Neem Ka Shahad
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हिन्दी कविता के क्षेत्र में राजवर्धन आज़ाद का प्रवेश एक सुखद संयोग है। एक कुशल नेत्र चिकित्सक यहाँ समर्थ कवि के रूप में प्रकट हुआ है। कवि कर्म का सम्बन्ध हृदय से भी है। जो व्यक्ति मनुष्य की आँखों की रोशनी लौटाता है, वह हृदय से कितना संवेदनशील होगा इसका प्रमाण यह कविता-संग्रह है।</p> <p>‘नीम का शहद’ कवि डॉ. राजवर्धन आज़ाद के अनुसार एक नवीन प्रयोगधर्मिता का उदाहरण है। अपनी भावनाओं को सूत्रों में अभिव्यक्त करना या यूँ कहें कि कम शब्दों में अधिक भावों को व्यक्त करना है—‘ज़िन्दगी है उल्फ़त/जिनकी है क़िस्मत/जिनके हैं ख़ादिम/उनकी है जन्नत।’</p> <p>मुक्त छंद के कवि डॉ. आज़ाद की भावनाएँ सूक्ष्म हैं। कविता के केन्द्र में मनुष्य का जीवन है। विभिन्न भाव-भंगिमाओं से परिपूर्ण डॉ. आज़ाद की कविताएँ पृथ्वी से जन्नत तक की उड़ान भरती हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, देश-विदेश की गतिविधियाँ कविता के मुख्य सरोकारों में शामिल हैं। प्रकृति, प्रवृत्ति, परछाईं, पीढ़ियाँ, परिवार, परमेश्वर के साथ स्व से शिखर तक डॉ. आज़ाद की कविताओं में उपस्थित हैं। देश एवं देश की परिस्थितियों को लेकर डॉ. आज़ाद चिन्तित रहते हैं। उनकी चिन्ता यह भी है कि जिनके कंधों पर देश को विकसित करने की जिम्मेवारी है, वे स्वयं बीमार हैं। अर्थात अयोग्य हैं। ‘बीमार है मुल्क’ कविता में वे लिखते हैं—‘बीमार है मुल्क/बीमार हैं कुर्सियाँ/बीमार हकीम से/हम दवा पूछ रहे हैं।’</p> <p>उनकी कविता दुनिया में हो रहे पल-पल बदलाव की ख़बर रखती है। साथ ही संस्कृति के अवमूल्यन के प्रति सचेत भी करती है। एक कवि संवेदनशील संस्कृतिकर्मी भी होता है, इसलिए संस्कृति के अवमूल्यन से उनका चिन्तित होना स्वाभाविक है। संस्कृति के विभिन्न केन्द्रों का विपरीत व्यवहार डॉ. आज़ाद जैसे संवेदनशील एवं कर्मशील कवि को सोचने पर विवश कर देता है। उन्हीं के अनुसार—‘रक्षक बने भक्षक/मित्र बने तक्षक/संस्कृति हुई तार-तार/तस्कर बने परीक्षक।’</p> <p>डॉ. राजवर्धन आज़ाद हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेज़ी में भी कविता लिखते हैं। इनकी संवेदनशीलता तमाम विधाओं में मानवीयता के अत्यंत क़रीब है। ‘नीम का शहद’ कवि हृदय व्यक्तियों के लिए ‘नीम’ और ‘शहद’ के गुणों से परिपूर्ण फलदायी सिद्ध होगा।</p> <p>—डॉ. कल्याण कुमार झा
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हिन्दी कविता के क्षेत्र में राजवर्धन आज़ाद का प्रवेश एक सुखद संयोग है। एक कुशल नेत्र चिकित्सक यहाँ समर्थ कवि के रूप में प्रकट हुआ है। कवि कर्म का सम्बन्ध हृदय से भी है। जो व्यक्ति मनुष्य की आँखों की रोशनी लौटाता है, वह हृदय से कितना संवेदनशील होगा इसका प्रमाण यह कविता-संग्रह है।</p>
<p>‘नीम का शहद’ कवि डॉ. राजवर्धन आज़ाद के अनुसार एक नवीन प्रयोगधर्मिता का उदाहरण है। अपनी भावनाओं को सूत्रों में अभिव्यक्त करना या यूँ कहें कि कम शब्दों में अधिक भावों को व्यक्त करना है—‘ज़िन्दगी है उल्फ़त/जिनकी है क़िस्मत/जिनके हैं ख़ादिम/उनकी है जन्नत।’</p>
