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शाइरों और अदीबों की हाज़िरजवाबी, तंज और मजाहिया गुफ़्तगू में भी शाइरी और इल्म की गहरी बातें छिपी होती हैं| ये चीज़ें किसी भाषा के अदब का अनौपचारिक विस्तार ही नहीं होतीं, उस साहित्य और समाज की आत्मा में झाँकने का एक खूबसूरत झरोखा हैं| इस किताब में शामिल लतीफ़ों से लगभग दो सौ सालों के महान शाइरों, संपादको, सियासी शख्शियतों और पत्रकारों का किरदार उभरता है| साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप का बौद्धिक परिदृश्य बनता दिखाई पड़ता है|
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शाइरों और अदीबों की हाज़िरजवाबी, तंज और मजाहिया गुफ़्तगू में भी शाइरी और इल्म की गहरी बातें छिपी होती हैं| ये चीज़ें किसी भाषा के अदब का अनौपचारिक विस्तार ही नहीं होतीं, उस साहित्य और समाज की आत्मा में झाँकने का एक खूबसूरत झरोखा हैं| इस किताब में शामिल लतीफ़ों से लगभग दो सौ सालों के महान शाइरों, संपादको, सियासी शख्शियतों और पत्रकारों का किरदार उभरता है| साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप का बौद्धिक परिदृश्य बनता दिखाई पड़ता है|
Book Details
-
ISBN9789392088117
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह पुस्तक कुछ लोगों की इस धारणा को झुठलाती है कि श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य की परम्परा उर्दू में तो है, हिन्दी में नहीं; अथवा यदि है तो भी स्तरीय नहीं है। वस्तुतः हिन्दी-उर्दू व्यंग्य लेखन पर इस तरह विचार करना ग़लत है, क्योंकि सम्पादक के ही शब्दों में कहें तो “कम-से-कम अब यह स्थिति ज़रूर आ गई है, जब लिपि को छोड़कर उर्दू और हिन्दी, दोनों भाषाओं में और कोई अन्तर नहीं रहा।” इसलिए यदि उर्दू के पतरस बुखारी से लेकर कृष्ण चंदर तक तथा हिन्दी के अन्नपूर्णानन्द से लेकर लतीफ़ घोंघी तक की व्यंग्य रचनाओं को यहाँ देखा जाएगा तो अपने समय की धड़कनें उनमें समान रूप से सुनी जा सकेंगी।
वर्तमान जीवन के विविध क्षेत्रों में निहित जड़ीभूत संस्कारों और विद्रूपताओं पर ये रचनाएँ कसकर प्रहार करती हैं। इस प्रक्रिया में अनेकानेक दुर्लभ व्यंग्य-स्थितियाँ, धारदार भाषा-शैली, शिल्पगत अनूठे प्रयोग तथा यथार्थ को पारदर्शी बनाती हुई वैचारिकता संकलित निबन्धों को सहज ही अविस्मरणीय बना देती है। दूसरे शब्दों में हम हँसी-हँसी में ही सोच के गम्भीर बिन्दुओं का स्पर्श करने लगते हैं।
Buddhiprakash
- Author Name:
Sampat Saral
- Book Type:

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सम्पत सरल को ज़्यादातर लोग मंच से जानते हैं जहाँ वे पिछले कई वर्षों से उल्लेखनीय निडरता के साथ न सिर्फ़ समाज, बल्कि सरकार को भी आईना दिखाते रहे हैं। ‘बुद्धिप्रकाश’ उनके व्यंग्य निबन्धों की पुस्तक है; और इन्हें पढ़कर कोई भी कहेगा कि जिस धारदार, सधे और सुँते हुए व्यंग्य की कमी हिन्दी में काफ़ी समय से खल रही थी, वह अब हमारे सामने है। हमारे आसपास ऐसी बहुत कम चीज़ें रह गई होंगी, जिन्हें व्यंग्य का विषय बनाते हुए किसी को कोई संकोच हो; जीवन का, सामाजिक व्यवस्था का अधिकांश अपने विरोधाभासों के चलते स्वयं ही व्यंग्य है। लेकिन चीज़ों के बाह्य आडम्बरों, शक्ति और सामर्थ्य की अभेद्य भंगिमाओं और रंध्रहीन व्यवस्था को बेधकर उनके भीतर के व्यंग्य को पकड़ना—इसके लिए एक निगाह चाहिए, जो सम्पत सरल के पास है; और उसे बिना किसी लाग-लपेट के साफ़-साफ़ उकेर देनेवाली भाषा भी। इस संकलन में शामिल निबन्धों को पढ़ते हुए जो चीज़ सबसे पहले महसूस होती है वह यही कि वे अपनी एक भी पंक्ति को व्यर्थ नहीं जाने देते; हर वाक्य सही निशाने पर जाकर लगता है; और हर बात अपने अनूठेपन में हमें नई लगती है। हास्य उनके व्यंग्य के साथ स्वयं चला आता है, अनायास, एक साथ कई दिशाओं में मार करता हुआ, जैसे कि उन्होंने अपने इस समय को सांगोपांग समझ लिया हो। यह पुस्तक आपको बार-बार अपने पास बुलाएगी।
Ishwar Bhi Pareshan Hai
- Author Name:
Vishnu Nagar
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‘ईश्वर भी परेशान है’ विष्णु नागर की व्यंग्यधर्मिता का रोचक उदाहरण है। समकालीन हिन्दी व्यंग्य की गहमागहमी में उनकी शैली अलग से पहचानी जाती है। सामाजिक परिवर्तन के भीतर सक्रिय अन्तर्विरोधों की पहचान, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के मलिन मुख और निजी जीवन में नैतिकता के चक्रव्यूह आदि को बूझने में विष्णु नागर का जवाब नहीं। यही वजह है कि वे कम शब्दों में प्रभावपूर्ण ढंग से विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। विष्णु नागर के इस व्यंग्य संग्रह की एक और विशेषता पाठक का ध्यान खींचती है। वह है, सामाजिक घटनाओं या प्रसंगों पर लेखन की चुटीली टिप्पणियाँ। लोकतंत्र की लीला में प्रतिक्षण ऐसे कार्य होते और दिखते हैं जो विडम्बनाओं से भरे होते हैं। इन कार्यों में छिपे मन्तव्यों पर उँगली टिकाते हुए लेखक ने उन्हें उजागर किया है। ‘मतदाता उछलो मत!’ में विष्णु नागर लिखते हैं कि ‘हे बीटा, आज अकाद लो।... कल हमारे द्वारे पर हुजूर कहते हुए आओगे, गिड़गिड़ाओगे, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम क्या हो और हम क्या हैं!... तब तुम्हें पता चलेगा कि हम किसके थे, किसके हैं और किसके रहेंगे।’ पुरानी उक्ति है कि कठिन बात सरलता से कह जाना मुश्किल काम है। विष्णु नागर ने अपनी व्यंजनापूर्ण भाषा से यही काम किया है!
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