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Aatmahatya Ke Paryay

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वर्ष 2002 में आए पहले संकलन ‘समय का हिसाब’ ने वन्दना देवेन्द्र को हिन्दी के कवियों की पहली पंक्ति में शुमार कर दिया। कवि राजेश जोशी ने उस वर्ष छपी कविता की किताबों की अपनी समीक्षा में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ कविता-संग्रह घोषित किया था। वन्दना की रचनाओं की गहराई, वैविध्य, विस्तार देखकर अचरज होता है। यह जानकर और भी अचम्भा होता है कि वे उत्कृष्ट मृदु गीतात्मक और निर्मम यथार्थवादी राजनीतिपरक कविताएँ समान दक्षता से लिख सकती हैं। वन्दना देवेन्द्र ने कविता के संसार में स्वयं के लिए जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, वे मुश्किल, खरे और ईमानदार हैं। ज़मीनी सोच, सरलता और निराडम्बर ने उनके काम पर धार रखी है। बहुत से मौलिक विषयों का चयन और एक अलहदा तरह का निर्वाह उनकी रचना-प्रक्रिया को और भी चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। वरिष्ठ कवि और चिन्तक विष्णु खरे ने लिखा है : ‘वन्दना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कविताओं में दिया भी है, किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है, या उनका कवि उनके चित्राकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीजा यह है कि उनकी कविता का कैनवास एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोट्रैट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब कुछ है।... उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख वर्ण भी हैं। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर समाज के बहुत से स्त्री-पुरुषों की जीवनी भी जानती हैं। ‘यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती।’ हिन्दी की कविता, कहानी की दुनिया में वन्दना ने अपनी प्रासंगिक उपस्थिति ही दर्ज नहीं कराई वरन् ‘सच यह है कि वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही है।’

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वर्ष 2002 में आए पहले संकलन ‘समय का हिसाब’ ने वन्दना देवेन्द्र को हिन्दी के कवियों की पहली पंक्ति में शुमार कर दिया। कवि राजेश जोशी ने उस वर्ष छपी कविता की किताबों की अपनी समीक्षा में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ कविता-संग्रह घोषित किया था। वन्दना की रचनाओं की गहराई, वैविध्य, विस्तार देखकर अचरज होता है। यह जानकर और भी अचम्भा होता है कि वे उत्कृष्ट मृदु गीतात्मक और निर्मम यथार्थवादी राजनीतिपरक कविताएँ समान दक्षता से लिख सकती हैं।

वन्दना देवेन्द्र ने कविता के संसार में स्वयं के लिए जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, वे मुश्किल, खरे और ईमानदार हैं। ज़मीनी सोच, सरलता और निराडम्बर ने उनके काम पर धार रखी है। बहुत से मौलिक विषयों का चयन और एक अलहदा तरह का निर्वाह उनकी रचना-प्रक्रिया को और भी चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।

वरिष्ठ कवि और चिन्तक विष्णु खरे ने लिखा है : ‘वन्दना एक (चर्चित) चित्रकार भी हैं और अपने इस फ़न का विनम्र, स्वाभाविक संकेत उन्होंने अपनी कविताओं में दिया भी है, किन्तु हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि शायद उनकी चित्रकार-प्रतिभा उन्हें भारतीय मानवीयता की विभिन्न रंगतों और सूक्ष्म तथा स्थूल रेखाओं को देखने में मदद करती है, या उनका कवि उनके चित्राकार के इस तरह काम आता हो, या दोनों ही वक़्त-ज़रूरत एक-दूसरे को प्रेरित करते हों। बहरहाल, नतीजा यह है कि उनकी कविता का कैनवास एक अद्भुत वैराट्य लिए हुए है और उसमें स्टिल लाइफ़, पोट्रैट, व्यक्ति-समूह, लैंडस्केप (जो उनकी पर्यावरण-चेतना का हिस्सा है), पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंग आदि सब कुछ है।... उनकी रचनाओं में यदि निजी, पराए और वृहत्तर सामाजिक दु:ख-तकलीफ़ों के गाढ़े रंग हैं तो छोटी-बड़ी ख़ुशियों, विसंगतियों, चुनौतियों, शरारत और व्यंग्य के शोख़-चटख वर्ण भी हैं। एक स्तर पर वे अमेरिकी राष्ट्रपति से भारतीय लुम्पेन राजनेताओं तक को, यानी भूमंडलीय से देशी राजनीति तक को, पहचानती हैं तो दूसरे स्तर पर समाज के बहुत से स्त्री-पुरुषों की जीवनी भी जानती हैं।

‘यह देखकर हैरत होती है कि उन्होंने यह सब एक ऐसी भाषा और शैली में उपलब्ध किया है जो अपनी सादगी में इतनी कारगर हैं कि उन्हें शब्दों या शिल्प के चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ती।’ हिन्दी की कविता, कहानी की दुनिया में वन्दना ने अपनी प्रासंगिक उपस्थिति ही दर्ज नहीं कराई वरन् ‘सच यह है कि वे उस वृहत्तर सर्जक पीढ़ी में शामिल हैं जो रघुवीर सहाय के बाद हिन्दी कविता को अपूर्व विस्तार, वैविध्य और समृद्धि प्रदान कर रही है।’

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2010
Weight
256 grams
ISBN-13
9788126718832
Pages
100
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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