Nai Konplen
Author:
Motilal AlamchandraPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Available
Book
ISBN: 9789387310728
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Jhukna Kisi Ko Ropna Hai
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

- Description: नब्बे के बाद की हिन्दी कविता को कवियों की जिस पीढ़ी ने अपने सरोकारी एवं सतत लेखन से सँवारा-बनाया है उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविताई का विस्तार तीन दशकों में फैला हुआ है, लेकिन इसकी खासियत है इसका सातत्य। 1999 में श्रीप्रकाश शुक्ल का पहला संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ के आने से लेकर 2022 में सातवें संग्रह ‘वाया नई सदी’ तक की यात्रा में एक निरन्तरता है। ये कृतियाँ क्रमशः संस्कृति, दर्शन और राजनीतिक चेतना की धुरी पर अपने समय को कातती हैं। इनके पूरे परिस्पन्द के बीच एक चीज सर्वनिष्ठ है और वह है लोकभाषा और जनपदीयता। बनारस अंचल श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं की शिराओं में रक्त बनकर दौड़ रहा है। सोनभद्र, मिर्जापुर, प्रयाग और गाजीपुर का ‘लोकेल’ उनकी कविता में बुनियाद की तरह बिछा हुआ है। उनकी कविताओं पर इस क्षेत्र की लोककथाओं, लोक धुनों और गीतों का गहरा असर है। आख्यान-परम्परा का तो सबसे गहरा और व्यापक। श्रीप्रकाश शुक्ल की आख्यान शैली में लोक और शास्त्र दोनों में मौजूद दन्तकथाओं, किंवदन्तियों और मिथकीयता के आधुनिक सन्दर्भों का काव्यमय सन्धान अद्भुत और व्यापक है। लोककथाओं व मिथकीय पृष्ठभूमि के साथ श्रीप्रकाश शुक्ल ने बहुत साभिप्राय लोक देवों-देवियों, लोकनायकों और अति साधारण किरदारों के साथ मामूली जगहों, पेशों, रिवाजों व चीजों को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। प्रशस्त इतिहासबोध और जनपदीयता के भीतर से कविता में इतिवृत्त और प्रकृति के संश्लेष के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल इस प्रवृत्ति के प्रतिनिधि कवि हैं।
Ye Galat Baat Hai
- Author Name:
Manoj Kumar Sharma
- Book Type:

-
Description:
‘ये ग़लत बात है’ कवि-कहानीकार मनोज कुमार शर्मा का पठनीय कविता-संग्रह है। समकालीन हिन्दी कविता सहसा इतनी सजग और त्वरित हो उठी है कि परिवेश की प्रत्येक गतिविधि उसकी ज़द में है। इसके परिणाम अनेक रूपों में प्राप्त हो रहे हैं। कुछ रूप मनोज कुमार शर्मा की इन कविताओं में देखे जा सकते हैं।
सामाजिक विसंगतियाँ, आत्मीय प्रसंग, प्रगतिशील चिन्तन, निजता के निमिष और मानवीय प्रयत्न— इन बिन्दुओं पर मनोज ने अपनी कविताएँ केन्द्रित की हैं। कुछ कविताओं में प्रकारान्तर से समय, नियति और नियन्ता से संवाद है। कवि जीवन की ‘म्रियमाण वास्तविकता’ को भी रेखांकित करता है। ऐसी कविताओं से व्यंग्यमिश्रित पीड़ा का यह भाव भी मुखर होता है—‘ऐ लीलाधर!/क्यों बनाया मनुष्य को भस्मासुर/क्यों बनाया मनुष्य/क्यों?’
जब मनोज ‘पानी’ कविता लिखते हैं तब वे जल के साथ ‘सजल संवेदना’ पर मँडराते संकटों का संकेत भी करते हैं। ऐसे प्रयत्नों से वे अपने निहितार्थों को व्यापक बनाते हैं। यह पढ़कर अच्छा लगता है कि उनका दृढ़ भरोसा प्रेम में है—चाहे वह प्रेम व्यक्ति केन्द्रित हो या मूल्य सन्दर्भित। और इसकी प्रतीक्षा कवि अनन्त तक कर सकता है—‘जब मिल जाएँगी दसों दिशाएँ आकाश से/ क्या तुम तब मिलोगे?’
ये कविताएँ पाठक को उकसाती हैं कि वह नई सुबह की अगवानी कर सके। विश्वास है, यह संग्रह पाठकों की प्रीति अर्जित करेगा।
Kaafila-E-Nau-Bahaar
- Author Name:
Vikas Sharma Raj
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Pida, Neend Aur Ek Ladki
- Author Name:
Prerana Sarwan
- Book Type:

-
Description:
डायरी से :
दु:ख का गर्भपात नहीं होता है। दु:ख सतमासे भी नहीं होते हैं। दु:ख तो सम्पूर्ण रूप से जन्मते हैं जीवन की कोख से, इस विचार मात्र से मेरे भीतर दु:खों की ज्वालामुखी उमड़ पड़ती है। उसी बहते हुए लावे में हैं हज़ारों दु:खों के भ्रूण, जो एक क्षण में पूर्ण रूप से जन्म लेते हैं। जो मेरे पतन के कारण हैं या उन्नति के, मैं नहीं जानती। मैंने स्वयं से बाहर निकलकर कभी कुछ देखने का साहस या प्रयास नहीं किया। मैं भीतर ही भीतर जीवन की खाई को गहरा करने में लगी रहती हूँ। मुझे याद है, मुझे चाँद ने कभी नहीं छुआ लेकिन बन्द कमरों में आकर सूरज की आग मेरी कोमल देह को झुलसाती रही, पीड़ा देती रही।
11 जुलाई, 1999
मेरी प्रत्येक कविता जीवन की प्रत्येक साँस का ऋण चुकाती है। मेरे जाने पर जीवन मुझ पर एहसान या दया की दुहाई न दे। मैं नहीं कहूँगी अपनी व्यथा, पर मेरी कविता जीवन के मुझ पर किए हुए अन्याय की कथा कहेगी। मृत्यु के बाद भी मेरी कविता ख़ामोश नहीं होगी। मेरी कविता की सत्यता से यह जीवन मृत्यु के बाद भी नहीं बच पाएगा।
25 जनवरी, 1999
कितना बचाया पर आज आख़िरकार गिन्नी चिड़िया के एक बच्चे को खा गई। हम क्या कर सकते हैं! ईश्वर ने जीवों की यही नियति निर्धारित की है। उसकी लीला वो ही जाने, चिड़िया जैसी कितनी इच्छाएँ मेरी रोज़ मरती हैं और आँसुओं में बहा दी जाती हैं।
20 मई, 2011
Pani ka Pta Puchh Rahi Thi Machhali
- Author Name:
Kamleshwar Sahu
- Book Type:

- Description: Poems
Jai Kanhaiyalal Ki
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: कवि ने प्रथम पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे टिप्पणी दी है –“ कृष्ण-रूप में कंस जैसे हर शासक के प्रति “, जिससे मुख्य मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है ‘ करारे व्यंग्य – देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर ‘ | रमेशराज के व्यंग्यों की ख़ास बात यह है कि स्तरहीनता नहीं, कहीं अशिष्टता नहीं, न कहीं मर्यादा का उल्लंघन, फिर भी करारे प्रहार | जीवन का भोगा हुआ यथार्थ जैसे साकार सामने खड़ा हो | कैसी सहज-सरल अभिव्यक्ति, लक्ष्य की ओर दनदनाते-सनसनाते तीर की तरह – जन को न रोटी-दाल, जै कन्हैयालाल की नेताजी को तर माल, जै कन्हैयालाल की! नीति है कमाल की !! व्यंग्य को अधिक धारदार और मारक बनाने के लिए कवि ने उद्धव-गोपी प्रसंग को बड़ी होशियारी के साथ जोड़ दिया है- ऊधौ देश पर आप कर्ज विश्वबैंक का लाद-लाद हो निहाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कथ्य की सशक्तता के साथ कवि का कौशल भी प्रभावित करता है | इसे मैं उक्ति-वैचित्र्य का कमाल मानता हूँ, साथ ही वर्ण-मैत्री भी निर्दोष एवं प्रभावी है | प्रकृति से जो प्रतीक लिए गए हैं वे कवि के मन्तव्य को भी स्पष्ट करते हैं तथा उनसे काव्य में कलात्मक विम्ब-सौन्दर्य भी प्रभावित करता है | देखिये एक उदाहरण – खुशियों का मानसून अँखियों से दूर है सूख गए सुख-ताल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कवि ने अपने कथ्य को अधिक ग्राह्य बनाने के लिए पौराणिक इंगित भी दिए हैं | कहीं विरोधाभास से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है तो कहीं आधुनिक योजनाओं की विडम्बनाओं की ओर इंगित है – केवल अंगूठे नहीं मांगें आज द्रोण जी भील को करें हलाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
Hansti Hui Laraki
- Author Name:
Nirmala Thakur
- Book Type:

-
Description:
निर्मला ठाकुर की कविताएँ यह कहना चाहती हैं कि अनुभव रचना का एक ज़रूरी तत्त्व है। जीवनानुभव की रोशनी में बाहरी दुनिया को देखते हुए उन्होंने कविताओं को आकार दिया है। 'हँसती हुई लड़की' का केन्द्रीय सरोकार स्त्री है। स्त्री की बहुतेरी छवियाँ हैं। यहाँ जीवन का मार्मिक विस्तार है। ‘रूप—कई रूप’ कविता में ’नन्ही/मुन्नी दँतुली में हँसी—दूध की' से लेकर सन्ध्या की देहरी तक आ पहुँची स्त्री-जिजीविषा का वर्णन है। निर्मला ठाकुर ने बहुत संजीदगी के साथ आधी आबादी के संघर्षों व स्वप्नों को चित्रित किया है। ‘औरत की दुनिया’ इस सन्दर्भ में ख़ासतौर पर पढ़ी जानी चाहिए।
इन कविताओं का सशक्त पक्ष है ‘अबूझ की समझ’। यही कारण है कि इनमें सुसंवेद्य पारदर्शिता है। ‘बर्तन माँजती हुई स्त्री की फलश्रुति है—इधर देखो/मुखातिब हो ज़रा हमसे/मुख पर कौन सी छाया घनेरी/लिए बैठी हो/उठो न/चेहरा इधर कर/ऊपर उठाओ/समय का दर्पण तुम्हारे सामने है।’ कवयित्री ने स्त्री-जीवन के कोलाहल और अकेलेपन की शिनाख़्त की है।
रिश्ते, प्रकृति, रूपबोध व जनजीवन आदि कविताओं में शामिल हैं। 'स्वर्ग सुख' कविता पढ़कर निराला की वह ‘तोड़ती पत्थर’ याद आ सकती है। ‘जो करना’ आत्मकथात्मक है और बेहद मार्मिक।
भाषा-शिल्प की सहजता में विन्यस्त ये कविताएँ एक संवेदनशील मन का आईना हैं।
Aankhon Mein Uljhi Dhoop
- Author Name:
Amita Sharma
- Book Type:

-
Description:
ये कविताएँ कुछ हद तक ‘पर्सनल पोएम्स’ हैं, निजी कविताएँ। जैसे व्यक्तिगत काव्य-डायरियाँ। इनका ‘मैं’ कोई पराया ‘मैं’ नहीं। पूरी तरह आत्मकथात्मक ‘मैं’ भी नहीं। यह एक अन्दर की कहीं छिपी-ढँकी इच्छा के कविता में प्रकट होने की प्रक्रिया में आकार लेता ‘मैं’ है। सपनों का ‘मैं’। कविता में सपना देखनेवाला ‘मैं’। ये कविताएँ निर्द्वंद्व मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा का प्रगीत हैं। अपने बेहद निजी, दैहिक सम्बन्ध को भी प्रकृति के पूरे वैभव और समूचे ब्रह्मांड के साथ विमर्श में पाने की लालसा इन कविताओं में है। इहलौकिक सम्बन्धों के बारे में कोई मुखरता यहाँ नहीं है, पर कोई अन्तर्बाधा भी नहीं। यह एक ऐसा अप्रतिम और अनाम सम्बन्ध है जैसे आकाश में चिड़िया की उड़ान होती है जो हवा पर अपने पदचिह्न नहीं छोड़ती। इन कविताओं में लौकिक और अलौकिक के बीच सहज आवाजाही है। इसलिए कोई मिथक यहाँ आता भी है तो उसकी सिर्फ़ हल्की-सी पदचाप ही सुनाई पड़ती है। इन कविताओं में शब्द की चिन्ता और शब्द की काया का स्वीकार बहुत दिलचस्प भी है और अलग-सा भी। ये शब्द की आज़ादी और मौन के साहस, दोनों को जानती हैं। वे शब्द और देह को एक-दूसरे के विकल्प की हद तक देखने और उसे एक-दूसरे की जगह रखने की कोशिश करती हैं। ये कविताएँ एक ऐसा दिक् रचती हैं जहाँ किसी अनुपस्थित की अदेह उपस्थिति है। उस अनुपस्थित के शब्दों की गूँज है। उसके स्पर्श का अहसास है। देहदीन देह की ख़ामोशी है। अनुपस्थित समय है। एक स्टिललाइफ़ जैसा चित्र, जिसमें हर चीज़ पर किसी अनुपस्थित की छाप भी है और उसके किसी भी क्षण आ जाने की संभावना है। इन कविताओं की खनक में चुप और बातूनीपन का दुर्लभ सन्तुलन है। इसे सुनना थोड़ा अटपटा हो सकता है, पर कहना चाहता हूँ कि यह सन्तुलन किसी स्त्री की कविता में ही सम्भव हो सकता है।
—राजेश जोशी
Raswanti
- Author Name:
Ramdhari Singh Diwakar
- Book Type:

-
Description:
सौन्दर्य, संवेदना और प्रतिरोध के अद्वितीय कवि हैं रामधारी सिंह ‘दिनकर’, और इस बात को उनके आरम्भिक आत्ममंथन युग की रचना ‘रसवन्ती’ में भी लक्षित किया जा सकता है। इस संग्रह में प्रकृति या ऋतुओं का सौन्दर्य हो; स्त्री-पुरुष का प्रेम हो, पीड़ा का आरोह हो; संघर्ष-सरोकारों की छटपटाहट हो, सामाजिक मूल्य-ह्रास या आगत की रहस्यमयता हो—दिनकर एक साधक के रूप में सभी को निम्नतम से उच्चतम स्तर तक बग़ैर किसी दृष्टिबन्ध के साधते दृष्टिगत होते हैं। यह राष्ट्रकवि की उदात्त अन्तश्चेतना ही है कि वे अपनी परम्परा से विलग नहीं होते और कालिदास के जीवन को साक्षात् करते अपने रचना-लोक में उन्हें ‘कविगुरु’ कहते हैं।
उल्लेखनीय है कि ‘गीत-शिशु’, ‘रसवन्ती’, ‘बालिका से वधू’, ‘प्रीति’, ‘दाह की कोयल’, ‘नारी’, ‘अगुरु-धूम’, ‘पुरुष-प्रिया’, ‘पावस-गीत’, ‘कत्तिन का गीत’, ‘कालिदास’, ‘सावन में’, ‘भ्रमरी’, ‘रहस्य’, ‘शेष गान’ आदि रचनाएँ अपनी प्रांजल प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि के छन्द विधान और सहज भाव-सम्प्रेषण के कारण इस संग्रह के प्राण-तत्त्व की तरह हैं, जो पढ़नेवाले की स्मृति में रच-बस जाती हैं।
वस्तुत: ‘रसवन्ती’ दिनकर के अन्वेषी मन की विशिष्ट और अविस्मरणीय कृति है।
Aavirbhav
- Author Name:
Yatish Kumar
- Book Type:

-
Description:
यतीश कुमार कविता के कारोबार को जिस तरह से अपनी इस किताब में कर गुज़र रहे हैं, उसे देखकर यह साफ़ हो जाता है कि वह एक रास्ते की तलाश में थे जो उन्हें मिलता हुआ दिख रहा है। उन्होंने हिन्दी के विश्रुत उपन्यासों पर और यदा-कदा गद्य के किसी और जॉनर पर कविताएँ लिखने की ठानी।
अमूमन उपन्यास और कविता को अपनी संरचनाओं में एक-दूसरे का विपरीत और विलोम माना जा सकता है। लेकिन यतीश बहुत मौलिक तरीक़े से दोनों को किसी कृतिकार पारस्परिकता में देखना शुरू करते हैं। वह उपन्यास को कविता की तात्त्विकता में घटित करने का जोखिम उठाते हैं। इसके लिए वह उपन्यास के मानस और मनस्तत्त्व को आविष्कृत करते हैं—उसका विज़न और उसकी अन्तर्दृष्टि, उसकी मेटाफिजिकल अन्तर्धारा और उसकी वैचारिक निर्मिति। यह एक वजह है कि उपन्यास पर लिखी उनकी कविता कथा का सार-संक्षेप नहीं होती। वह वृत्तान्तों में न्यस्त आकांक्षाओं, ललक, उद्वेग, दुविधा, उम्मीद, वियुक्ति, विघटन, आवेग, संघर्ष वगैरह को कविता के स्वगत में ढालना शुरू करते हैं और उस विवेक को ढूँढ़ना शुरू करते हैं जो किसी भी उपन्यास का अग्रसारक होता है। कह लीजिए कि उपन्यासों पर लिखी जाती इन कविताओं की अपनी अन्तर्यात्रा है जो मूल कृति के समानान्तर होते हुए भी स्वायत्त है और कथा के ठोस के समानान्तर संवेग का आवेग। हिन्दी में किसी ने इस तरह का काम किया हो तो मैं नहीं जानता। उनके इस काम की महत्ता उनके इस तरह अनन्य और अपूर्व होने मात्र से निर्धारित हो सकती थी लेकिन यतीश ने जो काम इस फॉरमैट में किया है वह गहन और सूझ भरा है जो अपने दुस्साहस और संश्लिष्ट काव्यगत स्थापत्य के लिए अपनी विरल पहचान बनाएगा, इसमें कोई संशय नहीं। काव्य के इस गद्य युग में इन कविताओं जैसा प्योर पोएट्री की तरफ़ जाता पोएटिसाइज़्ड टेक्स्ट शायद ही किसी कवि के पास हो यह याद दिलाते हुए कि इस शुद्ध दिखती कविता में जीवन के द्वन्द्व और उसकी दुर्वहता और क्षत-विक्षत करती उसकी सांसारिकता कभी ओझल नहीं होती।
Baanch Raha Yadon Ka Lekha
- Author Name:
Brijnarayan Sharma
- Book Type:

- Description: This book has no description
Sab Ki Aawaz Ke Parde Mein
- Author Name:
Vishnu Khare
- Book Type:

-
Description:
बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में अपनी धुन और आत्महानि की सीमा तक जाकर, लीक छोड़ लिख पानेवाले कम थे लेकिन शायद विष्णु खरे उन्हीं में गिने जाएँ। विष्णु खरे के साथ एक बड़ी घटना यह रही कि उनकी कविता हिन्दी के विभिन्न समसामयिक सम्प्रदायों को तुष्ट नहीं कर पाई। उनके न तो गुरु-संरक्षक रहे, न मित्र-प्रोत्साहक और न भक्त-शिष्य। ऐसी लगभग सर्वसम्मत उपेक्षा के बावजूद कहीं-कहीं उनकी कविताएँ न केवल याद रखी गईं, बल्कि कभी-कभी उनकी माँग भी की जाती रही, यही कोई कम ग़नीमत नहीं है।
अपने और दूसरों के लिए और मुश्किलें पैदा करते हुए विष्णु खरे एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसमें भूले-भटके काव्यावेश आ जाता है, वरना अक्सर उसमें निम्न-मध्यवर्गीय संकेतों और ब्याजशब्दावली का बाहुल्य रहता है और कभी उनकी ज़ुबान बातचीत की तरह आमफ़हम, दफ़्तरी, अख़बारी, तत्समी या गवेषणात्मक तक हो जाती है और ख़तरनाक ढंग से कहानी, गद्य, वर्णन, ब्योरों, रपट आदि के नज़दीक पहुँचती है और यह तय करना कठिन होता है कि उस निर्विकार-सी वस्तुपरकता में तथ्याभास का व्यंग्य है, करुणा है या उन्हें कविता लिखना ही नहीं आता।
कविता के विषयों को लेकर भी उनके यहाँ एक कैलाइडोस्कोप की बहुबिम्बदर्शी विविधता है जो उनकी हर चीज़ में दिलचस्पी के दख़ल की पैदाइश है और इस ज़िद की कि सब कुछ में जो कविता है, उसका कुछ हिस्सा हासिल करना ही है। दुनिया उनके आगे बाज़ीचा-ए-इत्फ़ाल नहीं, उसमें जन्म ले चुके आदमी का कौतूहल और कशमकश है। विष्णु खरे को भी कवियों का कवि कहकर दाख़िल-दफ़्तर कर देना सुविधाजनक है लेकिन वे उन सजगों के कवि हैं जिनकी तादाद अन्दाज़ से कहीं ज़्यादा है। भारतीय आदमी और मानव के लिए उनकी प्रतिबद्धता असन्दिग्ध है लेकिन वे सारे ऐहिक और अपौरुषेय व्यापार, माया और लीला, यथार्थ और मिथक को जानने के प्रयास के प्रति भी वचनबद्ध हैं, क्योंकि हर बार उसे नई तरह से जानना चाहे बिना आदमी और अस्तित्व के पूरे बखेड़े को समझने की कोशिश अधूरी ही रहेगी। इसमें अनुभववाद या दूर की कौड़ी लाने का लाघव-प्रदर्शन नहीं है, समूचे जीवन से वाबस्तगी की बात है।
इसीलिए विष्णु खरे की कविता न तो आदमी और समाज से घबराकर ‘शुद्ध कला’, अध्यात्म या रहस्यवाद में पलायन करती है और न कायनात को मात्र भौतिक मान किसी आसान ‘वाद’ की शरण लेती है। उनके यहाँ अनुभव और कविता ‘प्योर’ तथा ‘अप्लाइड’ दोनों अर्थों में हैं क्योंकि दोनों प्रकारों का एक-दूसरे के बिना अस्तित्व और गुज़ारा सम्भव नहीं है। वे वाक़ई अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने को मनुष्य और कवि होने की सार्थकता मानते हैं। इस संग्रह की कविताओं में भी वे अपने कथ्य, भाषा तथा शैली को जोखिम-भरी चुनौतियों और परीक्षाओं के सामने ले गए हैं। वे कविता को बाँदी या देवदासी की तरह नहीं, मानव-प्रतिभा की तरह हर काम में सक्षम देखना चाहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिसकी अपनी कोई अर्थवत्ता न हो—हर आवाज़ के पीछे जो दुनिया है, विष्णु खरे की यदि कोई महत्त्वाकांक्षा है तो उसे ही अभिव्यक्ति देने का प्रयास करने की लगती है।
SAMUDRA KO BANDHANA ABHI SHESH HAI
- Author Name:
Ghanshyam Tripathi
- Book Type:

- Description: Poems
Kahin Door Jakar Dam Todne Ka Man Hota Hai
- Author Name:
Saumitr
- Book Type:

- Description: Book
Itna Tum May Hokar
- Author Name:
Sneh Sonkar
- Book Type:

- Description: Book
Samvedana Ke Swar
- Author Name:
Dinesh Adhikari
- Book Type:

-
Description:
दिनेश अधिकारी नेपाली कवि हैं। हिन्दी में यह उनका पहला काव्य-संग्रह है। बहैसियत कवि अपने काव्य-कर्म के बारे में उनका कहना है कि आदमी और आदमी से जुड़े तमाम सन्दर्भ ही उनके लेखन की ऊर्जा बनते हैं। मौलिकता की उनकी अवधारणा ठीक उतनी ही विनम्र है जितनी ये कविताएँ। विनम्र लेकिन तत्वतः ठोस और अपने पैरों के नीचे की ज़मीं को भरी-पूरी नज़रों से देखती-आँकती हुई। वे कहते हैं कि एक ही विश्व के निवासी होने के कारण विषयवस्तु में समानता की सम्भावना प्रबल होती है। सो सृष्टा की मौलिकता को उसके प्रस्तुति-क्रम में खोजना चाहिए। लेकिन मौलिकता की एक कसौटी और भी है, वह है दृष्टि, जिसके दर्शन इस संग्रह की कविताओं में होते हैं। उनकी कविता पूछती है : ‘प्रदर्शन मात्र ही शक्ति है क्या?’ उनकी कविता बताती है : ‘कपड़ा फट जाता है, चमड़ी नहीं।’ उनकी कविता उद्घाटित करती है : ‘तर्क वास्तव में बेशर्म ही होता है...शासक की तरह बेहया।’ उनकी कविता स्वीकार करती है : ‘अकेले चलने का आनन्द तुम्हारे साथ चलते नहीं आता।’ ये कुछ पंक्तियाँ यद्यपि उनकी मौलिकता को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन इस
संग्रह की कविताओं की अर्थ और सन्दर्भ-व्याप्ति कहीं अधिक है।
बीच-बीच में नेपाली अभिव्यक्तियों के साथ ये कविताएँ अखिल मानवता को सम्बोधित करती हैं। ‘हर्क बहादुर’, ‘कहाँ रखें अब पैदा होनेवाले पुत्र को’, ‘मच्छरदानी के भीतर आदमी’, ‘आदमी का क़द’ और ‘विकासोन्मुख देश का आदमी’ जैसी अनेक कविताएँ कवि के आन्तरिक विस्तार का परिचय देती हैं।
संग्रह में प्रकाशित ‘गाँव की एक कविता’ बार-बार पढ़ने लायक़ कविता है जिसमें प्रस्तुत गाँव की तस्वीर भारत में भी जहाँ चाहे वहाँ देखी जा सकती है। हस्तक्षेप के रूप में देखें तो यह विचारणीय है जो यह कविता कहती
है : ‘गोद के शिशु को पीठ पर बाँधकर मज़े से निकल जाती है कोई भी माँ अपनी सन्तान पर भी बोझ बन सकती है—उसे पता नहीं।’ हिन्दी कविता के परिदृश्य में हमारे प्रिय पड़ोसी देश से आई यह दस्तक स्वागत योग्य है, पर उससे पहले ध्यान से पढ़ने योग्य।
Chandayan-2
- Author Name:
Shyam Manohar Pandey
- Book Type:

- Description: चंदायन हिजरी 781 (1379 ई.) की रचना है। इसकी रचना मौलाना दाऊद ने फीरोज़शाह तुगलक के युग में की थी। चंदायन काव्य की दृष्टि से ही नहीं, सांस्कृतिक और भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। चंदायन की कथा का मूल स्त्रोत लोरिकी, लोरिकायन या चनैनी है। ये तीनों नाम एक ही लोक महाकाव्य के हैं। लोरिकी को ही चनैनी भी कहा जाता है। अवधी क्षेत्र में चनैनी इस महाकाव्य को नायिका चनवा (चंदा) के नाम पर दिया गया है। चंदायन के कवि मौलाना दाऊद ने लोक महाकाव्य से कथा लेकर चंदा का नख-शिख, नगर वर्णन, बारहमासा में विरह का गम्भीर चित्र जोड़कर इस काव्य को एक श्रेष्ठ साहित्यिक काव्य बना दिया है। चंदायन के नाम से अब हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी अपरिचित नहीं रह गये हैं। हिन्दी और अंग्रेजी में लिखे गये निबन्धों में मौलाना दाऊद की कृति चंदायन पर विस्तार से विचार किया है। इस द्वितीय भाग में चंदायन की व्याख्या, शब्दार्थ तथा सांस्कृतिक टिप्पणियाँ तथा विशिष्ट शब्दों की व्युत्पत्ति विस्तार से दी गयी है। पाठकों की सुविधा के लिए दो सौ छंदों की विशद् शब्दानुक्रमणिका दी गयी है। इससे चंदायन की भाषा का स्वरूप समझने में सहायता मिल सकती है।
Pichhla Baqi
- Author Name:
Vishnu Khare
- Book Type:

- Description: यह कहकर कि विष्णु खरे हिन्दी में बिलकुल अलग ढंग की कविता लिखते थे (उनकी ख़ास अपने रंग की कविता की बात है यह, उन कुछेक कविताओं की नहीं जो उनकी उतनी ख़ास नहीं हैं), हम ज़रूर एक बड़ी बात कहते हैं। पर उनका अपना रंग क्या है, यह बताए बग़ैर बात अधूरी है। पहली ही नज़र में उन्हें अलग दिखा देनेवाली चीज़ है उनकी कविता का बाना; ऐसा बाना जिसमें से 'कवितापन’ के निशान मानो चुन-चुनकर हटा दिए गए हैं—भावनात्मकता, लयात्मकता, आवेग और बहाव, लगाव और आत्मीयता, सहानुभूति और करुणा तक...। पहली नज़र में वे कविता होने का दावा करनेवाली गद्यात्मक कहानियाँ मालूम होती हैं। उनका कहानीपन भी वर्णनात्मक लगता है, कथात्मक नहीं, मानो जान-बूझकर लयहीन, गद्यात्मक, मनमाने तौर पर लम्बी या छोटी पंक्तियों में कुछ चीज़ों के बारीक वर्णन में घटना या पात्र जोड़ दिए गए हैं; आप कविता से जुड़ी अपनी अपेक्षाएँ, रुचियाँ, आदतें लेकर उनके पास जाते हैं और निराश होते हैं; आप कहानी की तरह उसे पढ़ना चाहते हैं तो पाते हैं कि जिन तत्त्वों (सूक्ष्म निरीक्षण, मानसिक या घटनागत मोड़, आश्चर्य इत्यादि) को आप कहानी पढ़ने के बाद खोजते या निकालते, वे ढाँचे की तरह—मांस-मज्जा-मोटापे से रहित—आपके सामने हैं, पूरी कहानी नहीं। कविता के रूप में आप जिस ताप, आवेग और शब्दों की मितव्ययिता चाहते हैं, वह नहीं है। कविता के रूप में उक्त तत्त्वों को जिन आवरण-आच्छादनों के साथ चाहते हैं, वे आवरण-आच्छादन भी नहीं हैं। कहानी की दृष्टि से शब्दों की कंजूसी, कविता की दृष्टि से शब्दों की इफ़रात। ‘अकेला आदमी’, ‘कोशिश’ और ‘दोस्त’ जैसी कविताएँ आपको तब भी अपनी संस्कारगत काव्य-रुचियों के क़रीबतर जान पड़ती हैं। इससे बरबस आप विष्णु खरे की दूसरी कविताओं को समझने की, उनमें ‘कवितापन’ खोजने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी यह कोशिश लगातार चलती है; होते-होते आप कवि के मुरीद भी हो जा सकते हैं। समय इन कविताओं में एक तरह से सर्वव्याप्त आयाम है जिसमें देश या स्थान भी समाहित है। 'टेबिल’ में वह चार पीढ़ियों का क़िस्सा बनता है। ‘हँसी’ में वह हमारा अपना ज़माना है, जब पुरस्कृत बालक भूखा, पैदल, थका, शील्डों के बोझ से दबा घर पहुँचता है, जहाँ ख़ुद ही उसे ताला खोलना है; समारोह में विशेष स्वागत अतिथियों का है, सड़क पर पुलिस की घुड़क है, दूसरे दिन स्कूल में क़तार में वह निरीह इकाई मात्र है। एक संवेदनहीन, मूल्यहीन, क्रूर समाज का समय। 'गर्मियों की शाम’ में वह हमारी यौन-नैतिकता, अच्छाई, किशोर-मन की कसमसाहट का समय है। ‘स्वीकार’ और ‘डरो’ में, ‘दूरबीन’ और ‘वापस’ में और ‘कार्यकर्ता’ और ‘कोमल’ में हमारे समय का समाज-संगठन, व्यक्ति-सत्ता, व्यंग्य, तल्ख, विडम्बना, अक्सर दुरदुराए जाते आम इनसान संकेतित हैं। समय पर यही आँख ‘मुक़ाबला’ में प्रागैतिहासि फ़ैंटेसी को समेट लाती है। बचपन, कैशोर्य, जवानी, बुढ़ापा; सफलता, रोग, दैन्य, छोटे शहरों की उदासी और उदास आकर्षण, बड़े शहरों का दृश्य (‘वापस’) उनमें तरह-तरह से आता है। समय के लिए विष्णु खरे काल या महाकाल जैसे प्रत्यय नहीं अपनाते, और इस नुक्ते में उनकी काव्य-चेतना के दो रुझान स्पष्ट हैं। ‘समय’ शब्द हमारे समय में अंग्रेज़ी के ‘टाइम’ का प्रत्ययान्तर है, और प्रचलित आधुनिकतावाद में वह प्रगति, इतिहास, उत्तरोत्तर आगे बढ़नेवाला, रैखिक विकास का अर्थ लिए हुए है; व्यतीत हो जानेवाला समय है, ‘कालो न यात:’ वाला, आवर्तित, चक्राकार काल नहीं। लेकिन विष्णु खरे इसको ‘अर्थ’ और ‘अव्यक्त’ जैसी कविताओं में ‘एक प्रवहमान अनन्त लीला’ से जोड़ते हैं। आधुनिकता के विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक, विषयी-निरपेक्ष विषय-केन्द्रित दृष्टि के उपकरणों का उपयोग क्या वे अपनी मूल भारतीय दार्शनिक अवधारणाओं की पड़ताल करने में कर रहे हैं? सर्वातीत, लीला, स्थावर-जंगम जैसे शब्द उनके यहाँ बार-बार हैं, और केवल शब्द ही नहीं, उनके अर्थ को स्वीकार करनेवाली चेतना भी। यह चेतना—शक होता है कि—सचेत रूप से अपनाई हुई नहीं है, बल्कि उनमें ख़ुद-ब-ख़ुद है, इस देश-प्रदेश में पलने, बढ़ने के कारण। उसकी पुष्टि तरह-तरह के अध्ययनों से, हालाँकि भारतीय अवधारणा से कुछ भिन्न रूपोंवाले स्रोतों से होती है—दॉन हुआन, बोर्खेस के हवाले द्रष्टव्य हैं। तर्क से चलकर अतर्क्य तक पहुँचना इसीलिए सम्भव है। क्षणवाद को इस तरह वे विजित करते दीखते हैं। अस्तित्ववादी अकेलेपन और संत्रास की धारणाओं का आतंक इसीलिए उन पर नहीं दीखता। अन्तत: निष्कृति का द्वार उन्हें सहज ही पता है।
Karze Tahjeeb Ek Duniya Hai
- Author Name:
Vinay Kumar
- Book Type:

-
Description:
हमारे बीच इधर जिन कवियों के रचना-कर्म को गहरी उत्सुकता और उम्मीद के साथ देखा गया है, उनमें डॉ. विनय कुमार भी हैं। उन्होंने बाक़ी सबसे भिन्न रास्ता चुना है। हिन्दी-उर्दू के दोआब को अपनी भूमि मानकर उन्होंने कुछ अनूठी कविताएँ रची हैं। इनमें उनका अपना अनुभव सार रूप में प्रगट होता है। दिल्ली के अनुभव से लेकर गाँव-जवार और देश-दुनिया के प्रसंग यहाँ समाहित हैं। साथ-साथ समसामयिक विषयों एवं जीवन-तथ्यों, राजनीतिक-सामाजिक सन्दर्भों पर उनकी बेलाग, तिलमिला देनेवाली टिप्पणियाँ भी दर्ज होती चलती हैं। विवरणों-ब्योरों का ढेर लगाने के बजाय डॉ. विनय कुछ चुनिन्दा बिम्ब निर्मित करने की कोशिश करते हैं जो वास्तव में अनुभवों का सारांश होते हैं। डॉ. विनय भाषा को अपने ढंग से बरतते हैं—उर्दू-बहुल शब्दों-मुहावरों से जड़ी उनकी भाषा एक ही साथ अनलंकृत, सादी भी है और मीनाकारी से जगमग भी।
कवि विनय कुमार पेशे से मनोरोग-चिकित्सक हैं। हमारी भाषा में ऐसे कवि विरल हैं जो मनोरोग-चिकित्सा में भी यशस्वी हों। इस क्षेत्र में उनके अनुभव अभी कविता में विस्तार से आने को शेष हैं, लेकिन जहाँ-तहाँ उन अनुभवों की पदचाप, उनकी नेपथ्य-झंकार अवश्य सुनी जा सकती है। जटिल मनोगुत्थियों से उलझनेवाले डॉ. विनय कुमार का मुख्य ध्येय इन कविताओं में अपनी बात का सम्प्रेषण है जिसमें वह हमेशा ही अप्रत्याशित रूप से सफल होते हैं। उनकी कविता अपना सम्पूर्ण अर्थ-कोष एक ही पाठ में खोल देती है। ऐसी सम्प्रेषणीयता कविता को साधारण पाठकों के लिए सुगम तो बनाती ही है, साथ ही कविता को वैचारिक हथियार की क्षमता भी प्रदान करती है। डॉ. विनय कुमार की कविता की गुफ़्तगू अवाम से है।
—अरुण कमल
Sanyogvash
- Author Name:
Ashutosh Dubey
- Book Type:

-
Description:
हमारे जीवन का एक उप-जीवन भी होता है। अपने दिखाई दे सकने वाले क्रियाकलापों के समानान्तर हम उसे अपने अंतर्लोक में जीते हैं। यहाँ हम चीज़ों को उनकी दृश्यमान हदों के अलावा उनकी संभावनाओं में भी देखते हैं। यह दुनिया को देखने की एक भिन्न पद्धति होती है।
आशुतोष दुबे अकसर अपनी कविता हमारे ‘होने’ के साथ-साथ चलती इसी पटरी से उठाते हैं, वह जगह जो हमें अपने वर्तमान की स्थूलताओं में छोड़कर कभी अतीत में दिपदिपाते एक आलोक-वृत्त में घुमा लाती है, कभी आगत के किसी अदेखे-अछूते लोक में लिवा ले जाती है।
ये अत्यन्त महीन रेशों में धड़कते उसी जीवन की कविताएँ होती हैं, जिन्हें अपनी दैनिक दुश्चिन्ताओं और दुष्कामनाओं के शोर से बाहर आकर पढ़ना होता है। बल्कि कह सकते हैं कि इस बोझ से ख़ाली होने में वे भी आपकी मदद करती हैं। वे आपके अनुभव-जगत और उसके यथार्थ के एक अन्य पहलू से आपको परिचित कराती हैं जो बहुत छोटी-छोटी चीज़ों की मद्धिम लेकिन अटल आभा में छिपा होता है। ख़तरनाक ढंग से पूर्वानुमेय और कल्पना-वंचित हो चुके हमारे इस समय में ये कविताएँ हमें विस्मित होने का अवसर देती हैं, हमें हमारे सूक्ष्म के सामने ले जाती हैं और इस तरह हमें अपने आप से भी बचाती हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book