Pakistani Urdu Shayri: Vol. 1
Author:
Narendra NathPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
पाकिस्तान के कुछेक नामचीन शायरों को छोड़ दें तो हिन्दी का पाठक वहाँ के ज़्यादातर शायरों से परिचित नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखकर ‘पाकिस्तानी उर्दू शायरी’ शीर्षक इस शृंखला की योजना बनाई गई थी जिसमें दो सौ से ज़्यादा शायरों को उनके जीवन-परिचय और रचनाओं के साथ पाठकों के सामने लाने का इरादा किया गया था।</p>
<p>इसके लिए इन पुस्तकों के सम्पादक नरेन्द्र नाथ पाकिस्तान भी गए, कराची और लाहौर के किताबघरों-पुस्तकालयों से नई-पुरानी किताबें जमा कीं और पत्र-पत्रिकाओं की फ़ाइलें खँगालीं। शायरों से निजी तौर पर ख़तो-किताबत भी की गई।</p>
<p>पाकिस्तान के शायरों को हिन्दी पाठक तक पहुँचाने के अलावा इस शृंखला का एक उद्देश्य हिन्दी और उर्दू कविता के बीच एक पुल बनाना भी है। भारत की आज़ादी के साथ ही पाकिस्तान एक मुल्क के रूप में अलग हो गया, सरहदें खिंच गईं, लेकिन कोई चीज़ थी जिसे नहीं बाँटा जा सका, वह तब भी एक थी, आज भी एक है। वह है देखने का, सोचने का, जीने का ढंग और हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक बोध। पाकिस्तानी उर्दू शायरी के इन पाँच खंडों से गुज़रते हुए आप हर हाल में इस चीज़ को महसूस करेंगे। अनेक नज़्में और ग़ज़लें हैं जिनके रूपक, उपमाएँ और उपमान सरहदों से ऊपर उठकर भारत और पाकिस्तान के इस एकत्व को बरबस उजागर कर देते हैं।</p>
<p>इस खंड में कुल अठारह शायरों की रचनाएँ शामिल हैं, साथ ही उनका जीवन-परिचय भी, और जहाँ सम्भव हो सका, उनकी शायरी के बारे में टिप्पणियाँ भी। ख़ासतौर पर जिन विधाओं की रचनाएँ यहाँ ली गई हैं उनमें ग़ज़लें, नज़्में और फुटकर शे’र प्रमुख हैं। कुछ शायरों की रुबाइयाँ, क़तआत और गीत भी लिये गए हैं जो पाकिस्तान के काव्य-परिदृश्य का विस्तृत परिचय हमें देते हैं।
ISBN: 9788119989362
Pages: 175
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: ‘अग्निरेखा’ में महादेवी जी की अन्तिम दिनों में रची गई कविताएँ संगृहीत हैं, जो पाठकों को अभिभूत भी करेंगी और आश्चर्यचकित भी। आश्चर्यचकित इस अर्थ में कि महादेवी-काव्य में ओतप्रोत वेदना और करुणा का वह स्वर, जो कब से उनकी पहचान बन चुका है, यहाँ एकदम अनुपस्थित है। अपने आपको ‘नीरभरी दु:ख की बदली’ कहनेवाली महादेवी अब जहाँ ‘ज्वाला के पर्व’ की बात करती हैं, वहीं ‘आँधी की राह’ चलने का आह्वान भी। ‘वंशी’ का स्वर अब ‘पाञ्चजन्य’ के स्वर में बदल गया है और ‘हर ध्वंस-लहर में जीवन लहराता’ दिखाई देता है। अपनी काव्य-यात्रा के पहले महत्त्वपूर्ण दौर का समापन करते हुए महादेवी जी ने कहा था—‘देखकर निज कल्पना साकार होते; और उसमें प्राण का संचार होते। सो गया रख तूलिका दीपक-चितेरा।’ इन पंक्तियों में जीवन-प्रभात की जो अनुभूति है, वही प्रस्तुत कविताओं में ज्वाला बनकर फूट निकली है। अकारण नहीं कि वे गा उठी हैं—‘इन साँसों को आज जला मैं/लपटों की माला करती हूँ।’ कहना न होगा कि महादेवीजी के इस काव्यताप को अनुभव करते हुए हिन्दी का पाठक-जगत उसके पीछे छुपी उनकी युगीन संवेदना से निश्चय ही अभिभूत होगा।
Main Bhi To Hoon
- Author Name:
Nusrat Mehdi
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