Temple Management
Author:
Dr. Suresh HawarePublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
Religion-spirituality0 Ratings
Price: ₹ 340
₹
425
Unavailable
India has a rich and diverse culture, with its different rituals, practices and customs. The temples all across the country are testimony to such diverse rituals. India has around 30 lakh temples. It has a potential to bring socio-economic transformation in India. The book is a documentation to this effect on a very novel subject of temple management. The scientific approach, the service mind and the management skills have the potential to change the scenario of the temples in India.
Dr. Suresh Haware being a senior nuclear scientist and a successful businessman besides serving as chairman of Sri Sai Baba temple located at Shirdi, has penned down his experiences and his prospective plans on managing the temples.
The temples possess a huge potential for employment generation that has not yet been harnessed. Institutions could carve out professional courses in the subject to make suitable manpower available for managing the temples effectively.
This book is of interest to and will attract the attention of professionals towards this necessity. It will provide a spark to many minds from the business, industry, religion and institutions so as to attract many souls to the innovative subject of temple management.
Temple management will then make a difference.
ISBN: 9789390923489
Pages: 224
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
संस्कृत, पालि, अंग्रेज़ी, प्राकृत, उर्दू, अर्थशास्त्र, खगोलशास्त्र, गणित और भाषाविज्ञान आदि भाषाओं और विषयों के अधिकारी विद्वान अखिलेश मिश्र के बौद्धिक व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि उन्होंने ज्ञान को कर्म से जोड़ा। जीवन-भर वे ज्ञान, कर्म, वाणी और लेखनी की एकाग्र शक्ति के साथ जनसंघर्षों में संलग्न रहे। अस्सी के दशक में जब साम्प्रदायिक शक्तियाँ उभार पर थीं, उन्होंने अपनी पूरी ताक़त साम्प्रदायिकता विरोधी संघर्ष में झोंक दी। साक्षरता और जन-शिक्षण में उनकी बहुत गहरी और निजी दिलचस्पी थी।
इस पुस्तक में उनके राष्ट्रीय सहारा में जनवरी 1997 से दिसम्बर 1998 तक ‘धर्म-संस्कृति’ के अन्तर्गत लिखे गए निबन्धों को संकलित किया गया है। ये निबन्ध साबित करते हैं कि मिश्र जी हिन्दी के स्वतन्त्रचेता और विवेकशील विचारकों की गौरवशाली परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थे।
डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में : ‘उनके विचार से धर्म गुण है और हर वस्तु की तरह मनुष्य का गुण धर्म होता है जिसे मनुष्यता अथवा मानवता कहते हैं।’ और, ‘जो गुण धर्म का मर्म के लेखक के प्रति श्रद्धावनत होने को विवश करता है वह है उसकी निर्भयता।’
धर्म, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्र आदि पदों को लेकर आज पैदा की जा रही धुन्ध के बीच ये निबन्ध हमें निश्चय ही रोशनी दिखाएँगे।
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