Bina Deewaron Ke Ghar
Author:
Mannu BhandariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Available
‘बिना दीवारों के घर’ का जो घर है उसकी दीवारें हैं, लेकिन लगभग ‘न-हुईं’ सी ही। एक स्त्री के ‘अपने’ व्यक्तित्व की आँच वे नहीं सँभाल पातीं, और पुरुष, जिसको परम्परा ने घर का रक्षक, घर का स्थपति नियुक्त किया है, वह उन पिघलती दीवारों के सामने पूरी तरह असहाय! यह समझ पाने में क़तई अक्षम कि पत्नी की परिभाषित भूमिका से बाहर खिल और खुल रही इस स्त्री से क्या सम्बन्ध बने! कैसा व्यवहार किया जाए! और यह सारा असमंजस, सारी दुविधा और असुरक्षा एक निराधार सन्देह के रूप में फूट पड़ती है। आत्म और परपीड़न का एक अनन्त दुश्चक्र, जिसमें घर की दीवारें अन्ततः भहरा जाती हैं।</p>
<p>स्त्री-स्वातंत्र्य के संक्रमण काल का यह नाटक ख़ास तौर पर पुरुष को सम्बोधित है और उससे एक सतत सावधानी की माँग करता है कि बदलते हुए परिदृश्य से बौरा कर वह किसी विनाशकारी संभ्रम का शिकार न हो जाए, जैसे कि इस नाटक का ‘अजित’ होता है।
ISBN: 9788171197590
Pages: 100
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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महान रूसी लेखक नि. व्. गोपाल की कालजयी कृति 'दी गवर्नमेंट इंस्पेक्टर' पर मूलतः आधारित संजय सहाय का हिंदी नाटक जांच-पड़ताल उस व्यथा और तंत्र के मानव-द्रोही भ्रष्ट चरित्र को परत-दर-परत खोलता है, जिसके बीच हम रहने और जीने के लिए लगभग अभिशप्त हैं ! यथार्थ के विचलित कर देनेवाले उत्ताप और तीखे दंश के सहारे यह नाटक कहीं-न-कहीं हमें भी अपनी ही नजरों के आगे परख व् पहचान के लिए खड़ा करता है ! एक बेमुरौवत कठघरे में-जहाँ से जीवन-सन्दर्भों की न केवल एक नई कारगर पहचान व् प्रतीति होती है; बल्कि अर्थपूर्ण बदलाव की शुरुआत भी होती है !
भाषा, रूप, चरित्र, अंतर्वस्तु और अर्थध्वनियों के स्तर पर दिक् और काल के अपार आयामों में गूंजती हुई गोगोल की सशक्त कृति के भीतर से सर्जनात्मक अंतर्यात्रा करते हुए 'जांच-पड़ताल' के लेखक ने समसामयिक भारतीय संदर्भो में अपरोक्ष अभिप्रायों से लैस एक नई रंग-आकृति रचने-ढालने की कोशिश की है ! अनुकृति या अंतरण से भिन्न यह नाट्य-रचना देश, समाज, भाषा और युग के भिन्न संदर्भो में मूल कृति का ही पुनराविष्कार है, जिसमे उनकी अशेष रचनात्मक संभावनाओं का संदोहन है ! हम इसे गोगोल की आधारभूत कृति का हिंदी तदभव कह सकते हैं !
Mere Bachche
- Author Name:
Arthur Miller
- Book Type:

- Description: अमेरिका ही नहीं, विश्व के श्रेष्ठ नाट्यकार आर्थर मिलर का नाटक ‘ऑल माइ संस’ एक ऐसी ही कृति है जो एक ओर व्यक्तिगत स्वार्थ एवं संकुचित दृष्टिकोण तथा दूसरी ओर सामाजिक हित एवं सहज मानवीयता के संघर्ष को मूर्त करती है। यह संघर्ष तब और अर्थपूर्ण तथा मार्मिक हो उठता है जब हम इसके एक छोर पर पिता को और दूसरे छोर पर पुत्र को पाते हैं। जिओ केलर सेना के लिए दागी सिलिंडर दे देते हैं जिसके फलस्वरूप 21 पायलट मर जाते हैं। यद्यपि इसके लिए वे पकड़े जाते हैं पर चालाकी से सारा दोष अपने साझीदार के सिर डाल वे मुक्त हो जाते हैं। जब इस तथ्य का उनके पुत्र क्रिस केलर को पता चलता है तो वह अत्यन्त क्षुब्ध होता है; देश के प्रति, देशवासियों के प्रति ऐसा जघन्य अपराध करने के लिए पिता को जेल ले जाने को तैयार हो जाता है। पिता अपनी भूल स्वीकार करते हैं और अपने को गोली मारकर उस भूल का प्रायश्चित्त करते हैं। विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में लिखे गए इस नाटक का कथानक सार्वभौम महत्त्व का है; ऐसी स्थिति किसी भी देश, किसी भी काल में पाई जा सकती है जब लोभ के कारण, व्यक्ति स्वार्थ के लिए एक व्यक्ति देश एवं समाज का बहुत बड़ा अहित कर बैठता है। हम सही मायनों में लड़ाई की विभीषिका से भले ही न गुज़रे हों, पर आए दिन जनकल्याण के कामों में जो धोखाधड़़ी, लूट-खसोट दिखलाई पड़ती है वह कम बड़ा अपराध नहीं है, उसका ‘ऑल माइ संस’ की घटनाओं से अद् भुत साम्य प्रतीत होता है।
Shreshth Bharatiya Ekanki : Vol. 2
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

