Do Sharan
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 236
₹
295
Available
निराला की सम्पूर्ण गीत-रचना का एक बहुत बड़ा भाग शरणागति या प्रपत्ति-भाव के गीतों से सम्बद्ध है। भक्ति, प्रार्थना और शरणागति के गीत ‘परिमल’ संग्रह से ही हमें मिलने लगते हैं। इसकी क्षीण ध्वनि उनके पहले संग्रह ‘अनामिका’ की ‘माया’ कविता में हमें सुनाई देती है। ‘या कि ले कर सिद्धि तू आगे खड़ी, त्यागियों के त्याग की आराधना’—कहकर कवि अपनी रचनात्मकता की उस विशेष दिशा की ओर संकेतित करता है, जो आगे चलकर उसके अवसाद, उसकी उदासी, खिन्नता, मृत्यु-भय और आत्म-जर्जरता से होती हुई, अन्ततः शरणागति की प्रार्थना-भूमि पर उसे उतारती है।</p>
<p>‘आराधना’ और ‘अर्चना’ में उसकी संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। अकेले ‘अर्चना’ में शरणागति के लगभग 34-35 गीत संगृहीत हैं। ‘गीत-गुंज’ और उनके अन्तिम संग्रह ‘सांध्य काकली’ में भी यह प्रार्थना-क्रम तिरोहित नहीं हुआ है। यद्यपि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में निराला ‘प्रार्थना की व्यर्थता’ की बात भी करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन यह उत्कट नैराश्य के क्षणों की ही अभिव्यक्ति लगती है, अन्यथा वे अपनी कारुणिक आत्म-जर्जरता में लगातार ‘प्रभु’ की अमर फ़ैंटेसी में शरण लेते हुए दिखाई देते हैं। उनके सारे संग्रहों को मिलाकर शरणागति और प्रार्थना-क्रम के इन गीतों की संख्या लगभग 90 के आस-पास पहुँचती है। इस तरह निराला के अन्तःसंगीत का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ‘प्रभु’ के इसी साक्षात्कार से सम्बद्ध है।</p>
<p>वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने निराला की प्रपत्ति भाव की कविताओं को संकलित किया है। इन कविताओं में मनुष्य की उस आत्मिक मुक्ति की जद्दोजहद को सहज ही परिलक्षित किया जा सकता है, जो दरअसल सम्पूर्ण मानवमुक्ति का एक महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है।
ISBN: 9788126712168
Pages: 151
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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मैंने संजय अलंग के कविता-संग्रह ‘नदी उसी तरह सुन्दर थी जैसे कोई बाघ’ को एक पाठक की तरह देखा। कई कविताओं के कथ्य और शिल्प ने मुझे रोककर उसे दुबारा पढ़ने को बाध्य किया।
इस संग्रह की 'सुन्दर' शीर्षक कविता में, संजय सौन्दर्य की अवधारणा पर गोया एक विमर्श सृजन करते हैं। आलोचना या कथा में विमर्श सहज सम्भव होता है किन्तु कवि ने इसे कविता के माध्यम से करने की कोशिश की है। इसे देखिए—‘गुलाब उसी तरह सुन्दर था जैसे कोई नदी/नदी उसी तरह सुन्दर थी जैसे कोई बाघ/ बाघ उसी तरह सुन्दर था जैसे कोई मैना/...स्वाद और सुन्दरता/ सभी जगह थी/ बस उसे देखा जाना था/ख़ुशी के साथ।’
बकौल मुक्तिबोध संवेदना जो ज्ञानात्मक होती है। संजय की कविताएँ कुछ चकित करने के साथ ही चीज़ों को रूढ़ अवधारणाओं से मुक्त होकर देखने और पढ़ने की माँग करती हैं। कविताओं में महीन विमर्श निहित है जो दार्शनिक स्तर के बावजूद अमूर्त नहीं यथार्थवादी है और सोचने को बाध्य करता है। कविताओं के कथ्य में आप अपने को पाते हैं और विमर्श में सम्मिलित हो जाते हैं। उनका शिल्प आपको अपने साथ बनाए रखता है।
संग्रह की ही कविता ‘बँटे रंग' उस राजनीति की याद दिलाती है, जो न सिर्फ़ तामसी, राजसी और सात्त्विक, बल्कि स्त्रियों के रंगों को पुरुषों के रंगों से अलग बताती है। यह धूर्तता और संकीर्णता को उजागर करनेवाली अभिव्यक्ति और उत्कृष्ट कविता है। संजय अलंग की रचना-प्रक्रिया में संगतियों और विसंगतियों की यह खोज निरन्तर चलती रहती है और उनके कथ्य को विचारणीय बनाती है।
कड़ी मेहनत से सब कुछ पा लेने का भ्रम फैलाकर मज़दूरों का शोषण, उपासना-स्थलों के फ़र्श पर गिरे हुए प्रसाद की चिपचिपाहट से उपजी वितृष्णा और मंडी या सट्टा बाज़ार में धन्धेबाज़ों की तरह ग्राहकों को पुकारते पुजारी कैसे मनुष्यता और आस्था के मूल्यों को घृणित और पतनशील बना देते हैं; संजय अलंग की कविताएँ उसकी अनेक झलकियाँ प्रस्तुत करती हैं। यह उजागर होता है कि, आराध्य पीछे छूट जाता है और छूटता चला जाता है।
कविताओं में प्रतीक और बिम्ब मौलिक और मुखर होकर उभरे हैं। बूँदाबाँदी के दिन, एक छाते में साथ-साथ सिहरते हुए क्षणों का एक सुन्दर और मौलिक बिम्ब है। 'शाह अमर हो गया लाल क़िले के साथ' कविता प्रतीकों को नया विस्तार देती है।
कविताएँ विषय वैविध्य से भरपूर हैं। कवि की दृष्टि तीक्ष्ण है। वह रोज़मर्रा की गतिविधियों को भी खोजपूर्ण दृष्टि से देखता है। यह दृष्टि विश्लेषणपरक है जो अदृश्य को देखने की उत्सुकता से भरी है। ‘क्रमांक वाला विश्व’ कविता-दृष्टि तीक्ष्णता की ओर ध्यान आकृष्ट करती है।
Suraj Ko Angootha
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Jitendra Srivastava
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- Description: सूरज को अँगूठा दिखाते हुए ठहाके लगाने का साहस करती जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं का प्राणतत्त्व राजनीति और समाजनीति—दोनों के समान योग से निर्मित है। यही कारण है कि जितेन्द्र की कविताएँ इकहरी नहीं, बहुस्तरीय हैं। मनुष्य और मनुष्यता की चिन्ता करने के क्रम में यह कवि सत्ताकांक्षी राजनीति और वर्चस्ववादी सामाजिक संरचना की गहरी पड़ताल करता है। यह अकारण नहीं है कि वह बात करता है सपनों की, इच्छाओं की और चुप्पी के समाजशास्त्र की। पिछले तीन दशकों से हिन्दी कविता में निरन्तर सक्रिय, स्वीकृत और सम्मानित जितेन्द्र श्रीवास्तव गृहस्थ जीवन के सिद्ध और अद्वितीय कवि हैं। उनकी कविता से ही एक शब्द लेकर कहें तो पारिवारिक विन्यास के रास्ते जीवन की विविधता को प्रकट करने का कौशल उनकी कविताओं का जीवद्रव्य है। जितेन्द्र श्रीवास्तव की भाषा में अपूर्व और दुर्लभ आत्मीयता है। चिन्तन करते हुए, समस्याओं पर विचार करते हुए, दुःख बतियाते हुए, पत्नी से कुछ कहते हुए, छोटे भाई की शादी में माँ की चर्चा करते हुए, पिता को याद करते हुए, पुराने मित्र से मिलते हुए, बहुत दिनों के बाद अपनी पुश्तैनी खेती-बारी को निहारते हुए, आत्मबल को बटोरते हुए—आप कविताओं में विन्यस्त इन सभी रंगों से गुज़रते हुए पाएँगे कि जितेन्द्र की काव्य-भाषा में 'आत्मीयता' आश्चर्यजनक रूप से बनी रहती है। न कोई दिखावे की तल्खी, न नफ़रत का अतिरिक्त प्रदर्शन—फिर भी पक्षधरता में कोई विचलन नहीं। यह रक्त और विवेक में समाई हुई पक्षधरता है जिसे व्यक्त करने के लिए कवि को अलग से कोई उद्यम नहीं करना पड़ता। उम्मीद है उनका यह नया संग्रह हिन्दी कविता के पाठकों को एक नया आस्वाद देगा।
Aab Katek Chup Rahoo
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Deep Narayan
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Description:
दीप नारायण अपन जीवनक भोगल यथार्थकेँ अपन शब्द-शिल्प, उद्भावना आ कुशल अभिव्यक्तिक माध्यमे समकालीन मैथिली कविताक क्षेत्रमे अपन बेछप उपस्थिति दर्ज कएलनि अछि।
—तारानन्द वियोगी
दीप नारायणक कवितासँ समकालीन मैथिली कवितामे निस्संदेह सम्भावनाक एकटा नव बाट फुजैत अछि।
—नारायणजी
दीप नारायण मैथिलीक लोकप्रिय कवि छथि। मैथिली कविता आ समकालीन भारतीय कविता हिनक लेखनीसँ समृद्ध हैत।
—विद्यानन्द झा
दीप नारायण, सरल सुबोध भाषामे दैनिक जीवनक बहुत रास शब्द जकर अंकुरण मिथिलाक माटिपानिमे भेलैक, ओकरा अपन रचनात्मक कौशलसँ प्रभावी अर्थ दए, ‘आब कतेक चुप रहू’ लिखि एकटा सार्थक काज कएलनि अछि। प्रयुक्त प्रतीक-विम्बमे मानवीय-संवेदनाक अन्तर्वर्ती सौन्दर्य कवितासभकेँ विशिष्ट बनबैत छैक।
लोक–संवेदनाक एहि कविक लिखबाक अपनहि ढ’ब-ढर्रा छनि। जीवनक भोगल यथार्थकेँ अनुभूतिक र’हीसँ र’हिक’ मानवीय संवेदनाक प्रतीति गढ़बामे निष्णात कवि दीप नारायणक कविताक बगएमे फूटल बकार समकालीन मैथिली कविताक एक विशिष्ट हाक भ’ सकैत अछि।
अपन मौलिक शिल्पगत वैशिष्ट्यसँ काव्य-जगतमे फूट पहिचानक संग ई प्रतिष्ठित होएताह से हमर विश्वास अछि।
—कीर्ति नारायण मिश्र
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