Pratinidhi Shairy : Mirza Rafi 'Sauda'
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मीर तक़ी <strong>‘</strong>मीर<strong>’ </strong>के समकालीन मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी <strong>‘</strong>सौदा<strong>’ </strong>18वीं सदी के चार प्रमुख उर्दू शायरों में गिने जाते हैं। आम तौर पर सौदा को क़सीदे का शायर समझा जाता है<strong>, </strong>और इसमें कोई शक नहीं कि<strong>, </strong>सौदा के कुछेक क़सीदे ग़ज़ब के हैं। लेकिन सच बात यह है कि सौदा को इस रूप में पेश करना उनके साथ नाइंसाफ़ी से कुछ कम नहीं है। अपनी हज्वियाती नज़्मों (निन्दा-काव्यों) में और अपने शह्र-आशोवों में सौदा का हमें एक और ही रूप दिखाई देता है जो न तो उनके क़सीदों में नज़र आता है और न उनकी ग़ज़लों में। इन हज्वियाती नज़्मों और शह्र-आशोवों में सौदा अपने वक़्त की कड़वी सामाजिक सच्चाइयों के बारे में<strong>, </strong>18वीं सदी की पतनशील सामन्ती सभ्यता के बारे में जिस स्पष्ट दृष्टि का परिचय देते हैं<strong>, </strong>वैसी दृष्टि उनके किसी भी अग्रज या समकालीन शायर के यहाँ नहीं दिखाई देती। मीर और दर्द के यहाँ भी नहीं। इसमें शक नहीं कि सौदा ख़ुद इस सामन्ती संस्कृति से जुड़े हुए रहे और इसीलिए इसके पतन से उनका प्रभावित होना स्वाभाविक था<strong>, </strong>उनका अफ़सोस करना भी उतना ही स्वाभाविक था। लेकिन सौदा इस पतनशील संस्कृति का मातम ही नहीं करते<strong>, </strong>बढ़-चढ़कर उन लोगों पर चोटें करते हैं<strong>, </strong>उनकी क़लई खोलते हैं जो इस पतन के लिए ज़िम्मेदार थे। इस सिलसिले में सौदा ने जादू-बयानी का जो परिचय दिया है<strong>, </strong>वह अपनी मिसाल आप है।</p> <p>अकसर आलोचकों ने मीर और सौदा के तुलनात्मक अध्ययन के प्रयास किए हैं<strong>, </strong>और यह नतीजा निकाला है कि मीर सौदा से कोसों आगे हैं। आलोचकों की इस राय में बहुत कुछ सच्चाई है। ख़ासकर ग़ज़लों में जहाँ मीर का अन्दाज़े-बयाँ दिल को छू लेने की हैसियत रखता है<strong>, </strong>वहीं सौदा का अन्दाज़े-बयाँ ज़्यादातर भाषा के खिलवाड़ों तक सीमित रहता है। फिर भी इसमें शक नहीं कि सौदा को कुछ कम करके आँकना ग़लत होगा<strong>—</strong>ख़ासकर हजो और शह्र-आशोब जैसी विधाओं में उनका कोई जवाब नहीं है। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में कहें तो सौदा हिन्द के शायरों के पैग़म्बर तो नहीं हैं लेकिन सुख़न कहने में उन्हें एज़ाज़ ज़रूर हासिल है।
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मीर तक़ी <strong>‘</strong>मीर<strong>’ </strong>के समकालीन मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी <strong>‘</strong>सौदा<strong>’ </strong>18वीं सदी के चार प्रमुख उर्दू शायरों में गिने जाते हैं। आम तौर पर सौदा को क़सीदे का शायर समझा जाता है<strong>, </strong>और इसमें कोई शक नहीं कि<strong>, </strong>सौदा के कुछेक क़सीदे ग़ज़ब के हैं। लेकिन सच बात यह है कि सौदा को इस रूप में पेश करना उनके साथ नाइंसाफ़ी से कुछ कम नहीं है। अपनी हज्वियाती नज़्मों (निन्दा-काव्यों) में और अपने शह्र-आशोवों में सौदा का हमें एक और ही रूप दिखाई देता है जो न तो उनके क़सीदों में नज़र आता है और न उनकी ग़ज़लों में। इन हज्वियाती नज़्मों और शह्र-आशोवों में सौदा अपने वक़्त की कड़वी सामाजिक सच्चाइयों के बारे में<strong>, </strong>18वीं सदी की पतनशील सामन्ती सभ्यता के बारे में जिस स्पष्ट दृष्टि का परिचय देते हैं<strong>, </strong>वैसी दृष्टि उनके किसी भी अग्रज या समकालीन शायर के यहाँ नहीं दिखाई देती। मीर और दर्द के यहाँ भी नहीं। इसमें शक नहीं कि सौदा ख़ुद इस सामन्ती संस्कृति से जुड़े हुए रहे और इसीलिए इसके पतन से उनका प्रभावित होना स्वाभाविक था<strong>, </strong>उनका अफ़सोस करना भी उतना ही स्वाभाविक था। लेकिन सौदा इस पतनशील संस्कृति का मातम ही नहीं करते<strong>, </strong>बढ़-चढ़कर उन लोगों पर चोटें करते हैं<strong>, </strong>उनकी क़लई खोलते हैं जो इस पतन के लिए ज़िम्मेदार थे। इस सिलसिले में सौदा ने जादू-बयानी का जो परिचय दिया है<strong>, </strong>वह अपनी मिसाल आप है।</p>
<p>अकसर आलोचकों ने मीर और सौदा के तुलनात्मक अध्ययन के प्रयास किए हैं<strong>, </strong>और यह नतीजा निकाला है कि मीर सौदा से कोसों आगे हैं। आलोचकों की इस राय में बहुत कुछ सच्चाई है। ख़ासकर ग़ज़लों में जहाँ मीर का अन्दाज़े-बयाँ दिल को छू लेने की हैसियत रखता है<strong>, </strong>वहीं सौदा का अन्दाज़े-बयाँ ज़्यादातर भाषा के खिलवाड़ों तक सीमित रहता है। फिर भी इसमें शक नहीं कि सौदा को कुछ कम करके आँकना ग़लत होगा<strong>—</strong>ख़ासकर हजो और शह्र-आशोब जैसी विधाओं में उनका कोई जवाब नहीं है। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में कहें तो सौदा हिन्द के शायरों के पैग़म्बर तो नहीं हैं लेकिन सुख़न कहने में उन्हें एज़ाज़ ज़रूर हासिल है।
Book Details
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ISBN9788171197156
-
Pages188
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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दिलचस्प, चौंकानेवाला और दूरगामी विकास कर रही थी। उनकी शुरुआती विस्फोटक कविताओं के केन्द्र में जो इनसानी क़दरें थीं, वे ही परिष्कृत और सम्पृक्त होती हुई उनकी ‘किसने बचाया मेरी आत्मा को’, ‘एक ज़माने की कविता’, ‘कपड़े के जूते’ तथा ‘भूखा बच्चा’ जैसी मार्मिक रचनाओं में प्रवेश कर गईं। यों तो आलोकधन्वा हिन्दी के उन कुछ कवियों में से एक हैं जिनकी काव्य-दृष्टि तथा अभिव्यक्ति हमेशा युवा रहती हैं (और इसलिए वे युवतर कवियों के आदर तथा आदर्श बने रहते हैं), किन्तु लगभग अलक्षित ढंग से उन्होंने क्रमशः ऐसी प्रौढ़ता प्राप्त की है जो सायास और ओढ़ी हुई नहीं है और बुज़ुर्गियत की मुद्रा से अलग है। विषय-वस्तु, शिल्प, शैली तथा रुझानों में एक साथ सातत्य तथा विकास, सरलता तथा जटिलता, ताज़गी और परिपक्वता देखनी हों तो ‘छतों पर लड़कियाँ’, ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ को इसी क्रम में पढ़ना दिलचस्प होगा जिनमें भारतीय किशोरियों/स्त्रियों के स्निग्ध और त्रासद जीवन-सोपान तो हैं ही, आलोकधन्वा के कवि-जीवन तथा काव्य-चेतना के अग्रसर चरण भी साफ़ नज़र आते हैं।
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आलोकधन्वा ने शुरू नागार्जुन की परम्परा में किया था और जहाँ वे आज खड़े हैं वह नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह की मिली-जुली ज़मीन लगती है जिसे उन्होंने दोनों वरिष्ठों की अलग-अलग उर्वरता से आगाह रहते हुए अपने समय और काव्य-समझ के मुताबिक़ अपने लिए तैयार किया है। आलोकधन्वा में एक वैश्विक तथा भारतीय दृष्टि तो हमेशा से थी, धीरे-धीरे वह अपने आसपास के तथा व्यापक सचराचर पर भी गई। हम कह सकते हैं कि यदि पहले वे मात्र सिंहावलोकन के कवि थे तो अब उनकी निगाह चीज़ों और ब्योरों में भी जाती है और उनके ज़रिए वे आदमी और व्यक्ति होने के गहरे एहसास तक पहुँचते हैं और उसे अपनी कविता में चरितार्थ करते हैं। उनके काव्य-संसार में अब इनसान और इनसानी सरोकार तो हैं ही, पेड़, पगडंडी, पतंग, पानी, रास्ते, रातें, सूर्यास्त, हवाएँ, बिकरियाँ, पक्षी, समुद्र, तारे, चाँद भी हैं। वे पगडंडी, चौक, रेल जंक्शन से निजी और सार्वजनिक दुनिया में पहुँचते हैं, थियेटर, मैटिनी शो और पहली फ़िल्म की रोशनी में स्मृतियों में जाकर अपनी संवेदना तथा सृजनशीलता के स्रोत खोजते-पाते हैं और समुद्र की आवाज़ उनके लिए किसी रहस्यमय अनादि-अनन्त की नहीं, आन्दोलन और गहराई की है। अति-मुखरता के लिए तो इसमें अवकाश ही नहीं है, आविष्ट भावातिरेक से भी वे अपनी ऐसी कविताओं में बचे हैं। आलोकधन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तराशी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है जिनमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है और तब ‘शरद की रातें/इतनी हलकी और खुली/जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक/जैसे इन शामों की रातें होंगी/किसी और मौसम में’ या ‘समुद्र मुझे ले चला उस दोपहर में/जब पुकारना भी नहीं आता था/जब रोना ही पुकारना था’ सरीखी क्लासिकी रंगत की पंक्तियाँ प्राप्त होती हैं। यह अकारण नहीं है कि कवि मीर का ज़िक्र करता है। आलोकधन्वा ‘जो घट रहा है’ उसके कवि थे और रहेंगे लेकिन अब उसके भी प्रवक्ता हैं जिसका ‘होना’ सामान्यतः नहीं माना-पहचाना जाता। उन्हें उम्मीद है कि ‘कभी लिखेंगे कवि इसी देश में/इन्हें भी घटनाओं की तरह’ जबकि सच यह है कि वे स्वयं उस सबको घटना बनाने की क्षमता प्राप्त कर चुके हैं जो निश्चेष्ट, अमूर्त तथा अचल लगता है। चेतन में चेतना तो सभी देख लेते हैं, उसके साथ जड़ में चैतन्य को स्थापित कर पाना आलोकधन्वा जैसे अनन्य, दुस्साहसी सर्जक के बूते की ही बात है जो इस प्रक्रिया में अपनी प्रतिबद्धता को सम्पूर्ण बनाने की राह पर अग्रगामी नज़र आता है।
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Description:
छोटी और कुछ बहुत ही छोटी इन कविताओं का उत्स जीवन के हाशियों पर दूब की तरह उगते, पलते और झड़ जाते दु:खों के भीतर है—इसका अहसास आपको एक-एक कविता से गुज़रते हुए धीरे-धीरे होता है। धीरे-धीरे आप जानने लगते हैं कि किस कविता की किस पंक्ति में दरअसल कितनी बड़ी एक टीस को छिपाकर गूँथ दिया गया है।
'घर की उम्र के लिए/एक पूरा आदमी/टुकड़े-टुकड़े बँटकर/थामता है/हर कोना/...घर की उम्र के लिए/बिखर कर मर जाता है/एक पूरा आदमी।’ घर यहाँ दरअसल एक व्यवस्था का, एक स्थिर सुरक्षा का और सरल शब्दों में कहें तो उस दुनियादारी का प्रतीक है, जिसकी तरफ़ एक व्यक्ति जीवन-भर खिंचकर आता है तो उतने ही वेग से उससे दूर भी जाता है। भीतर और बाहर की इसी खींचतान के अलग-अलग बिन्दुओं से उपजी बेचैन मगर बहुत गहरे में हमें अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति का शान्त आधार उपलब्ध करानेवाली ये कविताएँ इसी अर्थ में विशिष्ट हैं कि ये हमें अपनी सादगी से अपने बहुत नज़दीक बुलाकर हमारा दु:ख सोखती हैं। भाव-बोध के आधार पर संग्रह की कविताओं को चार खंडों में समायोजित किया गया है। पहला है 'पगडंडी’ जिसमें ग्रामीण जीवन और परिवेश में बसे, बनते-बिगड़ते-बदलते रिश्तों और रूपाकारों को सहेजने-समेटने की संवेदन-यात्रा समाहित है। दूसरे खंड 'अलाव’ में अपने अस्तित्व के इर्द-गिर्द बुनी आँच और उसकी लपटों को पकडऩे, चित्रित करने की बारीक लेकिन सुदृढ़ बुनाई है। 'आरोह-अवरोह’ में घर, रिश्तों और कचहरी में फैले आहत तन्तुओं को गहरी-तीखी रंगत में उकेरा गया है। और, चौथे खंड 'मध्यान्तर के बाद’ में पुन: जीवन की जड़ों को खोलकर- खोदकर देखने की कोशिश की गई है जो हमारी सवंदेना-यात्रा को वापस जीवन में आरम्भ से जोड़ देती है।
'पत्थरों को संवेदना देती है/उनकी दरारों में दबी मिट्टी/जहाँ उग आती है दूब/चट्टानों के अस्तित्व को ललकारती।’ ये कविताएँ दरअसल जीवन की कठोर, पथरीली चट्टानों के बीच बची मिट्टी में उगी कविताएँ हैं; जिनमें हम अपने दग्ध वजूद को कुछ देर भीनी-भीनी ठंडक से भर सकते हैं।
Yuddh Mein Jeevan
- Author Name:
Pratibha Chauhan
- Book Type:

-
Description:
‘...क्योंकि जितना सह लेता है आदमी/उतना लिख नहीं पाता’
‘युद्ध में जीवन’ सत्ताधारियों की उन महत्त्वाकांक्षाओं पर एक टिप्पणी है जिनसे युद्ध जन्म लेते हैं और मानवता के सदियों से सँजोए, फलते-फूलते स्वप्न पल-भर में ध्वस्त हो जाते हैं। अपने समय की जीवन-विरोधी मुद्राओं को बहुत गम्भीरता और जिम्मेदारी से समझने वाली कवि प्रतिभा चौहान के इस नए संग्रह का आरम्भ उन्हीं कविताओं से होता है जिनका विषय युद्ध है।
युद्ध उन्हें व्यथित करता है, दुख से भर देता है, लेकिन वे हताश नहीं होतीं। उनका कवि-मन जानता है कि तथाकथित विजेताओं का ख़बरची जब बताता है कि सरहद के उस पार सब ख़त्म हो चुका है, तब भी कोई बच्चा जिसके दोनों हाथ युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं, पानी में गिरी एक चींटी को बचाने की कोशिश में लगा रहता है—युद्ध से अप्रभावित, परे व शुद्ध।
‘युद्ध में जीवन’ का एक अर्थ यह भी है। जीवन जिसमें प्रेम होता है, रोज़मर्रा के संघर्ष होते हैं, प्रकृति के अनेक-अनेक रंग होते हैं—कभी डरावने, कभी दिलफ़रेब, लेकिन फिर भी उस युद्ध से बेहतर जिसका हासिल सिर्फ़ शून्य होता है।
संग्रह में कुछ कविताएँ जीवन के निजी और नम अहसासों की ओर भी इशारा करती हैं जिन्हें हम अपनी इच्छाओं, कामनाओं और उदासियों के बीच सँजोते जाते हैं। कुछ अनुभव, कुछ सबक, कुछ दुख जब कितने हवाओं के झोंके प्यासे ही लौट जाते हैं। एक अनकहे चश्मे की तलाश में और वह प्रेम जो मुझे लिखता रहा / और मिटाता रहा / लिखने और मिटाने के क्रम में / उसने मुझे ग्रन्थ बना दिया।
ऐसी ही काव्यात्मक अभिव्यक्तियों और याद रह जानेवाली कविताओं का संग्रह है ‘युद्ध में जीवन’!
Beautiful Poem (Series-3)
- Author Name:
Dr.Sanjay Rout
- Book Type:

- Description: This book is not just a collection of poems, but it is also a platform for young artists to showcase their talent. The beauty and grace of these poems will touch the hearts of readers, who are sure to appreciate the sense of optimism and pride that these young writers have imbibed in their words.
Ek Parityakt Pul Ka Sapna
- Author Name:
Saumya Malviya
- Book Type:

- Description: ये कविताएँ बीते दो-एक दशकों में उपजी बेचैनियों और निराशाओं को स्वर देने का प्रयास करती हैं। वक़्त की चोट को शब्दों में महसूसना चोट पर मरहम का ही काम नहीं करता, बल्कि उसे ज़िन्दा भी रखता है। यह संग्रह अपने ज़ख़्मों के प्रति उत्तरदायी बने रहने की अपील करता हुआ, उनके भरने की उम्मीद की व्यर्थ और अश्लील सकारात्मकता से मुक्त उम्मीद भी करता है। जैसे-जैसे इस दौर की अलामतें हम पर नुमायाँ हुई हैं, कविता, विचार और संवेदना में भ्रम और कुहासा बढ़ा है। दृश्य के धुँधलाने के साथ दृष्टि भी क्षीण होती-सी महसूस हुई है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ इस सन्दर्भ में दृष्टि की खोज भी हैं और उसके थिर और स्पष्ट बने रहने की टॉर्च भी। हालाँकि इन कविताओं में रोशनी की दिशोन्मुखता नहीं, आग की दहनप्रियता अधिक है और इस जलने में केवल सन्ताप नहीं, प्रतिदिन की, सम्बन्धों की, स्थितियों और संघर्षों की ऊष्मा भी है जो जीवन को ठंडेपन से दूर रखते हुए जीवन्त-जाग्रत बनाए रखती है। शिल्प और भाषा के स्तर पर अपने को परस्पर काटते हुए प्रयोग भी उस विकलता को अपने में विन्यस्त करते हैं जो अन्तर्वस्तु की ज़मीन पर जगह-जगह उद्घाटित हुई है। इन कविताओं में एक कवि की यात्रा भी है जो गणित, विज्ञान, दर्शन और समाजशास्त्र की गलियों में भटकती हुई बार-बार कविता के दयार पर लौटती है। ये लौटना ही उसका अरमान भी है और उसका निकष भी। नतीजन इनमें जो धधक रहा है, कई पाँवों का चक्कर, कई हाथों की दुआ है जो हर बार कविता पर आकर ख़त्म होती है। इसलिए तमाम उत्कंठाओं और व्याकुलताओं के बाद भी इन कविताओं में एक बसेरापन भी है और अपनी जगह की ठसक भी।
Dard Aashob
- Author Name:
Ahmed Faraz
- Book Type:

- Description: आज फिर करते हो किस ज़ोम प’ ज़ख़्मों का शुमार सरफिरो! वादी-ए-पुरख़ार में ये तो होगा क्यूँ निगाहों में है अफ़सुर्दा चराग़ों का धुवाँ आरज़ू-ए-लबो-रुख़्सार में ये तो होगा एक से एक कड़ी मंज़िले-जाँ आएगी रहगुज़ारे-तलबे-यार में ये तो होगा होंठ सिल जाएँ मगर जुरअते-इज़्हार रहे दिल की आवाज़ को मद्धम न करो दीवानो! ढल चुकी रात तो अब कुहर भी छट जाएगी अब भी उम्मीद की लौ कम न करो दीवानो! आँधियाँ आया ही करती हैं हरिक हब्स के बाद गुलशुदा शम्ओं का मातम न करो दीवानो!
Sandhyageet
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

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Description:
‘सांध्यगीत’ में कुछ स्फुट गीत संगृहीत हैं। ‘सांध्यगीत’ मेरी उस मानसिक स्थिति को व्यक्त कर सकेगा जिसमें अनायास ही मेरा हृदय सुख-दु:ख में सामंजस्य का अनुभव करने लगा। मेरे गीत मेरा आत्म-निवेदन मात्र है—इनके विषय में कुछ कह सकना मेरे लिए सम्भव नहीं है! इन्हें मैं अपने उपहार के योग्य अकिंचन भेंट के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानती।
—महादेवी वर्मा
Ek Samaya Tha
- Author Name:
Raghuvir Sahay
- Book Type:

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Description:
रघुवीर सहाय का यह अन्तिम कविता-संग्रह है हालाँकि उनका चरम दस्तावेज़ नहीं। ये बची-खुची कविताएँ नहीं हैं जिन्हें हम एक दिवंगत कवि के लिए उचित सहानुभूति से पढ़ें। ये ऐसी रचनाएँ भी नहीं हैं जिनमें किसी तरह की शक्ति या सजगता का अधेड़ छीजन दिखाई पड़े। आज़ादी, न्याय और समता के लिए रघुवीर सहाय का चौकन्ना संघर्ष इस संग्रह में उतना ही प्रखर है जितनी बेचैन है उनकी भाषा की तलाश—अमिधा के जीवन को अभिधा में व्यक्त करने की ज़िद ताकि अर्थान्तर के इस चतुर समय में उनकी बोली के दूसरे अर्थ न लग जाएँ। रघुवीर सहाय की जिजीविषा इस पूरे संग्रह के आर-पार स्पन्दित है : उसमें विषाद है पर निरुपायता नहीं। उसमें दुःख है पर हाथ पर हाथ धरे बैठी लाचारी नहीं। वे अभी जीना चाहते हैं—“कविता के लिए नहीं/कुछ करने के लिए कि मेरी सन्तान कुत्ते की मौत न मरे।”
कविता के दृश्यालेख में फिर बच्चों, लड़कियों, पत्नी, अधेड़ों, परिवार, लोगों आदि के चेहरे हैं। पर उन्हें इतिहास या विचारधारा के दारुयोषितों की तरह नहीं, बल्कि अपने संघर्ष, अपनी लाचारी या अपनी उम्मीद की झिलमिल में व्यक्तियों की तरह देखा-पहचाना गया है। कविता नैतिक बयान है—ऐसा जो अत्याचार और अन्याय की बहुत महीन-बारीक छायाओं को भी अनदेखे नहीं जाने देता, न ही अपनी शिरकत की शिनाख़्त करने में कभी और कहीं चूकता है। यहाँ नेकदिली या भलमनसाहत से उपजी या करुणा के चीकट में लिपटी अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि नैतिक संवेदना और ज़िम्मेदारी का बेबाक-अचूक, हालाँकि एकदम स्वाभाविक प्रस्फुटन है।
अत्याचार और ग़ैरबराबरी के ऐश्वर्य और वैभव के विरुद्ध यह कविता ज़िन्दगी की निपट साधारणता में भी प्रतिरोध और संघर्ष की असमाप्य मानवीय सम्भावना की कविता है। भाषा उनके यहाँ कौशल का नहीं, अपनी पूरी ऐन्द्रिकता में, नैतिक तलाश और आग्रह का हथियार है। बीसवीं शताब्दी के अन्त के निकट यह बात साफ़ देखी-पहचानी जा सकती है कि हिन्दी भाषा को उसका नैतिक संवेदन और मानव-सम्बन्धों की उसकी समझ देने में जिन लेखकों ने प्रमुख भूमिका निभाई है, उनमें रघुवीर सहाय का नाम बहुत ऊपर है। हिन्दी कविता की संरचना, सम्भावना और संवेदना की मौलिक रूप से बदलनेवाले कालजयी कवियों में निश्चय ही रघुवीर सहाय हैं : हिन्दी में गद्य को ऐसा विन्यास बहुत कम मिला है कि वह कविता हो जाए जैसा कि रघुवीर सहाय की कविता में इधर, और इस संग्रह में विपुलता से हुआ है।
अन्तिम चरण में रघुवीर सहाय की कविता पहले जैसी चित्रमय नहीं रही पर उसमें उनकी निरालंकार शैली में, मूर्तिमत्ता है—वह पारदर्शिता जो उनकी कविता की विशिष्टता रही है, अधिक उत्कट, सघन और तीक्ष्ण हुई है। भाववाची को, जैसे ग़ुलामी, रक्षा, मौक़ा, पराजय, उन्नति, नौकरी, योजना, मुठभेड़, इतिहास, इच्छा, आशा, मुआवज़ा, ख़तरा, मान्यता, भविष्य, ईर्ष्या, रहस्य आदि को, बिना किसी लालित्य या नाटकीयता का सहारा लिए, और निरे रोज़मर्रा को कुछ अलग ढंग से देखने की कोशिश में रघुवीर सहाय जैसा सच-ठोस-सजीव बनाते हैं, वह एक बार फिर सिद्ध करता है कि उनके यहाँ जीने की सघनता और शिल्प की सुघरता में कोई फाँक नहीं थी। कविता जीने का, इसके आशयों को आत्मसात् करने और सोचने का ढंग है—कविता जीवन का दर्शन या अन्वेषण या उसकी अभिव्यक्ति नहीं है—वह जीवन है उससे तदाकार है।
कविता अपने विचार बाहर से उधार नहीं लेती, बल्कि ख़ुद सोचती है, अपनी ही सहज-कठिन प्रक्रिया से अपना विचार अर्जित करती है—रघुवीर सहाय की कविताएँ कविता की वैचारिक सत्ता का बहुत सीधा और अकाट्य साक्ष्य हैं। हिन्दी के विचार-प्रमुख दौर में इस कविता-वैचारिकता का ऐतिहासिक महत्त्व है।
इस संग्रह में पहले के संग्रहों की छोड़ दी गई कुछ कविताएँ भी शामिल हैं और इस तरह यह संग्रह रघुवीर सहाय की कविता की यात्रा को पूर्ण करता है। अपनी मृत्यु के बाद भी रघुवीर सहाय लगातार तेजस्वी और विचारोत्तेजक उपस्थिति बने हुए हैं। उनका एक समय था पर आज ऐसे बहुत से हैं जो मानते हैं कि हिन्दी में सदा उनका समय रहेगा।
—अशोक वाजपेयी।
Vichitra
- Author Name:
Rajkamal Chaudhary
- Book Type:

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Description:
साँस–भर ज़िन्दगी, पेट–भर अन्न, लिप्सा–भर प्यार, लाज–भर वस्त्र, प्राण–भर सुरक्षा—अर्थात् तिनका–भर अभिलाषा की पूर्ति के लिए मनुष्य धरती के इस छोर से उस छोर तक बेतहाशा भागता और निरन्तर संघर्ष करता रहता है। जीवन और जीवन की इन्हीं आदिम आवश्यकताओं रोटी, सेक्स, सुरक्षा, प्रेम–प्रतिष्ठा–ऐश्वर्य, बल–बुद्धि–पराक्रम के इन्तज़ाम में जुटा रहता है। इसी इन्तज़ाम में कोई शेर और कोई भेड़िया हो जाता है, जो अपनी उपलब्धि के लिए दूसरों को खा जाता है, और कोई भेड़–बकरा, हिरण–ख़रगोश हो जाता है, जो शक्तिवानों के लिए उपकरण–भर होता है।
राजकमल चौधरी की कविताएँ मशीन और मशीनीकरण, पश्चिमी देशों और पश्चिमी व्यवसायों, संस्कृतियों से प्रभावित–संचालित आधुनिक भारतीय समाज और सभ्यता के इसी जीवन–संग्राम की अन्दरूनी कथा कहती हैं।
सन् 1950–1956 के बीच लिखी गई अप्रकाशित कविताओं का यह संकलन हमारे समाज की इन्हीं स्थितियों की जाँच–पड़ताल करता नज़र आता है। सुखानुभूति, जुगुप्सा और क्रोध इनकी तमाम रचनाओं से ये तीन परिणतियाँ पाठकों के सामने बार–बार आती हैं और ऐसा इस संकलन में भी है।
राजकमल की कविताओं में घटना और विषय के मुक़ाबले ‘शब्द’ बहुत अर्थ रखता है। ये ‘शब्द’ ही इन कविताओं को कहीं कविता की लयात्मकता में जलतरंग की ध्वनियों के साथ सुखानुभूति से भर देते हैं, कहीं सभ्य इनसान की ग़लीज़ हरकतों के कारण जुगुप्सा उत्पन्न करते हैं और कहीं देवताओं की दानवी प्रवृत्ति पर ज्वालामुखी फटने–सा क्रोध।
संकलन की हरेक कविता अपनी मौलिक ताज़गी और निजी गुणवत्ता के कारण भावकों, पाठकों से बहस करती है। भावकों के अन्दर सत्–असत् को लड़ाकर, सत् को विजय दिलाती है। राजकमल की कविता में यही विजय ‘शब्द’ की विजय है।
Ek Ta Herayal Duniya
- Author Name:
Krishna Mohan Jha
- Book Type:

- Description: Collection of Maithili Poems
Waqt Ka Main Lipik
- Author Name:
Yash Malviya
- Book Type:

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‘वक़्त का मैं लिपिक’ अपने समय से सीधे मुठभेड़ तो है ही, इसमें कवि की व्यक्तिगत पीड़ा भी अनुस्यूत है। उनके व्यक्तिगत जीवन में जो कुछ घटित हुआ है, उसी का प्रतिबिम्बन इसमें हुआ है और शायद ये गीत न होते तो वे बिखर गए होते, टूट गए होते, हिंस्र पशु हो गए होते, लेकिन इन गीतों ने उन्हें सहारा देकर मनुष्य बने रहने की ताक़त दी है।
यश स्वयं ही मानते हैं कि ये गीत, उनके लिए गीत नहीं उनके जीवन की तारीख़ें हैं। इनमें बाबरी मस्जिद का क़त्ल है तो गुजरात कांड के फफोले और छाले भी इनके बदन पर हैं। इन पर रोज़-रोज़ बलात्कार का शिकार होती सुबहों की पथरा गई चीख़ों का प्रतिरोध भी दर्ज़ है।
...एक रचनाकार अपने जीवन-संघर्ष में किन-किन मोड़ों से गुज़रता है, यह देखना हो तो यश मालवीय के इन गीतों से दो-चार हुआ जा सकता है।
वे अपने गीतों को नवगीत कहलवाना पसन्द करते हैं और मानते हैं कि ढेर सारी विडम्बनाओं के साथ तकनीक के कंट्रास्ट को साधने में नवगीतों की भूमिका ऐतिहासिक रही है। लेकिन उनका ज़ोर इस बात पर सदैव रहता है कि नवगीतों की बुनियादी शर्त उनका गीत होना है।
इस संकलन में शामिल उनके गीत इस शर्त को बख़ूबी पूरा करते हैं।
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