Hindu Hone Ka Dharma
(0)
Author:
Prabhash JoshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
1995
1596 (20% off)
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अपने सुदीर्घ पत्रकार जीवन में प्रभाष जोशी का लेखन लोक के विवेक को रेखांकित करने और जहाँ वह मंद पड़ा हो वहाँ उसे पुनर्जाग्रत करने का लेखन रहा है। ज़्यादातर हिन्दी समाज से संवाद करती उनकी पत्रकारिता एक ओर सत्ता-राजनीति से सीधी बहस में उतरती है और दूसरी ओर समाज, संस्कृति, पर्यावरण, संगीत और खेल की मार्फ़त समग्र जीवन-मूल्यों की खोज करती है। प्रभाष जोशी के सम्पादन में 1983 में प्रकाशित दैनिक ‘जनसत्ता’ एक बड़ी घटना थी जिसने ‘सबकी ख़बर लेने’ के साहस और ‘सबको ख़बर देने’ की प्रतिबद्धता के साथ पत्रकारिता के इकहरे विन्यास को, उसके सत्ता-केन्द्रित स्वरूप को तोड़ते हुए उसे लोकधर्मी बनाने की पहल की। क़रीब दस वर्ष बाद 1992 में जब हिन्दू समाज से उभरे कुछ विकृत और उन्मादी तत्त्वों ने अपनी साम्प्रदायिक-नकारात्मक प्रवृत्तियों के चरम के रूप में अयोध्या की बाबरी मस्जिद का ध्वंस किया तो प्रभाष जोशी उन चुनिंदा लेखकों-पत्रकारों में अग्रणी थे जिन्होंने हमारे सर्वग्राही धर्म और उदार-सहिष्णु-सामासिक संस्कृति के साथ हुए इस दुष्कृत्य का विरोध किया। ऐसे समय में जब ज़्यादातर हिन्दी मीडिया साम्प्रदायिकता के आक्रमण के आगे घुटने टेक रहा था या हक्का-बक्का था तो प्रभाष जोशी ने गांधी विचार के आलोक में जिस वैचारिक संघर्ष की शुरुआत की, वह भी ‘जनसत्ता’ के प्रकाशन जैसी ही एक घटना थी।</p> <p>‘हिन्दू होने का धर्म’ बाबरी ध्वंस के बाद और गुजरात नरसंहार तक ‘जनसत्ता’ में लिखे गए प्रभाष जोशी के सैकड़ों लेखों-स्तम्भों में से एक चयन है जिसके फ़ोकस में संघ परिवार के साम्प्रदायिक हिन्दुत्व के विपरीत हिन्दू होने का वह मर्म है जो हमारी वास्तविक परम्परा और समाज के मूल्यों को निर्मित करता आया है और महात्मा गांधी जिसके सबसे बड़े प्रतीक-व्यक्तित्व थे। साम्प्रदायिक तत्त्वों और छद्म राष्ट्रवाद के विभिन्न मुखोशों और दशाननों को उधेड़ती ये टिप्पणियाँ हमारे आसपास बनाए जा रहे एक बुरे या निकृष्ट हिन्दू से जिरह करती हुई उसकी जगह एक अच्छे, सच्चे और नैतिक हिन्दू को प्रतिष्ठित करती हैं और यह सिद्ध करती हैं कि हिन्दुत्व की संघ परिवारी परिभाषाएँ व्यापक हिन्दू समाज में पूरी तरह अमान्य हैं। आज़ादी की लड़ाई के समय से ही हमारे देश में ‘गांधी जीतेंगे या गोडसे’ की बहस चलती रही है और उसे भी इन लेखों में बहस का विषय बनाया गया है। ख़ास बात यह है कि प्रभाष जोशी अपना वैचारिक विमर्श और अलख हिन्दुत्व के ही मोर्चे पर चलाए और जगाए रहते हैं जिससे उनके तर्क और निष्कर्ष ज़्यादा विश्वसनीय और कारगर हो उठते हैं और इस काम में हमारा पारम्परिक लोक-विवेक और धर्म उनकी मदद करता चलता है।
