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‘मृत्युंजयी’ का मुख्यराग है—लोक मुक्ति। दलित, शोषित, उपेक्षित, प्रताड़ित, पीड़ित; आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा उपेक्षित और अज्ञान के अन्धकार में भटकते अज्ञानी लोगों की बिलखती चेतना के रेगिस्तानी समुद्र में आस्था और संकल्प की सुगम राह बना डालने की युक्ति : “करो उपकृत धरा लोक को/अपना ज्ञान बाँटकर उनको/श्रम से मंडित जग जीवन है/यह रहस्य बतला कर उनको।”</p> <p>“अपने सत्कर्मों से मानव/जीवन काल बढ़ा सकता है/धर्म आचरण से आत्मा को/वह उदात्त बना सकता है।”</p> <p>कवि ने यहाँ तत्त्व के लिए संघर्ष किया है, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष किया है और लोक दृष्टि विकसित करने के लिए जन संघर्ष को अनिवार्य माना है : “मिटा भूत के पद्चिन्हों को/भूल पुराने व्यथा-व्यंग्य को/नई राह पर कदम बढ़ाकर/नई कहानी लिख डाला है/एक नया संसार बनाकर।”</p> <p>‘मृत्युंजयी’ पढ़कर आप एक ऐसे फूल की कल्पना कर सकते है जो कभी जुही भी हो जाता है तो कभी कमल, कभी मौलश्री, कभी अमलतास तो कभी शेफालिका। ‘मृत्युंजयी’ पढ़ने और उसकी संवेदना के आन्तरिक सतह का स्पर्श करने के पश्चात आपको सहज अनुभव होगा कि महाकवि भागवत झा ‘आज़ाद’ अपने शब्दों से जीवन की परिधि का विस्तार करते हैं। उनकी कविता मानव मन में उच्चतर जीवन मूल्यों के प्रति उत्कंठा और आस्था जगाती है और इस तरह मानवीय नश्वरता के विरुद्ध शाश्वरता का जयगान करती है।
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‘मृत्युंजयी’ का मुख्यराग है—लोक मुक्ति। दलित, शोषित, उपेक्षित, प्रताड़ित, पीड़ित; आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा उपेक्षित और अज्ञान के अन्धकार में भटकते अज्ञानी लोगों की बिलखती चेतना के रेगिस्तानी समुद्र में आस्था और संकल्प की सुगम राह बना डालने की युक्ति : “करो उपकृत धरा लोक को/अपना ज्ञान बाँटकर उनको/श्रम से मंडित जग जीवन है/यह रहस्य बतला कर उनको।”</p>
<p>“अपने सत्कर्मों से मानव/जीवन काल बढ़ा सकता है/धर्म आचरण से आत्मा को/वह उदात्त बना सकता है।”</p>
<p>कवि ने यहाँ तत्त्व के लिए संघर्ष किया है, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष किया है और लोक दृष्टि विकसित करने के लिए जन संघर्ष को अनिवार्य माना है : “मिटा भूत के पद्चिन्हों को/भूल पुराने व्यथा-व्यंग्य को/नई राह पर कदम बढ़ाकर/नई कहानी लिख डाला है/एक नया संसार बनाकर।”</p>
<p>‘मृत्युंजयी’ पढ़कर आप एक ऐसे फूल की कल्पना कर सकते है जो कभी जुही भी हो जाता है तो कभी कमल, कभी मौलश्री, कभी अमलतास तो कभी शेफालिका। ‘मृत्युंजयी’ पढ़ने और उसकी संवेदना के आन्तरिक सतह का स्पर्श करने के पश्चात आपको सहज अनुभव होगा कि महाकवि भागवत झा ‘आज़ाद’ अपने शब्दों से जीवन की परिधि का विस्तार करते हैं। उनकी कविता मानव मन में उच्चतर जीवन मूल्यों के प्रति उत्कंठा और आस्था जगाती है और इस तरह मानवीय नश्वरता के विरुद्ध शाश्वरता का जयगान करती है।
Book Details
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ISBN9789395737227
-
Pages32
-
Avg Reading Time1 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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केदार जी सबकी आवाज़ सुनते हैं। प्रकृति का कण-कण। घर का कोना-कोना, मन का रेशा-रेशा; जहाँ भी स्पन्दन है, केदार जी की कविता अपनी पूरी संवेदना के साथ वहाँ पहुँच जाती है। हर स्वर की प्रतिध्वनि को व्यक्त करने को उनके शब्दों का रोम-रोम खुला है। खुलते दिन, उतरती साँझें, गहराती रातें—सभी बिम्ब यहाँ उपस्थित हैं और साथ में है रचने को कवि के आतुर हाथ...
