Musaddas-E-Hali
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‘मुसद्दस’ के काव्यात्मक पक्ष पर टिप्पणी करते हुए शमशेर कहते हैं : ‘उसका संगठन अद्भुत रूप से पुष्ट जान पड़ता है। कोई एक भाव बिलकुल उसी रूप में दोहराया नहीं गया। पूरी कविता की लड़ियाँ आपस में इस तरह गुँथी हुई हैं कि अगर एक को भी तोड़कर अलग करें तो पूरी कविता का सौन्दर्य उसी परिणाम में टूटता और बिखरता है।’</p> <p>‘मुसद्दस-ए-हाली’ की रचना 1879 में उस समय हुई जब भारतीय समाज 1857 के विद्रोह में पराजित होने के बाद पस्ती और हताशा के दौर से गुज़र रहा था। ख़ास तौर पर भारतीय मुस्लिम समाज। मौलाना अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ ने इसकी रचना सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर क़ौम को इस हालात से जगाने के लिए की। इस कृति की अहमियत का अनुमान सर सैयद के इस कथन से लगाया जा सकता है कि ‘अगर ख़ुदा ने मुझसे पूछा कि दुनिया में तुमने क्या किया तो मैं जवाब दूँगा कि मैंने हाली से ‘मुसद्दस-ए-हाली’ लिखवाई।’</p> <p>इसी से प्रेरित होकर मैथिलीशरण गुप्त ने हिन्दू समाज को ध्यान में रखकर अपनी प्रसिद्ध कृति ‘भारत भारती’ की रचना की जो 1913 में प्रकाशित हुई। दोनों ही रचनाएँ अपने-अपने ढंग से भारत के लोगों को अपने वैभवशाली अतीत का स्मरण करने और अशिक्षा, अज्ञान तथा मानसिक दासता से मुक्त होने का आह्वान करती हैं।</p> <p>यह ‘मुसद्दस-ए-हाली’ का प्रामाणिक पाठ है जिसे हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने सम्पादित किया है। दस्तावेज़ी महत्त्व की इस प्रस्तुति में प्रयास किया गया है कि मुसद्दस के मूल पाठ के साथ-साथ इसकी पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक महत्ता भी पाठकों के सामने मौजूद रहे। यह काम करता है कवियों के कवि कहे जानेवाले शमशेर बहादुर सिंह का एक महत्त्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने ‘भारत भारती’ और ‘मुसद्दस-ए-हाली’ को साथ-साथ पढ़ते हुए लिखा था। हाली द्वारा लिखी गईं पहले और दूसरे संस्करणों की भूमिकाओं का लिप्यन्तरण भी इसमें शामिल है।
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‘मुसद्दस’ के काव्यात्मक पक्ष पर टिप्पणी करते हुए शमशेर कहते हैं : ‘उसका संगठन अद्भुत रूप से पुष्ट जान पड़ता है। कोई एक भाव बिलकुल उसी रूप में दोहराया नहीं गया। पूरी कविता की लड़ियाँ आपस में इस तरह गुँथी हुई हैं कि अगर एक को भी तोड़कर अलग करें तो पूरी कविता का सौन्दर्य उसी परिणाम में टूटता और बिखरता है।’</p>
<p>‘मुसद्दस-ए-हाली’ की रचना 1879 में उस समय हुई जब भारतीय समाज 1857 के विद्रोह में पराजित होने के बाद पस्ती और हताशा के दौर से गुज़र रहा था। ख़ास तौर पर भारतीय मुस्लिम समाज। मौलाना अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ ने इसकी रचना सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर क़ौम को इस हालात से जगाने के लिए की। इस कृति की अहमियत का अनुमान सर सैयद के इस कथन से लगाया जा सकता है कि ‘अगर ख़ुदा ने मुझसे पूछा कि दुनिया में तुमने क्या किया तो मैं जवाब दूँगा कि मैंने हाली से ‘मुसद्दस-ए-हाली’ लिखवाई।’</p>
<p>इसी से प्रेरित होकर मैथिलीशरण गुप्त ने हिन्दू समाज को ध्यान में रखकर अपनी प्रसिद्ध कृति ‘भारत भारती’ की रचना की जो 1913 में प्रकाशित हुई। दोनों ही रचनाएँ अपने-अपने ढंग से भारत के लोगों को अपने वैभवशाली अतीत का स्मरण करने और अशिक्षा, अज्ञान तथा मानसिक दासता से मुक्त होने का आह्वान करती हैं।</p>
<p>यह ‘मुसद्दस-ए-हाली’ का प्रामाणिक पाठ है जिसे हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने सम्पादित किया है। दस्तावेज़ी महत्त्व की इस प्रस्तुति में प्रयास किया गया है कि मुसद्दस के मूल पाठ के साथ-साथ इसकी पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक महत्ता भी पाठकों के सामने मौजूद रहे। यह काम करता है कवियों के कवि कहे जानेवाले शमशेर बहादुर सिंह का एक महत्त्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने ‘भारत भारती’ और ‘मुसद्दस-ए-हाली’ को साथ-साथ पढ़ते हुए लिखा था। हाली द्वारा लिखी गईं पहले और दूसरे संस्करणों की भूमिकाओं का लिप्यन्तरण भी इसमें शामिल है।
Book Details
-
ISBN9789392757624
-
Pages159
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘कुठाँव’ में स्त्री और पुरुष का, प्रेम और वासना का, हिन्दू और मुसलमान का और ऊँची-नीची जातियों का एक भीषण परिदृश्य रचा गया है। अब्दुल बिस्मिल्लाह समाज और विशेष रूप से मुस्लिम समाज की आन्तरिक विडम्बनाओं और विसंगतियों को बख़ूबी चित्रित करते रहे हैं। इस उपन्यास में मेहतर समाज की मुसलमान औरत इद्दन और उसकी बेटी सितारा है जो ऊँची जाति के, पैसेवाले मुस्लिम मर्दों से लोहा लेती हैं। स्त्री और पुरुष के और भी आमने-सामने के कई समीकरण यहाँ रचे गए हैं और यौन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करके अपनी सामाजिक और मर्दाना प्रतिष्ठा को द्विगुणित करने के कुप्रयासों का भी निर्दयतापूर्वक भंडाफोड़ किया गया है। यह प्रश्न कि सदियों से ताक़त के क़िस्म-क़िस्म के चौखटों में जकड़ी, लड़ती-भिड़ती और जीतती-हारती औरतों के लिए आख़िर मुक्ति की राह कहाँ है? इस सन्दर्भ में उपन्यास सपनों की अनन्त उड़ानों पर विराम लेता है। हम जान पाते हैं कि ये सपने ही हैं जो उन्हें अन्तत: मुक्ति की मंज़िल तक ले जाएँगे। तब न कोई अपनी दैहिक ताक़त से उन्हें परास्त कर पाएगा, न सामाजिक ताक़त से।
Jheeni-Jheeni Beeni Chadariya
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Abdul Bismillah
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बनारस के साड़ी-बुनकरों पर केन्द्रित अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास हिन्दी कथा-साहित्य में एक नये अनुभव-संसार को मूर्त करता है और इस अनुभव-संसार में साड़ी-बुनकरों की जिस अभावग्रस्त और रोग-जर्जर दुनिया में हम मतीन, अलीमुन और नन्हें इक़बाल के सहारे प्रवेश करते हैं, वहाँ मौजूद हैं रऊफ चचा, नजबुनिया, नसीबुन बुआ, रेहाना, कमरुन, लतीफ, बशीर और अल्ताफ़ जैसे अनेक लोग, जो टूटते हुए भी साबुत हैं–हालात से समझौता नहीं करते, बल्कि उनसे लड़ना और उन्हें बदलना चाहते हैं और अन्ततः अपनी इस चाहत को जनाधिकारों के प्रति जागरूक अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि इक़बाल को सौंप देते हैं। इस प्रक्रिया में लेखक ने शोषण के उस पूरे तंत्र को भी बारीकी से बेनकाब किया है जिसमें एक छोर पर है गिरस्ता और कोठीवाल, तो दूसरे छोर पर भ्रष्ट राजनीतिक हथकंडे और सरकार की तथाकथित कल्याणकारी योजनाएँ। साथ ही उसने बुनकर-बिरादरी के आर्थिक शोषण में सहायक उसी की अस्वस्थ परम्पराओं, सामाजिक कुरीतियों, मजहबी जड़वाद और साम्प्रदायिक नज़रिये को भी अनदेखा नहीं किया है।
Taki Sanad Rahe
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Abdul Bismillah
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अब्दुल बिस्मिल्लाह उस जीवन-यथार्थ के कहानीकार हैं, जहाँ छोटी-से-छोटी इच्छा पूरी करने के लिए अथक संघर्ष करना पड़ता है। इस जीवन को व्यापक सामाजिकता के कुलीन विवरणों के बीच पहचानना एक दृष्टि-सम्पन्न रचनाकार का ही काम है। हाशिए पर चल रही सक्रियताओं को रचनाशीलता के केन्द्र में प्रतिष्ठित करते हुए अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपनी कहानियों को आकार दिया है।
‘ताकि सनद रहे’ अब्दुल बिस्मिल्लाह के चार कहानी-संग्रहों—'रैन बसेरा', ‘कितने-कितने सवाल’, ‘टूटा हुआ पंख’ और ‘ज़ीनिया के फूल’ में शामिल रचनाओं का समग्र है। इनमें से बहुत सारी कहानियाँ पाठकों व आलोचकों के बीच चर्चित हो चुकी हैं।
यदि हम मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के जीवन का समकालीन यथार्थ पहचानना चाहते हैं तो इन कहानियों में क़दम-क़दम पर ठहरकर हमें ग़ौर से देखना होगा। लेखक ने सामाजिक विकास की आलोचना इस तरह की है कि स्थितियों को जीनेवाले चरित्र पाठक की संवेदना का हिस्सा बन जाते हैं। अलग से यह घोषित करने की ज़रूरत नहीं कि लेखक की प्रतिबद्धता क्या है और उसके सरोकार क्या हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह की भाषा पारदर्शी है। सहज और अर्थ की त्वरा से भरी। इस सहजता की अन्विति कई बार ऐसे होती है, ‘नाले के इस पार सड़क थी और उस पार जंगल। उन दिनों जंगल का रंग इस क़दर हरा हो गया था कि वह हमेशा काले बादलों में डूबा हुआ नज़र आता था। वहाँ जो एक छोटी-सी, ऊँची-नुकीली पहाड़ी थी, वह घास के ताजिए की तरह लगती थी। उस जंगल में शाजा, सलई, धवा, हर्रा, पलाश, कुसुम और जामुन के पेड़ कसरत से भरे हुए थे। उन दिनों कुसुम के फल तो झड़कर ख़तम हो गए थे, पर जामुन अभी बचे हुए थे। हवा चलती तो काले-काले जामुन भद-भद नीचे गिरते और ऐसा लगता मानो प्यार के रस में डूबी हुई आँखें टपकी पड़ रही हों।'
वस्तुतः इन कहानियों को समग्रता में पढ़ना परिचित परिवेश में भी अप्रत्याशित यथार्थ से साक्षात्कार करने सरीखा है।
Shaadi ka Joker
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Abdul Bismillah
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‘शादी का जोकर’ वरिष्ठ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह का महत्त्वपूर्ण कहानी-संग्रह है। इस संग्रह में सत्रह कहानियाँ हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपनी रचनाशीलता का प्रस्थान व्यापक सामाजिक सरोकारों से निर्मित किया था। उपन्यासों और कहानियों की सार्थक व यशस्वी रचना-यात्रा करने के बाद उनमें नई तरह की सादगी जगमगाने लगी है।
प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ सक्रिय शब्दों में व्यक्त हुई हैं। लेखक ने आम ज़िन्दगी से झाँकती परेशानी, पशेमानी और कशमकश से इन कहानियों के सूत्र सहेजे हैं। पहली ही कहानी ‘ख़ून' रिश्तों की हिफ़ाज़त करनेवाले शख़्स और बेमुरव्वत दुनिया की दास्तान है। 'त्राहिमाम', 'कैलेंडर', ‘महामारी’, ‘तीसरी औरत’ सरीखी रचनाएँ रेखांकित करती हैं कि पठनीयता और सार्थकता की सहभागिता से स्मरणीय का जन्म होता है।
यह उल्लेखनीय है कि एक नैतिक निष्कपट क़िस्सागोई अब्दुल बिस्मिल्लाह की पहचान है। सामाजिक अविश्वास और उत्पीड़न के प्रसंग को 'शादी का जोकर' में अद्भुत अभिव्यक्ति मिली है। बारिश होने पर गाँव की बरात में आए दिल्ली के कला रसिकों का भागना और कला की दशा का बखान ‘तूफ़ानी पहलवान’ के इन शब्दों में है—‘अब सिर्फ़ बच गई अमराई में दोनों चारपाइयाँ, जो भीगती रहीं उस धारासार वर्षा में और आम के तने से चिपटे खड़े रहे तूफ़ानी पहलवान हाथ जोड़े। भीगती रही काँधे से लटकी उनकी ढोलक और उसकी डोरियों से टपकता रहा बूँद-बूँद पानी टप्प-टप्प...।'
ज़ाहिर है कि 'शादी का जोकर' एक उल्लेखनीय कहानी-संग्रह है। कथा-रस के साथ समकालीन सभ्यता में व्याप्त असमंजस की अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है।
Mukhara Kya Dekhe
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Abdul Bismillah
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‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986) के प्रकाशन के ठीक दस वर्षों बाद आनेवाला अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास अपनी महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ एक ऐसे मुखड़े का रहस्योद्घाटन कर रहा है जो बाहर से बहुत भव्य है, पर भीतर से अत्यन्त कुरूप। ‘मुखड़ा क्या देखे’ की कथा भारतीय स्वाधीनता के कुछ बाद से लेकर इमरजेंसी तक फैली हुई है। इस पूरे दौर में देश के भीतर घटित सारी घटनाओं की छाप ग्रामीण जीवन पर किस रूप में पड़ी, उपन्यास की नींव इसी प्रश्न पर डाली गई है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि देश-दुनिया में घटनेवाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार जिस रूप में देखते हैं, गाँव के सामान्य लोग उसी रूप में नहीं देखते। उनके विचार और निष्कर्ष भले ही ग़लत होते हों, पर होते हैं ठोस। निस्सन्देह ‘मुखड़ा क्या देखे’ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय इतिहास के अनेक बिन्दुओं की ऐसी व्याख्या है, जो इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलेगी।
‘मुखड़ा क्या देखे’ उपन्यास किसी विशेष गाँव या विशेष पात्रों की कथा न होकर सामान्य भारतीय जनमानस की कथा है। इस उपन्यास को बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समाज की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। भारतवर्ष बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषायी देश है। हिन्दी में ऐसे अनेक उपन्यास आए हैं, जो या तो बहुसंख्यक समाज की कहानी कहते हैं या फिर अल्पसंख्यक समाज की, लेकिन ‘मुखड़ा क्या देखे’ समग्र भारतीय समाज की कहानी कहता है, जिसमें सम्पन्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर हिन्दू ‘परजा’ और मुसलमान ‘परजा’ का शोषण करते हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस विषय पर लिखते हैं, उसमें आकंठ डूब जाते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने मुसलमान रीति-रिवाज़ों का चित्रण किया है, उसी प्रामाणिकता के साथ हिन्दू और ईसाई समुदाय के रीति-रिवाज़ों का भी। अर्थात् पिछले बीस वर्षों में आए हिन्दी उपन्यासों में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हिन्दी में लिखा गया यह उपन्यास समूचे भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अन्तर्वस्तु और शिल्प पर ठेठ देसी रंगों एवं संस्कारों की गहरी छाप है।
Zaharbaad
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Abdul Bismillah
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‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के प्रख्यात रचनाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास प्रकाशन-क्रम की दृष्टि से तीसरा किन्तु लेखन-क्रम से पहला है। इसकी कथाभूमि मध्य प्रदेश के एक पूर्वी छोर पर स्थित मंडला अंचल है। वहाँ के ग्रामीण परिवेश में रचे गए इस उपन्यास में ऐसे चरित्रों का निरूपण हुआ है जो आज़ाद हिन्दुस्तान की बड़ी-बड़ी विकास योजनाओं से एकदम अछूते और अपरिचित हैं और ग़रीबी की रेखा के बहुत नीचे का जीवन जी रहे हैं। उनके माध्यम से लेखक ने समाज की विसंगतियों, वर्जनाओं और दारुण विषमताओं को मार्मिक ढंग से उकेरा है। संक्षेप में कहें तो यह उपन्यास रोज़-रोज़ मरकर जीनेवाले अनगिनत पति-पत्नियों, पुत्रों और प्रेमी-प्रेमिकाओं की, उनके दुःख-दर्द की ऐतिहासिक महागाथा है। साथ ही लेखक ने ग्रामीण परिवेश का चित्रण इतनी सशक्त भाषा में किया है कि वह सब आँखों के सामने से गुज़रता हुआ प्रतीत होता है। संवादों में मंडला की बोली के प्रयोग ने पात्रों को सम्भव और विश्वसनीय बनाया है।
Gausevak
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Abdul Bismillah +1
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नक्सल प्रभावित एक आदिवासी इलाक़े में विकास का मिथ, नक्सलियों और पुलिस-प्रशासन के बीच पिसते आदिवासी, लगातार मौत को अपने सामने देखते नाउम्मीद जीवन का अवसरवाद जो गौरक्षा की राजनीति करनेवाली एक पार्टी के लिए बहुत उर्वर ज़मीन तैयार करता है, और इन सबके बीच गाय की तस्करी करनेवाले एक गौसेवक आदिवासी नेता के टिकट पाने का जुगाड़...आदिवासी जीवन के संकटों का बयान करनेवाली मुद्रा से अनछुई यह कहानी संकटों के गतिविज्ञान में आपको गहरे ले जाती है, और मज़ा यह कि जाते हुए आपको लेखक के शोध/तजुर्बे से आतंकित/प्रभावित होने की याद भी नहीं रहती! आपको याद बस इतना रहता है कि आप ‘धामा चेरो’ नामक एक गौसेवक आदिवासी नेता की कहानी सुन रहे हैं जिसने कई और गोरखधंधों के साथ-साथ गौतस्करी से अच्छी कमाई की है और जो पिछली बार विफल रहने के बाद इस बार टिकट पाने के लिए कृतसंकल्प है। अनिल यादव की बारीक निगाह और कथाभाषा उनकी ख़ास पहचान है। वे चीज़ों को जिस तरह देखते हैं, उसमें निगाहें हर अवगुंठन को पार कर जाती हैं और 'दृश्य' के भीतर का 'अदृश्य' दिखने लगता है। इसी देखने से इस कहानीकार की ख़ास अपनी कथाभाषा जन्मी है। हिन्दी के युवा/लगभग-युवा कथाकारों में सम्भवतः अनिल यादव ही हैं जिन्हें, अब, कथाभाषा से पहचाना जा सकता है। यह उन्होंने क्रमशः अर्जित की है और 'गौसेवक' में यह अपनी पकी हुई पहचान के साथ है।
—संजीव कुमार
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