Bhay Bhi Shakti Deta Hai
Author:
Leeladhar JagudiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Unavailable
लीलाधर जगूड़ी की कविता यथार्थ को आंशिकता में नहीं बल्कि उसकी पूरी जटिलता और बारीकियों में खोजती आई है। इसी खोज ने उन्हें एक समर्थ कवि की पहचान दी है। लगभग इकहरी और एकआयामी हो रही कविता के मौजूदा दौर में जगूड़ी की ये कविताएँ अनुभव के अनेक आयामों के साथ कुछ चकित करती हैं, कुछ रोमांच से भर देती हैं और अन्ततः इस तरह विचलित करती हैं कि पाठक के भीतर भी एक प्रक्रिया शुरू हो सके।</p>
<p>इन कविताओं में न तो यथार्थ का उत्सव है और न विलाप : इनमें यथार्थ की ऐसी आलोचना है जिसमें वे नए और अनजाने पहलू भी प्रकट होते चलते हैं, जो इससे पहले काव्य-अनुभव नहीं बन पाए थे। यहाँ देखने, जानने और जाँचने के इतने तरीक़े हैं, भाषा और शिल्प की इतनी विविधता है और इसके बावजूद अनुभवों की खोज के अनेक नए या अज्ञात रास्तों की सम्भावनाओं के संकेत भी हैं। यह शायद इसलिए सम्भव हुआ है कि जगूड़ी के लिए जीवन, कविता और भाषा में से कोई भी चीज़ आसान नहीं हैं; कहीं सरल रेखाएँ नहीं हैं; इसके बरक्स उलझे हुए रास्ते और तीखे मोड़ हैं जिन पर चलते हुए आगे नए रास्ते और नए मोड़ ही दिखते हैं। इस मानी में यह संग्रह जगूड़ी की काव्य-यात्रा में एक बड़े मोड़ की तरह है जो आगे की यात्रा को आसान नहीं बना देता, बल्कि नए रचनात्मक जोखिमों की ओर ले जाता है।</p>
<p>भय भी शक्ति देता है की कविताओं के सरोकार बहुत विस्तृत हैं जिन्हें मोटे तौर पर छह हिस्सों में बाँटा गया है। जगूड़ी की आलोचनात्मक दृष्टि लोकगीतों और मिथकों के मनुष्य से लेकर आज के आर्थिक मनुष्य तक के संकटों से जूझती है; वह एक पहाड़ी बैल के सपने और दादी की आदिम दुनिया में भी जाती है और आधुनिक टेक्नोलॉजी या युद्धतंत्र की भी जाँच-परख करती है।</p>
<p>इस तरह लीलाधर जगूड़ी अपने समय के भौतिक और नैतिक संकटों को कविता में दर्ज़ करते हैं और सवाल उठाते चलते हैं। लेकिन वे महज़ यथार्थ का लेखा-जोखा या अनुकृति नहीं करते, बल्कि उसकी पुनर्रचना करते हैं। अपने समय से जूझते हुए वे कविता में एक और या समान्तर समय की रचना करते हैं, जो ख़ास तौर से इस संग्रह की और आधुनिक हिन्दी कविता की भी एक उपलब्धि है।
ISBN: 9788171782277
Pages: 143
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘‘घरानेदार गायकी’ ग्रन्थ शास्त्रीय संगीत के सौन्दर्यात्मक ढाँचे के यथासम्भव सभी आयामों का सैद्धान्तिक विवेचन करनेवाला मराठी का (और सम्भवत: अन्य भाषाओं में भी) पहला अनुसन्धानात्मक ग्रन्थ होगा।’’
—डॉ. श्रीराम संगोराम
‘‘श्री वामनराव देशपाण्डे का यह अध्ययन मात्र उनके किताबी ज्ञान पर निर्भर नहीं है। इस सम्पूर्ण अध्ययन के पीछे उनकी अनुभूति है। स्वानुभव से उन्होंने अपने विचार निश्चित किए हैं और अत्यन्त प्रासादिक शैली में उन्होंने एक जटिल विषय प्रस्तुत किया है और इसीलिए पठन का आनन्द भी अवश्यमेव प्राप्त होता है।’’
—श्री दत्ता मारूलकर
‘‘भारतीय संगीत परम्परा के कई आयामों की दृष्टि से यह अग्रणी पुस्तक है।’’
—एलिस बर्नेट
‘‘आश्चर्य है कि ‘खयाल’ पर भारत या पश्चिम में बहुत कम सामग्री प्रकाशित हुई है। जो हुई है, उनमें देशपाण्डे की पुस्तक ही प्रमुख है, जो सन् 1973 में अंग्रेज़ी में ‘Indian Musical Traditions’ के नाम से प्रकाशित हुई।’’
–जेम्स किप्पेन
Dukh Ki Bandishen
- Author Name:
Sarvendra Vikram
- Book Type:

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Description:
सर्वेन्द्र विक्रम का यह कविता-संग्रह ‘दु:ख की बन्दिशें' स्मृति और विस्मृति के बीच काँपते कुहासे की थाह लगाता है। समय और समाज की विडम्बनाएँ इस संग्रह की कविताओं का प्रस्थान हैं। सर्वेन्द्र व्यापक मनुष्यता के वृत्त में इन विडम्बनाओं का परीक्षण करते हैं। समूचे सामाजिक परिदृश्य में अदृश्य जैसा जीवन जी रहे असंख्य व्यक्तियों की 'मानवीय उपस्थिति' दर्ज करने की उत्कंठा इन रचनाओं में है।
कवि एक अघोषित विस्थापन अथवा निर्वासन की प्रक्रिया पर दृष्टि रख सका है। इसीलिए स्त्रियों का अस्मिता-विमर्श इन कविताओं में एक नई तर्कपूर्ण मार्मिकता प्राप्त करता है। इनमें ‘हल्की-सी नमी और असली कहानी जैसी दीप्ति’ का अनुभव किया जा सकता है। स्त्रियों के अपदस्थ आत्मविश्वास और आत्मसंघर्ष पर ऐसी कविताएँ विरल हैं। दुखहरन, वजीर और बरकत अली जैसे लोग लोकतंत्र में कहाँ हैं, ऐसे अनेक प्रश्न उठाती सर्वेन्द्र की कविताएँ निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। पूँजी, बाज़ार, सत्ता, भूमंडलीकरण और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में अन्तर्ध्वनियों की तरह निहित हैं। ‘धुनिएँ’ कविता कहती है, ‘धुनिएँ दिल्ली जाते हैं या नहीं/पता नहीं/जहाँ बहुत कुछ है धुनने के लिए/रूई के अलावा भी।’
सर्वेन्द्र विक्रम उन तत्त्वों की पहचान भी करते हैं जिनकी समग्र संरचना में नए समाज का मानचित्र मौजूद है। उन्हें भली-भाँति ज्ञात है कि स्थानीयता की शक्ति और वैश्विकता का विवेक ही इस मानचित्र को सजीव कर सकता है। उल्लेखनीय है कि वे राजनीति पर इस तरह मौन हैं कि अभिव्यंजनाएँ सब प्रकट कर देती हैं। सभ्यता और संस्कृति के विकास का इतिहास आलोचनात्मक आशयों के साथ यहाँ व्यक्त हुआ है। एक सघन सतर्क संवेदनात्मक सन्तुलन इन कविताओं की अर्थ-सम्भावनाओं का परिविस्तार करता है। किसी बौद्धिक या शीर्षक की भाँति प्रयोग किए जानेवाले तात्कालिक पद प्रयोगों की अनुपस्थिति रचनाकार के उत्तरदायी कवि-कर्म का प्रमाण है। वस्तुत: सर्वेन्द्र सहभोक्ता की तरह इन कविताओं की रचना कर रहे हैं।
रस्मअदायगी में व्यस्त बहुतेरी समकालीन कविताओं की भीड़ में सर्वेन्द्र विक्रम का स्वर विश्वास का पुनर्वास है। मितकथन और सम्यक् कथन की सिद्धि संग्रह की उपलब्धि है।
Kuchh Rafoo Kuchh Thigare
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

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Description:
“यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है/जो यह भरोसा दिलाती है कि/कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता/और सब कुछ गँवा देने के बाद भी/कुछ बचा रहता है।”
अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित है। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गई ये कविताएँ कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव माननेवाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है।
अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाए हुए हैं। उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती है।
Kamayani
- Author Name:
Jaishankar Prasad
- Book Type:

- Description: प्रसाद जी ने प्राचीन भारतीय ग्रन्थों से कामायनी-कथा की प्रेरणा प्राप्त की और भारतीय दर्शन के योग से उसका निरूपण किया। उपनिषदों का अद्वैत, शैव-दर्शन की समरसता, आनन्द, बौद्धों की करुणा—सभी की छाया के दर्शन इसमें होते हैं। चिन्तन-मनन अथवा यों कहें कि दार्शनिकता और काव्य का अद् भुत सामंजस्य ‘कामायनी’ में देखने को मिलता है। ‘कामायनी’ का मनु अपने कठिन संघर्ष के बाद जीवन में समरसता स्थापित कर आनन्द प्राप्त कर लेता है। यह श्रद्धाजन्य आनन्द ही ‘कामायनी’ का लक्ष्य है। देश, काल और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर, मानव और मानवता की विषय-वस्तु के साथ कामायनी नए युग का गौरवशाली महाकाव्य बन गया है।
Tulsi Rachnawali Vol-3
- Author Name:
Dr. Ramji Tiwari
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- Description: गोस्वामी तुलसीदास की विलक्षण प्रतिभा से प्रसूत अनंत काव्य-कीर्ति-कौमुदी में स्नात होकर समस्त विश्व के काव्य-रसिक धन्य, रससिक्त और श्रद्धानवत होते रहे हैं, किंतु सभी के दृष्टि-पथ में 'रामचरितमानस' ही आकाशदीप की भाँति विराजमान है। अन्य ग्रंथरत्न छायावेष्टित ही रह जाते हैं। जबकि लोक-परलोक चिंतन, व्यावहारिक चेतन जीवन और अध्यात्मबोध, संस्कृति और संस्कार, संघर्ष और आस्था तथा जय और पराजय से युक्त विलक्षण व्यक्तित्व उनके सभी ग्रंथ-रत्नों को देखने के बाद ही सगुण साकार हो पाता है। संस्कारशील और सुरुचि-संपन्न पाठक भी इस विश्वकवि के संपूर्ण वाड्मय का रसास्वादन कर लेने के बाद ही पूर्ण परितोष का लाभ ले पाता है। गोस्वामीजी के सभी ग्रंथरत्नों को एकत्र उपलब्ध कराने के पुनीत उद्देश्य से ही इस 'रचनावली' की योजना बनाई गई है। ग्रंथावली का प्रथम खंड सुविज्ञ पाठकों को समर्पित है। इसमें गोस्वामीजी की 'रामलला नहछू', 'वैराग्य संदीपनी', 'बरवै रामायण', 'जानकी मंगल', 'पार्वती मंगल', 'रामाज्ञा-प्रश्न', 'दोहावली', 'श्रीकृष्ण गीतावली' कृतियों का समावेश है। आशा है, सुधी पाठकों को अभीप्सित परितोष मिल सकेगा।
Tera Tujhko Arpan
- Author Name:
Rashmi Sthapak
- Book Type:

- Description: Book
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