Lohe Ki Kamarpetiyan
(0)
Author:
Tapi Dharma RaoPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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स्वर्गीय तापी धर्माराव के लेखन का फ़ोकस मुख्यत: समाज सुधार रहा है। तेलगू में इनकी पुस्तकें लोकप्रियता के शिखर पर रही हैं। इस पुस्तक में विख्यात लेखक ने कमरपेटियों की परम्परा और इतिहास को अपना विषय बनाया है। कमरपेटियाँ हमारी परम्परा में जड़ी यौन–वर्जनाओं, पुरुष–वर्चस्व और शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों की चरम और सर्वाधिक नृशंस अभिव्यक्ति हैं। इस पुस्तक में कमरपेटियों के इतिहास, उनके समाज–नीतिशास्त्र और वर्तमान में उनके लोक–प्रचलित अवशेषों का सरल, जनसाधारण की भाषा में विवरण दिया गया है। लेखक बताते हैं कि मरुगुबिल्लाओं (लाज–रक्षक पदक) के रूप में आज आन्ध्र में जो आभूषण प्रचलित है, वह कमरपेटियों का ही इमिटेशन है। उसके अलावा पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों और खुदाइयों में मिली कमरपेटियों, उनके प्रकारों और उनसे जुड़ी किंवदन्तियों के बारे में प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में है।
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स्वर्गीय तापी धर्माराव के लेखन का फ़ोकस मुख्यत: समाज सुधार रहा है। तेलगू में इनकी पुस्तकें लोकप्रियता के शिखर पर रही हैं। इस पुस्तक में विख्यात लेखक ने कमरपेटियों की परम्परा और इतिहास को अपना विषय बनाया है।
कमरपेटियाँ हमारी परम्परा में जड़ी यौन–वर्जनाओं, पुरुष–वर्चस्व और शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों की चरम और सर्वाधिक नृशंस अभिव्यक्ति हैं। इस पुस्तक में कमरपेटियों के इतिहास, उनके समाज–नीतिशास्त्र और वर्तमान में उनके लोक–प्रचलित अवशेषों का सरल, जनसाधारण की भाषा में विवरण दिया गया है। लेखक बताते हैं कि मरुगुबिल्लाओं (लाज–रक्षक पदक) के रूप में आज आन्ध्र में जो आभूषण प्रचलित है, वह कमरपेटियों का ही इमिटेशन है। उसके अलावा पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों और खुदाइयों में मिली कमरपेटियों, उनके प्रकारों और उनसे जुड़ी किंवदन्तियों के बारे में प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में है।
Book Details
-
ISBN9788171196166
-
Pages79
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Prayagraj Aur Kumbh : Sanskritik Vaibhav Ki Abhinav Gatha
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Zilani Bano +1
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प्रयागराज को तीर्थराज कहा गया है। यह भारत का सर्वप्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्त्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है। यह हिन्दू-आस्था का एक महान केन्द्र तो है ही, यह हमारे देश की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का केन्द्रबिन्दु भी है। प्रयागराज के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन मत्स्य, पद्म और कूर्म पुराण के कई अध्यायों में मिलता है। कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान-दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है। उन श्रद्धालुओं को कभी कोई निमंत्रण नहीं देता, वे श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर वहाँ खिंचे चले आते हैं। हमारी सनातन सस्कृति का यह चुम्बकीय आकर्षण अनादिकाल से यथावत् बना हुआ है। श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है। यह परम्परा हमें अपनी मूल संस्कृति से जोड़े रखने के साथ ही सांस्कृतिक एकीकरण का पथ भी प्रशस्त करती है। स्वाभाविक रूप से प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास के बारे में जानना-समझना एक सुखद अनुभूति है। बहरहाल, अभिलेखीय और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास को इस पुस्तक में बहुत ही सरस ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें प्रामाणिकता और रोचकता का मणि-कांचन संयोग है। यह पुस्तक हमारे देश के सांस्कृतिक वैभव की एक अभिनव गाथा लेकर आई है।
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