Shri Guru Granth-Darshan
(0)
Author:
Jai Ram Mishra, Jairam MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
300
₹ 240 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘गुरुग्रन्थ’ की अधिकांश रचनाएँ उन सिक्ख गुरुओं की हैं जो सीधे गुरु नानक देव की शिष्य-परम्परा में आते हैं तथा जिन्हें क्रमश: उन्हीं की ‘ज्योति का प्रतिरूप’ रहते आने के कारण, 'नानक' संज्ञा द्वारा अभिहित करने की परिपाटी भी चली आई है। इसमें संगृहीत वाणियों के रचयिताओं की चेष्टा अधिकतर यही जान पड़ती है कि जो कुछ वास्तविक सत्य के रूप में अनुभूत हो उसे स्वयं अपने जीवन में भी उतारा जाए तथा वैसा ही करने का परामर्श किसी दूसरे को भी दिया जाए। वैसे सत्य का स्वरूप सदा एकरस एवं विश्वजनीन ही हो सकता है। ‘गुरुग्रन्थ' की एक ऐसी अन्य विशेषता, उसमें संगृहीत विविध रचनाओं के क्रमदान में भी पाई जा सकती है। उसमें आए हुए पदों को कोई ऐसा शीर्षक भी दिया हुआ नहीं मिलता जो विषयानुसार निश्चित किया गया हो तथा जिसके सहारे हमें उस मत-विशेष का परिचय मिल सके जिसे उनके रचयिताओं ने प्रकट किया होगा। उनका क्रम केवल रागानुसार ही स्थिर किया गया जान पाता है जिससे इस विषय में, हमें कोई भी सहायता नहीं मिल पाती। हमें यहाँ प्रत्यक्षत: केवल इतना ही पता चल पाता है कि सिक्ख गुरुओं ने, तथा कतिपय सन्तों, भक्तों ने एवं सूफियों तक ने भी एक ही प्रकार के गीत गाए होंगे।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
‘गुरुग्रन्थ’ की अधिकांश रचनाएँ उन सिक्ख गुरुओं की हैं जो सीधे गुरु नानक देव की शिष्य-परम्परा में आते हैं तथा जिन्हें क्रमश: उन्हीं की ‘ज्योति का प्रतिरूप’ रहते आने के कारण, 'नानक' संज्ञा द्वारा अभिहित करने की परिपाटी भी चली आई है।
इसमें संगृहीत वाणियों के रचयिताओं की चेष्टा अधिकतर यही जान पड़ती है कि जो कुछ वास्तविक सत्य के रूप में अनुभूत हो उसे स्वयं अपने जीवन में भी उतारा जाए तथा वैसा ही करने का परामर्श किसी दूसरे को भी दिया जाए। वैसे सत्य का स्वरूप सदा एकरस एवं विश्वजनीन ही हो सकता है।
‘गुरुग्रन्थ' की एक ऐसी अन्य विशेषता, उसमें संगृहीत विविध रचनाओं के क्रमदान में भी पाई जा सकती है। उसमें आए हुए पदों को कोई ऐसा शीर्षक भी दिया हुआ नहीं मिलता जो विषयानुसार निश्चित किया गया हो तथा जिसके सहारे हमें उस मत-विशेष का परिचय मिल सके जिसे उनके रचयिताओं ने प्रकट किया होगा। उनका क्रम केवल रागानुसार ही स्थिर किया गया जान पाता है जिससे इस विषय में, हमें कोई भी सहायता नहीं मिल पाती। हमें यहाँ प्रत्यक्षत: केवल इतना ही पता चल पाता है कि सिक्ख गुरुओं ने, तथा कतिपय सन्तों, भक्तों ने एवं सूफियों तक ने भी एक ही प्रकार के गीत गाए होंगे।
Book Details
-
ISBN9789388211604
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Shri Rambhakt : Shaktipunj Hanuman
- Author Name:
Jairam Mishra +1
- Book Type:

- Description:
‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम’ ने कहा है—लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है परन्तु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। अवतार श्रीराम का यह कथन हनुमानजी के महान व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है। श्रीराम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान कि जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्भुत, अप्रतिम, एकान्त भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलम्बन बन जानेवाला हनुमान जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं। यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मन्दिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं। इस पुस्तक की रचना में ‘वाल्मीकीय रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ तथा ‘आनन्द रामायण’ से विशेष सहायता ली गई है। ‘स्कंदपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि एवं ‘महाभारत’ (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों—‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ एवं ‘कम्बन’ रचित ‘कम्ब रामायण’ (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है। इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ रचित ‘आंजनेय' कल्याण पत्रिका के ‘हनुमानांक’ (1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व और मूर्ति का विकास’ आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गई है।
Leela Purshottam Bhagwan Srikrishna : Vyaktitva Aur Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra +1
- Book Type:

- Description:
भगवान श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी, सर्वलोक स्वरूप, नित्य शासक, रणधीर एवं अविचल हैं। भीष्म पितामह की इस मान्यता के बाद द्रौपदी का यह कथन, ‘हे सच्चिदानन्द-स्वरूप श्रीकृष्ण महायोगिन विश्वात्मन्, गोविन्द, कौरवों के बीच कष्ट पाती हुई मुझ शरणागत अबला की रक्षा कीजिए।’ श्रीकृष्ण के सर्वमान्य एवं सर्वव्यापी चरित्र की एक झलक मात्र प्रस्तुत करता है। सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय में ऐसा बहुआयामी तथा लोकरंजक दूसरा चरित्र नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक में भगवान कृष्ण के लीलाधाम स्वरूप का विस्तृत विवेचन इस तरह प्रस्तुत किया गया है जिससे पाठक उनके लौकिक तथा दार्शनिक पक्षों को सहज ही हृदयंगम कर सकेंगे। लीलाधर भगवान् श्रीकृष्ण के क्रिया-कलापों के संक्षिप्त विवरण उनके पूरे जीवन-विस्तार से इस तरह चुने गए हैं कि उनका एक मनोहारी सर्वव्यापी और सम्पूर्ण चरित्र लोगों के सामने समुपस्थित हो सके। श्रीकृष्ण सम्बन्धी अनन्त एवं अपार कथा-सागर से कोई भी लेखक कुछ बूँदें ही चुन सकता है। शर्त व्यक्ति अथवा लेखक की अपनी धारणा का है। विश्वरूप श्रीकृष्ण में वह सब है जो समस्त प्रकृति अथवा मनुष्य के प्रज्ञान में संचित है। ज्ञेय अथवा अज्ञेय स्वरूप के सम्पूर्ण व्याख्यान की क्षमता बेचारे मनुष्य में कहाँ है। वह अपनी जिज्ञासा के अनुसार उस विश्वव्यापी चरित्र का एक नन्हा आयाम ही देख पाया है। पं. जयराम मिश्र ने एक विनम्र जिज्ञासु की तरह कृष्ण के सच्चिदानन्द, विश्वात्मन् स्वरूप को इस पुस्तक में प्रस्तुत कर हिन्दी पाठकों की महती सेवा की है तथा भारतीय संस्कृति और संज्ञान को सर्व सुलभ बनाया है।
Leela Purshottam Bhagwan Srikrishna : Vyaktitva Aur Darshan
Jairam Mishra
20% off₹ 175
₹ 140
Available
Aadi Shankracharya : Jeewan Aur Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra +1
- Book Type:

- Description:
आठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में जैन धर्म, बौद्ध धर्म तथा अन्य अनेक सम्प्रदायों और मत-मतान्तरों का बोलबाला था। जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। जैन धर्म को खुलकर चुनौती दी। जैन धर्म भी वैदिक धर्म का कम विरोधी नहीं था। बौद्ध और जैन धर्मों के अतिरिक्त सातवीं-आठवीं शताब्दी में अन्य धार्मिक सम्प्रदाय भी प्रचलित हो गए थे। उनमें भागवत, कपिल, लोकायतिक (चार्वाक), काणाडी, पौराणिक, ऐश्वर, कारणिक, कारंधमिन (धातुवादी), सप्ततान्त्व (मीमांसक), शाब्दिक (वैयाकरण), पांचेरात्रिक प्रमुख थे। ये सभी सम्प्रदाय वेद-विरोधक और श्रुति-निन्दक थे। ऐसी विषम और भयावह स्थिति में धार्मिक जगत में किसी ऐसे उत्कट त्यागी, निस्पृह, वीतराग, धुरंधर विद्वान, तपोनिष्ठ, उदार, सर्वगुण-संपन्न अवतारी पुरुष की महान आवश्यकता थी जो धर्म की विशृंखलित कड़ियों को एकाकार करके उसे सुदृढ़ बनाता और धर्म का वास्तविक स्वरूप सबके सम्मुख प्रस्तुत करता। मध्वाचार्य ने शंकराचार्य के अवतार का वर्णन विस्तार के साथ किया है। उसका सारांश इस प्रकार है—"भगवती भूदेवी और समस्त देवताओं ने जगत-सृष्टा ब्रह्मा के साथ कैलाश पर्वत पर जाकर पिनाकपाणी आशुतोष भगवान शंकर की आर्त्त वाणी में करबद्ध स्तुति की। तब भगवान शंकर उन लोगों के सम्मुख अत्यन्त तेजस्वी रूप में प्रकट हुए और उन्हें इस प्रकार आश्वासन दिया—‘हे देवगण, मैं समस्त घटनाओं से भली-भाँति विज्ञ हूँ। अतः मैं मनुष्य का रूप धारण कर आप लोगों की मनोकामना पूर्ण करूँगा। दुष्टाचार विनाश के लिए तथा धर्म के स्थापन के लिए, ब्रह्मसूत्र के तात्पर्य निर्णायक भाष्य की रचना कर, अज्ञानमूलक द्वैतरूपी अन्धकार को दूर करने के लिए मध्यकालीन सूर्य की भाँति चार शिष्यों के साथ चार भुजाओं से युक्त विष्णु के समान इस भूतल पर यतियों में श्रेष्ठ शंकर नाम से अवतरित होऊँगा। मेरे समान ही आप लोग भी मनुष्य-शरीर धारण कर मेरे कार्य में हाथ बँटाइए।’ इतना कहकर और देवताओं को अन्य आवश्यक निर्देश देकर भगवान शंकर अन्तर्धान हो गए!" आचार्य शंकर का भारतीय दार्शनिकों में अप्रतिम स्थान है। पाश्चात्य दार्शनिक भी उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं और उनकी प्रतिभा के सम्मुख नतमस्तक हैं। उनके बाल्यकाल से देहलीला सँवरण तक की घटनाएँ चमत्कारिक एवं दैवी शक्ति से परिपूर्ण हैं। इसलिए उन्हें भगवान आशुतोष शंकर का अवतार माना जाता है। उन्होंने वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया और उसके वास्तविक स्वरूप को सही अर्थ में समझाने की चेष्टा की। इस महान प्रयास में उन्हें तत्कालीन धर्मों और सम्प्रदायों से लोहा लेना पड़ा। शैवों, शाक्तों, वैष्णवों, बौद्धों, जैनों एवं कापालिकों आदि से शास्त्रार्थ करना पड़ा। अपनी असाधारण प्रतिभा और अकाट्य तर्कों द्वारा उन्हें पराजित किया। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में चार शंकराचार्य को अभिषिक्त कर भारतीय वैदिक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा। उन्होंने शैवों, शाक्तों एवं वैष्णवों को एक सूत्र में बाँधा। इससे वैदिक धर्म अत्यन्त शक्तिशाली हो गया। मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अद्वितीय आश्चर्यजनक कार्य किए।
Maryada Purushottam Bhagwan Ram : Jivan Aur Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra +1
- Book Type:

- Description:
श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम तो हैं ही, पूर्ण ब्रह्म के अवतार भी हैं। महामानव और आदर्श मानव के रूप में वह सद्प्रेरणा के अजस्र स्रोत हैं। पर श्रीराम के अवतार स्वरूप को, मोक्ष को जीवन का परम पुरुषार्थ माननेवाला आस्तिक बुद्धिसम्पन्न ईश्वरवादी ही ठीक-ठीक जानता-समझता है। श्रीराम भारतीय धर्म-संस्कृति के अनिवार्य और अपरिहार्य अंग हैं! इसीलिए ईश्वर के विभिन्न नामों में साधना की दृष्टि से रामनाम का महत्त्व सर्वोपरि है। आज के पंकिल कुहासे को नष्ट करने के लिए श्रीराम जैसे चन्दन चर्चित चरित्र में अवगाहन की महती आवश्यकता मानवता को है। वह श्रीराम, जो समस्त भारतीय साधना और ज्ञान-परम्परा के वागद्वार हैं, जिनका दृढ़चरित्र लोक-मर्यादा के कठोर अंकुश से अनुशासित है और जो जन-जन के मन को ‘रस विशेष’ से आप्लावित कर सकता है। इस पुस्तक के लेखक डॉ. जयराम मिश्र राम-साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान ही नहीं, राम-स्वरूप के ज्ञाता और उसमें रमे हुए सन्त हैं। हमें विश्वास है कि यह ग्रन्थ वाल्मीकि और तुलसी की रामकथा-परम्परा की एक कड़ी बनेगा।
Guru Nanak Dev : Jivan Aur Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra +1
- Book Type:

- Description:
डॉ. जयराम मिश्र ने इस पुस्तक में गुरुमत दर्शन को गुरुनानक देव जी की जीवन-घटनाओं द्वारा प्रकट किया है। स्थान-स्थान पर गुरुदेव के उच्चारित शब्दों की व्याख्या की गई है, ताकि साधारण पाठक गुरुमत सम्बन्धी ठीक-ठीक परिचय प्राप्त कर सकें। घटनाओं के आन्तरिक तथ्य को लेखक ने विस्तारपूर्वक प्रकट किया है।... डॉ. मिश्र की लेखनी में बल है। उनका गुरुमत का शान विषद् और निर्दोष है।...इस पुस्तक का स्रोत चाहे हमारी जन्म साखियाँ क्यों न हों, परन्तु जिस सुयोग्य ढंग से घटनाओं का वर्णन किया गया है, वह लेखक की मौलिकता का परिचायक है।...पुस्तक के अन्त में दो अध्याय व्यक्तित्व एवं दर्शन सम्बन्धी अलग दिए गए हैं।... मैं इस मनोहर रचना के लिए डॉ. जयराम मिश्र को बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि यह रचना हिन्दी पाठकों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगी। —डॉ. सुरेन्द्रसिंह कोहली वरिष्ठ प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, पंजाबी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़।
Gorakh-Vijay
- Author Name:
Brajendra Kumar Singhal +1
- Book Type:

- Description:
‘गोरख विजय' नाथपंथ के महान योगी गुरु गोरखनाथ से सम्बन्धित पुरातन बाग्रा काव्य ग्रन्थ ‘गोर्ख विजय’ का हिन्दी अनुवाद और समीक्षात्मक पर्यालोचन प्रस्तुत करनेवाली कृति है। गोरखनाथ ने अपने साधनामय जीवन और कल्याणमय दर्शन से तत्कालीन जन-समाज को अत्यन्त प्रभावित-प्रेरित किया था। उन्होंने द्वैताद्वैत-विलक्षण अद्वैतवाद का समर्थन किया लेकिन संसार को मिथ्या मानने से इनकार किया। उन्होंने मोक्ष का साधन योग को माना और योग को अष्टांग न मानकर षडंग माना। वस्तुतः यम-नियम को उन्होंने, साधक हो या सामान्य-जन, मनुष्य मात्र का कर्तव्य और दायित्व बताया जिनमें परिपक्वता के बाद ही आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि सम्भव है। ऐसी अनेकानेक बातों को जानने-समझने के लिए ‘गोरख विजय’ एक अत्यन्य उपयोगी ग्रन्थ है। प्रस्तुत पुस्तक का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें बंगाल के लोक समाज में प्रचलित गोरखनाथ सम्बन्धी कई लोकगाथाएँ और कुछ अन्य प्रासंगिक सामग्री भी दी गई हैं जिनसे गोरखपंथी साधना के नये आयाम खुलते हैं। वस्तुतः साधक हो या साहित्यिक, विद्वान हो या सामान्य पाठक, गोरखनाथ में दिलचस्पी रखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है।
Ramdoot : Hanuman Ka Aatmakhyan
- Author Name:
Trilok Nath Pandey
- Book Type:

- Description:
प्रभु श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण सहित ऋष्यमूक पर्वत की एक दूसरी सुरम्य चोटी, जिसका नाम प्रस्रवण था, पर चले गए और वहाँ एक गुफा में निवास करने लगे। मैंने उनसे आग्रह किया कि मैं दास-रूप में उनके निकट रहकर उनकी सेवा करना चाहता हूँ। इस सम्बन्ध में मैंने सुग्रीव जी से भी अनुमति ले ली थी, किन्तु प्रभु श्रीराम ने मेरे आग्रह को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि, “मैं आपके अतिशय स्नेह एवं सत्कार की भावना से अनुगृहीत हूँ, हनुमान। किन्तु, आपका प्रस्ताव मैं स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मैं और मेरे अनुज लक्ष्मण तपस्वी रूप में हैं और तपस्वियों को किसी दास से सेवा लेने का अधिकार नहीं है। आपकी सेवा नहीं, आपकी सहायता की मुझे आवश्यकता है। इसके अनेक अवसर आगे आएँगे। अभी वर्षा ऋतु प्रारम्भ हो गई है। इस काल में यात्रा एवं उद्योग सम्बन्धित सारे कार्य स्थगित हो जाते हैं। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों आप किष्किन्धापुरी में विश्राम करें और मैं लक्ष्मण सहित प्रस्रवण पर्वत पर। वर्षा ऋतु समाप्त होते ही सीता की खोज शुरू कर दी जाएगी।”
Main Ram Bol Raha Hoon
- Author Name:
Pramod Kumar Agrawal
- Book Type:

- Description:
राम का जीवन भारतीयों के लिए एक आदर्श जीवन है। जन्म से लेकर अंत तक राम का चरित्र एक दीप-स्तंभ है। ऐसे सार्वकालिक राष्ट्रीय नायक का कथानक किसी भी कृति को गौरवान्वित करता है। ‘रामचरितमानस’ के धीरोदात्त नायक राम कथनी से अधिक करनी में विश्वास रखते थे। अतः उनके जो भी कथन उपलब्ध हैं, वे भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर हैं। राम के प्रस्तुत उद्घोष तुलसीकृत रामचरितमानस एवं लेखक की समांतर कृति ‘रामचरितमानस: नाट्य रूप’ से उद्धृत किए गए हैं। विश्वास है, सुधी पाठक प्रस्तुत कृति से प्रेरणा ग्रहण करके अपने जीवन को सफल बनाएँगे और भारतीय तथा विश्व-समाज को समुन्नत करने में योगदान देंगे।
Rumi: Rooh-E-Kainat
- Author Name:
- Book Type:

- Description:
Desc awaiting from Publisher
Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg
- Author Name:
Vishen Lakhiani
- Book Type:

- Description:
Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg Hindi Translation of The Buddha and The Badass: The Secret Spiritual Art of Succeeding at Work. क्या आपने गौर किया है कि कैसे कुछ लोग नौकरी में कमाल के भाग्यशाली होते हैं! वे बड़ी आसानी से समाधान सुझा देते हैं। वे सही लोगों को आकर्षित करते हैं। लोग उनके अभियानों, कंपनियों, उनकी टीमों का हिस्सा बनना चाहते हैं। वे बड़े-बड़े काम मुसकराते हुए पूरा कर लेते हैं और वेतन में अच्छी वृद्धि के साथ ही प्रमोशन भी पा लेते हैं। ये सुपरस्टार कमाल की एकाग्रता और रचनात्मकता का प्रदर्शन कर खास दायरे का हिस्सा बन जाते हैं।यह पुस्तक बताती है कि उनके साथ कैसे जुड़ें। आप जहाँ भी हों, आप में अनोखी शक्तियाँ हैं। यह आधुनिक युग का भ्रम है कि कठिन परिश्रम और संघर्ष से ही सफलता मिलती है। आपके भीतर एक आत्मा है और एक बार आपने काम के क्षेत्र में इसकी पूरी शक्ति का प्रयोग किया, तो बस कमाल हो जाता है। अपने भीतर के बुद्ध और निर्भीक योद्धा को जगाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आपके काम करने के तरीके को बदलकर रख देगी। आप उन तरीकों को जान लेंगे, जो वास्तविकता के हर नियम को आपके पक्ष में ला देंगे।
Shri Hanuman Chalisa | Devotional & Spirituality Prayer of Lord Hanuman Book in Hindi
- Author Name:
Kishor Makwana::Rasikba Kesariya
- Book Type:

- Description:
श्री हनुमान चालीसा भगवान् श्रीराम तक पहुँचने का एक मार्ग है। जन-मानस में व्याप्त श्रीहनुमान चालीसा कोई सिद्ध कर ले, नित्य सौ बार पठन करे तो हनुमानजी उसकी सब इच्छा-आकांक्षा पूर्ण करते हैं, ऐसी मान्यता है। मनुष्य के जीवन को सफल बनानेवाली ये रत्नमणिकाएँ हैं। श्रीहनुमानजी का संपूर्ण चरित्र हम सबमें श्रद्धा, विश्वास, ज्ञान, शक्ति, पुरुषार्थ, भक्ति, सत्य, प्रामाणिक प्रयत्न, समर्पण भाव, पराक्रम, संस्कार- संपन्न वाणी, विवेक और निष्काम कर्म जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए अनेक गुणों का सिंचन करता है।
Gita-Mata
- Author Name:
Mahatma Gandhi
- Book Type:

- Description:
महात्मा गांधीजी ने गीता को ‘माता’ की संज्ञा दी थी। उसके प्रति उनका असीम अनुराग और भक्ति थी। उन्होंने गीता के श्लोकों का सरल-सुबोध भाषा में तात्पर्य दिया, जो ‘गीता-बोध’ के नाम से प्रकाशित हुआ। उन्होंने सारे श्लोकों की टीका की और उसे ‘अनासक्तियोग’ का नाम दिया। कुछ भक्ति-प्रधान श्लोकों को चुनकर ‘गीता-प्रवेशिका’ पुस्तिका निकलवाई। इतने से भी उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने ‘गीता-पदार्थ-कोश’ तैयार करके न केवल शब्दों का सुगम अर्थ दिया, अपितु उन शब्दों के प्रयोग-स्थलों का निर्देश भी किया। गीता के मूल पाठ के साथ वह संपूर्ण सामग्री प्रस्तुत पुस्तक में संकलित है। गीता को हमारे देश में ही नहीं, सारे संसार में असाधारण लोकप्रियता प्राप्त है। असंख्य व्यक्ति गहरी भावना से उसे पढ़ते हैं और उससे प्रेरणा लेते हैं। जीवन की कोई भी ऐसी समस्या नहीं, जिसके समाधान में गीता सहायक न होती हो। उसमें ज्ञान, भक्ति तथा कर्म का अद्भुत समन्वय है और मानव-जीवन इन्हीं तीन अधिष्ठानों पर आधारित है। महात्मा गांधी की कलम से प्रसूत गीता पर एक संपूर्ण पुस्तक, जो जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालकर पाठक की कर्मशीलता को गतिमान करेगी।
Shri Hanuman Chalisa Rahasy
- Author Name:
Shailesh Tiwari
- Book Type:

- Description:
Book
Raman Maharshi
- Author Name:
Anita Gaur
- Book Type:

- Description:
"साधना में अभिरुचि रखनेवालों के लिए श्री रमण महर्षि का नाम जाना-पहचाना है। भारत के आध्यात्मिक क्षितिज पर पिछले कुछ वर्षों में जिन नक्षत्रों का उदय हुआ है, उनमें श्री रमण महर्षि का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने जीवन तथा कार्यों से भारत का नाम आलोकित किया है। भारत के अलावा पश्चिम के कई देशों में अपना उजाला फैलाकर रमण महर्षि ने देश को गौरवान्वित किया है तथा मानव-जाति की बहुमूल्य सेवा की है। 30 दिसंबर, 1879 को सोमवार के दिन आधी रात के लगभग एक घंटे बाद एक जाने-माने प्राचीन ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ उस अद्भुत बालक का, जिसे बाद में पूरी दुनिया ने भगवान् श्री रमण महर्षि के नाम से जाना। उन्होंने साधारण जनों को रास्ता बताया कि मानव को उसके दैनिक कार्यों को करते हुए किस प्रकार उस परम तत्त्व की वंदना करनी है, कैसे आत्मा की शुद्धि करके जन्म-मरण के चक्करों से पार पाना है। यदि हम अपने दायित्वों का निर्वाह ही नहीं कर सकते तो हमें इस पृथ्वी पर मानव बनकर रहने का क्या अधिकार है! इस जगत् में ज्ञान की वास्तविक परिभाषा, जीवन की गहराइयाँ महर्षि रमण जैसे ज्ञानी पुरुषों ने ही हमें समझाई है। आध्यात्मिकता के मार्ग का दिग्दर्शन करनेवाले श्री रमण महर्षि की प्रेरणाप्रद जीवनगाथा।
Hanumat-Katha
- Author Name:
Krishan Mohan Mishra
- Book Type:

- Description:
वाल्मीकि रामायण के अनुशीलन से श्रीराम तथा हनुमान की आध्यात्मिक शक्तियों के दिग्दर्शन होते हैं ।सामान्यतया इतिहास लेखन में आध्यात्मिक शक्तियों पर विचार नहीं किया जाता है, परंतु प्राचीनकाल से ही विश्व के बहुत से समुदायों में कुछ विशिष्ट मानवों में आध्यात्मिक शक्तियों की उपस्थिति के उल्लेख मिलते रहे हैं। अत: आध्यात्मिक तथा अतींद्रिय शक्तियों की अवहेलना उचित नहीं है। इस कृति में श्रीराम तथा हनुमान आदि को ऐतिहासिक समझते हुए उनकी इन शक्तियों का भी कुछ अंश तक परिज्ञान लिया गया है प्रस्तुत उपन्यास मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण तथा सद्गुरुओं के विचारों के आधार पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखा गया है| अस्तु, यदि प्रस्तुत कृति में कुछ अच्छा है, तो वह महान् कवि वाल्मीकि का प्रसाद है और निर्विवाद प्रतीति यह है कि बिना केसरीनंदन हनुमान की कृपा के तो रामकथा अथवा उसका कोई अंश लिखा ही नहीं जासकता। श्री हनुमान के समर्पण, भक्ति, पराक्रम, पौरुष और त्याग का दिग्दर्शन करवाता अत्यंत पठनीय उपन्यास ।
Sai Ki Seva Mein
- Author Name:
Dr. Suresh Haware
- Book Type:

- Description:
साईं की सेवा करने का मुझे अवसर मिला, यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा ईश्वरीय आशीर्वाद है, ऐसी मेरे मन की प्रामाणिक भावना है। इस कालावधि में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। मैं शिरडी कभी आता नहीं था, लेकिन इस पूरे कार्यकाल में मैं शिरडी के सिवाय कहीं जाता ही नहीं था। साईं बाबा का पहले कभी विचार करता नहीं था। लेकिन इस दौरान साईं के सिवाय कोई दूसरा विचार ही नहीं किया। पैर अपने आप शिरडी की ओर खिंचे चले आते थे।
Ashtavakra Geeta
- Author Name:
Swami Prakhar Pragyanand
- Book Type:

- Description:
"भारतीय पौराणिक साहित्य-भंडार में एक-से-एक अप्रतिम बहुमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। अष्टावक्र गीता अध्यात्म का शिरोमणि गं्रथ है। इसकी तुलना किसी अन्य गं्रथ से नहीं की जा सकती। अष्टावक्रजी बुद्धपुरुष थे, जिनका नाम अध्यात्म-जगत् में आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि जब वे अपनी माता के गर्भ में थे, उस समय उनके पिताजी वेद-पाठ कर रहे थे, तब उन्होंने गर्भ से ही पिता को टोक दिया था—‘शास्त्रों में ज्ञान कहाँ है? ज्ञान तो स्वयं के भीतर है! सत्य शास्त्रों में नहीं, स्वयं में है।’ यह सुनकर पिता ने गर्भस्थ शिशु को शाप दे दिया, ‘तू आठ अंगों से टेढ़ा-मेढ़ा एवं कुरूप होगा।’ इसीलिए उनका नाम ‘अष्टावक्र’ पड़ा। ‘अष्टावक्र गीता’ में अष्टावक्रजी के एक-से-एक अनूठे वक्तव्य हैं। ये कोई सैद्धांतिक वक्तव्य नहीं हैं, बल्कि प्रयोगसिद्ध वैज्ञानिक सत्य हैं, जिनको उन्होंने विदेह जनक पर प्रयोग करके सत्य सिद्ध कर दिखाया था। राजा जनक ने बारह वर्षीय अष्टावक्रजी को अपने सिंहासन पर बैठाया और स्वयं उनके चरणों में बैठकर शिष्य-भाव से अपनी जिज्ञासाओं का शमन कराया। यही शंका-समाधान अष्टावक्र संवाद रूप में ‘अष्टावक्र गीता’ में समाहित है। ज्ञान-पिपासु एवं अध्यात्म-जिज्ञासु पाठकों के लिए एक श्रेष्ठ, पठनीय एवं संग्रहणीय आध्यात्मिक ग्रंथ। "
Dharm Se Aagey
- Author Name:
Dalai Lama +2
- Book Type:

- Description:
परम पूज्य दलाई लामा ने अपनी बहुचर्चित किताब ‘एथिक्स फ़ॉर ए न्यू मिलेनियम’ में धार्मिक सिद्धान्तों की अपेक्षा वैश्विक सिद्धान्तों पर आधारित नैतिकता को स्थापित करने की प्रस्तावना दी थी। अब ‘बियोन्ड रिलीजन : एथिक्स फ़ॉर ए होल वर्ल्ड’ पुस्तक में दलाई लामा ने अत्यन्त करुणा से भरे बेबाक अन्दाज़ में ग़ैर-धार्मिक तरीक़े विकसित करने हेतु अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने धार्मिक युद्ध से आगे बढ़कर एक साझा संसार के निर्माण हेतु नीतिगत सिद्धान्तों की प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत की है, जो धर्म को पूरा सम्मान देती है। आध्यात्मिक और बौद्धिक अधिकार के उच्चतम स्तर के साथ दलाई लामा ने नीतिगत और आनन्दपूर्ण जीवन के मार्ग और समझ-बूझ तथा परस्पर आदर पर आधारित एक वैश्विक मानव-समाज के निर्माण की प्रार्थना की है जिसे वह ‘तृतीय मार्ग’ कहते हैं। ‘बियोन्ड रिलीजन’ पुस्तक में दलाई लामा ने उन लोगों के लिए रूपरेखा प्रस्तुत की है जो किसी धार्मिक परम्परा से जुड़े बिना इस दुनिया को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना और आध्यात्मिक आनन्द से पूर्ण जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखते हैं।
Dashaguru Parampara Ke Navam Guru Shri Tegabahaduraji
- Author Name:
Dr. Kuldip Chand Agnihotri
- Book Type:

- Description:
सप्तसिंधु क्षेत्र की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्होंने भारतवर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें सबसे पहली घटना तो सिंधु-सरस्वती सभ्यता का विकास है। दरअसल वर्तमान भारतीय विश्वासों, आस्थाओं एवं पूजा-पद्धति का आधार सिंधु-सरस्वती घाटी में ही मिलता है। इसके उपरांत वेद रचना का युग आता है। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अगला चरण है—गंभीर चिंतन का युग। इस युग के चिंतन ने भारतवर्ष को ही नहीं, बल्कि पूरे जंबूद्वीप को आच्छादित किया। कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का युद्ध इस क्षेत्र की ऐसी घटना है, जिसने पूरे हिंदुस्तान को सप्तसिंधु के मैदान में लाकर खड़ा कर दिया था। बाद के काल में विदेशी आक्रांता येन-केन-प्रकारेण विजित प्रदेश के निवासियों को अपने मजहब में मतांतरित करने लगे थे। हमले क्योंकि सप्तसिंधु क्षेत्र से ही होते थे, इसलिए इसका सर्वाधिक दंश भी इसी क्षेत्र को सहना पड़ा। लेकिन इस नई आफत का सामना कैसे किया जाए, यह सबसे बड़ी चुनौती थी। इस मरहले पर दशगुरु परंपरा की शुरुआत एक दैवी योजना ही मानी जा सकती है। गुरु नानक देवजी इसके संस्थापक थे। दुर्भाग्य से दशगुरु परंपरा का मूल्यांकन आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हुआ है, लेकिन ऐतिहासिक व सामाजिक क्षेत्र में समग्र रूप से नहीं हुआ। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कुदाल चलाने की जरूरत है और यह पुस्तक दशगुरु परंपरा को प्रकाश में लाने का स्तुत्य प्रयास है।
Nath Sampraday
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ऐसे वांड़्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। नाथ सिद्धों और अपभ्रंश साहित्य पर उनके शोधपरक निबन्ध पढ़ते समय मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘नाथ सम्प्रदाय’ में गुरु गोरखनाथ के लोक-संपृक्त स्वरूप का उद्घाटन किया गया है। स्वयं द्विवेदी जी के शब्दों में 'गोरखनाथ ने निर्मम हथौड़े की चोट से साधु और गृहस्थ दोनों की कुरीतियों को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। लोकजीवन में जो धार्मिक चेतना पूर्ववर्ती सिद्धों से आकर उसके पारमार्थिक उद्देश्य से विमुख हो रही थी, उसे गोरखनाथ ने नई प्राणशक्ति से अनुप्राणित किया।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book