Bagdad Se Ek Khat
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अपने समय से संवाद करती ये कविताएँ कवि महेन्द्र मिश्र के लम्बे प्रशासकीय मौन के बाद सामने आ रही हैं। आज से कोई चौबीस वर्ष पहले उनका पहला काव्य-संकलन आया था—‘अनायास वर्षा’। तब से बहुत कुछ घटित हो चुका है दुनिया में और काव्य का परिदृश्य भी वही नहीं है, जो उस समय था। इन कविताओं से गुज़रते हुए मैंने अनुभव किया कि इस संग्रह के रचयिता ने इस बीच के लगभग सारे सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को अपनी चेतना में जज़्ब करने के बाद वह वस्तु-फ़लक तैयार किया है, जिससे इस कृति को आकार मिलता है। यह बौद्धिक रूप से एक अत्यन्त सजग रचनाकार की रचना है—जिसे अपने से की गई एक लम्बी बहस भी कहा जा सकता है। वस्तुतः इस किताब का नाम ‘बग़दाद से एक ख़त’ वह संकेतक है, जो इन कविताओं के ‘टोन’ का निर्धारण करता है। मुझे अच्छा लगा कि वैचारिक आवेग वाली लम्बी कविताओं के साथ-साथ यहाँ कुछ अपेक्षाकृत छोटी कविताएँ भी हैं—जैसे ‘वह लड़का’ और ‘नदी’ जो अलग ढंग की कविताएँ हैं और पाठक से सीधे संवाद करती हैं। यह भरा-पूरा संग्रह प्रमाण है कि अपनी प्रशासकीय उलझनों में चाहे इस कवि ने कविता का साथ—अस्थायी रूप से—छोड़ दिया हो, पर कविता ने अपने इस ‘पुराने प्रेमी’ का साथ कभी नहीं छोड़ा। — केदारनाथ सिंह
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अपने समय से संवाद करती ये कविताएँ कवि महेन्द्र मिश्र के लम्बे प्रशासकीय मौन के बाद सामने आ रही हैं। आज से कोई चौबीस वर्ष पहले उनका पहला काव्य-संकलन आया था—‘अनायास वर्षा’। तब से बहुत कुछ घटित हो चुका है दुनिया में और काव्य का परिदृश्य भी वही नहीं है, जो उस समय था। इन कविताओं से गुज़रते हुए मैंने अनुभव किया कि इस संग्रह के रचयिता ने इस बीच के लगभग सारे सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को अपनी चेतना में जज़्ब करने के बाद वह वस्तु-फ़लक तैयार किया है, जिससे इस कृति को आकार मिलता है। यह बौद्धिक रूप से एक अत्यन्त सजग रचनाकार की रचना है—जिसे अपने से की गई एक लम्बी बहस भी कहा जा सकता है। वस्तुतः इस किताब का नाम ‘बग़दाद से एक ख़त’ वह संकेतक है, जो इन कविताओं के ‘टोन’ का निर्धारण करता है। मुझे अच्छा लगा कि वैचारिक आवेग वाली लम्बी कविताओं के साथ-साथ यहाँ कुछ अपेक्षाकृत छोटी कविताएँ भी हैं—जैसे ‘वह लड़का’ और ‘नदी’ जो अलग ढंग की कविताएँ हैं और पाठक से सीधे संवाद करती हैं।
यह भरा-पूरा संग्रह प्रमाण है कि अपनी प्रशासकीय उलझनों में चाहे इस कवि ने कविता का साथ—अस्थायी रूप से—छोड़ दिया हो, पर कविता ने अपने इस ‘पुराने प्रेमी’ का साथ कभी नहीं छोड़ा।
— केदारनाथ सिंह
Book Details
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ISBN9788126717200
-
Pages115
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Book
Yeh Bhumandal Ki Raat Hai
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Pankaj Raag
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कविता की यात्रा में अकसर ही कुछ ऐसा होता है जो छूटता जाता है, उसी को समेटते-सहेजते हुए फिर एक और कवि आता है, और समकालीन रचनात्मकता के अधूरे परिदृश्य को पूरा करता है।
पंकज राग का यह संग्रह और उनकी कविताएँ यही काम करती दिखती हैं। न सिर्फ़ विषयों और शीर्षकों में, बल्कि भाषा के प्रयोग और बिम्बों-प्रतीकों के मुखौटों में भी वे उन चीज़ों और भंगिमाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो सिर्फ़ उनकी अपनी खोज हैं। “दिन बड़ा अजीब-सा गुज़रे/शाम बड़ी थकी-थकी-सी हो/भूख हो पर लगे नहीं/हरारत हो पर दिखे नहीं/बातें सतरंगी करो/यह भूमंडल की रात है।” संग्रह की पहली और शीर्षक-कविता की शुरुआती ये पंक्तियाँ कवि की विशिष्टता की भूमिका की तरह पाठक के मन में गड़ जाती हैं, जिसका निर्वाह यह संग्रह अन्त तक करता है।
पंकज राग की ये कविताएँ उन चिन्ताओं को तो देखती ही हैं जो आज हम सबके लिए निर्णायक विषय बनी हुई हैं, साथ ही वे उन पीड़ाओं को भी अनदेखा नहीं करतीं जो हमारे अतीत में गुज़री हैं और आज हमारी स्मृतियों में कसकती हैं। ‘दिल्ली : शहर-दर-शहर’ जो इस संग्रह की सबसे लम्बी कविता है, वर्तमान और अतीत का ऐसा ही महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होता है। “तुम मुझे फ़ीरोज़ी बना दो/दिल्ली की उस मध्यवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा/कोटला फ़ीरोज़शाह के स्लेटी खँडहरों के बीच/उस लड़के का उत्तर फँस-सा गया/फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ/वैसे ही जैसे फ़ीरोज़ाबाद का भी कुछ न हो सका।”
अतीत से वर्तमान तक व्याप्त मनुष्य के अधूरेपन की निशानदेही करती ये कविताएँ निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होंगी।
Chhainya-Chhainya
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Gulzar
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उनके पास लगभग उतने ही शब्द हैं, ठीक जितने ‘आम आदमियों’ के शब्दकोश में होते हैं । उनके पास लगभग नियत जीवन-हृदय हैं जैसे आम आदमियों की जिन्दगी में होते हैं। उनके पास क़रीब-क़रीब वही इच्छाएँ हैं जो किसी भी आदमी के निजीपन में उसे तरंगित या उद्वेलित कर सकती हैं। हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रियता में संगीत के जादू से मिलकर जो मनहरणकारी क्रिया सम्पन्न होती है, उसका मूल भी यही बिन्दु है। लेकिन, गुलज़ार इसी मनहरणकारी व्यवसाय में अपनी संवेदन-शीलता से रिश्तों का अनूठा स्पर्श देने में कामयाब होते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी बन जाती है। चाँद, रात, शाम, सुबह या सूरज उनके जरिए नई अर्थवत्ता ग्रहण करते चलते हैं। मुहावरों के नवप्रयोग होते हैं, प्रकृति की सूक्ष्म व्यंजनाएँ खुल जाती हैं। शायद इसलिए कि शब्दों की ध्वन्यात्मकता को उन्होंने अपने ढंग से परख लिया है। उनके पास लोक रस, गंध और स्पर्श सुरक्षित हैं। वे स्मृतियों और यथार्थ के बीच एक पुल बनाते हैं। उदासी का तहलका मचाने वाली खामोशी की सर्जना करते हैं। गुलज़ार के शब्द, लोक-हृदय के उफानों, सुखों, इच्छाओं तथा यथार्थ के प्रति उत्पन्न आवेगों को इस तरह बाँटते प्रतीत होते हैं कि हम उन्हें देखने, सुनने, महसूसने लगते हैं। उनकी काव्य-यात्रा प्रकृति और मन के बीच अपने आपको खो देने की प्रबल इच्छा से संपन्न होती है। ‘बंदिनी’ सेΓ‘इजाज़त’ के बाद ‘सत्या’ और ‘फ़िलहाल’ तक गुलज़ार ऐसी निर्बन्ध परंपरा में बदलते हैं जो हमें लगातार अपने साथ ले चलने के लिए खींचती है। हमारी अनुभूतियों को उठाती है और उन्हें बेजान होने से बचने का अवसर प्रदान करती है। वह स्पर्श करती है, गूँजती है और अपने भीतर खो जाने की माँग करती है।
फ़िल्मों के सौदे में भी गुलज़ार उम्र उधेड़ के, साँस तोड़ के लम्हे देते हैं। ‘छैंया-छैंया’ गुलज़ार के प्रेमियों के लिए उन्हीं लम्हों का ताजा गुच्छा है।
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