<p>मुक्त छंद के कवि डॉ. आज़ाद की भावनाएँ सूक्ष्म हैं। कविता के केन्द्र में मनुष्य का जीवन है। विभिन्न भाव-भंगिमाओं से परिपूर्ण डॉ. आज़ाद की कविताएँ पृथ्वी से जन्नत तक की उड़ान भरती हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, देश-विदेश की गतिविधियाँ कविता के मुख्य सरोकारों में शामिल हैं। प्रकृति, प्रवृत्ति, परछाईं, पीढ़ियाँ, परिवार, परमेश्वर के साथ स्व से शिखर तक डॉ. आज़ाद की कविताओं में उपस्थित हैं। देश एवं देश की परिस्थितियों को लेकर डॉ. आज़ाद चिन्तित रहते हैं। उनकी चिन्ता यह भी है कि जिनके कंधों पर देश को विकसित करने की जिम्मेवारी है, वे स्वयं बीमार हैं। अर्थात अयोग्य हैं। ‘बीमार है मुल्क’ कविता में वे लिखते हैं—‘बीमार है मुल्क/बीमार हैं कुर्सियाँ/बीमार हकीम से/हम दवा पूछ रहे हैं।’</p>
<p>उनकी कविता दुनिया में हो रहे पल-पल बदलाव की ख़बर रखती है। साथ ही संस्कृति के अवमूल्यन के प्रति सचेत भी करती है। एक कवि संवेदनशील संस्कृतिकर्मी भी होता है, इसलिए संस्कृति के अवमूल्यन से उनका चिन्तित होना स्वाभाविक है। संस्कृति के विभिन्न केन्द्रों का विपरीत व्यवहार डॉ. आज़ाद जैसे संवेदनशील एवं कर्मशील कवि को सोचने पर विवश कर देता है। उन्हीं के अनुसार—‘रक्षक बने भक्षक/मित्र बने तक्षक/संस्कृति हुई तार-तार/तस्कर बने परीक्षक।’</p>
<p>डॉ. राजवर्धन आज़ाद हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेज़ी में भी कविता लिखते हैं। इनकी संवेदनशीलता तमाम विधाओं में मानवीयता के अत्यंत क़रीब है। ‘नीम का शहद’ कवि हृदय व्यक्तियों के लिए ‘नीम’ और ‘शहद’ के गुणों से परिपूर्ण फलदायी सिद्ध होगा।</p>
<p>—डॉ. कल्याण कुमार झा
Book Details
-
ISBN9788119835362
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति और नारी का सौन्दर्य बहुत चित्रित है। वे जीवन-रस का छककर पान करनेवाले कवि हैं। सुख, सौन्दर्य, श्रम—ये केदारनाथ अग्रवाल के जीवन एवं काव्य-मूल्य के ढाँचे के विभिन्न अवयव हैं। निस्सन्देह इसका स्रोत समाजवादी विचारधारा है। यह सुख सामाजिकता से अलग या उसका विरोधी नहीं। बस, इसका अनुभव निजी है। वह अनावश्यक संचय से, निष्क्रियता से, दूसरों का हक़ मार लेने से नहीं मिलता। सुख केदारनाथ अग्रवाल के लिए मानवता का स्वाद है, अस्तित्व का रस है। उनका जीवन-आचरण और कविता भी उसी प्राप्ति के लिए अनुशासित और अनुकूलित थी। प्रेम हो तो साधना भी सिद्धि का आनन्द देती है। केदारनाथ अग्रवाल प्रकृति और मनुष्य को श्रम-संस्कृति की दृष्टि और विचारधारा से चित्रित करते हैं। उनके यहाँ प्रकृति और मनुष्य का तादात्म्य है। केदारनाथ अग्रवाल की कविता ने नई प्रकृति, नया समुद्र, नए धन-जन, नया नारी सौन्दर्य गढ़ा है। वे श्रम-संस्कृति के सौन्दर्य-निर्माता कवि हैं। उन्होंने प्रगतिशील कविता-हिन्दी कविता को कालजयी गरिमा दी है। केदारनाथ अग्रवाल बुन्देलखंड की प्रकृति, वहाँ के जन-जीवन से ही नहीं, वहाँ के लोकगान, वहाँ की लय, वहाँ की भाषा और तान से जुड़े हैं। उनकी रचनाधर्मिता में बुन्देलखंड अपनी समग्रता में रचा-बसा है। यह सारा रचाव-बसाव कवि के हृदय में है और अभिव्यक्तित्व में भी।
—डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी
Mere Manch Ki Sargam
- Author Name:
Piyush Mishra
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जब होश सँभाला तो मैं सन् 1990 में अपने थियेटर ग्रुप 'एक्ट-वन आर्ट ग्रुप, नई दिल्ली' की बाँहों में था। उससे पहले अगर कुछ याद है तो चंद उँगलियों पर गिने जानेवाले दोस्त जो एक हथेली में ख़र्च हो जाएँगे, प्लस टू के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में प्रवेश, सन् 1983 से 1986 तक वहाँ का प्रवास, 'हैमलेट', 'नेक्रासोव' और 'मैन इक्वल्स मैन', स्व. फ्रिट्ज बेनेविट्ज नाम के गुरु और श्री रंजीत कपूर और श्री नसीरुद्दीन शाह जैसे सम्मानित सीनियरों से मुलाक़ात, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में 18 दिन की पेशेवर हवाखोरी, 1989 में मुंबई कूच और 1990 में दिल्ली वापसी। और उसके बाद 'एक्ट-वन' से निकाह, उससे तलाक़ और फिर से निकाह।
इस संकलन में मेरी व्यक्तिगत शायरी या सिनेमा के गीत नहीं हैं। ये सिर्फ़ मेरे थियेटर के गीत हैं जिनको संगीतबद्ध या कम्पोज़ किया जा चुका है। इस संकलन में ये अपने ‘ओरिजिनल फ़ार्म' में हैं और इन पर मुझसे ज़्यादा मेरे उन करोड़ों दोस्तों का हक़ है जिनकी बढ़ती हुई तादाद से मेरा ख़ुदा भी मुझे नहीं बचा सकता।
बहरहाल ये गीत उस दौर के नाम जिसमें मैंने बड़ा होना सीखा...।
...उन सबके नाम जिनको धोखा देकर मैंने ये जाना कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।
...उन सबके नाम जिनसे मिले धोखे ने मुझे माफ़ी देने के महान गुण से परिचित कराया!
Teri Hansi Krishn Vivar Si
- Author Name:
Punam Sinha Shreysi
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Waqt Zaroorat
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- Description: क़्त ज़रूरत’ की कविताएँ उस संवेदनशीलता का प्रतीक हैं, जिससे भारत एक सुन्दर देश बनता है। यहाँ की जनता, उसकी सामूहिकता और स्वत्व—सब मिलकर एक साझा भविष्य की रचना करते हैं; लेकिन आज इसी सुंदरता के साझेपन पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। अविनाश मिश्र अपनी कविताओं के माध्यम से चेताते हैं कि नफ़रत की एक सामूहिक मानसिकता विकसित हो रही है। कविता, प्रेम और सद्भाव से आपूरित मन ही इस नफ़रत की काट है। इस संग्रह की कविताएँ इस ज़िम्मेदारी को स्वीकारती हैं। कविता के सत्त्व को कमज़ोर किए बिना, एक वेधक साहित्यिक संवेदनशीलता के साथ ये कविताएँ ‘समय की छुअन’ लिये हुए हैं। यहाँ समय का प्रत्येक स्पंदन है, लेकिन यह केवल दर्ज कर लिए जाने की बेचैनी के साथ नहीं आया है; बल्कि यह कविता की मूलभूत शर्त यानी शब्द और मानवीय सौन्दर्य के साथ आया है। इस संग्रह में किसिम-किसिम के अभागे लोग हैं—प्रेम से विहीन, भरपेट भोजन से वंचित और किसी जल रहे पेड़ की तरह घृणा से धुँधुआते लोग। अविनाश का कवि अपनी कविता के माध्यम से उनके लिए मैत्री और सद्भाव का हाथ बढ़ाता है। इक्कीसवीं सदी में शोर बहुत ज़्यादा है; इसके गए दो दशकों में भाषा, संवेदना और सामूहिकता का क्षरण बहुत तीव्रता से हुआ है। ऐसे में ये कविताएँ हमें असहाय कर देती हैं कि देखो—हम सब ये हो गए हैं। ये हमारे दुःख हैं, इन्हें देखो... ‘वक़्त ज़रूरत’ में दुःख की एक तान और उससे मुक्ति की छटपटाहट आरंभ से अंत तक विद्यमान है। इस संकलन की बहुत सारी कविताएँ उस फाँक की तरफ़ इशारा करती हैं, जहाँ व्यक्ति की याददाश्त उसे सबल बनाने के बजाय उसे कमज़ोर करती हैं और ‘सबको समझ में आ सकने वाली भाषा’ के चक्कर में रचनाकार अपनी भाषा से हाथ धो बैठता है। यह संग्रह भाषा की निष्कलुषता के लिए भी स्मरणीय है।
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