Yun Bhi Kabhi-Kabhi
Author:
Mamta TiwariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Unavailable
जब ज़िन्दगी की रोशनी ने अचानक काला लिबास पहन लिया और अन्धकार छा गया तब कविता ने मुझे सिखाया कि उस मुक़ाम पर जहाँ दूसरों की बुराइयों की चोट से रोना नहीं आता, बल्कि लोगों की अच्छाइयाँ देख आँखें भर आती हैं, बस तभी असली कविता की शुरुआत होती है, और आज आँखों में कुछ नमी सी है...।</p>
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ISBN: 9788183616287
Pages: 79
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Mithilesh Kumar Rai
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- Description: यथार्थ के अनुभवमूलक अन्वेषण और संवेदना के नए धरातल के कारण युवा कवि मिथिलेश कुमार राय के इस संग्रह की कविताएँ अलग से आकर्षित करती हैं। ग्रामीण जीवन के यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए अब तक जो फ्रेम हिंदी कविता में बने या बनाए गए, ये कविताएँ उन ढाँचों या चौकठों से बाहर की कविताएँ हैं। हिंदी में ग्रामीण जीवन के चित्रण को लेकर बनी बद्धमूल धारणाओं को और नई अवधारणाओं को विकसित करने का उपक्रम 1990 के बाद से निरंतर होता रहा है। फिर भी, मिथिलेश की कविताओं को पढ़ते हुए एक सुखद आश्चर्य होता है कि लोक जीवन के बारे में अब भी इतना कुछ, इतना नया, इतना अनूठा और इतना मार्मिक भी; कहने को बचा रह गया था। संग्रह की पहली ही कविता 'लक्ष्मी देवी उपले बढिय़ा थोपती है' की शुरुआती पंक्तियाँ द्रष्टव्य है— लछमी देवी उपले बढिय़ा थोपती हैंसम्मान के पर्चे पर इनका भी नाम चढऩा चाहिए महोदयलछमी देवी सानी इतना अच्छा लगाती हैंकि नाद जब ख़ाली हो जाता हैभैंसें तभी गर्दन ऊपर करती हैंसंग्रह में एक कविता है—'चावल लेने पड़ोसी के घर दौड़ती हैं स्त्रियाँ।' इस तरह की कविता में प्राय: अभाव का चित्रण होता है, लेकिन मिथिलेश लिखते हैं कि चावल, चीनी, चायपत्ती आदि माँगने जाने वाली स्त्रियाँ पड़ोसियों के साथ नेह-छोह के रिश्तों को जुगाने के लिए भी जाती हैं। ज़ाहिर है, कहन का यह नया ढंग यथार्थ की नई समझ के चलते ही आया है। निस्संदेह लोक अस्मिता की नई पहचान के कारण युवा कवि का यह संग्रह अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करने में सफल होगा। —मदन कश्यप
Aur Anya Kavitayen
- Author Name:
Vishnu Khare
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Description:
विष्णु खरे की कविताएँ हिन्दी भाषा के सामर्थ्य को कई तरह के विषयों में ले जाकर विस्तृत और स्थित करती हैं। उनमें महाभारत से आज के यथार्थ का वृहत् वितान बनता है। वाक्य-विन्यास में यदि शाब्दिक लाघव है, तो शब्दों में भाषायी अर्थ-गहनता। दोनों पर अद् भुत पकड़ और चुस्त अन्तर्गतियाँ हैं : ठहरी गहराइयाँ हैं तो पाँव उखाड़ देनेवाला प्रवाह भी।
खरे की कविता के दो स्पष्ट ध्रुवान्त बनते हैं। एक तो उस प्रकार की कविताएँ हैं, जो मौजूदा यथार्थ की भीड़ में कन्धे रगड़ती ही चलती हैं; दूसरी वे कविताएँ, जो हमें अनुभवों की अधिक अमूर्त शक्तियों का अहसास कराती हैं। दोनों के बीच फ़ासले हैं, किन्तु विरोध नहीं—यह आभास उनके काव्य-बोध को एक जटिल संगति देता है और अनुभूतियों के एक ज़्यादा बड़े क्षितिज की पहचान कराती है।