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Description:
आज रंगमंच के उपयुक्त सशक्त नाटकों की शायद सबसे अधिक आवश्यकता है। क्योंकि टी.वी. और फ़िल्मों द्वारा फैलाए गए प्रदूषण को सशक्त नाटक ही सही चुनौती दे सकते हैं, परन्तु इस दृष्टि से वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक दिखाई नहीं पड़ता। विभिन्न भारतीय भाषाओं में अच्छे नाटकों का लगातार अभाव होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में रंगमंच के योग्य उत्कृष्ट नाटकों का परस्पर आदान-प्रदान हो। इस तरह का एक प्रयत्न भारतीय भाषा परिषद् द्वारा किया गया है।
दो खंडों में प्रकाशित 'श्रेष्ठ भारतीय एकांकी’ के खंड—दो में असमिया, उर्दू, गुजराती, तमिल, तेलुगू तथा मलयालम के श्रेष्ठ एकांकी संकलित हैं। इसमें रंगमंच के उपयुक्त एकांकी ही प्रायः चुने गए हैं। विभिन्न विभागों का सम्पादन सम्बन्धित भाषाओं के अधिकारी विद्वानों द्वारा किया गया है।
उन्होंने भूमिकाओं में अपनी-अपनी भाषा के नाटक और एकांकी साहित्य के विकास और विशिष्टताओं का गहरा विवेचन किया है। इनसे पाठकों को सम्बन्धित भाषाओं के अवदान की पर्याप्त जानकारी मिल सकेगी। एकांकियों के हिन्दी अनुवाद अत्यन्त प्रामाणिक अनुवादकों द्वारा करवाए गए हैं, ताकि नाटक के कथ्य और नाट्य-भाषा दोनों की रक्षा की जा सके।
'एकांकी' विधा एक तरह से वर्तमान युग का अवदान और आन्दोलन है। अपने समय की ज्वलन्त समस्याएँ और चिन्ताएँ इनके मूल में होती हैं। ऐसी कृतियाँ एक बड़े पाठक और दर्शक समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना आज हमारे समय की माँग है।
आशा है, यह संकलन इन अर्थ में भी उपादेय होगा।
Rang Kolaj
- Author Name:
Devendra Raj Ankur
- Book Type:

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Description:
रंग कोलाज रंगमंच के कुछ अनिवार्य सवालों पर उत्तेजक बहस छेड़ती है। इसमें अभिनेता, निर्देशक, नाट्य रचना, नुक्कड़ नाटक, कहानी मंचन के बहाने रंगमंच के बदलते स्वरूप और समीकरणों को कई स्तरों पर परखने की कोशिश की गई है। कुछ सैद्धान्तिक सवाल उठाए गए हैं तो दूसरी ओर प्रयोग के धरातल पर भी संवाद बनाने की शुरुआत की गई है।
साहित्य के अध्येता और सक्रिय रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर का यह अध्ययन हिन्दी रंगकर्म के विद्यार्थियों और सुधी पाठकों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। अभिनेता की रचना प्रक्रिया, भारतीय रंगमंच में एकल अभिनय, अभिनेता और दर्शक के आपसी सम्बन्ध, नुक्कड़ नाटकों के व्याकरण, उनकी परम्परा तथा नाटककार और निर्देशक के अन्तर्सम्बन्धों पर अपने अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में प्रकाश डालने के अलावा इस पुस्तक में लेखक ने कृष्ण बलदेव वैद और काशीनाथ सिंह की रचनात्मकता पर भी एक रंगकर्मी-आलोचक की हैसियत से पर्याप्त प्रकाश डाला है।
विवेचनात्मक आलेखों के साथ-साथ इस पुस्तक में दो नाटकों के अनुवाद भी शामिल हैं, और, साथ ही महेश आनन्द द्वारा अंकुर जी से लिया गया एक साक्षात्कार भी जो इस पुस्तक की उपयोगिता को और ज़्यादा बढ़ा देता है।
Fuziyama
- Author Name:
Bhisham Sahni
- Book Type:

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Description:
फ़ूज़ीयामा रूसी लेखक चिंगेज़ आइतमातोव तथा कलताई मोहम्मेजानोव की रोचक नाट्य-कृति है।
अनुवादक के शब्दों में "चिंगेज़ आइतमातोव मुख्यतः एक कथाकार के रूप में ही जाने जाते थे। इतना ही नहीं, 1960 से ही वह एक नई विधा अपना रहे थे–वह अपनी कृतियों में मिथकों और गाथाओं का प्रयोग करने लगे थे। यह, समाजवादी यथार्थवाद की सपाट सीधी लीक से हटकर नया रुख अपनाने का प्रयास था; साथ ही साथ अपने सांस्कृतिक विरसे के प्रति पाई जाने वाली दृष्टि पर पुनर्विचार करने का प्रयास भी। इतना ही नहीं, ब्रेजनेव के शासनकाल में सेंसर की कैंची से बचने के लिए, सांकेतिक प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग बुद्धिजीवियों के लिए नितांत आवश्यक होता जा रहा था। जमाना बदल गया था, ख्रुश्चेव-शासन का वह छोटा-सा कालखंड, जब लिखने-बोलने की कुछ आजादी मिलने लगी थी, अब खत्म हो चुका था। फिर से दमन का दौर आ गया था और मतभेद रखनेवालों को जेलखानों और पागलखानों में ठूँसा जाने लगा था...‘‘फ़ूज़ीयामा उन समस्याओं से साक्षात् करता है, जिनका संबंध विशेष रूप से सोवियत इतिहास से है; साथ ही वह ऐसे सवाल भी उठाता है जो विश्वव्यापी स्तर पर मानव स्वभाव से जुड़े हैं–चाहे वह बुद्धिजीवियों की विकट स्थिति रही हो, या मनुष्य के अंतःकरण से सम्बद्ध प्रश्न।’’
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