला होता है। ढोल की आवाज, उसके आकार-प्रकार पर कम, उसके खोखलेपन पर ज्यादा निर्भर करती है। ढोल की एक पोल भी होती है, जो कभी-कभी खुल जाती है। परम्परागत ढोल की तो पोल खुलते ही वह बजना बन्द हो जाता है और घर के किसी कोने पर सन्यास लेकर पड़ा रहता है, जब तक कि उसे उसकी पोल के साथ पुनः कस न दिया जाय। लेकिन आधुनिक पीढ़ी के ढोल तो, पोल खुलने के बाद भी उतनी ही गम्भीर रिदम के साथ पूरी बेशर्मी से बजते रहते हैं... और मजे की बात यह है कि लोग उसे सुनते भी रहते हैं... पूरी तन्मयता के साथ। बजनेवाले ढोल, अगर आपके नजदीक बज रहे हों, तो वे आपको कर्कश लग सकते हैं... लेकिन ज्यों-ज्यों ढोल और आपके बीच की दूरी बढ़ती जाती है, उनकी आवाज अपेक्षाकृत मधुर होती जाती है, और विश्वसनीय भी।
Sire Se Kharij
- Author Name:
Anoop Mani Tripathi
- Book Type:

- Description: त्रासदी जब जीवन में रोजमर्रा का हिस्सा बन जाती तो वह प्रहसन बन जाती है। दुःख की सघनता करुणा या क्रोध की जगह एक निर्मम हँसी के शिल्प में व्यक्त होती है। व्यंग्य का सम्बन्ध विनोद से नहीं गहरी करुणा से जुड़ा होता है। हरिशंकर परसाई की परम्परा और श्रीलाल शुक्ल की पाठशाला के सिद्ध और प्रसिद्ध व्यंग्यकार अनूप मणि त्रिपाठी की रचनाओं का मूल स्वभाव यही है। एक ऐसे समय में जब लगातार बदरूप होता जा रहा यथार्थ असम्भव कल्पनाओं का भी अतिक्रमण करता जा रहा है तब चित्रण की पुरानी और प्रचलित यथार्थवादी शैली आज के यथार्थ को पकड़ने में नाकाफी होने लगी है। इसी वजह से कविता में फैन्टेसी और बिम्बों का चलन बढ़ा और गद्य का स्वभाव व्यंग्यात्मक होता जा रहा है। ‘सिरे से ख़ारिज’ संग्रह आज की राजनीतिक, सामाजिक (और साहित्यिक भी) विडम्बनाओं पर लेखक की गहरी प्रतिक्रिया और तीखी टिप्पणी के रूप में हमेशा दर्ज किया जाएगा। भले ही लेखक ने रावण की कल्पित कहानियाँ लिखी हैं, लेकिन वह कल्पित रावण की सच्ची कहानियों के रूप में पढ़ी जाएँगी। तब लोग पाएँगे कि इस आर्यावर्त में राजा के प्रेम-पत्र का आलम्बन भारत माता नहीं, सूखे काठ की ठूँठ कुर्सी रही है। 'सिरे से ख़ारिज' के इन वाकयात की असली ताकत यह है कि किताब के हाथ में होने तक ये आपको गुदगुदाएँगे और जब आप पढ़कर किताब को रख देंगे तो धीरे-धीरे अपने आगोश में जकड़ते चले जाएँगे। —देवेन्द्र
Teparesi Ritarns
- Author Name:
B.N. Mallesh
- Rating:
- Book Type:

- Description: ಸಾಮಾಜಿಕ ವಿದ್ಯಮಾನಗಳನ್ನು ಸೂಕ್ಷ್ಮ ದೃಷ್ಟಿಯಿಂದ ನೋಡಿ ಅವುಗಳಿಗೆ ಹಾಸ್ಯದ ಲೇಪನ ನೀಡಿ, ವ್ಯಂಗ್ಯ, ವಿಡಂಬನೆಗಳ ಮೂಲಕ ಆರೋಗ್ಯಕರ ಸಮಾಜ ನಿರ್ಮಾಣದ ಆಶಯದೊಂದಿಗೆ ಇಲ್ಲಿಯ ಬರಹಗಳಿವೆ. ಆಯ್ದ ವಸ್ತು, ನಿರೂಪಣಾ ಶೈಲಿ, ಸಾಮಾಜಿಕ ಹೊಣೆಗಾರಿಕೆಯ ಎಚ್ಚರ ಇಂತಹ ಸಾಹಿತ್ಯಕ ಅಂಶಗಳಿಂದ ಇಲ್ಲಿಯ ಬರಹಗಳು ಓದುಗರ ಗಮನ ಸೆಳೆಯುತ್ತವೆ. There are writings here with the hope of building a healthy society by looking at social phenomena from a sensitive point of view and giving them a coating of humor, irony and satire. The writings here attract the attention of the readers due to such literary elements as selected material, narrative style, awareness of social responsibility.
Mafia Zindabad
- Author Name:
Harish Naval
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
White House Mein Ramleela
- Author Name:
Alok Puranik
- Book Type:

-
Description:
आलोक पुराणिक ने अपनी रचनाओं से व्यंग्य विधा को एक नया शिल्प और सौन्दर्य प्रदान कर विशिष्ट पहचान दी है। ‘व्हाइट हाउस में रामलीला’ उनका महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इस व्यंग्य-संग्रह में उनकी आकार में छोटी दिखनेवाली टिप्पणियाँ विचार का एक
बड़ा कैनवस रचती हैं। आम आदमी की रोज़मर्रा की पीड़ा से लेकर व विश्व फ़लक पर होनेवाली घटनाओं तक सबको उन्होंने इसमें समेटा है।
आज की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विडम्बनाओं का परत-दर-परत खोलते हुए व्यंग्यकार ने उन कारणों की ओर भी संकेत किया है जो इन स्थितियों के मूल में हैं।
कुछ लेखों में धार्मिक आडम्बरों और ढोंगों पर भी व्यंग्य किया गया है जो लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर अपनी जेब भरते हैं।
समसामयिक जीवन और समाज के विभिन्न पक्षों पर तीखी निगाह से दृष्टिपात करते ये व्यंग्य-लेख निश्चय ही पाठकों को लम्बे समय तक याद रहेंगे।
Kahat Kabeer
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

-
Description:
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को श्रेष्ठतम इसलिए कहा जाता है कि उनका उद् देश्य कभी पाठक को हँसाना भी नहीं रहा। न उन्होंने हवाई कहानियाँ बुनीं, न ही तथ्यहीन विद्रूप का सहारा लिया। अपने दौर की राजनीतिक उठापटक को भी वे उतनी ही ज़िम्मेदारी और नज़दीकी से देखते थे जैसे साहित्यकार होने के नाते आदमी के चरित्र को। यही वजह है कि समाचार-पत्रों में उनके स्तम्भों को भी उतने ही भरोसे के साथ, बहैसियत एक राजनीतिक टिप्पणी पढ़ा जाता था जितने उम्मीद के साथ उनके अन्य व्यंग्य-निबन्धों को।
इस पुस्तक में उनके चर्चित स्तम्भ 'सुनो भई साधो' में प्रकाशित 1983-84 के दौर की टिप्पणियाँ शामिल हैं। यह वह दौर था जब देश खालिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहा था। ये टिप्पणियाँ उस पूरे दौर पर एक अलग कोण से प्रकाश डालती हैं, साथ ही अन्य कई राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं का उल्लेख भी इनमें होता है। ज़ाहिर है ख़ास परसाई-अन्दाज़ में। मसलन, 21 नवम्बर, 83 को प्रकाशित ‘चर्बी, गंगाजल और एकात्मता यज्ञ’ शीर्षक लेख की ये पंक्तियाँ। “काइयाँ साम्प्रदायिक राजनेता जानते हैं कि इस देश का मूढ़ आदमी न अर्थनीति समझता, न योजना, न विज्ञान, न तकनीक, न विदेश नीति। वह समझता है गौमाता, गौहत्या, चर्बी, गंगाजल, यज्ञ। वह मध्ययुग में जीता है और आधुनिक लोकतंत्र में आधुनिक कार्यकर्म पर वोट देता है। इस असंख्य मूढ़ मध्ययुगीन जन पर राज करना है तो इसे आधुनिक मत होने दो।”
Shesh Agale Prishth Par
- Author Name:
K. D. Singh
- Book Type:

- Description: यह किताब एक ऐसे लेखक की है जो लेखन की दुनिया का पेशेवर बाशिन्दा नहीं है, फिर भी गद्य की एकदम ताज़ा पृष्ठभूमि से आया है, जहाँ विद्यार्थी जीवन के हल्के-फुल्के और रोचक अनुभवों के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। उसने स्वयं कहा है कि ‘यह उपन्यास नहीं है’ और मैं इस तरह की कोशिश को ‘विधाओं में एक तोड़-फोड़’ कहता हूँ। यह तोड़-फोड़ सार्थक है, समर्थ है और पठनीय है। नये लोग कविता की तरह गद्य में भी नई संरचना लेकर आएँगे तो निश्चित ही समृद्धि आएगी—भाषा में, रूप में और विन्यास में भी। —दूधनाथ सिंह
Khattar Kakak Tarang
- Author Name:
Harimohan Jha
- Book Type:

- Description: खट्टर कका आई सँ पछस्तर साल पहिने ‘प्रकट’ भेलाह। केना? इ रहस्य बाद मे, मुदा भाङक भांगक तरंग मे एहन-एहन गूढ़ अर्थक फुलझड़ी छोड़ल जा सकैत अछि, इ प्रतिभा खट्टर कका कें छोड़ि कऽ ककरो लग नहि अछि। ओ कखनो सोमरस कें भाङ सिद्ध क दैत छैथ, तऽ आयुर्वेद कें महाकाव्य। कखनो अपन तर्क सँ भगवान कें मौसा बना लैत छैथ, तऽ कखनो समधि। ओ पातिव्रत्य कें व्यभिचार साबित कऽ सकैत छैथ, तऽ असती कें सती। हुनकर नजर मे कामदेव सृष्टि कें कर्ता छैथ। जेना कबीरदासक उनटे वाणी कहल जायत अछि, तहिना खट्टर कका उनटे गंङ्गा बहबैत छैथ। तरंग मे कहल हुनकर गप्पक जवाब प्रकांड पंडितो कें नहि फुरैत छहिन। हुनकर किछु तरंग देखू—ब्रह्मचारी कें वेद नहि पढ़बाक चाही, पुराण बहु-बेटी कें योग्य नहि अछि, दुर्गाक कथा स्त्रैण रचनै छैथ, गीता मे श्रीकृष्ण अर्जुन कें फुसला लेलथिन, दर्शनशास्त्रक रचना रस्सी देखि क भेल अछि, असली ब्राह्मण विदेश मे रहैत छैथ, मूर्खताक कारण पंडितगण छैथ, दही-चूड़ा-चीनी सांख्यक त्रिगुण अछि, स्वर्ग गेला पर धर्म भ्रष्ट भ जायत आदि। इ जनैत कि हुनकर तरंग कर्मकाडी कें लाल-पीअर करैत अछि, खट्टर कका मस्त रहैत छैथ, भांग घोंटैत रहैत छैथ, आ आनन्द-विनोदक वर्षा करैत रहैत छैथ। जेना शुरू मे कहल गेल कि खट्टर कका प्रकट भेलाह, तऽ ओ प्रकट होयते प्रसिद्ध भ गेलाह। मैथिलिए मे नहि, हिन्दी, गुजराती आदि भाषा मे सेहो पढ़ल गेलाह। ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ जकाँ पत्रिका खट्टर ककाक किछु तरंग छपलक। हुनकर लोकप्रियता एहन छलैन्हि कि हुनकर परिचय-पात, घर-द्वार जनैत लेल चिट्ठी आबऽ लागल। खट्टर कका हँसी-हँसी मे जरूर तरंग छोड़ैत छैथ, मुदा ओकरा ओ अपन तर्क सँ प्रमाणित सेहो क दैत छथिन। वेद, उपनिषद, पुराण सब पर हुनकर पकड़ छैन। तर्कक जाल एहन बुनताह कि पाठकगण सोच मे पड़ि जेताह। हुनकर चश्मा सँ देखब, त इ दुनिया मे सब उनिटा नजर आयत। मुदा, हुनकर बातक रस आ विनोद पाठकगण कें सब उलझन सुलझा दैतेन, इ भरोसा अछि।
Chhichhorebaji Ka Resolution
- Author Name:
Piyush Pandey
- Book Type:

-
Description:
पीयूष पांडे का व्यंग्य-लेखन एकदम नई तरह का इसलिए नहीं है कि ये ख़ुद
नए हैं, बल्कि इसलिए नया है कि इनकी चेतना एकदम आधुनिक है। एकदम छोटे बच्चे भी पर्याप्त बूढ़े हो सकते हैं चेतना के स्तर पर। और एकदम बूढ़े भी बच्चे हो सकते हैं चेतना के स्तर पर। पीयूष पांडे ने व्यंग्य के विषय तलाशे नहीं हैं, विषय उनके आसपास टहल रहे हैं। एसएमएस, फेसबुक, मजनूँ से लेकर पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था तक के विषय उनके व्यंग्य लेखन में हैं। विषयों की तलाश व्यंग्यकारों को परेशान करती है। पर पीयूष पांडे उस परेशानी से जूझते नहीं दिखते। जो भी विषय है, उस पर अपनी दृष्टि से लिखो, व्यंग्य हो जाएगा, वह इस सिद्धान्त पर अमल करते हुए दिखते हैं। पर पीयूष पांडे के व्यंग्य की ख़ास बात यह है कि वह व्यंग्य लेखों का इस्तेमाल सिर्फ़ हँसाने के लिए नहीं करते। इधर, व्यंग्यकारों की बहुत बड़ी फ़ौज इस तरह के सिद्धान्त पर काम कर रही है कि किसी भी गद्य में हँसने के चार-छह मौक़े धर दो, व्यंग्य हो जाएगा। व्यंग्यकारों का एक बड़ा वर्ग इसके उलट यह भी मानता है कि व्यंग्य को हँसने-हँसाने का काम तो करना ही नहीं चाहिए।
पीयूष एक सीधे रास्ते पर चलते हैं। स्थितियों को जैसी हैं, वैसी हैं, उन्हें पेश कर देते हैं। उनमें हँसी का स्कोप है, तो हँस लीजिए। पर बेवजह हँसाने की कोशिश नहीं है। मोबाइल, फेसबुक जैसी आसपास इतनी आधुनिक चीज़ें हैं कि ख़ास तौर पर शिक्षित युवा इनसे मुक्त नहीं रह सकते। कई तरह की स्थितियाँ व्यंग्य बन रही हैं। एक तरह से देखें, तो पीयूष पांडे की यह किताब नए बनते व्यंग्य का आईना है। बदलती परिस्थितियों का आईना है, जो कि व्यंग्य को होना चाहिए। पीयूष ख़ुद मीडिया से जुड़े हुए हैं, इसलिए मीडिया की आन्तरिक परिस्थितियों को बख़ूबी समझते हैं। इस पुस्तक में मीडिया पर कुछ शानदार व्यंग्य लेख हैं। मीडिया कैसी मदारीगिरी में बिजी है, यह बात इस पुस्तक में बार-बार सामने आती है।
वास्तविक दुनिया में वर्चुअल दुनिया यानी आभासी दुनिया किस तरह से प्रवेश करती है, इस पुस्तक में बार-बार दिखाई देता है। कुल मिलाकर कहें, तो यह नए ज़माने के व्यंग्य की किताब है। जो कई तरह के नए मानकों का निर्माण करेगी। व्यंग्य के नए और पुराने छात्रों को इस किताब को पढ़ना चाहिए, ऐसी मेरी रिकमंडेशन है। इसे पढ़ना सब लोग रिजोल्यूशन बनाएँगे, ये मेरी शुभकामना है।
—आलोक पुराणिक
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book