Aankhon Mein Uljhi Dhoop
Author:
Amita SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 236
₹
295
Unavailable
ये कविताएँ कुछ हद तक ‘पर्सनल पोएम्स’ हैं, निजी कविताएँ। जैसे व्यक्तिगत काव्य-डायरियाँ। इनका ‘मैं’ कोई पराया ‘मैं’ नहीं। पूरी तरह आत्मकथात्मक ‘मैं’ भी नहीं। यह एक अन्दर की कहीं छिपी-ढँकी इच्छा के कविता में प्रकट होने की प्रक्रिया में आकार लेता ‘मैं’ है। सपनों का ‘मैं’। कविता में सपना देखनेवाला ‘मैं’। ये कविताएँ निर्द्वंद्व मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा का प्रगीत हैं। अपने बेहद निजी, दैहिक सम्बन्ध को भी प्रकृति के पूरे वैभव और समूचे ब्रह्मांड के साथ विमर्श में पाने की लालसा इन कविताओं में है। इहलौकिक सम्बन्धों के बारे में कोई मुखरता यहाँ नहीं है, पर कोई अन्तर्बाधा भी नहीं। यह एक ऐसा अप्रतिम और अनाम सम्बन्ध है जैसे आकाश में चिड़िया की उड़ान होती है जो हवा पर अपने पदचिह्न नहीं छोड़ती। इन कविताओं में लौकिक और अलौकिक के बीच सहज आवाजाही है। इसलिए कोई मिथक यहाँ आता भी है तो उसकी सिर्फ़ हल्की-सी पदचाप ही सुनाई पड़ती है। इन कविताओं में शब्द की चिन्ता और शब्द की काया का स्वीकार बहुत दिलचस्प भी है और अलग-सा भी। ये शब्द की आज़ादी और मौन के साहस, दोनों को जानती हैं। वे शब्द और देह को एक-दूसरे के विकल्प की हद तक देखने और उसे एक-दूसरे की जगह रखने की कोशिश करती हैं। ये कविताएँ एक ऐसा दिक् रचती हैं जहाँ किसी अनुपस्थित की अदेह उपस्थिति है। उस अनुपस्थित के शब्दों की गूँज है। उसके स्पर्श का अहसास है। देहदीन देह की ख़ामोशी है। अनुपस्थित समय है। एक स्टिललाइफ़ जैसा चित्र, जिसमें हर चीज़ पर किसी अनुपस्थित की छाप भी है और उसके किसी भी क्षण आ जाने की संभावना है। इन कविताओं की खनक में चुप और बातूनीपन का दुर्लभ सन्तुलन है। इसे सुनना थोड़ा अटपटा हो सकता है, पर कहना चाहता हूँ कि यह सन्तुलन किसी स्त्री की कविता में ही सम्भव हो सकता है।</p>
<p>—राजेश जोशी
ISBN: 9788171193752
Pages: 102
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आम इंसान की नज़र संसार को देखती है तो उस घटनाओं, व्यक्तियों के प्रति नफ़रत, दुख, क्रोध जैसे विभिन्न भाव पैदा होते हैं मगर जब ये नज़र प्रेम की नज़र बन जाती है तो उसमें संसार की हर वस्तु के प्रति शुकराने का भाव पैदा होता है। और हर पदार्थ के पीछे उसी ऊर्जा, अनवारे-इलाही आदि शक्ति नज़र आने लगती है। फिर तो महबूब में, मुर्शिद में, दोस्त में, दुश्मन में जन्म में, मृत्यु में, उसी अनवारे-इलाही का जलवा नज़र आने लगता है। यही बात है कि मजन का प्यार किसी संत की इबादत से कम नहीं।"तेरी आँखों में रात डूबी है" की ये ग़जलें जहाँ आफिस में काम करने वाली प्रेमिका, संसार से उकताये हुए आदमी, बेटी के प्रति प्रेम में डूबे पिता, विश्व समाज के बदलते हुए परिवेश की मंज़रकशी करती हैं, वहीं इन ग़ज़लों में भाषा की सादगी के साथ जुबान की दिलकश पेशगोई है। ये ग़ज़लें और नज्में एक प्रेमी, एक कामगार, एक साधक की भावनाओं का आईना है साथ ही शरीर और मन के पार रुहानी संसार की तरफ़ भी इशारे करती हैं सूफ़ियाना नज़र देती हैं। निश्चित रूप से इन नज्मों में ऐसा बहुत कुछ है जहाँ से हर इंसान को कभी न कभी गुज़रना है, ठहरना है।
सुर्ख खंजर लिये पीछे है हुजूमे-कातिल
शहरे-जाना से मगर होते भी रुखसत न बनें
क्योंकि ये शहरे-जाना है, परमात्मा का नगर है ये जगत। हमें इसमें जीना है और आनन्दपूर्ण जीना है। ये ग़जलें सुख-दुख के दो किनारों से आगे नये जश्न के सफ़र की तरफ़ ले जा रहीं हैं और उत्सव में जीने का मंगल सन्देश हैं।
Satrang
- Author Name:
Kamal Naseem
- Book Type:

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उर्दू ग़ज़लों के चुनिन्दा शे’रों के प्रस्तुत संकलन में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के सात जाने-माने शायरों और उनके लगभग 800 चुनिन्दा शे’र शामिल किए गए हैं। यह संकलन उस पाठक के लिए है जो उर्दू से प्यार करता है, ग़ज़ल का दीवाना है, ग़ज़ल गायकी का क़द्रदान है, मगर उर्दू की लिपि से वाक़िफ़ नहीं है। उसकी ज़रूरतों और अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे शे’र चुने गए हैं जिनमें विचार और भाव की उत्कृष्टता है मगर भाषा अपेक्षाकृत सरल है, जिनकी अदायगी मन को मोह लेती है और धार सीधे दिल में उतर जाती है।
कुछ ग़ज़लों के एक से अधिक शे’र भी संकलन में शामिल हैं। ये बहुधा ऐसी ग़ज़लें हैं जो बहुत लोकप्रिय हैं और शायर की ख़ास पहचान भी। शे’र विषय के अनुरूप संयोजित किए गए हैं। दर्शन, अध्यात्म, रहस्यवाद, हुस्न-ओ-इश्क़, एक विशिष्ट सोच या प्रतीक अथवा किसी विशेष काव्य चरित्र जैसे नासेह, कासिद, वाइज इत्यादि से सम्बद्ध विभिन्न शायरों के शे’र आपको एक ही स्थान पर मिलेंगे।
Aatmahatya Ke Paryay
- Author Name:
Vandana Devendra
- Book Type:

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वर्ष 2002 में आए पहले संकलन ‘समय का हिसाब’ ने वन्दना देवेन्द्र को हिन्दी के कवियों की पहली पंक्ति में शुमार कर दिया। कवि राजेश जोशी ने उस वर्ष छपी कविता की किताबों की अपनी समीक्षा में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ कविता-संग्रह घोषित किया था। वन्दना की रचनाओं की गहराई, वैविध्य, विस्तार देखकर अचरज होता है। यह जानकर और भी अचम्भा होता है कि वे उत्कृष्ट मृदु गीतात्मक और निर्मम यथार्थवादी राजनीतिपरक कविताएँ समान दक्षता से लिख सकती हैं।
वन्दना देवेन्द्र ने कविता के संसार में स्वयं के लिए जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, वे मुश्किल, खरे और ईमानदार हैं। ज़मीनी सोच, सरलता और निराडम्बर ने उनके काम पर धार रखी है। बहुत से मौलिक विषयों का चयन और एक अलहदा तरह का निर्वाह उनकी रचना-प्रक्रिया को और भी चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
वरिष्ठ कवि और चिन्तक विष्णु खरे ने लिखा है : ‘वन्दना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कविताओं में दिया भी है, किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है, या उनका कवि उनके चित्राकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीजा यह है कि उनकी कविता का कैनवास एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोट्रैट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब कुछ है।... उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख वर्ण भी हैं। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर समाज के बहुत से स्त्री-पुरुषों की जीवनी भी जानती हैं।
‘यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती।’ हिन्दी की कविता, कहानी की दुनिया में वन्दना ने अपनी प्रासंगिक उपस्थिति ही दर्ज नहीं कराई वरन् ‘सच यह है कि वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही है।’
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