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अपने सुदीर्घ पत्रकार जीवन में प्रभाष जोशी का लेखन लोक के विवेक को रेखांकित करने और जहाँ वह मंद पड़ा हो वहाँ उसे पुनर्जाग्रत करने का लेखन रहा है। ज़्यादातर हिन्दी समाज से संवाद करती उनकी पत्रकारिता एक ओर सत्ता-राजनीति से सीधी बहस में उतरती है और दूसरी ओर समाज, संस्कृति, पर्यावरण, संगीत और खेल की मार्फ़त समग्र जीवन-मूल्यों की खोज करती है। प्रभाष जोशी के सम्पादन में 1983 में प्रकाशित दैनिक ‘जनसत्ता’ एक बड़ी घटना थी जिसने ‘सबकी ख़बर लेने’ के साहस और ‘सबको ख़बर देने’ की प्रतिबद्धता के साथ पत्रकारिता के इकहरे विन्यास को, उसके सत्ता-केन्द्रित स्वरूप को तोड़ते हुए उसे लोकधर्मी बनाने की पहल की। क़रीब दस वर्ष बाद 1992 में जब हिन्दू समाज से उभरे कुछ विकृत और उन्मादी तत्त्वों ने अपनी साम्प्रदायिक-नकारात्मक प्रवृत्तियों के चरम के रूप में अयोध्या की बाबरी मस्जिद का ध्वंस किया तो प्रभाष जोशी उन चुनिंदा लेखकों-पत्रकारों में अग्रणी थे जिन्होंने हमारे सर्वग्राही धर्म और उदार-सहिष्णु-सामासिक संस्कृति के साथ हुए इस दुष्कृत्य का विरोध किया। ऐसे समय में जब ज़्यादातर हिन्दी मीडिया साम्प्रदायिकता के आक्रमण के आगे घुटने टेक रहा था या हक्का-बक्का था तो प्रभाष जोशी ने गांधी विचार के आलोक में जिस वैचारिक संघर्ष की शुरुआत की, वह भी ‘जनसत्ता’ के प्रकाशन जैसी ही एक घटना थी।</p>
<p>‘हिन्दू होने का धर्म’ बाबरी ध्वंस के बाद और गुजरात नरसंहार तक ‘जनसत्ता’ में लिखे गए प्रभाष जोशी के सैकड़ों लेखों-स्तम्भों में से एक चयन है जिसके फ़ोकस में संघ परिवार के साम्प्रदायिक हिन्दुत्व के विपरीत हिन्दू होने का वह मर्म है जो हमारी वास्तविक परम्परा और समाज के मूल्यों को निर्मित करता आया है और महात्मा गांधी जिसके सबसे बड़े प्रतीक-व्यक्तित्व थे। साम्प्रदायिक तत्त्वों और छद्म राष्ट्रवाद के विभिन्न मुखोशों और दशाननों को उधेड़ती ये टिप्पणियाँ हमारे आसपास बनाए जा रहे एक बुरे या निकृष्ट हिन्दू से जिरह करती हुई उसकी जगह एक अच्छे, सच्चे और नैतिक हिन्दू को प्रतिष्ठित करती हैं और यह सिद्ध करती हैं कि हिन्दुत्व की संघ परिवारी परिभाषाएँ व्यापक हिन्दू समाज में पूरी तरह अमान्य हैं। आज़ादी की लड़ाई के समय से ही हमारे देश में ‘गांधी जीतेंगे या गोडसे’ की बहस चलती रही है और उसे भी इन लेखों में बहस का विषय बनाया गया है। ख़ास बात यह है कि प्रभाष जोशी अपना वैचारिक विमर्श और अलख हिन्दुत्व के ही मोर्चे पर चलाए और जगाए रहते हैं जिससे उनके तर्क और निष्कर्ष ज़्यादा विश्वसनीय और कारगर हो उठते हैं और इस काम में हमारा पारम्परिक लोक-विवेक और धर्म उनकी मदद करता चलता है।
Book Details
-
ISBN9788126719365
-
Pages655
-
Avg Reading Time22 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वाल्मीकि रामायण के अनुशीलन से श्रीराम तथा हनुमान की आध्यात्मिक शक्तियों के दिग्दर्शन होते हैं ।सामान्यतया इतिहास लेखन में आध्यात्मिक शक्तियों पर विचार नहीं किया जाता है, परंतु प्राचीनकाल से ही विश्व के बहुत से समुदायों में कुछ विशिष्ट मानवों में आध्यात्मिक शक्तियों की उपस्थिति के उल्लेख मिलते रहे हैं। अत: आध्यात्मिक तथा अतींद्रिय शक्तियों की अवहेलना उचित नहीं है। इस कृति में श्रीराम तथा हनुमान आदि को ऐतिहासिक समझते हुए उनकी इन शक्तियों का भी कुछ अंश तक परिज्ञान लिया गया है प्रस्तुत उपन्यास मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण तथा सद्गुरुओं के विचारों के आधार पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखा गया है| अस्तु, यदि प्रस्तुत कृति में कुछ अच्छा है, तो वह महान् कवि वाल्मीकि का प्रसाद है और निर्विवाद प्रतीति यह है कि बिना केसरीनंदन हनुमान की कृपा के तो रामकथा अथवा उसका कोई अंश लिखा ही नहीं जासकता। श्री हनुमान के समर्पण, भक्ति, पराक्रम, पौरुष और त्याग का दिग्दर्शन करवाता अत्यंत पठनीय उपन्यास ।
Sai Ki Seva Mein
- Author Name:
Dr. Suresh Haware
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साईं की सेवा करने का मुझे अवसर मिला, यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा ईश्वरीय आशीर्वाद है, ऐसी मेरे मन की प्रामाणिक भावना है। इस कालावधि में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। मैं शिरडी कभी आता नहीं था, लेकिन इस पूरे कार्यकाल में मैं शिरडी के सिवाय कहीं जाता ही नहीं था। साईं बाबा का पहले कभी विचार करता नहीं था। लेकिन इस दौरान साईं के सिवाय कोई दूसरा विचार ही नहीं किया। पैर अपने आप शिरडी की ओर खिंचे चले आते थे।
Ashtavakra Geeta
- Author Name:
Swami Prakhar Pragyanand
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"भारतीय पौराणिक साहित्य-भंडार में एक-से-एक अप्रतिम बहुमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। अष्टावक्र गीता अध्यात्म का शिरोमणि गं्रथ है। इसकी तुलना किसी अन्य गं्रथ से नहीं की जा सकती। अष्टावक्रजी बुद्धपुरुष थे, जिनका नाम अध्यात्म-जगत् में आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि जब वे अपनी माता के गर्भ में थे, उस समय उनके पिताजी वेद-पाठ कर रहे थे, तब उन्होंने गर्भ से ही पिता को टोक दिया था—‘शास्त्रों में ज्ञान कहाँ है? ज्ञान तो स्वयं के भीतर है! सत्य शास्त्रों में नहीं, स्वयं में है।’ यह सुनकर पिता ने गर्भस्थ शिशु को शाप दे दिया, ‘तू आठ अंगों से टेढ़ा-मेढ़ा एवं कुरूप होगा।’ इसीलिए उनका नाम ‘अष्टावक्र’ पड़ा। ‘अष्टावक्र गीता’ में अष्टावक्रजी के एक-से-एक अनूठे वक्तव्य हैं। ये कोई सैद्धांतिक वक्तव्य नहीं हैं, बल्कि प्रयोगसिद्ध वैज्ञानिक सत्य हैं, जिनको उन्होंने विदेह जनक पर प्रयोग करके सत्य सिद्ध कर दिखाया था। राजा जनक ने बारह वर्षीय अष्टावक्रजी को अपने सिंहासन पर बैठाया और स्वयं उनके चरणों में बैठकर शिष्य-भाव से अपनी जिज्ञासाओं का शमन कराया। यही शंका-समाधान अष्टावक्र संवाद रूप में ‘अष्टावक्र गीता’ में समाहित है। ज्ञान-पिपासु एवं अध्यात्म-जिज्ञासु पाठकों के लिए एक श्रेष्ठ, पठनीय एवं संग्रहणीय आध्यात्मिक ग्रंथ। "
Svaraj
- Author Name:
Ramchandra Gandhi +1
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रामचन्द्र गाँधी एक ऐसे भारतीय दार्शनिक थे जिनकी साहित्य और कलाओं में गहरी दिलचस्पी थी : उनका चिन्तन अक्सर अध्यात्म, कला और साहित्य को अपनी समझ के भूगोल में समाविष्ट करता था। अपने जीवन में उनका अपने समय के कई बड़े लेखकों और कलाकारों से सम्पर्क और दोस्ताना था। चित्रकार तैयब मेहता के एक त्रिफलक से प्रेरित होकर रामचन्द्र गाँधी ने यह अद्भुत पुस्तक लिखी है। सम्भवत: किसी कलाकृति पर ऐसी विचार-सघन पुस्तक कम से कम भारत में दूसरी नहीं है। उसमें जितने दार्शनिक आशय कला के खुलते हैं, उतने ही अभिप्राय स्वयं रामचन्द्र गाँधी के चिन्तन के भी। यह सीमित अर्थों में कलालोचना नहीं है पर यह दिखाती है कि गहरा कलास्वादन उतने ही गहरे मुक्त चिन्तन को उद्वेलित कर सकता है। तैयब मेहता रज़ा साहब के घनिष्ठ मित्र थे। इस पुस्तक का आलोचक मदन सोनी द्वारा बड़े अध्यवसाय से किया गया हिन्दी अनुवाद उस कला-मैत्री को एक प्रणति भी है। —अशोक वाजपेयी
Dharm Se Aagey
- Author Name:
Dalai Lama +2
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परम पूज्य दलाई लामा ने अपनी बहुचर्चित किताब ‘एथिक्स फ़ॉर ए न्यू मिलेनियम’ में धार्मिक सिद्धान्तों की अपेक्षा वैश्विक सिद्धान्तों पर आधारित नैतिकता को स्थापित करने की प्रस्तावना दी थी। अब ‘बियोन्ड रिलीजन : एथिक्स फ़ॉर ए होल वर्ल्ड’ पुस्तक में दलाई लामा ने अत्यन्त करुणा से भरे बेबाक अन्दाज़ में ग़ैर-धार्मिक तरीक़े विकसित करने हेतु अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने धार्मिक युद्ध से आगे बढ़कर एक साझा संसार के निर्माण हेतु नीतिगत सिद्धान्तों की प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत की है, जो धर्म को पूरा सम्मान देती है। आध्यात्मिक और बौद्धिक अधिकार के उच्चतम स्तर के साथ दलाई लामा ने नीतिगत और आनन्दपूर्ण जीवन के मार्ग और समझ-बूझ तथा परस्पर आदर पर आधारित एक वैश्विक मानव-समाज के निर्माण की प्रार्थना की है जिसे वह ‘तृतीय मार्ग’ कहते हैं। ‘बियोन्ड रिलीजन’ पुस्तक में दलाई लामा ने उन लोगों के लिए रूपरेखा प्रस्तुत की है जो किसी धार्मिक परम्परा से जुड़े बिना इस दुनिया को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना और आध्यात्मिक आनन्द से पूर्ण जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखते हैं।
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