नैरेशन या वर्णन-विवरण की अनेक विधियों को विष्णु खरे ने अपनी कविताओं में कई तरह से इस्तेमाल किया है—इस बात को सही तरीक़े से लक्षित किया जाना चाहिए। एक अनोखा प्रयोग उनकी मिथकीय और ऐतिहासिक कविताओं में देखा जा सकता है। ‘महाभारत’ प्रसंग में रिपोर्ताज शैली का इस्तेमाल कविता, मिथक और मौजूदा यथार्थ को एक दुर्लभ त्रिकोणात्मक तनाव देता है।
—कुँवर नारायण
Ishqnama
- Author Name:
Khwaja Ruknuddin Ishq
- Book Type:

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Description:
इस किताब में ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ के प्रसिद्ध फ़ारसी और उर्दू कलाम का संग्रह किया गया है. सूफ़ी-संतों के कलाम जनमानस में लोकप्रिय तो रहे हैं, लेकिन हिन्दी के पाठकों को इन्हें पढ़ने का अवसर कभी नहीं मिला. हिंदी पाठकों के लिए पहली बार ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ का कलाम देवनागरी में पेश किया जा रहा है. इस किताब के संपादक रय्यान अबुल
उलाई हैं.
Arambh Hai Prachand
- Author Name:
Piyush Mishra
- Book Type:

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Description:
हिन्दी फ़िल्मों के गाने अब हिन्दी कविता और उर्दू शायरी का विस्तार-भर नहीं रह गए, अब वे अपने आप में एक स्वतंत्र विधा हैं। उनके लिखने का ढंग अलग है। वे अपनी बात भी अलग ढंग से कहते हैं। उनकी बिम्बों की योजना, शब्दों का चयन और संगीत के साथ उनकी हमक़दमी उन्हें पढ़ी जानेवाली कविता से अलग बनाती है। इसलिए उनको पाठ में देखना भी उन्हें जैसे नए सिरे से जानना होता है।
और ये पीयूष मिश्रा के गाने हैं। पीयूष मिश्रा जो अभिनेता हैं, संगीतकार हैं, और थियेटर के एक बड़े नाम ही नहीं, एक मुहावरा रहे हैं। ये गाने उन्होंने या तो फ़िल्मों के लिए ही लिखे या अपने लिए लिखे और फ़िल्मों ने उन्हें ले लिया। पीयूष मिश्रा की बिम्ब-चेतना का विस्तार बहुत व्यापक है। वे समाज से, देश-विदेश की राजनीति से, व्यक्ति और समाज के आपसी द्वन्द्व से विचलित रहते हैं, उन पर सोचते हैं। और इसलिए जब वे किसी दिए गए फ़िल्म-दृश्य को अपने गीत की लय में विजुअलाइज करते हैं तो उनकी कल्पना उसकी सीमाओं को लाँघकर दूर-दूर तक जाती है। वे सामने मौजूद पात्रों के परिवेश को व्यापक सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में रूपायित करते हैं और पर्दे पर मौजूद दृश्य की साक्षी आँखों को सोचने का एक बड़ा परिदृश्य देते हैं। पीयूष मिश्रा के गीत चरित्रों के संवाद नहीं होते, उनकी नियति की व्याख्या होते हैं। ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ और ‘गुलाल’ जैसी फ़िल्मों के गाने हिन्दी फ़िल्म गीतों के इतिहास का एक अलग अध्याय हैं।
The King of Rimes
- Author Name:
Ziad Dib Jreige
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- Description: After being born as dawn unto his own self, the Lebanese Nightingale sings again, this time with a more vibrant and echoing voice. “The King of Rimes” is merely a mixture of the poet’s self-worth and his experimental literary perspectives speaking to the core of life and death. Including the first thirty sonnets following the Shakespearean model, and many more selected poems and quotes, this book is both an expression and a work of art.
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