'खोल दूँ यह आज का दिन/जिसे/मेरी देहरी के पास कोई रख गया है/एक हल्दी रँगे/दूरदेशी पत्र-सा...इस सम्पुटित दिन के सुनहले पत्र को/जो द्वार पर गुमसुम पड़ा है/खोल दूँ।’
प्रकृति केदार जी की कविताओं का विषय नहीं, उनकी सहचरी है। वे प्रकृति को देखते भी हैं, उससे उजास भी लेते हैं और उसकी पुनर्रचना भी करते हैं। इसी तरह लोक और उसमें रचा-बसा घर, और घर में बुने हुए रिश्ते—इन सबकी इयत्ता उनके शब्दों के साथ-साथ चलती है, उनसे अपना नया रूप पाती है, एक नई परिभाषा जो हमें नए सिरे से जीने का भरोसा और उम्मीद देती है। घर के रूप में एक ख़ाली कमरा भी उन्हें अपनी पूरी भयावहता में अन्तत: एक सकारात्मक बिन्दु दिखाई देता है जहाँ से वे और हम अपनी नई यात्रा शुरू कर सकते हैं...
'आज भी खड़ा है वह/...मेरी प्रतीक्षा में/बड़े-बड़े डैनों वाला कमरे का दानव...उसे सब ज्ञात है/...इसीलिए कभी कुछ पूछता नहीं है/जब बाहर से आता हूँ/चुपके से क्षत-विक्षत डैने उठाकर/मुझे जगह दे देता है/मानो कहता हो : अब बहुत थक गए हो तुम/योद्धा, विश्राम करो!’
Saanjh Ka Neela Kivaar
- Author Name:
Bhavana Shekhar
- Book Type:

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Description:
भारतीय कविता विशेषकर हिन्दी कविता में अभी का समय स्त्री-नवजागरण का समय है। भक्तिकाल के बाद इतनी बड़ी संख्या में इतनी तेजोमय स्त्री कवियों का आविर्भाव हुआ है। भावना शेखर इसी स्त्री-काव्य का एक नवीनतम शिखर हैं। अन्तर केवल यह है कि भावना शेखर की कविताएँ रूढ़ या प्रचलित अर्थ में स्त्रीवादी कविताएँ नहीं हैं। ये बस उतनी ही और वैसी ही जाग्रत कविताएँ हैं जितनी कि किसी भी कविमात्र द्वारा सृजित हो सकती हैं—स्त्री वा पुरुष। क्योंकि ये मनुष्य जाति बल्कि सम्पूर्ण जीव-जगत और ब्रह्मांड की कविताएँ हैं। ‘बिछुड़न’ शीर्षक कविता इस जगत व्याप्ति का अद्भुत उदाहरण है। ‘हृदय की भूमि में’, ‘गुरुत्वाकर्षण’ की शक्ति को पहचानती भावना शेखर की कविताओं के लिए कुछ भी अस्पृश्य नहीं है। बचपन की स्मृतियों से लेकर ऐन्द्रिक अनुभवों और गहन लालसा से भरी ये कविताएँ सहसा हमें बेचैन कर देती हैं। ‘मेरी नसों में कुछ जी उठा है/मालूम होता है/दीवार के उस पार गुज़री हो तुम अभी-अभी’—आज केवल भावना शेखर ही ऐसी पंक्ति रच सकती हैं। और इतना नया और सूक्ष्म विवरण भी—‘पत्तों से छनती धूप बदरंग है कलई उतरे बर्तनों सी’, साथ-साथ भावना ने ऐसी कविताएँ भी लिखी हैं जो मूलत: स्त्री-अनुभव की कविताएँ हैं जैसे ‘सत्रहवीं दहलीज़’ या ‘ऋतुस्नान के बाद’। लेकिन यहाँ कोई तिक्तता या द्वेष नहीं है, केवल एक पृथक् जीवनचर्या है और यही इस कविता की प्रतिरोध-भूमि है। ‘बित्ता-भर ज़मीन’ की तलाश पूरे संग्रह की प्रेरणा-शक्ति है, फिर भी यहाँ कुछ भी सपाट या अनगढ़ नहीं है। ‘यह अभिधा नहीं व्यंजना है’ कवि का कहना है जो सच तथा प्रामाणिक है तथा ‘स्त्रीलिंग’ का इन्द्रधनुषी आक्षितिज प्रसार। इस संग्रह की एक अनूठी और मार्मिक कविता है ‘स्त्रीलिंग।’ इन कविताओं को पढ़ना एक नए अनुभव-संसार, एक नए शिखर की चमक और प्राणवायु को आत्मसात् करना है। मैं केवल एक कविता उद्धृत कर रहा हूँ—
“चूल्हे की राख में बुझते अंगारे
हथेली पर सूखती क़तरा-भर नमी
इकलौते पैर पर लँगड़ाती मैना
और पुलिया के पारवाली बंजर ज़मीं
कभी तो सुलगेगी बुझती चिंगारी
