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श्रीकान्त वर्मा मुक्तिबोध की पीढ़ी के बाद के कवियों में अन्यतम बेचैन और उत्तप्त कवि इस माने में ज़्यादा हैं कि उन्होंने अपनी कविता के ज़रिए न केवल अपने समय का सीधा, तीक्ष्ण और अन्दर तक तिलमिला देनेवाला भयावह साक्षात्कार किया, बल्कि हर अमानवीय ताक़त के विरुद्ध एक निर्मम और नंगी भिड़ंत की। इसीलिए उनकी कविता में नाराज़गी, असहमति और विरोध का स्वर सबसे मुखर है। उनकी कविता उस दर्पण की तरह है, जहाँ कोई झूठ छिप नहीं सकता। उनकी कविता हर झूठ के विरुद्ध कहीं प्रतिशोध है तो कहीं सार्थक वक्तव्य। शायद इसीलिए वे सन् 60 के बाद की कविता के हिन्दी के पहले नाराज़ कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। वे एक ओर मानवीय संवेदना के गहन ऐन्द्रिक प्रेम और क्षोभ के विरल कवि हैं तो दूसरी तरफ़ सामाजिक कर्म की कविता में नैतिक क्षोभ से उपजे सामाजिक हस्तक्षेप के दुर्लभ कवि हैं। वे उत्तर खोजने के बजाय प्रश्न खड़े करनेवाले कवि हैं। ‘भटका’ मेघ से शुरू हुई श्रीकान्त वर्मा की काव्य–यात्रा ‘माया दर्पण’, ‘दिनारंभ’ और ‘जलसाघर’ से गुज़रते हुए एक ऐसी कवि की दुनिया है जहाँ बीसवीं शताब्दी के मनुष्य की अपने समय से सीधी बहस है। कवि दूसरे से उलझने के बजाय स्वयं से प्रश्न करता है जहाँ उसके आत्माभियोग और आत्म–स्वीकार का स्वर सबसे मूल्यवान है। ‘मगध’ और ‘गरुड़ किसने देखा है’ एक ऐसे कवि की अथाह करुणा की पुकार है जो युग–संधि पर खड़ा अपने समय के मनुष्य, समाज, राजनीति, इतिहास और काल को बहुत निर्मम होकर बेचैनी के साथ देखते हुए मनुष्य और समाज की नियति को परिभाषित कर रहा है। इसीलिए ‘मगध’ समकालीन व्यवस्था का मर्सिया भर नहीं है बल्कि समय, समाज और व्यवस्था के विरुद्ध एक सीधा हस्तक्षेप है। इस खंड में पहली बार श्रीकान्त वर्मा की सम्पूर्ण प्रकाशित–अप्रकाशित, संकलित–असंकलित कविताओं का संचयन किया गया है जिसमें दर्ज है—एक कवि का सम्पूर्ण संसार जो अनेक संसारों में फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त इस खंड में पुस्तकों की भूमिकाएँ, सम्पादकीय और अपने समकालीनों के साथ दो महत्त्वपूर्ण संवाद भी मौजूद हैं।
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श्रीकान्त वर्मा मुक्तिबोध की पीढ़ी के बाद के कवियों में अन्यतम बेचैन और उत्तप्त कवि इस माने में ज़्यादा हैं कि उन्होंने अपनी कविता के ज़रिए न केवल अपने समय का सीधा, तीक्ष्ण और अन्दर तक तिलमिला देनेवाला भयावह साक्षात्कार किया, बल्कि हर अमानवीय ताक़त के विरुद्ध एक निर्मम और नंगी भिड़ंत की। इसीलिए उनकी कविता में नाराज़गी, असहमति और विरोध का स्वर सबसे मुखर है।
उनकी कविता उस दर्पण की तरह है, जहाँ कोई झूठ छिप नहीं सकता। उनकी कविता हर झूठ के विरुद्ध कहीं प्रतिशोध है तो कहीं सार्थक वक्तव्य। शायद इसीलिए वे सन् 60 के बाद की कविता के हिन्दी के पहले नाराज़ कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। वे एक ओर मानवीय संवेदना के गहन ऐन्द्रिक प्रेम और क्षोभ के विरल कवि हैं तो दूसरी तरफ़ सामाजिक कर्म की कविता में नैतिक क्षोभ से उपजे सामाजिक हस्तक्षेप के दुर्लभ कवि हैं। वे उत्तर खोजने के बजाय प्रश्न खड़े करनेवाले कवि हैं।
‘भटका’ मेघ से शुरू हुई श्रीकान्त वर्मा की काव्य–यात्रा ‘माया दर्पण’, ‘दिनारंभ’ और ‘जलसाघर’ से गुज़रते हुए एक ऐसी कवि की दुनिया है जहाँ बीसवीं शताब्दी के मनुष्य की अपने समय से सीधी बहस है। कवि दूसरे से उलझने के बजाय स्वयं से प्रश्न करता है जहाँ उसके आत्माभियोग और आत्म–स्वीकार का स्वर सबसे मूल्यवान है।
‘मगध’ और ‘गरुड़ किसने देखा है’ एक ऐसे कवि की अथाह करुणा की पुकार है जो युग–संधि पर खड़ा अपने समय के मनुष्य, समाज, राजनीति, इतिहास और काल को बहुत निर्मम होकर बेचैनी के साथ देखते हुए मनुष्य और समाज की नियति को परिभाषित कर रहा है। इसीलिए ‘मगध’ समकालीन व्यवस्था का मर्सिया भर नहीं है बल्कि समय, समाज और व्यवस्था के विरुद्ध एक सीधा हस्तक्षेप है।
इस खंड में पहली बार श्रीकान्त वर्मा की सम्पूर्ण प्रकाशित–अप्रकाशित, संकलित–असंकलित कविताओं का संचयन किया गया है जिसमें दर्ज है—एक कवि का सम्पूर्ण संसार जो अनेक संसारों में फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त इस खंड में पुस्तकों की भूमिकाएँ, सम्पादकीय और अपने समकालीनों के साथ दो महत्त्वपूर्ण संवाद भी मौजूद हैं।
