Kurma Purana
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To save the world from cosmic annihilation, Lord Vishnu takes on his second avatar, the Kurma, or tortoise. The Kurma Purana is one of the eighteen classic Hindu texts known collectively as the Puranas. Its origins can be traced back to 600 to 900 CE. In this text, we encounter Indradyumna, Varaha, Devi, Vyasa, and Shiva's divine presence as we delve into the deep and nuanced tale of one of the greatest Hindu legends. This translation of the Kurma Purana by Bibek Debroy, the seventh book in the Purana series, attempts to bring readers the rich and layered history of our myths and classics. Previous books in the series include the Bhagavata Purana, Brahma Purana, Markandeya Purana, Brahmanda Purana, Vishnu Purana and the Shiva Purana.
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To save the world from cosmic annihilation, Lord Vishnu takes on his second avatar, the Kurma, or tortoise. The Kurma Purana is one of the eighteen classic Hindu texts known collectively as the Puranas. Its origins can be traced back to 600 to 900 CE. In this text, we encounter Indradyumna, Varaha, Devi, Vyasa, and Shiva's divine presence as we delve into the deep and nuanced tale of one of the greatest Hindu legends.
This translation of the Kurma Purana by Bibek Debroy, the seventh book in the Purana series, attempts to bring readers the rich and layered history of our myths and classics.
Previous books in the series include the Bhagavata Purana, Brahma Purana, Markandeya Purana, Brahmanda Purana, Vishnu Purana and the Shiva Purana.
Book Details
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ISBN9780143469582
-
Pages600
-
Avg Reading Time20 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
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