चुल्लू-भर तरावट मुट्ठी में होगी
उस ओर होगी परिन्दों की आहट
मेरी मुँडेर भी गौरैया फुदकेगी”
—अरुण कमल
Aatmahatya Ke Paryay
- Author Name:
Vandana Devendra
- Book Type:

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Description:
वर्ष 2002 में आए पहले संकलन ‘समय का हिसाब’ ने वन्दना देवेन्द्र को हिन्दी के कवियों की पहली पंक्ति में शुमार कर दिया। कवि राजेश जोशी ने उस वर्ष छपी कविता की किताबों की अपनी समीक्षा में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ कविता-संग्रह घोषित किया था। वन्दना की रचनाओं की गहराई, वैविध्य, विस्तार देखकर अचरज होता है। यह जानकर और भी अचम्भा होता है कि वे उत्कृष्ट मृदु गीतात्मक और निर्मम यथार्थवादी राजनीतिपरक कविताएँ समान दक्षता से लिख सकती हैं।
वन्दना देवेन्द्र ने कविता के संसार में स्वयं के लिए जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, वे मुश्किल, खरे और ईमानदार हैं। ज़मीनी सोच, सरलता और निराडम्बर ने उनके काम पर धार रखी है। बहुत से मौलिक विषयों का चयन और एक अलहदा तरह का निर्वाह उनकी रचना-प्रक्रिया को और भी चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
वरिष्ठ कवि और चिन्तक विष्णु खरे ने लिखा है : ‘वन्दना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कविताओं में दिया भी है, किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है, या उनका कवि उनके चित्राकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीजा यह है कि उनकी कविता का कैनवास एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोट्रैट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब कुछ है।... उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख वर्ण भी हैं। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर समाज के बहुत से स्त्री-पुरुषों की जीवनी भी जानती हैं।
‘यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती।’ हिन्दी की कविता, कहानी की दुनिया में वन्दना ने अपनी प्रासंगिक उपस्थिति ही दर्ज नहीं कराई वरन् ‘सच यह है कि वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही है।’
Rekhta ke Daag
- Author Name:
Nawab Mirza Khan 'Daag'
- Book Type:

- Description: "रेख़्ता क्लासिक्स" सीरीज़ उर्दू के क्लासिकी शायरों के प्रतिनिधि शायरी को नए पाठकों तक पहुँचाने के एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत किताब में दाग़ देहलवी की प्रतिनिधि शायरी है जिसका संकलन फ़रहत एहसास साहब ने किया है।
Zindagi Se Darte Ho
- Author Name:
Noon Meem Rashid
- Book Type:

- Description: अमिताभ सिंह बघेल ने अपनी तरह-तरह की साहित्यिक और सांस्कृतिक दिलचस्पीयों के साथ ही, अब उर्दू शाइरी को देवनागरी लिपि में पेश करने की तरफ पेशक़दमी की है, लेकिन एक ज़रा फ़र्क़ के साथ और वो यह कि उन्होंने इस काम के लिए ग़ज़ल नहीं बल्कि नज़्म का इंतख़ाब किया है।... उन्नीसवीं सदी में यही काम, उर्दू के ज़रिए सारे मज़हबों को जोड़ने के दायरे में, और ज़्यादा बड़े पैमाने पर मुंशी नवल किशोर ने किया था। बघेल साहब इसी रौशन विरासत को जारी रखने और आगे बढ़ाने के आरज़ूमन्द दिलों और दिमाग़ों की नई नस्ल के निहायत मज़बूत इरादों वाले शख़्स हैं जिन्हें क़ुदरत से गहरी-बामानी सोच और रचनात्मकता हासिल हुई है।... —फ़रहत एहसास नून मीम राशिद की नज़्मों का हिन्दी में आना एक ख़ुशगवार मौक़ा है। उर्दू शाइरी को नागरी लिपि में पढ़ने वाले पहले ही अच्छी ख़ासी तादाद में मौजूद हैं, फिर भी, इस किताब का आना एक ऐसी कमी को पूरा करेगा जो नज़्म के आशिक़ों ने हमेशा महसूस की है। इंसानी ज़िन्दगी की हक़ीक़त और उससे बरामद तज्रबों की आँच हमारे तख़य्युल को जो उड़ान बख़्शती है उसका बदल मुमकिन नहीं। ऐसे में राशिद को पढ़ना हर बार हमें एक नए सिरे से इस उड़ान का हिस्सा बनाता है। ज़ात ओ काइनात के मसअलों से उलझने वाली ये नज़्में बेदार और बाख़बर ज़ेहनों के लिए यक़ीनन सामान-ए-तस्कीन बनेंगी। राशिद की शाइरी का भरपूर तअर्रुफ़ कराती इस किताब में अमिताभ सिंह बघेल ने नज़्मों का चयन और लिप्यन्तरण बहुत दिल-जमई से किया है। मुझे यक़ीन है कि अदबी हलक़ों में इस किताब की पज़ीराई होगी और राशिद का नाम और काम तलाश कर उन्हें पढ़ने वालों की तादाद भी बढ़ेगी। —अभिषेक शुक्ला
Anterlok : Adhyatm Sambandhi Kavitayen
- Author Name:
Nandkishore Acharya
- Book Type:

- Description: कविता बल्कि कला मात्र अपने आपमें एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है—चाहे उसकी विषय–वस्तु कुछ भी हो। स्पष्ट है कि इलियट के लिए धर्म किसी ‘आधि–प्राकृतिक सत्ता में विश्वास’ करना है जबकि आर्नाल्ड के लिए वह मानवमात्र को जोड़ने और जीवन को अर्थ प्रदान करनेवाली चीज़ है; बल्कि कह सकते हैं कि मानवमात्र के जुड़ाव का, संलग्नता का या अद्वैत का यह अनुभव ही जीवन को अर्थ देनेवाली चीज़ है। ‘आलोक के अनन्त का उद्घाटन’—किसी भी धार्मिक–आध्यात्मिक अनुभव की केन्द्रीय अन्तर्वस्तु यही है। उस उद्घाटन का आलम्बन कोई वैयक्तिक ईश्वर है या कोई निर्वैयक्तिक सत्ता अथवा सम्पूर्णत: भौतिक जगत के अन्तर्भूत एकत्व का बोध, इससे अनुभूति की गहराई में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, यदि वह कवि–कलाकार की अनुभूति है। धार्मिक या आध्यात्मिक अनुभव का अर्थ अपने अस्तित्व के अर्थ की तलाश है। इसके लिए ईश्वर जैसी किसी आधि–प्राकृतिक सत्ता पर विश्वास की अनिवार्यता नहीं है। जिस प्रकार विरह–काव्य अथवा वियोग–शृंगार भी प्रेमकाव्य ही हैं, उसी प्रकार जीवन का अर्थ खो देने की पीड़ा और उसे पाने की विकलता भी प्रकारान्तर से धार्मिक–आध्यात्मिक अनुभव ही है। पॉल टिलिच के शब्दों में, ‘‘जो यह अनुभव करता है कि वह अर्थ के चरम स्रोत से विलग हो गया है, वह अपनी इस प्रतीति द्वारा यह प्रगट करता है कि वह केवल विलग ही नहीं है, वह फिर से संयुक्त हो चुका है।’’ लेकिन यह संयुक्ति किसी सरल और रूढ़िबद्ध धार्मिक विश्वास से नहीं होती, वह उस वेदना में से उपजती है जिसे कार्ल जैस्पर्स ‘ईश्वर के लिए ईश्वर से भावोद्वेगपूर्ण संघर्ष’ कहता है । इसलिए आधुनिक कविता या कला जो सवाल पूछती है, उसका कोई निश्चित समाधान उसके पास नहीं होता; बल्कि उसकी वेदना ही उसका समाधान हो जाती है। इस संकलन में हिन्दी में सक्रिय सभी पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व कमोबेश हो सका है जिससे आध्यात्मिक संवेदन के बदलते काव्य–रूपों से हमारा परिचय हो सके।
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