Megh Jaisa Manushya
(0)
Author:
Shankha Ghosh, Prayag ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है। उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है! उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा।
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शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है।
उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है!
उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा।
Book Details
-
ISBN9789387462519
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं। बिना किसी तार्किक संयोजन के यह पूरा संग्रह एक ऐसे काव्य-फलक की तरह है, जिसके अन्त को खुला छोड़ दिया गया है। स्वयं इसकी रचयिता के अनुसार “वर्तमान और अतीत, इतिहास और किंवदन्तियाँ, कल्पना और यथार्थ यहाँ साथ-साथ घुमरी परैया-सा नाचते दीख सकते हैं।” आज के स्त्री-लेखन की सुपरिचित धारा से अलग यह एक नई कल्पनात्मक सृष्टि है, जो अपनी पंक्तियों को पाठक पर बलात् थोपने के बजाय उससे बोलती-बतियाती है, और ऐसा करते हुए वह चुपके से अपना आशय भी उसकी स्मृति में दर्ज करा देती है। शायद यह एक नई काव्य-विधा है, जिसकी ओर काव्य-प्रेमियों का ध्यान जाएगा। समकालीन कविता के एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि यह काव्य-कृति एक नई काव्य-भाषा की प्रस्तावना है, जो व्यंजना के कई बन्द पड़े दरवाज़ों को खोलती है और यह सब कुछ घटित होता है एक स्थानीय केन्द्र के चारों ओर। कविता की जानी-पहचानी दुनिया में यह सबाल्टर्न भावबोध का हस्तक्षेप है, जो अलक्षित नहीं जाएगा। —केदारनाथ सिंह
Fiza Ke Samandar Mein
- Author Name:
Ramswaroop Kisan
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ग्रामीण जीवन के अनूठे चित्र और मनुष्य के संसार के ऐसे बिम्ब जिन पर सामान्यतः हमारी निगाह कम ही ठहरती है, रामस्वरूप किसान की कविताओं में बहुतायत से मिलते हैं। मिसाल के तौर पर इस संग्रह की पहली ही कविता-शृंखला ‘पीठ’ को लिया जा सकता है जिसमें कुल सोलह कविताएँ शामिल हैं। ‘पीठ एक कारुणिक क्षेत्र’ है जिसे देखकर कवि-मन बार-बार कभी अपने भीतर और कभी बाहर की ओर एक प्रश्नाकुल चिन्तन-यात्रा पर निकल जाता है। ‘फ़िज़ा के समन्दर में’ शीर्षक कविता-शृंखला की ग्यारह कविताएँ पुनः कवि की विशिष्ट दृष्टि का पता देती हैं जिसमें प्रेम के लिए घर से भागती हुई लड़की हमें और हमारे समाज को पुनः पुनः सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है— यह रहा/तुम्हारा दूल्हा/साथ-साथ रहोगे तो/प्यार हो जाएगा/पापा ने कहा।...नहीं, ऐसा कहो पापा/यह रहा तुम्हारा प्यार/साथ-साथ रहोगे/तो दूल्हा हो जाएगा। संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएँ इसी तरह पाठक को सहसा चौंका देती हैं और हमारी देखी जानी चीज़ों को नये ढंग से हमारे सामने ला देती हैं। आम जन-जीवन के दैनन्दिन दुखों, व्यवस्था-जनित असहायताओं और मनुष्य की आन्तरिक और बाह्य पीड़ाओं के साथ इन कविताओं की राजनैतिक चेतना भी मुखर रूप में सामने आती है— पब्लिक लड़ती है चुनाव—पैसों से/बातों से/लातों से/भालों-बन्दूक़ों-तलवारों से/ख़ून के फ़व्वारों से/और लड़ा-लड़ाया चुनाव/उनके गले में डाल देती है.../वे चुनाव नहीं लड़ते/वे तो पहनते हैं चुनाव।
Nihshabd Noopur : Rumi Ki 100 Gazalein
- Author Name:
Rumi +1
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रूमी ईरान के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में अलग हैं। इनकी प्रत्येक ग़ज़ल का हर शे’र आत्म-अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। इनकी कविता केवल काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर पाठकों को लुब्ध करने में पर्यवसित नहीं होती, बल्कि दिल से निकलकर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। प्रस्तुत पुस्तक उनकी चुनिन्दा 100 ग़ज़लों का अनुवाद है। इस पुस्तक के माध्यम से रूमी पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इसमें सबसे पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है, फिर साथ में ही उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लें फ़ारसी लिपि में भी रखी गई हैं। पुस्तक के अन्त में दिए गए अनेक परिशिष्टों के माध्यम से फ़ारसी काव्य-भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से समझाया गया है। क्लासिकल फ़ारसी कविता के सम्यक् परिचय के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है। अन्त में प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार मूल से जुड़े रसपूर्ण अनुवाद की प्रस्तुति के साथ ही यह पुस्तक रूमी-रीडर के तौर पर भी उपयोग में आने योग्य है।
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
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