Kavitavali (Tulsidass Kart)
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Author:
Tulsidass, Sudhakar Pandey, TulsidasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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गोस्वामी तुलसीदास का सम्पूर्ण जीवन और कृतित्व राम के प्रति समर्पित और राममय था। यद्यपि ‘कवितावली’ तुलसी के मुक्तक पदों का संग्रह है, किन्तु इसमें राम के बालरूप से लेकर राम के सभी रूपों की झाँकी है। तुलसी के अतिप्रिय राम सम्बन्धित मार्मिक प्रसंग भी इन मुक्तकों में मिलते हैं। ‘कवितावली’ तुलसीदास की ऐसी कृति है जिसमें उनका व्यक्तित्व राम-महिमा के साथ देश-काल से तादात्म्य करता हुआ एक संघर्षशील सर्जनात्मक, लोकमंगलाकांक्षी भक्त के रूप में प्रकट होता है। इस काव्य में रामचरित और उनसे सम्बद्ध चरित्रों की तथा उनके चरित्र की महिमा का आख्यान तो है ही, इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन स्थानों, उन तत्त्वों के भी सम्बन्ध में तुलसीदास स्पष्ट प्रकट होते हैं जो उनके जीवन में गुण-धर्म के समान समा गए हैं और जो उनके व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं। तुलसीदास के महान व्यक्तित्व के पीछे देश-काल को देखने की उनकी जो सर्जनात्मक दृष्टि है, उसका भी हमें इसमें ज्ञान प्राप्त होता है।</p> <p>तुलसीदास जी केवल द्रष्टा ही नहीं कर्मजयी स्रष्टा भी हैं और उनकी जीवन-गति में जो अवरोध समाज के सम्मुख आते हैं, उनसे संघर्षकर्ता तथा अजेय योद्धा के रूप में भी ‘कवितावली’ में अपने को प्रकट करते हैं। जाति-पाति के बन्धन से मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का आह्वान भी ‘कवितावली’ में है। ‘कवितावली’ के भीतर उनकी उन मान्यताओं की भी प्रभा है, जिनके कारण उन्हें लोग समवन्यवादी मानते हैं। लोक में प्रचलित और प्रिय कवित्त, सवैया और छप्पय की पद्धति अपनाकर तुलसी ने राम के विभिन्न रूपों की राममय रचना की है। उनके आदर्श राम थे और उनका सम्पूर्ण कृतित्व राममय था। उन्होंने मुक्तक मणि के रूप में इसे प्रचारित किया। ‘कवितावली’ में रामचरित के स्फुट मुक्तक संगृहीत हैं। इनका संयोजन और सम्पादन तुलसी के समय में ही हो चुका था। बालकांड से लेकर उत्तरकांड तक के रामचरितमानस के अनुरूप सातों कांड कवितावली में भी हैं। इन चार सौ पचीस पदों की विशेषता और रामचरितमानस से इनकी विभिन्नता यही है कि ये सभी मूलक छन्द हैं। कवितावली में ‘हनुमान बाहुक’ स्वतंत्र रूट-रचना है। तुलसी के जीवन से सम्बद्ध अनेक रचनाएँ भी कवितावली में हैं। उन्होंने हनुमान की अपनी आराधना को भी इस रचना में स्थान दिया है।</p> <p>तुलसी के सम्पूर्ण जीवन-काल की स्फुट रचनाओं को सुधाकर पाण्डेय जी ने इस ग्रन्थ में संगृहीत किया है। छात्रों की सुविधा के लिए शब्दार्थ, भावार्थ और पदों की विशिष्टता और विशेषता को भी उन्होंने इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है। इससे यह ग्रन्थ छात्रों के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी बन गया है।
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गोस्वामी तुलसीदास का सम्पूर्ण जीवन और कृतित्व राम के प्रति समर्पित और राममय था। यद्यपि ‘कवितावली’ तुलसी के मुक्तक पदों का संग्रह है, किन्तु इसमें राम के बालरूप से लेकर राम के सभी रूपों की झाँकी है। तुलसी के अतिप्रिय राम सम्बन्धित मार्मिक प्रसंग भी इन मुक्तकों में मिलते हैं। ‘कवितावली’ तुलसीदास की ऐसी कृति है जिसमें उनका व्यक्तित्व राम-महिमा के साथ देश-काल से तादात्म्य करता हुआ एक संघर्षशील सर्जनात्मक, लोकमंगलाकांक्षी भक्त के रूप में प्रकट होता है। इस काव्य में रामचरित और उनसे सम्बद्ध चरित्रों की तथा उनके चरित्र की महिमा का आख्यान तो है ही, इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन स्थानों, उन तत्त्वों के भी सम्बन्ध में तुलसीदास स्पष्ट प्रकट होते हैं जो उनके जीवन में गुण-धर्म के समान समा गए हैं और जो उनके व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं। तुलसीदास के महान व्यक्तित्व के पीछे देश-काल को देखने की उनकी जो सर्जनात्मक दृष्टि है, उसका भी हमें इसमें ज्ञान प्राप्त होता है।</p>
<p>तुलसीदास जी केवल द्रष्टा ही नहीं कर्मजयी स्रष्टा भी हैं और उनकी जीवन-गति में जो अवरोध समाज के सम्मुख आते हैं, उनसे संघर्षकर्ता तथा अजेय योद्धा के रूप में भी ‘कवितावली’ में अपने को प्रकट करते हैं। जाति-पाति के बन्धन से मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का आह्वान भी ‘कवितावली’ में है। ‘कवितावली’ के भीतर उनकी उन मान्यताओं की भी प्रभा है, जिनके कारण उन्हें लोग समवन्यवादी मानते हैं। लोक में प्रचलित और प्रिय कवित्त, सवैया और छप्पय की पद्धति अपनाकर तुलसी ने राम के विभिन्न रूपों की राममय रचना की है। उनके आदर्श राम थे और उनका सम्पूर्ण कृतित्व राममय था। उन्होंने मुक्तक मणि के रूप में इसे प्रचारित किया। ‘कवितावली’ में रामचरित के स्फुट मुक्तक संगृहीत हैं। इनका संयोजन और सम्पादन तुलसी के समय में ही हो चुका था। बालकांड से लेकर उत्तरकांड तक के रामचरितमानस के अनुरूप सातों कांड कवितावली में भी हैं। इन चार सौ पचीस पदों की विशेषता और रामचरितमानस से इनकी विभिन्नता यही है कि ये सभी मूलक छन्द हैं। कवितावली में ‘हनुमान बाहुक’ स्वतंत्र रूट-रचना है। तुलसी के जीवन से सम्बद्ध अनेक रचनाएँ भी कवितावली में हैं। उन्होंने हनुमान की अपनी आराधना को भी इस रचना में स्थान दिया है।</p>
<p>तुलसी के सम्पूर्ण जीवन-काल की स्फुट रचनाओं को सुधाकर पाण्डेय जी ने इस ग्रन्थ में संगृहीत किया है। छात्रों की सुविधा के लिए शब्दार्थ, भावार्थ और पदों की विशिष्टता और विशेषता को भी उन्होंने इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है। इससे यह ग्रन्थ छात्रों के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी बन गया है।
Book Details
-
ISBN9788180318849
-
Pages209
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
Be-Lagaam Shayari
- Author Name:
Sanjiv Saraf
- Book Type:

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‘बे-लगाम शाइरी’ उन शाइरों के अदम्य साहस का जश्न मनाती है, जो सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और नैतिकता की आम कसौटियों को चुनौती देने की हिम्मत रखते हैं। ये आज़ाद-ख़याल शाइर अपनी पैनी और सटीक शाइरी के ज़रीए पुराने जड़ विचारों पर वार करते हैं और “पवित्रता” के ठेकेदारों का ख़ूब मज़ाक़ उड़ाते हैं। उनके लिए कुछ भी और कोई भी इतना पवित्र या ख़राब नहीं कि उस पर सवाल न उठाया जा सके या उस पर बात न की जा सके — चाहे वो ख़ुदा हो, धर्म हो, शराब-नोशी पर पाबंदी लगाने वाले उपदेशक हों, जिस्मानियत का ज़िक्र हो, या फिर समलैंगिकता की बातें हों। ये शाइर हर तरह की रोक-टोक, ज़ुल्म, और ‘ये करो–ये न करो’ जैसी बंदिशों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं। हाज़िर-जवाबी और तंज़ (व्यंग्य) इन शाइरों के सबसे धारदार हथियार हैं, और इन्हीं के सहारे वो अपनी बात पाठक के दिल में उतार देते हैं। इस किताब में संजीव सराफ़ ने बेहद मेहनत और लगन से ऐसे अश्आर चुनकर पेश किए हैं, जो इस अपारंपरिक शाइरी की पूरी दुनिया का एक संक्षिप्त परिचय देते हैं। उद्योगपति, निवेशक और सामाजिक उद्यमी संजीव सराफ़ कई भूमिकाएँ निभाते नज़र आते हैं, लेकिन उर्दू शाइरी का जुनून उनके दिल के सबसे क़रीब है। उन्होंने रेख़्ता फ़ाउंडेशन की स्थापना की, जो उर्दू भाषा और साहित्य की दुनिया का सबसे बड़ा और लोकप्रिय प्लैटफ़ॉर्म है। साथ ही ये संस्था उर्दू के पुराने ग्रंथों के संरक्षण और युवाओं के बीच उर्दू को बढ़ावा देने के लिए साहित्यिक उत्सवों और अन्य कार्यक्रमों के आयोजन का व्यापक काम कर रही है। सिंधिया स्कूल (1975) और आई.आई.टी. खड़गपुर (1980) के पूर्वछात्र रहे संजीव, कारोबार और उद्योग में तीस से अधिक वर्षों से सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने पॉलीप्लेक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (एक भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी) की स्थापना की। साथ ही उन्होंने मनुपत्र (भारत का प्रमुख लीगल डेटाबेस) स्थापित की और ग्रीन-एनर्जी के क्षेत्र में कई छोटे-बड़ी परियोजनाएँ शुरू कीं। इसके बाद उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा उर्दू साहित्य पर केंद्रित कर दी और अब पूरी तरह इसी क्षेत्र में सक्रिय हैं, जिसे वो अब तक के अपने जीवन का सबसे संतोषजनक काम कहते हैं। संजीव को कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है, जिनमें 2016 में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद की डॉक्टर ऑफ़ लेटर्स (D.Litt.) की उपाधि; 2018 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का नैशनल सर सय्यद एक्सिलेंस अवार्ड; 2020 में रेख़्ता फ़ाउंडेशन के माध्यम से उत्कृष्ट काम के लिए सिंधिया स्कूल का माधव अवॉर्ड; और 2022 में उनके अल्मा मेटर आई.आई.टी. खड़गपुर द्वारा दिए गए डिस्टिंग्विश्ड एलमनाई अवॉर्ड शामिल हैं।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
- Book Type:

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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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- Description:
Book
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
- Book Type:

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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
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