Saanjh Ka Neela Kivaar
Author:
Bhavana ShekharPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
भारतीय कविता विशेषकर हिन्दी कविता में अभी का समय स्त्री-नवजागरण का समय है। भक्तिकाल के बाद इतनी बड़ी संख्या में इतनी तेजोमय स्त्री कवियों का आविर्भाव हुआ है। भावना शेखर इसी स्त्री-काव्य का एक नवीनतम शिखर हैं। अन्तर केवल यह है कि भावना शेखर की कविताएँ रूढ़ या प्रचलित अर्थ में स्त्रीवादी कविताएँ नहीं हैं। ये बस उतनी ही और वैसी ही जाग्रत कविताएँ हैं जितनी कि किसी भी कविमात्र द्वारा सृजित हो सकती हैं—स्त्री वा पुरुष। क्योंकि ये मनुष्य जाति बल्कि सम्पूर्ण जीव-जगत और ब्रह्मांड की कविताएँ हैं। ‘बिछुड़न’ शीर्षक कविता इस जगत व्याप्ति का अद्भुत उदाहरण है। ‘हृदय की भूमि में’, ‘गुरुत्वाकर्षण’ की शक्ति को पहचानती भावना शेखर की कविताओं के लिए कुछ भी अस्पृश्य नहीं है। बचपन की स्मृतियों से लेकर ऐन्द्रिक अनुभवों और गहन लालसा से भरी ये कविताएँ सहसा हमें बेचैन कर देती हैं। ‘मेरी नसों में कुछ जी उठा है/मालूम होता है/दीवार के उस पार गुज़री हो तुम अभी-अभी’—आज केवल भावना शेखर ही ऐसी पंक्ति रच सकती हैं। और इतना नया और सूक्ष्म विवरण भी—‘पत्तों से छनती धूप बदरंग है कलई उतरे बर्तनों सी’, साथ-साथ भावना ने ऐसी कविताएँ भी लिखी हैं जो मूलत: स्त्री-अनुभव की कविताएँ हैं जैसे ‘सत्रहवीं दहलीज़’ या ‘ऋतुस्नान के बाद’। लेकिन यहाँ कोई तिक्तता या द्वेष नहीं है, केवल एक पृथक् जीवनचर्या है और यही इस कविता की प्रतिरोध-भूमि है। ‘बित्ता-भर ज़मीन’ की तलाश पूरे संग्रह की प्रेरणा-शक्ति है, फिर भी यहाँ कुछ भी सपाट या अनगढ़ नहीं है। ‘यह अभिधा नहीं व्यंजना है’ कवि का कहना है जो सच तथा प्रामाणिक है तथा ‘स्त्रीलिंग’ का इन्द्रधनुषी आक्षितिज प्रसार। इस संग्रह की एक अनूठी और मार्मिक कविता है ‘स्त्रीलिंग।’ इन कविताओं को पढ़ना एक नए अनुभव-संसार, एक नए शिखर की चमक और प्राणवायु को आत्मसात् करना है। मैं केवल एक कविता उद्धृत कर रहा हूँ—</p>
<p>“चूल्हे की राख में बुझते अंगारे</p>
<p>हथेली पर सूखती क़तरा-भर नमी</p>
<p>इकलौते पैर पर लँगड़ाती मैना</p>
<p>और पुलिया के पारवाली बंजर ज़मीं</p>
<p>कभी तो सुलगेगी बुझती चिंगारी</p>
<p>चुल्लू-भर तरावट मुट्ठी में होगी</p>
<p>उस ओर होगी परिन्दों की आहट</p>
<p>मेरी मुँडेर भी गौरैया फुदकेगी”</p>
<p>—अरुण कमल
ISBN: 9788126727469
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Khoontiyon Per Tange Log
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
- Book Type:

-
Description:
‘खूँटियों पर टँगे लोग’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का सातवाँ काव्य-संग्रह है, जिसमें शामिल अधिकतर कविताएँ 1976-1981 के बीच लिखी गई थीं। इन कविताओं में नियति और स्थिति को स्वीकार कर लेने की व्यापक पीड़ा है। यह पीड़ा कवि के आत्म से शुरू होकर समाज तक जाती है और फिर समाज से कवि के आत्म तक आती है और इस तरह कवि और समाज को पृथक् न कर, एक करती हुई उसके काव्य-व्यक्तित्व को विराट कर जाती है।
सम्प्रेषण की सहजता सर्वेश्वर की कविताओं का मुख्य गुण रहा है और इसकी कलात्मक साध इस संग्रह में और निखरी है। एक समर्थ कवि के स्पर्श से चीज़ें वह नहीं रह जातीं जो हैं—कोट, दस्ताने, स्वेटर सब-के-सब युग की चुनौतियों से टकराकर क्रान्ति, विद्रोह और विरोध से जुड़ जाते हैं। प्रतीकों और बिम्बों का ऐसा सहज इस्तेमाल दुर्लभ है। सर्वेश्वर का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। इतना व्यापक संवेदन-क्षेत्र वह रचते हैं कि उनके एक कवि में अनेक कवि देखे जा सकते हैं और सभी सर्वेश्वर हैं। उनकी काव्य-भाषा लोक से आकर इस तरह सम्भ्रान्त भाषा में मिल जाती है कि एक का खुरदरापन और दूसरे का चिकनापन अलग-अलग पहचान पाना कठिन हो जाता है।
वस्तुतः ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ की कविताएँ सर्वेश्वर की काव्य-भाषा को और आगे बढ़ाती हैं तथा समकालीन हिन्दी काव्य को भी, जिसका चरित्र मूल्यों के अभाव और व्यवस्था के दबाव में तेज़ी से बदल रहा है। यह बदलाव, बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के, सर्वेश्वर के इस संग्रह में आसानी से देखा जा सकता है।
Tum Ho Mujh Mein
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

-
Description:
‘तुम हो मुझमें’ संवेदनशील कवयित्री पुष्पिता का महत्त्वपूर्ण कविता–संग्रह है। महत्त्वपूर्ण इस अर्थ में कि इन कविताओं में आकुल आत्मीयता और राग–विराग के जो उदात्त आशय हैं वे पाठक के शब्दबोध में प्रीतिकर विस्मय उपजाते हैं। प्रेम समस्त कविताओं का बीज शब्द है। प्रेम के अगणित अर्थों का अनुभावन करते हुए पुष्पिता ने अनुभवों, भावों व संवादों का सान्द्र आस्वाद सिरजा है। संग्रह की एक कविता में वे कहती हैं—
‘प्रेम शब्दों से परे है
शब्दकोशों से बहिष्कृत
मन के अन्त:पुर का पाहुन है वह
केवल हृदय से—
हार्दिकता से काम्य।’
इन कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है समकालीन चिन्तन व चेतना से सुगठित सम्पृक्ति। प्रचलित विमर्शों के सूत्र उनके आन्तरिक सत्यों के साथ सहेजे गए हैं। सतह पर तिरते मूल्यों व निष्कर्षों से कवयित्री की सहमति नहीं है। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ को चरितार्थ करके शब्दार्थ के अगम को सुगम बनाया गया है।
यह कविता–संग्रह प्रेम, मैत्री, साहचर्य, प्रकृति, गोचर–अगोचर, शब्द–शब्दातीत को उनकी मौलिकता में आलोकित करता है। पुष्पिता के पास भाषा और शिल्प की समृद्धि है। ‘तुम्हें देखने के बाद/छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें’—के स्वर में कहें तो ये कविताएँ पढ़कर पाठकों के मन में इनका बहुत कुछ छूट जाएगा।
जीवन को समग्रता में सँजोती रचनाएँ ‘तुम हो मुझमें’ की उपलब्धि हैं।
Lalak
- Author Name:
Ravindra Kumar
- Book Type:

- Description: "जब हमारे अंतस से बाह्य चीजें मेल नहीं खातीं, तब मन और मस्तिष्क में विक्षोभ और विद्रोह स्वाभाविक है। युवावस्था में यह स्थिति और भी तीव्रतम होती है। श्री रविन्द्र कुमार के कविता संकलन ‘ललक’ की सभी कविताएँ इसी तीव्रतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं। रविन्द्रजी की कविताएँ सामाजिक परिवेश की कविताएँ हैं। उनकी कविता में मानवीय संवेदना, समाज की असमानता, वर्गभेद, पूँजीवाद व बाजारवाद के शोषण तथा अंध परंपराओं एवं कुरीतियों के दुष्परिणाम आदि पहलू प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त हुए हैं। इसलिए ये कविताएँ पाठक को जागरूक करती हैं तथा उन्हें एक जिम्मेदार दृष्टि सौंपती हैं। संग्रह की शीर्षक कविता ‘ललक’ इस मायने में अति विशिष्ट कविता है क्योंकि यह कवि द्वारा बचपन में देखे गए स्वप्नों एवं सम्यक संकल्पों का लिखित दस्तावेज है। इस कविता में कवि रविन्द्र अपनी तरुणावस्था में (सन् 1997 में) लिखते हैं—‘‘मोटर गाडि़यों से करने की, मसूरी की सैर/ललक मुझे है इसकी/पर चढ़कर हिमगिरि की चोटी पर/ ललक है हिंद का तिरंगा फहराऊँ।’’ आज जब दिसंबर 2020 में मैं रविन्द्रजी की इस कविता की पांडुलिपि पढ़ रहा हूँ, तो मुझे कवि की यह कविता उनके द्वारा करीब ढाई दशक पहले अपने भविष्य की उपलब्धियों के बारे में की गई भविष्यवाणी लगती है। रविन्द्रजी विश्व की सबसे ऊँची पर्वत शृंखला माउंट एवरेस्ट पर दो बार चढ़कर राष्ट्रध्वज फहरा चुके हैं। इस प्रकार, कवि की काव्य-पंक्तियाँ वास्तविक रूप से मूर्त हुई हैं।’’ —डॉ. अश्वघोष वरिष्ठ कवि "
Kavita Ka Shuklapaksh
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ सिर्फ़ इसलिए हिन्दी का एक गौरव ग्रन्थ नहीं है कि उसने पहली बार साहित्य की समग्र परम्परा का एक वयस्क और उत्तरदायी परिप्रेक्ष्य से निदर्शन कराया, बल्कि इसलिए भी कि उसमें शुक्ल जी की गहरी रसिकता, सावधान और सटीक पहचान और सजग सुरुचि से चुनी हुई कविताओं या कवितांशों का एक विलक्षण संकलन भी है।
इस संकलन से शुक्ल जी का निजी रागबोध और काव्य-दृष्टि प्रगट होती है, साथ ही हिन्दी कविता-संसार की जटिल लम्बी परिवर्तन-कथा भी शुक्ल जी के विश्लेषण और चयन से विन्यस्त होती है। महत्त्वपूर्ण आलोचक डॉ. बच्चन सिंह ने अपने सहकर्मी डॉ. अवधेश प्रधान के साथ शुक्ल जी के चयन के आधार पर हिन्दी की एक ‘गोल्डन ट्रेजरी’ एकत्र की है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह हिन्दी काव्य की, छायावाद-पूर्व की सम्पदा से आकलित, एक रत्न-मंजूषा है। इस संकलन की एक और विशेषता की ओर भी ध्यान देना चाहिए—कविताओं में रूप का नैरन्तर्य और परिवर्तन। कुछ लोगों का विचार है कि साहित्य का इतिहास रूपों और उनके परिवर्तन का इतिहास होता है। शुक्ल जी को यह एकांगिता स्वीकार्य नहीं है। शुरू से ही रूपों के नैरन्तर्य, परिष्कार और परिवर्तन के प्रति वे सतर्क हैं। इन परिवर्तनों को वे कभी शब्द-शक्तियों के आधार पर, कभी क्रियारूपों और लय के आधार पर पहचानते हैं। इसमें केवल ‘श्रेष्ठ’ और ‘प्रिय’ का मनचाहा संकलन नहीं है, बल्कि ‘विविध’ और ‘प्रतिनिधि’ का सावधान चयन है जिसमें उत्कृष्ट काव्य-खंडों के साथ कुछ कमज़ोर काव्य-प्रयोग भी है जिनका ऐतिहासिक मूल्य है—काव्य-वस्तु और काव्य-भाषा के विकास की दृष्टि से। इसमें सफल काव्य-सृष्टि की ‘सिद्धावस्था’ के साथ असफल काव्य-प्रयत्नों की ‘साधनावस्था’ भी मौजूद है।
इस इतिहास-यात्रा में जगमगाते शिखरों के साथ कुछ गुमनाम घाटियाँ भी शामिल हैं। आप केवल ‘इतिहास’ में उद्धृत काव्य-रचनाओं को एक क्रम में देख जाएँ तो हिन्दी काव्यधारा का एक व्यापक और प्रतिनिधिमूलक गतिशील प्रवाह-चित्र सामने आ जाता है। यह संचयन ऐसी ही विविधवर्णी चित्रमाला है।
VAH EK AUR MAN...
- Author Name:
Shri Praveen Kumar
- Book Type:

- Description: ये ज़रूरी नहीं कि सबका सच एक हो जाए, सबके अहसासात एक हो जाएँ, सबके नज़रिए, सबके फलस़फे एक हो जाएँ न मैं अपने जज़्बों को खुद थाम पाया कहाँ होंठ सीना, न मैं जान पाया सर्दजोशी का आलम, सुलगती़िफज़ाएँ न वो चुप हुआ है और न मैं बाज़ आया। रु़खसती रु़ख बदलने का भी नाम है बेरु़खी रोकना आज़माइश मेरी आँसुओं सा निकलकर कहाँ चल दिए धूल सी भर गई है नुमाइश मेरी। —इसी संग्रह से इस काव्य-संकलन में मानवीय रिश्तों का स्थायी भाव प्रेम, यत्र-तत्र-सर्वत्र है और उसी में रूबरू हुए दिल को छूनेवाले तमाम मंजरों का मर्यादित तस्करा भी है। समय के प्रवाह में जज्बातों को थामने, उनसे गुफ्तगू करने की कशिश गीतों और नज्मों में मुसलसल है, तो मसरूफियत के आगोश में अपनों से दूर हो जाने की पीड़ा भी कमोबेश इसमें शामिल है।
Poorvkalin Ichhawar Ki Parkrima
- Author Name:
Rajesh Sharma
- Book Type:

- Description: Book
Yeh Prithvi Tumhein Deta Hoon
- Author Name:
Markandey
- Book Type:

-
Description:
मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है। लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था। सन् 1954 में उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पान-फूल’ और सन् 1956 में पहला कविता-संग्रह—‘सपने तुम्हारे थे’ नाम से आया था।
‘सपने तुम्हारे थे’ के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया। लेकिन फिर सन् 2006 की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नई कहानी’ का अंक एकाएक हाथ लगा। देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थीं। मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ 1980 के दशक में लिखी गई कविताओं में से छाँटकर ‘नई कहानी’ में छपने को दी गई थीं। इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को ‘सपने तुम्हारे थे’ के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी। अलबत्ता काव्य-रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन ज़रूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् 1980 के दशक में टूटा—भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही।
बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य-संकलन ‘सपने तुम्हारे थे’ की कविताओं के साथ सन् 1980 के दशक में लिखी गई उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है।
मार्कण्डेय कविता की ‘कला’ सीखने से ज़्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाए। ‘अभी तो मैं सीख रहा हूँ’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए—‘‘अगर सम्भव हुआ तो निहाई ले आऊँगा/हथौड़े से पीटूँगा, हँसिया बनाऊँगा/फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना/नाबदानों और वेश्यालयों में पड़े-पड़े/वे घिनौने, बदकार और चापलूस हो गए हैं...’’
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा—इसकी जाँच–परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है।
—राजेन्द्र कुमार
Purple Orchids
- Author Name:
Ashish
- Book Type:

- Description: Embark on a poignant journey through the transformative relationship that shaped the author’s life. This heartfelt memoir recounts the joys and laughter that once flourished, finding solace in each other’s company. Yet, unspoken words and unresolved issues weigh heavily, casting shadows on their love. The book delves into unexpressed emotions,unsaid conversations, and the lingering sense of loss.It becomes a powerful outlet for the author’s feelings, offering a testament to the impact of our actions on cherished relationships. Amidst love, regret, and personal growth, this book is a touching tribute to a person who forever changed their life, exploring the beauty and challenges of deep connections while embracingforgivenes and understanding.
Megh Jaisa Manushya
- Author Name:
Shankha Ghosh
- Book Type:

-
Description:
शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है।
उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है!
उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा।
Samanantar
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
‘समानान्तर’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा अनूदित विश्व-काव्य की श्रेष्ठ कृतियों का संकलन है।
इस पुस्तक में एक तरफ़ जहाँ हमें—पुर्तगीजी, स्पेनिश, अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, अमरीकी, चीनी, पोलिश एवं भारतीय भाषाओं में मलयालम की अछूती भावभूमि और नवीन भंगिमाओं वाली कविताएँ मिलती हैं तो दूसरी तरफ़ डी.एच. लारेंस की वे कविताएँ भी जो यूरोप और अमरीका में बहुत लोकप्रिय नहीं हो सकीं, लेकिन जिनका राष्ट्रकवि दिनकर जी ने चयन ही नहीं, बल्कि सरल भाषा-शैली में हिन्दी में अनुवाद भी किया और जो भारतीय चेतना के आसपास चक्कर काटती हैं।
अनूदित होते हुए भी नितान्त मौलिक प्रतीत होनेवाली कालजयी कविताओं का एक अनूठा संकलन है ‘समानान्तर’।
Coffee Cafe
- Author Name:
Rashmi Tarika
- Book Type:

- Description: This book has no description
Jaise Chand Par Se Dikhti Dharti
- Author Name:
Harjendra Chaudhary
- Book Type:

- Description: हरजेन्द्र चौधरी के पहले कविता-संग्रह ‘इतिहास बोलता है’ की कविताओं में जो गड़गड़ाता आवेश था, वह इस संग्रह की कविताओं में काफ़ी हद तक मंथर हो गया लगता है। समाज और संसार को अपनी अवधारणाओं, अपने सपनों के मुताबिक ढाल लेने की वह बेचैनी इन कविताओं में भी दिखाई पड़ती है लेकिन अधिक संयत, अधिक सधे हुए रूप में। चतुर्दिक घटित हो रहे सामाजिक परिवर्तन की गहरी पहचान और उसके सघन अनुभव इन कविताओं को अपेक्षाकृत अधिक 'स्थायी' प्रभविष्णुता प्रदान करते दिखाई पड़ते हैं। कवि यहाँ सामाजिक परिवर्तन की दिशा-गति के बिम्ब रचता है, जिनमें एक नैतिक आग्रह और 'रेजिस्टेंस' भाव अन्तर्निहित है। धरती पर से चाँद देखने की बजाय चाँद पर से धरती देखने-दिखाने वाली इन कविताओं में भाषा और बिम्बों की गजब की ताज़गी है। ये कविताएँ एक गहरी मानवीय संवेदना की कविताएँ हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि हरजेन्द्र चौधरी की कविताओं में किसान, कवि, औरत और बच्चे की उपस्थिति बार-बार दर्ज होती है। यहाँ इन्हें मानवीय संवेदना के बचे रहने के लक्षण और उसे बचाए रखने की चिन्ता के प्रमाणों के रूप में भी पढ़ा-देखा जा सकता है। साथ ही इन कविताओं में हम अपने 'समय का चेहरा' देख सकते हैं, जो निरन्तर बदल रहा है—जितना बाहर जीवन में, उतना ही इन कविताओं के भीतर भी। प्रतिकूल परिस्थितियाँ और मानवीय संघर्ष—दोनों की टकराहट भरी पारस्परिकता बार-बार इन कविताओं में स्थान पाती है। सामूहिक ज़िन्दगी को अनेकविध प्रभावित करने वाले 'सुदूर' कारणों को भी इन कविताओं में बिना किसी बड़बोलेपन के इतनी सहजता से स्थान दे दिया गया है कि पाठक चमत्कृत हुए बिना इनकी पकड़ में आ जाता है।
Kya-Kya Toot Gaya Bheetar
- Author Name:
Manoj Kumar Sharma
- Book Type:

-
Description:
जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं, विचारों, अपनी विवशता और व्यवस्था की अच्छी-बुरी चीज़ों को आधार बनाकर लिखी गई कविताओं का संग्रह है—‘क्या-क्या टूट गया भीतर’। कवि मनोज कुमार शर्मा ने सामाजिक टूटन की अन्तर्व्यथा को बड़ी सादगी से दर्ज किया है इन कविताओं में।
इनकी प्रतिभा इनके ‘अढ़ाये’ में परिलक्षित होती है जिसमें दो-टूक शब्दों में इन्होंने सामाजिक विद्रूपताओं और विडम्बनाओं पर व्यंग्य किया है। पाठक स्वयं पढ़कर इस बात का अन्दाज़ा लगा सकते हैं। निश्चय ही यह कविता-संग्रह पठनीय और संग्रहणीय कृति है।
Nepathy Mein Hansi
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

- Description: ये कविताएँ पिछले सात आठ बरसों में लिखी गई है । हमारे आसपास इस बीच बहुत तेजी से परिवर्तन हुए हैं । घटनाओं की गीत इतनी तेज और अप्रत्याशित बल्कि कहना चाहिये कि विस्मित कर देने वाली है कि उसे अव- धारणाओं में पकड़ना अगर असंभव नहीं तो कठिन अवश्य हो गया है । दृश्य गहरी मानवीय तकलीफों और बेचैनियों से भरा है । इन कविताओं में .शायद इसके कुछ संकेत मिलें । शायद इसीलिए इन कविताओं में 'मूड्स' की बहुत भिन्नताएं हैं । निराशा, उदासी और उन्माद के इस दृश्य के बीच भी उम्मीद बची है । और यह उम्मीद है, इस देश की विराट श्रमशील जनता-जों बहुत थोड़े में अपना गुजर-बसर करते हुए भी, ज्यादा से ज्यादा जगह को मनुष्य के रहने लायक और सुंदर बनाने में जुटी हैं । ये कविताएँ उस धुँधले उजाले को देख और दिखा सकें ऐसी मेरी इच्छा है ।
Sadran
- Author Name:
Bittu Sandhu
- Book Type:

- Description: सदरां दा सफ़र खारीयां रातां तों कसैले दिन, सुफनेयां दे निघ तों उडीक दी पीड़, ओसीयां भरीयां ‘तरकालां’ तों हिजर दी हूक निकियां-निकियां उम्मीदां, उडीकां ते गुआचीआं मुस्कुराहटां तों उस ‘किल’ तक दा है जो ऐसी ‘पीड़’ दे गया जिस तों कई जन्मां, रिश्तेयां ते रुतां दे बाद वी निजात नहीं मिली जापदी। बिट्टू दियां सदरां पता नहीं केहड़े जन्म तों केहड़ा पतझड़ ते केहड़ी बसन्त आपणी पोटली च बन लेआइयां हन। गल ख़ास एह है कि बिट्टू दी पहली किताब ‘सफ़ीना’ 2009 विच हिन्दुस्तानी दा लड़ फड़ डूंगे उफानी रुहानी समुंदरां च गोते लाउंदी सी। अज उनां समुंदरां ने साडे आले दुआले दी मिट्टी नू गल ला पंजाबी विच गुनीआं सदरां नू साडी झोली पाया ए। एह मिट्टी दा असर वी है। ते हां जो बिट्टू संधू नू नहीं जाणदे ते सिर्फ़ ‘सफ़ीना’ दी उर्दू हिन्दी विच बुणी महीन कविता नू मणदे हन। उन्हा लई एह ख़ुशख़बरी है कि पंजाबी बिट्टू संधू नू उन्हां दी अम्मी तों मिलया तोहफ़ा है। पनताली कवितावां विच लखां सदरां करोड़ां सुफनेआं ते अनगिणत सफ़र नामेयां दा एह ज़िक्र ख़ूबसूरत है बिट्टू च रचेया, मिचेया हूबहू उसदे नाल दा, बिलकुल उसदे हाल दा।
Sach Sune Kai Din Huye
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

-
Description:
बद्रीनारायण अपनी पीढ़ी के उन दो-तीन कवियों में हैं जिनकी कविता से एक साफ़ चेहरा और कुछ रास्ता निकलता नज़र आता है। यह महज़ अच्छे और ‘होनहार’ कवि ही नहीं, सामाजिक अंतःकरण रखने वाले कवि भी है। अपनी परिस्थिति और अपनी काव्यवस्तु से उनका रिश्ता प्रगीतात्मक होकर भी ज़मीनी, जिम्मेदार और क़तई मामूली है और उसी के नाप की भाषा और संवेदना उन्होंने अर्जित की है। उक्ति-वैचित्र्य, बेपर की उड़ान और वाक् चातुर्य से किसी क़दर परहेज़ करते हुए वह एक ही चक्कर में घर-बार, दुनिया-जहान, अंतरिक्ष और तारामण्डल के नज़ारों को समेट लाते हैं। इसकी वजह है, उनके अनुभव की अखण्डता और भाव-जगत की सचाई। उनकी कविता में कोई नक़ली सेट नहीं है, न ऐसी सृष्टि जो सिर्फ़ कविता के लिए रची गई हो।
बद्रीनारायण जिस ‘लोक’ का बयान करते हैं उसमें विभिन्न चीजों ओर मनोभावों के अपने वज़न, आयतन, अनुपात और सापेक्ष स्थिति का खयाल रखते हैं। वह किसी चीज़ को ‘लार्जर दैन लाइफ़’ साइज़ में पेश करने के विशेषाधिकार का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करते। स्केल की यह समझ सिर्फ़ उनकी शैली या काव्यगत स्ट्रेटेजी की ही नहीं, उस दार्शनिक रवैये की निशानदेही करती है जिसमें मानवीय खुद्दारी, बेकली और करुणा तो है, मनुष्य होने की बिलावजह अकड़ और प्रशस्ति नहीं है। ऐसे विनम्र मानववाद से ही वह आत्मिक संगीत निकल सकता है जो इतिहास के वर्तमान चरण में हमारे संकट, व्यथा, रुदन, चिंता और आघात से रिश्ता बनाता हो।
हिन्दी में कहने को तो व्यापकतर सामाजिक और नैतिक सरोकार की कविता खूब लिखी जाती है, पर ग़ौर से देखें तो वह बहुत संकीर्ण दायरे और सीमित कार्यक्रम की कविता है। बद्रीनारायण की कविता इस दायरे को बढ़ाने और इस कार्यक्रम में कुछ बातें जोड़ने का काम करती है। इसे पढ़कर यह उम्मीद भी बँधती है कि बद्रीनारायण भविष्य में जीवन में आशा-निराशा के उपलब्ध स्रोतों से परे जाकर सांस्कृतिक-सामाजिक संकट की तीव्रता और जटिलता को एक चुनौती और एक बुलावे की तरह स्वीकार करेंगे, क्योंकि वह उस सन्तुलन, विवेक और निश्चय के मालिक हैं जो कविता को मात्र एक संरक्षणात्मक क्रिया ही नहीं, एक आलोचनात्मक और परिवर्तनकामी कर्म बनाते हैं ।
–असद ज़ैदी
Lal Ribban Ka Fulba
- Author Name:
Sunita Jain
- Book Type:

- Description: Poems
Amiri Rekha
- Author Name:
Kumar Ambuj
- Book Type:

-
Description:
न्याय और अन्याय, अभाव और रईसी, इच्छा और यथार्थ, पुरातन और नई सभ्यता जैसे अनेक विलोम प्रत्ययों के बीच वैचारिक आवागमन को ये कविताएँ अप्रत्याशित अनूठेपन एवं द्वंद्वात्मकता के साथ सम्भव बनाते हुए नए प्रस्ताव प्रस्तुत करती हैं। यहाँ भाषा, विचार, नैतिकता और स्वप्नशीलता के साथ कलाकर्म की वही अप्रतिम सर्जनात्मकता दृष्टव्य है जिसे कुमार अंबुज की कविता ने लगातार अर्जित किया है और अंबुज हर बार उसे नई ऊँचाइयों, अभिनव जगहों तक ले गए हैं। ये कविताएँ सक्रिय और सकर्मक प्रतिरोध की रचनात्मक कार्रवाई हैं। इनमें जीवन के संगीत, उत्तराधिकार, वैश्विकता, राजनीति, बाज़ार, मनुष्यता, प्रेम और अपमान की, हमारे समय और हमारी भाषा की पुनर्परिभाषाएँ हैं, उनकी आधुनिक पहचान है। साहसिक आत्मावलोकन और प्रवंचनाएँ भी हैं। इन कविताओं से अपने भीतर के टूटे-फूटे मनुष्य की मरम्मत की जा सकती है। इन्हें इनके खुरदुरेपन के लिए प्यार किया जा सकता है और इस बात के लिए भी कि इनके भीतर कितना कुछ है—शान्त, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ। संवेदित, व्यग्र अभिव्यक्ति, अचूक दृष्टि और पक्षधरता से पुष्ट कविता कुमार अंबुज की अपनी उपलब्धि है, जिसे यहाँ समूची हिन्दी कविता के सन्दर्भ में कुछ अधिक शक्ति के साथ औचक, विस्मयकारी, दुर्लभ, हार्दिक और नव्यतर भंगिमाओं के साथ देखा जा सकता है। किंचित् लम्बे अन्तराल और प्रतीक्षा के बाद प्रकाशित यह संग्रह निश्चय ही नई बहसों, रुझानों, प्रस्थानों और चुनौतियों का कारण बनेगा।
Sarson Se Amaltas
- Author Name:
Chitra Desai
- Book Type:

-
Description:
रिश्तों का जटिल संसार और प्रकृति का सरल, सहज अकुंठ विस्तार; इन कविताओं की जड़ें इन्हीं दो ज़मीनों में फैली हैं। रिश्ते रंग बदलते हैं तो उनको एक सम पर टिकाए रखना, ताकि ज़िन्दगी ही अपनी धुरी से न हिल जाए, अपने आप में बाक़ायदा एक काम है, जबकि अपने होने-भर से, हमारे इर्द-गिर्द अपनी मौजूदगी-भर से ढाढ़स बँधाती प्रकृति हमारी व्यथित-व्याकुल रूह के लिए एक सुकूनदेह विश्राम-भूमि। और यही नहीं, ये कविताएँ बताती हैं कि उनके रंगों में हमारी हर पीड़ा, हर उल्लास, हर उम्मीद, हर अवसाद के लिए कहीं कोई रंग उपलब्ध है जो हमारे अर्जित-अनार्जित सम्बन्धों के शहरों, जंगलों, पहाड़ों और पठारों के अलग-अलग मोड़ों पर मन को अपना-सा लगता है, और सब तरफ़ से निराश हो हम उसकी उँगली थाम अपने अन्तस की ओर चल पड़ते हैं—नए होकर लौटने के लिए।
शायद इसीलिए ये कविताएँ प्रकृति का अवलम्ब कभी नहीं छोड़तीं। प्रकृति के स्वरों में ये रिश्तों के राग को भी गाती हैं और विराग को भी। टूटते-भागते सम्बन्धों को पकड़ने की कोशिश में यदि इनकी हथेलियाँ रिस रही हैं और नानी के कहने से आसमान में दूर बैठे चाँद को मामा मान लेने पर पश्चात्ताप कर रही हैं तो यह भरोसा भी उनमें विन्यस्त है कि ‘भीतर जमे रिश्ते ही/बाहरी मौसम से बचाते हैं।’ संग्रह की कई कविताएँ सम्बन्ध या कहें कि ‘सेन्स ऑफ़ बिलांगिंग’ को बिलकुल अलग भूमि पर देखती हैं, मसलन यह छोटी-सी कविता : ‘तुम्हें ख़ुश रखने की आदत/देवदार-सी/मेरे भीतर उग रही है/और इसीलिए मैं बहुत बौनी होती जा रही हूँ।’ या फिर ‘अपाहिज सम्बन्ध’ शीर्षक एक और छोटी कविता।
संग्रह की अधिकांश कविताओं में प्रेम एक अंडरकरंट की तरह बहता है और कभी-कभी पर्याप्त मुखर होकर बोलता हुआ भी दीखता है—उछाह में भी और अवसन्नता में भी। लेकिन बहुत शालीन संयम के साथ, जो रचनाकार के अहसास की गहराई का प्रमाण है। शायद इसी गहरे का परिणाम यह भी है कि अपने आस-पास के भौतिक-सामाजिक यथार्थ को लक्षित कविताएँ इन्हीं विषयों पर लिखी गईं अनेक समकालीन कविताओं से कहीं अधिक सारगर्भित और व्यंजक हैं, उदाहरण के लिए, ‘बम्बई-1’, एंड ‘बम्बई-2’, ‘अफ़वाह’ और ‘पुल कहाँ गया’ शीर्षक कविताएँ। कहना न होगा कि अपनी संयत अभिव्यक्ति में सधी ये कविताएँ हिन्दी कविता के पाठकों के लिए संवेदना के एक अलग इलाक़े को खोलेंगी।
KAHAN ACHHE HUMARE DIN
- Author Name:
Keshav Sharan
- Book Type:

- Description: collection of ghazals
Customer Reviews
0 out of 5
Book
Be the first to write a review...