Aankhon Mein Uljhi Dhoop
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ये कविताएँ कुछ हद तक ‘पर्सनल पोएम्स’ हैं, निजी कविताएँ। जैसे व्यक्तिगत काव्य-डायरियाँ। इनका ‘मैं’ कोई पराया ‘मैं’ नहीं। पूरी तरह आत्मकथात्मक ‘मैं’ भी नहीं। यह एक अन्दर की कहीं छिपी-ढँकी इच्छा के कविता में प्रकट होने की प्रक्रिया में आकार लेता ‘मैं’ है। सपनों का ‘मैं’। कविता में सपना देखनेवाला ‘मैं’। ये कविताएँ निर्द्वंद्व मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा का प्रगीत हैं। अपने बेहद निजी, दैहिक सम्बन्ध को भी प्रकृति के पूरे वैभव और समूचे ब्रह्मांड के साथ विमर्श में पाने की लालसा इन कविताओं में है। इहलौकिक सम्बन्धों के बारे में कोई मुखरता यहाँ नहीं है, पर कोई अन्तर्बाधा भी नहीं। यह एक ऐसा अप्रतिम और अनाम सम्बन्ध है जैसे आकाश में चिड़िया की उड़ान होती है जो हवा पर अपने पदचिह्न नहीं छोड़ती। इन कविताओं में लौकिक और अलौकिक के बीच सहज आवाजाही है। इसलिए कोई मिथक यहाँ आता भी है तो उसकी सिर्फ़ हल्की-सी पदचाप ही सुनाई पड़ती है। इन कविताओं में शब्द की चिन्ता और शब्द की काया का स्वीकार बहुत दिलचस्प भी है और अलग-सा भी। ये शब्द की आज़ादी और मौन के साहस, दोनों को जानती हैं। वे शब्द और देह को एक-दूसरे के विकल्प की हद तक देखने और उसे एक-दूसरे की जगह रखने की कोशिश करती हैं। ये कविताएँ एक ऐसा दिक् रचती हैं जहाँ किसी अनुपस्थित की अदेह उपस्थिति है। उस अनुपस्थित के शब्दों की गूँज है। उसके स्पर्श का अहसास है। देहदीन देह की ख़ामोशी है। अनुपस्थित समय है। एक स्टिललाइफ़ जैसा चित्र, जिसमें हर चीज़ पर किसी अनुपस्थित की छाप भी है और उसके किसी भी क्षण आ जाने की संभावना है। इन कविताओं की खनक में चुप और बातूनीपन का दुर्लभ सन्तुलन है। इसे सुनना थोड़ा अटपटा हो सकता है, पर कहना चाहता हूँ कि यह सन्तुलन किसी स्त्री की कविता में ही सम्भव हो सकता है।</p> <p>—राजेश जोशी
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ये कविताएँ कुछ हद तक ‘पर्सनल पोएम्स’ हैं, निजी कविताएँ। जैसे व्यक्तिगत काव्य-डायरियाँ। इनका ‘मैं’ कोई पराया ‘मैं’ नहीं। पूरी तरह आत्मकथात्मक ‘मैं’ भी नहीं। यह एक अन्दर की कहीं छिपी-ढँकी इच्छा के कविता में प्रकट होने की प्रक्रिया में आकार लेता ‘मैं’ है। सपनों का ‘मैं’। कविता में सपना देखनेवाला ‘मैं’। ये कविताएँ निर्द्वंद्व मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा का प्रगीत हैं। अपने बेहद निजी, दैहिक सम्बन्ध को भी प्रकृति के पूरे वैभव और समूचे ब्रह्मांड के साथ विमर्श में पाने की लालसा इन कविताओं में है। इहलौकिक सम्बन्धों के बारे में कोई मुखरता यहाँ नहीं है, पर कोई अन्तर्बाधा भी नहीं। यह एक ऐसा अप्रतिम और अनाम सम्बन्ध है जैसे आकाश में चिड़िया की उड़ान होती है जो हवा पर अपने पदचिह्न नहीं छोड़ती। इन कविताओं में लौकिक और अलौकिक के बीच सहज आवाजाही है। इसलिए कोई मिथक यहाँ आता भी है तो उसकी सिर्फ़ हल्की-सी पदचाप ही सुनाई पड़ती है। इन कविताओं में शब्द की चिन्ता और शब्द की काया का स्वीकार बहुत दिलचस्प भी है और अलग-सा भी। ये शब्द की आज़ादी और मौन के साहस, दोनों को जानती हैं। वे शब्द और देह को एक-दूसरे के विकल्प की हद तक देखने और उसे एक-दूसरे की जगह रखने की कोशिश करती हैं। ये कविताएँ एक ऐसा दिक् रचती हैं जहाँ किसी अनुपस्थित की अदेह उपस्थिति है। उस अनुपस्थित के शब्दों की गूँज है। उसके स्पर्श का अहसास है। देहदीन देह की ख़ामोशी है। अनुपस्थित समय है। एक स्टिललाइफ़ जैसा चित्र, जिसमें हर चीज़ पर किसी अनुपस्थित की छाप भी है और उसके किसी भी क्षण आ जाने की संभावना है। इन कविताओं की खनक में चुप और बातूनीपन का दुर्लभ सन्तुलन है। इसे सुनना थोड़ा अटपटा हो सकता है, पर कहना चाहता हूँ कि यह सन्तुलन किसी स्त्री की कविता में ही सम्भव हो सकता है।</p>
<p>—राजेश जोशी
Book Details
-
ISBN9788171193752
-
Pages102
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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एकान्त नवें दशक में उभरे उन महत्त्वपूर्ण कवियों में एक हैं जिन्होंने अपनी कविताओं में अपने समय के लोक समाजों के सुख-दु:ख, हँसी-ख़ुशी, करुण-आश्चर्य, चीख़-चीत्कार आदि भावों को दर्ज किया है। आधुनिकता के दबाव में ग्रामीण समाजों में बढ़ रही ‘भावों की ग़रीबी’ को भी उन्होंने बख़ूबी अपनी कविताओं में जगह दी है। न केवल लोक के मानवीय भाव बल्कि धीरे-धीरे भारतीय समाज में हो रहे ग्रामीण समाजों के वंचितीकरण, बाज़ार-संस्कृति के आक्रामक प्रसार में अपने को बचाए रखने की जद्दोजहद, इस जद्दोजहद से निकलती भारतीय समाज के इस ‘बहुजन की राजनीति’ उनकी कविताओं में दर्ज है। उनकी कविताएँ आधुनिकता के टकराव से छिन्न-भिन्न हो रहे मानवीय भावों के जीवन्त दस्तावेज़ हैं।
पिछले दिनों हिन्दी समाज, हिन्दी कविता, भारतीय राजसत्ता एवं उसके विमर्श से गाँव, किसान एवं उसकी चिन्ताएँ ग़ायब होती गई हैं। एकान्त ने उन ग़ायब होते समूहों को अपनी कविताओं में दर्ज किया है। उनकी कविताएँ समाज में हो रहे अनेक सूक्ष्म परिवर्तनों, उस पर आम आदमी की प्रतिक्रियाओं को डॉक्यूमेंट कर उन्हें अत्यन्त सहज एवं मानवीय लोकेशन में अवस्थित कर आज के समय में प्रभावी हस्तक्षेप करती दिखती हैं।
इस संकलन में एक लम्बी कविता ‘डूब’ संकलित है जो भारत में जनजातीय समाजों के विस्थापन की पीड़ा को कविता-विमर्श का विषय बनाती है। वे एक समर्थ कवि हैं। अपने समय को कविता में लाना वे बख़ूबी जानते हैं। प्रिंट एवं मीडिया के शोर में आज जब हिन्दी काव्य-परिदृश्य में काव्यविहीन कविताएँ अच्छी कविताओं की जगह आकर क़ाबिज़ हो गई हैं, एकान्त के इस संकलन की कविताएँ हिन्दी की बेहतरीन कविताओं का नमूना प्रस्तुत करती हैं।
—बद्री नारायण
Pathron Ka Kya Hai
- Author Name:
Vinay Vishwas
- Book Type:

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यशस्वी युवा कवि विनय विश्वास का यह पहला कविता-संग्रह है। अपने समय के सच से टकराते संवेदनशील मनुष्य के अनुभव इनकी कविताओं का आधार हैं। न यह सच एक जैसा है, न इससे टकराव के अनुभव—इसलिए ये कविताएँ भी एकायामी नहीं। न इनमें प्रकृति और मनुष्य को अलग-अलग किया जा सकता है, न युगीन वास्तव और व्यक्तिगत संसार को। न राजनीति और परिवार को अलग-अलग किया जा सकता है, न शब्द और जीवन को। अनुभव की बहुलता और बहुस्तरीयता इनका ऐसा सच है, जिसने इन्हें दम्भी मुद्राओं की बनावट, कलात्मक दिखाई देनेवाली निरीहता और वहशी अराजकता से बचाकर ज़िन्दगी के प्रति सच्ची कविताएँ बनाया है।
इन कविताओं की सच्चाई उन पर बड़ी सहजता से व्यंग्य करती है, जो धर्म-ईमान की सौदागरी बड़े गर्व से किया करते हैं, दूसरों की मौत से अपनी साँसें खींचा करते हैं, पानी की तरह हर रंग में मिल जाया करते हैं और इनसान होते हुए भी कभी मक्खियों तो कभी केंचुओं को मात दिया करते हैं। इन कविताओं की सच्चाई उन सपनों की लड़ाई में कन्धे से कन्धा मिलाए जूझती है, जिनका भरोसा ईमानदारी और मेहनत की अप्रासंगिक होती पूँजी पर अब भी क़ायम है। इन कविताओं की सच्चाई सम्बन्धों के लगातार क्रूर होते इस्तेमाल का विरोध भी करती है और टूट-टूटकर बनते हुए नए मनुष्य के सौन्दर्य को जीती भी है। इन कविताओं की सच्चाई संवेदनात्मक उद्देश्य की मिट्टी से फूटते वैचारिक भावों के उन अंकुरों की पक्षधर है, जो हवा के ज़हर को ऑक्सीजन की तरह सर्जनात्मक चुनौती देने के लिए ही जन्मे हैं। इन कविताओं की सच्चाई रचना के हर स्तर पर अनुभव से नाभिनालबद्ध होने के कारण अतिरिक्त तराश या सपाटता से मुक्त है। इसीलिए इनमें से बहुत-सी कविताओं को जिस उत्सुकता के साथ पढ़ा गया है, उसी उत्साह के साथ सुना भी गया है।
सम्प्रेषण के संकट से दो-चार होती समकालीन कविता के दौर में ये कविताएँ प्रमाण हैं कि पाठकों और श्रोताओं को एक साथ प्रभावित करनेवाली कविताई बिना कोई रचनागत समझौता किए अब भी सम्भव है। निःसंकोच कहा जा सकता है कि पढ़ी और सुनी जानेवाली कविताओं के बीच की गहरी खाई को पाटते हुए सम्प्रेषण के संकट को सर्जनात्मक तरीक़े से हल करने में इन कविताओं की भूमिका उल्लेखनीय है।
Maine Garha Hai Apna Purush
- Author Name:
Anupam Singh
- Book Type:

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अनुपम सिंह इक्कीसवीं सदी की सम्भावना पूर्ण स्त्री-कविता की प्रखर आवाज़ हैं। उनकी कविताओं में एक छोटी लड़की झाँकती है जो पूरे सजग भाव से अपने आसपास सब कुछ देख रही है लेकिन सम्भवत: चुप करा दी गई है। यह चुप्पी कविताओं में आकर खुलती है और पूरी बेबाकी के साथ अपने जीवन, परिवेश और व्यवस्था को तार-तार कर देती है।
अनुपम की कविताएँ गहरे दुख की कविताएँ हैं। दुख जो स्त्री-जीवन में शोकगीत बनकर बसा है; दुख, जिसे हर किसान, शोषित-पिछड़े वर्ग का व्यक्ति और स्त्रियाँ अपने जीवन का स्थायी भाव मान चुके हैं।
जीवन की त्रासदी के इस मानचित्र का एक बड़ा हिस्सा स्त्रियों और उनके अभिशप्त जीवन के नाम है। वे स्त्रियाँ जो कठिन श्रम करते हुए, अधिकारविहीन और निरानन्द जीवन जीती हैं और हर बार जिस परिवार, समाज में वे जीती आई हैं उससे बेदख़ल कर दी जाती हैं। अनुपम ने ऐसी कई नाइंसाफ़ियों को क़रीब से देखा और महसूस किया है। अपमान और अवहेलना के अनेक ऐसे अध्याय जिनको समाज ने सामान्यीकृत करके स्वीकार कर लिया, फिर चाहे त्वचा के रंग पर ताना देने का प्रचलन हो या परिवार में ही बच्चियों की पीठ पर हाथ फेरते पुरुषों की वासना। सब उस व्यवस्था में विन्यस्त है। ‘थोड़ा कहे को बहुत समझना’ के कौशल से इन कविताओं में एक परा-इतिहास की रचना हुई है। स्त्री-कविता की धार इसी से है कि उसने दूर देखने वाले बाइस्कोप का लेंस बदल दिया है। वह अपने आस-पास के छोट-बड़े आख्यानों से इतिहास को परा-इतिहास के रूप में पहचान रही है। एक समानांतर दुनिया।
अनुपम सिंह ने इन कविताओं में एक और वर्जित क्षेत्र में प्रवेश किया है। उन्होंने स्त्री देह के रहस्यों, उसकी इच्छा-आकांक्षा और यौनिकता के अनुभवों को बड़े करीने से काग़ज़ पर उतारा है। ऐसा करने के लिए भाषा को भी नए सिरे से साधना पड़ता है। अनुपम ने यह कठिन काम किया। उनकी भाषा लोक और शास्त्र के बीच आवाजाही करती हुई स्त्री-जीवन में यौन-अनुभवों के सुख और आनन्द को सहेजती है। इन कविताओं की सघन बिम्बात्मक प्रस्तुति उस अनुभव की उद्दामता को बचा ले जाती है। यहाँ दो स्त्रियों के प्रेम में होने के अनुभव को भी उसकी मुलायमियत और पूरे सम्मान के साथ रचा गया है। इस अर्थ में यौनिकता के सवाल स्त्री-अस्मिता की नए सिरे से शिनाख़्त करने की कोशिश है जहाँ मन और देह अलग नहीं हैं।
—रेखा सेठी
Tumhen Saunpta Hun
- Author Name:
Trilochan
- Book Type:

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पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी कविता के परिदृश्य में त्रिलोचन की कविता का महत्त्व असाधारण रूप से बढ़ा है। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि इस महत्ता की स्वीकृति में पेशेवर साहित्य मर्मज्ञों और तथाकथित अकादमियों का योगदान न के बराबर रहा है। अगर पिछले कुछ वर्षों की लघु-पत्रिकाएँ उठाकर देखा जाए तो यह स्पष्ट लगेगा कि युवा कवियों ने अपने समय की सांस्कृतिक जड़ता के ख़िलाफ़ त्रिलोचन की रचनाशीलता में एक नई ताज़गी और ऊर्जा का अनुभव किया है, अपने समय की रचनात्मक चुनौतियों से निपटने के लिए उनकी रचनाएँ एक योद्धा के रूप में उनके सामने उभरीं। ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ उनकी कविताओं का एक विशिष्ट संग्रह है, जिसमें उनकी सन् 1935 से 83 तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएँ शामिल हैं। इतने लम्बे कालक्रम में बिखरी इन कविताओं में आप कवि के रचनात्मक विकास की अनेक मंज़िलों से साक्षात्कार करेंगे। वास्तव में त्रिलोचन की कविताएँ दु:खों और विपदाओं के अपार समुद्र में मानवीय सौन्दर्य, प्रेम, आशा और स्वप्न का एक ऐसा घनीभूत पुंज हैं जो हमारे भीतर जीवन के प्रति अगाध विश्वास जगाता है। छोटी-
बड़ी इक्यासी कविताओं का यह संग्रह कवि के व्यक्तित्व के कुछ ऐसे आयामों को भी सामने लाता है, जिनसे हिन्दी जगत प्राय: अपरिचित ही रहा है।
इस संग्रह के शान्ति पर्व वाले खंड में त्रिलोचन के चार काव्य रूपक भी शामिल किए गए हैं जो उन्होंने दूसरे महायुद्ध के नरसंहार की पृष्ठभूमि में लिखे थे। जीवन को विध्वंस की आग में झोंकनेवाली शक्तियों के ख़िलाफ़ त्रिलोचन की कविताएँ किसी गुरिल्ला सैनिक की तरह हमारे भीतर प्रवेश करती हैं। यह उनकी कविताओं का ऐसा प्रतिनिधि संग्रह है जिसमें पूर्व संकलनों की कोई कविता भरसक नहीं आने पाई है।
Khoontiyon Per Tange Log
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena
- Book Type:

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‘खूँटियों पर टँगे लोग’ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का सातवाँ काव्य-संग्रह है, जिसमें शामिल अधिकतर कविताएँ 1976-1981 के बीच लिखी गई थीं। इन कविताओं में नियति और स्थिति को स्वीकार कर लेने की व्यापक पीड़ा है। यह पीड़ा कवि के आत्म से शुरू होकर समाज तक जाती है और फिर समाज से कवि के आत्म तक आती है और इस तरह कवि और समाज को पृथक् न कर, एक करती हुई उसके काव्य-व्यक्तित्व को विराट कर जाती है।
सम्प्रेषण की सहजता सर्वेश्वर की कविताओं का मुख्य गुण रहा है और इसकी कलात्मक साध इस संग्रह में और निखरी है। एक समर्थ कवि के स्पर्श से चीज़ें वह नहीं रह जातीं जो हैं—कोट, दस्ताने, स्वेटर सब-के-सब युग की चुनौतियों से टकराकर क्रान्ति, विद्रोह और विरोध से जुड़ जाते हैं। प्रतीकों और बिम्बों का ऐसा सहज इस्तेमाल दुर्लभ है। सर्वेश्वर का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। इतना व्यापक संवेदन-क्षेत्र वह रचते हैं कि उनके एक कवि में अनेक कवि देखे जा सकते हैं और सभी सर्वेश्वर हैं। उनकी काव्य-भाषा लोक से आकर इस तरह सम्भ्रान्त भाषा में मिल जाती है कि एक का खुरदरापन और दूसरे का चिकनापन अलग-अलग पहचान पाना कठिन हो जाता है।
वस्तुतः ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ की कविताएँ सर्वेश्वर की काव्य-भाषा को और आगे बढ़ाती हैं तथा समकालीन हिन्दी काव्य को भी, जिसका चरित्र मूल्यों के अभाव और व्यवस्था के दबाव में तेज़ी से बदल रहा है। यह बदलाव, बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के, सर्वेश्वर के इस संग्रह में आसानी से देखा जा सकता है।
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