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Veerta Par Vichlit

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‘वीरता पर विचलित’ आर. चेतनक्रान्ति का दूसरा कविता-संग्रह है और हमारे समय की सच्चाइयों, उसके विरूपों और विडम्बनाओं की गहरे व्यंग्य, करुणा और विराग के साथ पड़ताल करता है। जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ ताक़त, वीरता और सफलता की प्रक्रियाओं और समाज में दिखने वाली उनकी शक्लों की जाँच-परख करती हैं, उन पर शिद्दत के साथ टिप्पणियाँ करती हैं। उनके माध्यम से हम आज के शहरी और क़स्बाई समाज का हाल जान सकते हैं, जो विचलित करने और सोचने के लिए बाध्य करने वाला है। ये कविताएँ ताक़तवर के बरक्स कमज़ोर, मर्दों के बरक्स औरतों, बड़ी चीज़ों के बरक्स मामूली चीज़ों, महानगरों के बरक्स क़स्बों की मासूम संवेदनाओं की कविताएँ हैं। चेतनक्रान्ति ने कई तरह की संरचनाओं के साथ ही मुश्किल छंदों और तुकों के दिलचस्प और सार्थक प्रयोग किए हैं, जिन्हें पढ़ना बिना छंद की कविता के इस युग में सुखद लगता है। उनके छंद कहीं नागार्जुन, तो कहीं नज़ीर अकबराबादी जैसे बड़े कवियों की कविता याद दिलाते हैं। इस संग्रह की अधिकतर कविताएँ पाठक को चकित करती हैं, झकझोरती हैं, रोकती हैं और गंभीर ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। हमें यह बताती हैं कि अपने समय को इस तरह भी देखा जा सकता है। —मंगलेश डबराल

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‘वीरता पर विचलित’ आर. चेतनक्रान्ति का दूसरा कविता-संग्रह है और हमारे समय की सच्चाइयों, उसके विरूपों और विडम्बनाओं की गहरे व्यंग्य, करुणा और विराग के साथ पड़ताल करता है। जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ ताक़त, वीरता और सफलता की प्रक्रियाओं और समाज में दिखने वाली उनकी शक्लों की जाँच-परख करती हैं, उन पर शिद्दत के साथ टिप्पणियाँ करती हैं। उनके माध्यम से हम आज के शहरी और क़स्बाई समाज का हाल जान सकते हैं, जो विचलित करने और सोचने के लिए बाध्य करने वाला है। ये कविताएँ ताक़तवर के बरक्स कमज़ोर, मर्दों के बरक्स औरतों, बड़ी चीज़ों के बरक्स मामूली चीज़ों, महानगरों के बरक्स क़स्बों की मासूम संवेदनाओं की कविताएँ हैं। चेतनक्रान्ति ने कई तरह की संरचनाओं के साथ ही मुश्किल छंदों और तुकों के दिलचस्प और सार्थक प्रयोग किए हैं, जिन्हें पढ़ना बिना छंद की कविता के इस युग में सुखद लगता है। उनके छंद कहीं नागार्जुन, तो कहीं नज़ीर अकबराबादी जैसे बड़े कवियों की कविता याद दिलाते हैं। इस संग्रह की अधिकतर कविताएँ पाठक को चकित करती हैं, झकझोरती हैं, रोकती हैं और गंभीर ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। हमें यह बताती हैं कि अपने समय को इस तरह भी देखा जा सकता है।
—मंगलेश डबराल

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2017
Weight
200 grams
ISBN-13
9789360867379
Pages
192
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13 × 20 cm
Language
Hindi

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