🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Samay Ka Hisab

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

जितना अचरज यह जानकर होता है कि पिछले क़रीब दो दशकों से लिखते रहने के बावजूद वंदना देवेन्द्र ने अब तक अपनी कोई भी रचना किसी पत्र-पत्रिका में नहीं दी है, उससे कहीं ज़्यादा अचम्भा उनकी इन कविताओं की गहराई, वैविध्य और विस्तार को देखकर होता है। मसलन हम पूछते रह जाते हैं कि जिस कवयित्री ने ‘छाते’ और ‘रँगे हाथ’ सरीखी मृदु, गीतात्मक रचनाएँ दी हों, वह ‘राक्षस पहले राक्षस थे’ या ‘धूमिल’ का स्मरण दिलानेवाली ‘उत्तर प्रदेश’ जैसी निर्मम, यथार्थवादी, राजनीतिपरक कविताएँ कैसे लिख सकी ? यदि ‘विजेता’ और ‘राजा था कन्नौज’ में वंदना इतिहास तथा सामन्ती मानसिकता को लेकर नए प्रश्न उठाती हैं तो ‘ताजमहल के बाद’ और ‘कोई चिल्लाता है’ में वे भारतीय और वृहत्तर मानव-इतिहास को एक विसंगति-भाव से देखती हैं, और ‘समय का हिसाब’ में वे इतिहास से भी आगे जाकर करोड़ों सूर्य, लाखों आकाश गंगाओं के बीच अपने कबाड़ के साथ हमारे प्रवेश की बात करती हैं और इससे पहले कि हम यह समझें कि वे ‘बड़े’ विषयों की महत्त्वाकांक्षी कवयित्री हैं, ‘रंग बिरंगे पाल’ और ‘कविता जैसा’ की उदास एकान्तिकता उनकी निजी संवेदनशीलता का परिचय दिलाती है। वंदना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कुछ कविताओं में दिया भी है किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है—या उनका कवि उनके चित्रकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीज़ा यह है कि उनकी कविता का कैनवस एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोर्ट्रेट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब-कुछ है। उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख़ वर्ण भी हैं। शायद सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि वंदना देवेन्द्र की सृजनशीलता के मूल में एक ऐसी सामाजिक तथा नारी-प्रतिबद्धता है जो उन्हें एक अनूठी अस्मिता देती है। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर वे स्त्री, पत्नी, माँ होने के अपने निजी अनुभव-संसार के साथ-साथ किसी लड़की, सहेली, फुलनियाँ, कम्मो आदि की जीवनियों को भी जानती हैं। नारी-प्रवृत्ति तथा औरत की आज़ादी पर आजकल बहुत-कुछ कहा लिखा जा रहा है लेकिन ‘रे फुलनियाँ भाज धरी’ जैसी लोकगीतनुमा कविता में वंदना ने एक असहाय विवाहिता का एक नया, चौंकानेवाला रूपान्तर प्रस्तुत किया है। फ़िरोज़ाबाद के चूड़ी बनानेवाले पर उनकी कविता ‘चूड़ियाँ’ हिन्दी के लिए एकदम नई है और दंगों में अपना जवान बेटा खो चुके बूढ़े मुस्लिम पर लिखी उनकी छोटी कविता ‘बेटा’ काव्य के उद्देश्य और असामर्थ्य को मार्मिकता से उभारती है। ‘कमल’, ‘बादशाह’, ‘सोचते हुए लोग’, ‘पेंटर’ आदि उनकी ऐसी रचनाएँ हैं जो अपनी दृष्टि और कला में हिन्दी के किन्हीं भी बेहतर कवि-कवयित्रियों के समकक्ष निस्संकोच रखी जा सकती हैं। कुछ अत्यन्त निजी अनुभवों और स्मृतियों पर चन्द ऐसी कविताएँ वंदना ने लिखी हैं जो उनके काव्य-विश्व को और जटिल तथा चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनकी कविता में पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक तथा संघर्षशील स्त्री-पुरुष-किशोर-बच्चे वैसे ही स्वाभाविक ढंग से मौजूद हैं जैसे कि वे वास्तविक भारतीय समाज में उपस्थित हैं। शिनाख़्त के लिए कह सकते हैं कि वंदना देवेन्द्र अनायास ही कात्यायनी, सविता सिंह, अनीता वर्मा, नीलेश रघुवंशी, अनामिका, निर्मला गर्ग जैसी प्रासंगिक कवयित्रियों में उल्लेख्य हो गई हैं जबकि सच यह है कि इन सबके साथ वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही हैं। —विष्णु खरे

Read more

₹ 595

476 20% off

Available

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

Frequently bought together
Samay Ka Hisab This book ₹476
Tao-Te-Chhing Laotse ₹495
Unbosoming Samridhi Prakash ₹120
3 books selected ₹1,210 ₹1,091

