Teri Hansi Krishn Vivar Si
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Book Details
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ISBN9789387310186
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Pages120
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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अपनी ईमानदारी और सदाशयता के बावजूद एकरस होती जा रही अधिकांश हिन्दी कविता के बीच भगवत रावत इसलिए अपनी अनायास और अप्रगल्भ पहचान तथा अस्मिता प्राप्त कर लेते हैं कि उनके यहाँ अपने कवि और कविताई को लेकर उतना हिसाब-किताब नहीं है जितनी कि अपनी और औरों की इनसानियत और दोस्ती को बचा पाने और चरितार्थ कर पाने की चिन्ता। इसलिए अभिव्यक्ति को लेकर उनकी कविता में कई क़िस्म के ‘कलात्मक’ संकोच या आत्म-प्रतिबन्ध नहीं हैं। लिखना उनके लिए इसलिए ज़रूरी नहीं है कि कविता एक प्रतिष्ठा का प्रश्न है या उसे लिखकर कुछ सिद्ध किया जाना है, बल्कि आज के भारतीय समय में जो लिख सकते हैं, उनके पास लिखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। वे लिखकर अमरत्व प्राप्त नहीं करना चाहते बल्कि यदि कोई विकल्प न हो तो मर-मर कर लिखना चाहते हैं।
आदमी को लेकर एक निस्संकोच अपनापन और करुणा भगवत रावत की कविता के केन्द्र में है, इसीलिए जब वे याद दिलाते हैं कि इस समय दुनिया को ढेर सारी करुणा चाहिए तो वे भावुक नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि निर्वैयक्तिकता, तटस्थता आदि के मूलत: मानव-विरोधी मूल्यों के ख़िलाफ़ एक अमोघ नकार दर्ज करते हैं।
भारतीय साहित्य की एक महान् परम्परा पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया है और वह है मित्रता के चित्रण की। ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ की मैत्रियाँ भी भारतीय मानवीयता का एक अनिवार्य तत्त्व हैं और बीसवीं शताब्दी में जिस वैश्विक मानवीय प्रतिबद्धता की बात की जाती है, उसके मूल में यही वह स्वाभाविक दोस्ताना है जो इनसानों में हमेशा मौजूद रहता है। मुक्तिबोध के बाद भगवत रावत आज के पहले हिन्दी कवि हैं जिनके यहाँ दोस्ती का जज़्बा, किसी मित्र की प्रतीक्षा, सखा के आने की ख़ुशी, बल्कि किसी भी राह चलते को दोस्त बनाने की चाहत इतनी शिद्दत से मौजूद है। जब हर अपने जैसा इनसान दोस्त है तो बेशक वसुधा भी कुटुम्ब है। यह आकस्मिक नहीं है कि भगवत रावत ने कुछ कविताएँ अपने कवि-कलाका र मित्रों पर भी लिखी हैं। दोस्ती का यह जज़्बा उस समय और भी सम्पूर्ण तथा सार्थक हो जाता है, जब भगवत रावत उसकी ज़द में प्रकृति और पर्यावरण को भी ले आते हैं।
भगवत रावत की ये कविताएँ भारतीय जीवन के ऐसे कई चित्र हिन्दी कविता में पहली बार लाती हैं जो शायद पहले कभी देखे नहीं गए। यदि प्रेमचन्द ने ‘क़फन’ में दलितों के मर्मांतक यथार्थ का चित्रण किया था तो ‘अतिथि कथा’ में भगवत रावत उसी बिरादरी का एक ऐसा स्निग्ध दृश्य उपस्थित करते हैं जो आत्मा को जगमगा जाता है। ‘यह तो अच्छा हुआ’, ‘सोच रही है गंगाबाई’, ‘मानव-संग्रहालय’ (जो निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ का समसामयिक संस्करण है) आदि में उनकी कविता संसार के सबसे बड़े सर्वहारा वर्ग—स्त्रियों की कथाएँ खोज लेती है। उनकी ‘कचरा बीननेवाली लड़कियाँ’ हिन्दी की इस तरह की बेहतरीन समूहपरक कविताओं में भी अपनी निगाह और वात्सल्य के लिए बेमिसाल स्वीकार की जानी चाहिए। यदि भगवत रावत की व्यापक आस्था और पक्षधरता को लेकर किसी भी दुविधा की गुंजाइश नहीं है तो यह भी सच है कि उसमें कोई अतिमानवीय, सुनियोजित, यंत्रचालित आशावाद तथा आत्माभिनन्दन भी नहीं है। कई कविताओं में पराजय की अकातर स्वीकृति है, अपनी और अपने जैसों की भूल-ग़लतियों, ख़ामियों और ग़फ़लतों का इक़बाल भी है। लेकिन इनमें आत्मदया और विलाप नहीं है, बल्कि उस तरह का मूल्यांकन है जो हर मुक़ाबले के बाद शाम को शिविरों में किया जाता है ताकि अगली सुबह फिर आगे बढ़ा जा सके। ‘मेरा चेहरा’, ‘सच पूछो तो’, ‘ठहरा हूँ जब-जब छाया के नीचे’, ‘क्या इसीलिए धारण की थी देह’, ‘मौत’ तथा ‘आग पेटी’ जैसी अत्यन्त निजी कविताओं में अपने एकान्त, पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कई क़िस्म की मुठभेड़ें हैं, आत्म-स्वीकृतियाँ हैं, यथार्थ से निर्मम मुक़ाबले हैं लेकिन निराशा या पस्ती कहीं नहीं है।
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‘ताल्स्ताय और साइकिल’ केदारनाथ सिंह की कविताओं का एक ऐसा संग्रह है, जो सबसे पहले कविता को देशज-नागर-वैश्विक इतिहास और भूगोल-विमर्श के बीच एक पुल बनाता है। केदारनाथ सिंह का काव्य-समय एक न होकर अनेक है और सांस्कृतिक बहुलता को अर्थ देता है। पहले की, पर लम्बे समय से बनी पहचान को यह छंद और छंद के बाहर नया विस्तार देनेवाला संग्रह है। एक कविता के शीर्षक के अनुसार ही कहें, यह एक ज़रूरी चिट्ठी का मसौदा है।
‘पानी की प्रार्थना‘, ‘त्रिनीदाद’, ‘पांडुलिपियाँ’, ‘घोंसलों का इतिहास’, ‘बुद्ध से’, ‘ईश्वर और प्याज’, ‘बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर’ ‘जे.एन.यू. में हिन्दी’ और ‘शहरबदल’ जैसी कविताएँ अपनी अन्तर्वस्तु में गहन और बनावट में अपूर्व हैं। लुखरी का आत्मव्यंग्य न दूसरों को बख़्शता है, न अपने को। फंतासी और अयथार्थ भी आज की जटिल सच्चाई के ही सगोतिया हैं।
केदारनाथ सिंह की हर कविता एक नया प्रस्थान है जो काव्यात्मक-अकाव्यात्मक, सहज-जटिल को एक साथ साधने की विलक्षण कला का साक्ष्य है। जो कवि ‘ताल्स्ताय और साइकिल’ जैसी कविता लिख सकता है, जो चींटियों की रुलाई सुन सकता है, जो इब्राहीम मियाँ ऊँटवाले को पहचान सकता है, उस कवि को गहरी समझ के साथ ही पढ़ा जा सकता है। यह कविता और मनुष्य को बचाने की ऐसी कोशिश है जो देह-देहान्तर के रिश्तों को पहचानने में सक्षम है।
‘ताल्स्ताय और साइकिल’ केदारनाथ सिंह की लम्बी काव्य-यात्रा का एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ समकालीन अनुभव के कई ऐसे धरातल उभरते दिखाई पड़ते हैं, जो उसके नए अनुषंगों को खोलते हैं और कई बार उसकी सुपरिचित परिधि को अतिक्रान्त भी करते हैं।
Yoon Hee
- Author Name:
Idrees Babar
- Book Type:

- Description: इदरीस बाबर ने अपनी ग़ज़ल के ज़रिये नई शायरी को दरयाफ़्त किया है। उनकी किताब ‘यूँ ही’ की तमाम ग़ज़लों की ख़ासियत ये है कि वह ग़ज़ल के पुराने और घिसे-पिटे मज़ामीन को दोहराती नहीं हैं, बल्कि जदीद ज़िन्दगी से जुड़े इंसानी मामलात को अपना मौज़ू बनाती हैं। अपनी ग़ज़ल में वह उर्दू से वाबस्ता नफ़ासत और नज़ाकत को नज़र अन्दाज़ करते हुए ऐसे अलफ़ाज़ के इस्तेमाल करने में भी कोई बुराई महसूस नहीं करते, जिनको बहुत पहले मेयारी ज़बान के तसव्वुर ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उनके अन्दर का ग़ज़ल-गो हर तरह से समाज की बदलती हुई ज़हनी करवट, सियासी निज़ाम में धँसी हुई इनसानी चीख़ और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इश्क़ करते, भटकते, बेरोज़गार और बा-सलाहियत नौजवान की बे-चैनी से वाक़िफ़ है। इदरीस बाबर के लिए कहा जा सकता है कि ग़ज़ल में ज़बान और बयान के जितने तज'रबे उन्होंने ज़फ़र इक़बाल के बाद किये हैं, वह अपने पहले शेरी मजमूए में किसी और शायर ने शायद ही किये हों। इस तरह वह जदीदतरीन ग़ज़ल में वाक़ई अनोखे लहजे के एक बा-कमाल शायर के तौर पर ख़ुद को मनवाने की भरपूर ताक़त रखते हैं। उनकी इस किताब से आपको उनके नएपन का महज़ कुछ पन्ने पलटते ही अन्दाज़ा हो जाएगा।
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