Book Details
-
ISBN9788126727292
-
Pages3850
-
Avg Reading Time128 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है। काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है। उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Saptaparna
- Author Name:
Mahadevi Verma
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मनुष्य की स्थूल पार्थिव सत्ता उसकी रंग-रूपमयी आकृति में व्यक्त होती है। उसके बौद्धिक संगठन से जीवन और जगत सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं, उनके तत्त्व के शोध और समाधान के प्रयास, चिन्तन की दिशा आदि संचालित और संयमित होते हैं! उसकी रागात्मक वृत्तियों का संघात उसके सौन्दर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से सम्पृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
Fiza Ke Samandar Mein
- Author Name:
Ramswaroop Kisan
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ग्रामीण जीवन के अनूठे चित्र और मनुष्य के संसार के ऐसे बिम्ब जिन पर सामान्यतः हमारी निगाह कम ही ठहरती है, रामस्वरूप किसान की कविताओं में बहुतायत से मिलते हैं। मिसाल के तौर पर इस संग्रह की पहली ही कविता-शृंखला ‘पीठ’ को लिया जा सकता है जिसमें कुल सोलह कविताएँ शामिल हैं। ‘पीठ एक कारुणिक क्षेत्र’ है जिसे देखकर कवि-मन बार-बार कभी अपने भीतर और कभी बाहर की ओर एक प्रश्नाकुल चिन्तन-यात्रा पर निकल जाता है। ‘फ़िज़ा के समन्दर में’ शीर्षक कविता-शृंखला की ग्यारह कविताएँ पुनः कवि की विशिष्ट दृष्टि का पता देती हैं जिसमें प्रेम के लिए घर से भागती हुई लड़की हमें और हमारे समाज को पुनः पुनः सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है— यह रहा/तुम्हारा दूल्हा/साथ-साथ रहोगे तो/प्यार हो जाएगा/पापा ने कहा।...नहीं, ऐसा कहो पापा/यह रहा तुम्हारा प्यार/साथ-साथ रहोगे/तो दूल्हा हो जाएगा। संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएँ इसी तरह पाठक को सहसा चौंका देती हैं और हमारी देखी जानी चीज़ों को नये ढंग से हमारे सामने ला देती हैं। आम जन-जीवन के दैनन्दिन दुखों, व्यवस्था-जनित असहायताओं और मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य पीड़ाओं के साथ इन कविताओं की राजनैतिक चेतना भी मुखर रूप में सामने आती है— पब्लिक लड़ती है चुनाव—पैसों से/बातों से/लातों से/भालों-बन्दूक़ों-तलवारों से/ख़ून के फ़व्वारों से/और लड़ा-लड़ाया चुनाव/उनके गले में डाल देती है.../वे चुनाव नहीं लड़ते/वे तो पहनते हैं चुनाव।
Hum Jo Nadiyon Ka Sangam Hein
- Author Name:
Bodhisatwa
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यह संग्रह अपनी कविताओं के तीव्र आवेग, भाव–विविधता एवं वस्तु–बहुलता के कारण महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। बोधिसत्व की कविताएँ मानो अनेक नदियों का संगम हैं। लोकगीतों की ऊष्मा तथा रागात्मकता, वर्तमान जीवन के ‘दुख–तंत्र’ की कठोर प्रतीति और वैचारिक दृढ़ता एवं प्रतिरोध—इन सबके संयोग से ये कविताएँ हमारे लिए एक वैकल्पिक पाठ की सृष्टि करती हैं। ‘हाहाकार के बीच से गुज़रती’ इन कविताओं में दर्ज हैं ‘बेनूर आँखों के ख़्वाब’, ‘सिले होंठों की मुस्कुराहट’ और ‘बँधे हाथों की छटपटाहट’। लोकगीत और बोलियों की शक्ति का उपयोग, जिसके लिए बोधिसत्व की आरम्भिक कविताएँ चिह्नित की गई थीं, उनका अद्यतन रूप यहाँ मिलता है, कुछ ज्वाया और सख़्त। इनमें बेचैन कर देनेवाली ऐन्द्रिकता है—‘ताज़े आटे की गर्मी थी उसकी ख़ुशी/वसन्त उसके लिए अब उखड़े नाखून की तरह है’। एक विरल करुणा और क्रोध। इनमें जीवन के प्रति समर्थन और लालसा है जैसे कि ‘ऐसा ही होता है’ कविता में, जो साधारण मनुष्य के दैनंदिन प्रेम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ‘गंध’ शीर्षक कविता स्वयं बोधिसत्व की कविताओं में अलग से उल्लेखनीय है। यह एक बड़ी कविता है, हमारे जीवन की दारुण विपत्ति, विडम्बना एवं निजी और सामाजिक के सीमा–प्रदेश पर निरन्तर विद्यमान द्वन्द्व की कविता। एक बात और—ये कविताएँ गहरे राजनैतिक आशय एवं नैतिक संकल्प की कविताएँ हैं। बोधिसत्व का ही शब्द लेकर कहें तो यह वह कविता है ‘जो समाज के हारे–गाढ़े काम दे’। —अरुण कमल
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