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

जितना अचरज यह जानकर होता है कि पिछले क़रीब दो दशकों से लिखते रहने के बावजूद वंदना देवेन्द्र ने अब तक अपनी कोई भी रचना किसी पत्र-पत्रिका में नहीं दी है, उससे कहीं ज़्यादा अचम्भा उनकी इन कविताओं की गहराई, वैविध्य और विस्तार को देखकर होता है। मसलन हम पूछते रह जाते हैं कि जिस कवयित्री ने ‘छाते’ और ‘रँगे हाथ’ सरीखी मृदु, गीतात्मक रचनाएँ दी हों, वह ‘राक्षस पहले राक्षस थे’ या ‘धूमिल’ का स्मरण दिलानेवाली ‘उत्तर प्रदेश’ जैसी निर्मम, यथार्थवादी, राजनीतिपरक कविताएँ कैसे लिख सकी ? यदि ‘विजेता’ और ‘राजा था कन्नौज’ में वंदना इतिहास तथा सामन्ती मानसिकता को लेकर नए प्रश्न उठाती हैं तो ‘ताजमहल के बाद’ और ‘कोई चिल्लाता है’ में वे भारतीय और वृहत्तर मानव-इतिहास को एक विसंगति-भाव से देखती हैं, और ‘समय का हिसाब’ में वे इतिहास से भी आगे जाकर करोड़ों सूर्य, लाखों आकाश गंगाओं के बीच अपने कबाड़ के साथ हमारे प्रवेश की बात करती हैं और इससे पहले कि हम यह समझें कि वे ‘बड़े’ विषयों की महत्त्वाकांक्षी कवयित्री हैं, ‘रंग बिरंगे पाल’ और ‘कविता जैसा’ की उदास एकान्तिकता उनकी निजी संवेदनशीलता का परिचय दिलाती है।

वंदना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कुछ कविताओं में दिया भी है किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है—या उनका कवि उनके चित्रकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीज़ा यह है कि उनकी कविता का कैनवस एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोर्ट्रेट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब-कुछ है। उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख़ वर्ण भी हैं।

शायद सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि वंदना देवेन्द्र की सृजनशीलता के मूल में एक ऐसी सामाजिक तथा नारी-प्रतिबद्धता है जो उन्हें एक अनूठी अस्मिता देती है। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर वे स्त्री, पत्नी, माँ होने के अपने निजी अनुभव-संसार के साथ-साथ किसी लड़की, सहेली, फुलनियाँ, कम्मो आदि की जीवनियों को भी जानती हैं। नारी-प्रवृत्ति तथा औरत की आज़ादी पर आजकल बहुत-कुछ कहा लिखा जा रहा है लेकिन ‘रे फुलनियाँ भाज धरी’ जैसी लोकगीतनुमा कविता में वंदना ने एक असहाय विवाहिता का एक नया, चौंकानेवाला रूपान्तर प्रस्तुत किया है। फ़िरोज़ाबाद के चूड़ी बनानेवाले पर उनकी कविता ‘चूड़ियाँ’ हिन्दी के लिए एकदम नई है और दंगों में अपना जवान बेटा खो चुके बूढ़े मुस्लिम पर लिखी उनकी छोटी कविता ‘बेटा’ काव्य के उद्देश्य और असामर्थ्य को मार्मिकता से उभारती है।

‘कमल’, ‘बादशाह’, ‘सोचते हुए लोग’, ‘पेंटर’ आदि उनकी ऐसी रचनाएँ हैं जो अपनी दृष्टि और कला में हिन्दी के किन्हीं भी बेहतर कवि-कवयित्रियों के समकक्ष निस्संकोच रखी जा सकती हैं। कुछ अत्यन्त निजी अनुभवों और स्मृतियों पर चन्द ऐसी कविताएँ वंदना ने लिखी हैं जो उनके काव्य-विश्व को और जटिल तथा चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनकी कविता में पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक तथा संघर्षशील स्त्री-पुरुष-किशोर-बच्चे वैसे ही स्वाभाविक ढंग से मौजूद हैं जैसे कि वे वास्तविक भारतीय समाज में उपस्थित हैं। शिनाख़्त के लिए कह सकते हैं कि वंदना देवेन्द्र अनायास ही कात्यायनी, सविता सिंह, अनीता वर्मा, नीलेश रघुवंशी, अनामिका, निर्मला गर्ग जैसी प्रासंगिक कवयित्रियों में उल्लेख्य हो गई हैं जबकि सच यह है कि इन सबके साथ वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही हैं।

—विष्णु खरे

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2002
Weight
270 grams
ISBN-13
9788126705931
Pages
144
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp