Aas-Pados
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यह ‘आस-पड़ोस’फ़िल्मकार, गीतकार, शायर और कहानीकार गुलज़ार के तीन ड्रामों से मिलकर बना-बसा है। गुलज़ार जिस तरह अल्फ़ाज़ से मनचाहा काम लेते हैं, उसी तरह उन्होंने ‘आस-पड़ोस’में फॉर्म्स को नई शक्ल दी है। लेकिन यह बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है वह जो इन ड्रामों में कही गई है, बल्कि बहुत सारी बातें। ‘ख़राशें’का सब्जेक्ट दंगे और उनके बीच जीता-लड़ता-मरता-भागता आम आदमी है, और हिन्दू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान होने की उसकी उलझनें हैं जिन्हें सियासत बीच-बीच में कठिन से कठिनतर करती जाती है। ‘लकीरें’उन्हीं सरहदों के बारे में है जो हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच खींची गई हैं। वे लकीरें जिन्हें अवाम के दिलों ने अब तक भी पूरी तरह क़ुबूल नहीं किया, लेकिन सरकारें उन्हीं से अपने कितने काम साधती रहती हैं! ‘अठन्नियाँ’में हमारी मुलाक़ात शहर मुम्बई और उसके तारीक हाशियों में ज़िन्दगी की जंग लड़ते लोगों से होती है। कहानियों और नज़्मों की इस बस्ती में दु:खों की भीड़ी-सीलीं गलियाँ भी हैं, और इनसान के हौसलों और ज़िन्दा रहने की ज़िदों का खुला बहुरंगी आसमान भी है। घने अहसास और हमारे दौर की एक पकी हुई क़लम से उतरी इस बस्ती से आप बार-बार गुज़रना चाहेंगे जिसका ख़ाका कहानियाँ खींचती हैं और उस ख़ाके को साँस की गर्मी और आँखों की नमी देने का काम नज़्में करती हैं।
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यह ‘आस-पड़ोस’फ़िल्मकार, गीतकार, शायर और कहानीकार गुलज़ार के तीन ड्रामों से मिलकर बना-बसा है। गुलज़ार जिस तरह अल्फ़ाज़ से मनचाहा काम लेते हैं, उसी तरह उन्होंने ‘आस-पड़ोस’में फॉर्म्स को नई शक्ल दी है। लेकिन यह बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है वह जो इन ड्रामों में कही गई है, बल्कि बहुत सारी बातें। ‘ख़राशें’का सब्जेक्ट दंगे और उनके बीच जीता-लड़ता-मरता-भागता आम आदमी है, और हिन्दू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान होने की उसकी उलझनें हैं जिन्हें सियासत बीच-बीच में कठिन से कठिनतर करती जाती है। ‘लकीरें’उन्हीं सरहदों के बारे में है जो हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच खींची गई हैं। वे लकीरें जिन्हें अवाम के दिलों ने अब तक भी पूरी तरह क़ुबूल नहीं किया, लेकिन सरकारें उन्हीं से अपने कितने काम साधती रहती हैं! ‘अठन्नियाँ’में हमारी मुलाक़ात शहर मुम्बई और उसके तारीक हाशियों में ज़िन्दगी की जंग लड़ते लोगों से होती है। कहानियों और नज़्मों की इस बस्ती में दु:खों की भीड़ी-सीलीं गलियाँ भी हैं, और इनसान के हौसलों और ज़िन्दा रहने की ज़िदों का खुला बहुरंगी आसमान भी है। घने अहसास और हमारे दौर की एक पकी हुई क़लम से उतरी इस बस्ती से आप बार-बार गुज़रना चाहेंगे जिसका ख़ाका कहानियाँ खींचती हैं और उस ख़ाके को साँस की गर्मी और आँखों की नमी देने का काम नज़्में करती हैं।
Book Details
-
ISBN9788196148706
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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राबर्ट वाइज़ द्वारा निर्देशित, आर्थर लॉरेंट्ज द्वारा लिखित, जेरोम डी. रॉबिंस द्वारा नृत्य-संयोजित, नियोनिद बार्नस्टीन द्वारा संगीत और स्टीवन सोंघीम द्वारा लिखे गए गीतों से सुसज्जित फ़िल्म ‘वेस्ट साइड स्टोरी’ सिर्फ़ अपने दस ऑस्कर अवाडर्स की भीड़ की वजह से ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि विलियम शेक्सपियर के ‘रोमियो एंड जूलियट’ से प्रेरित यह ब्राडवे म्यूजिकल क्लासिक कई मायनों में दुनिया के आधुनिक थिएटर इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है। ‘एक्ट-वन’ ने अपना अगला नाटक चुन लिया था जिसे नाटक से अधिक दुस्साहस कहना उचित होगा। ‘वेस्ट साइड स्टोरी’ का नया नामकरण हुआ...‘जब शहर हमारा सोता है’।
नाटक पढ़ा गया। फ़िल्म देखी गई। और गद्गद होने की प्रक्रिया से उबरने के बाद सर्वसम्मति से फ़ैसला हुआ कि अब इस स्क्रिप्ट को एक तरफ़ रख दिया जाए। हमारी स्क्रिप्ट हमारी होगी जिसमें हमारे चरित्र होंगे, हमारी सिचुएशंस होंगी, हमारे दृश्य होंगे, हमारे गीत और संगीत के साथ हमारा अपना हिन्दुस्तान होगा।
आज से चार सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी के आगमन के परिणामों को भोगता हुआ हमारा ख़ूबसूरत मुल्क 1947 और 1984 को छूता हुआ आज जब गोधरा से एक क़दम आगे जाने की छटपटाहट से गुज़र रहा है, तो ‘शहर...’ के ज़िन्दा होने का अहसास पहले से भी ज़्यादा मुखर और प्रखर हो जाता है।
Kamla
- Author Name:
Vijay Tendulkar
- Book Type:

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Description:
कमला इस पुरुष प्रधान समाज में शताब्दियों से जिन्दा है। कहीं उसे बाजार हाट से पशुओं की तरह खरीद लिया जाता है तो कहीं दान-दहेज में लिपटी चीज की तरह प्राप्त किया जाता है। नाम चाहे उसका सरिता हो या कुछ और, रहती वह कमला ही है। लेकिन इस मुर्दा समाज में शताब्दियों से जिन्दा यह नारी-देह आखिर कब तक रूह-विहीन रखी जाएगी, यह सवाल कमला में पूरी गम्भीरता से उठाया गया है।
सुविख्यात मराठी नाटककार विजय तेन्दुलकर की यह नाट्यकृति हिन्दी रंगमंच और साहित्यिक हलकों में विशेष चर्चित रही है। विशेषकर इसलिए भी कि पत्रकारिता के कैरियरिस्ट दिमाग से अखबारी पन्नों पर उछाली गई कमला जिस समाज-व्यवस्था और मानसिक सड़ाँध का परिणाम है, उसकी ओर भी सार्थक संकेत किया गया है। हमारे समाज के तथाकथित आभिजात्य, उसके आयातित सांस्कृतिक मिजाज और जगमग सभ्यता का यह ढोंग ही होगा कि वह अपनी मानवीय संवेदना और सामाजिक जागरूकता का ढोल पीटता फिरे तथा अधिसंख्य अनपढ़ आम भारतीय को बड़े घरानों के अंग्रेजी अखबारों के जरिये सचेत करने की डींग हाँके। काका के माध्यम से इस अखबारी प्रवृत्ति पर तेन्दुलकर ने गहरी चोट की है। नारी की खरीद- फरोख्त और उसकी गुलामी को सप्रमाण पेश करने- वाले पत्रकार जयसिंह जाधव का असली नारी-दर्शन क्या है, इसे सरिता के प्रति उसके व्यवहार से जाना जा सकता है । साथ ही एक अर्थपूर्ण संकेत इसमें यह भी है कि पत्नी के रूप में सरिता को अपनी परतंत्रता का बोध अपने स्वतंत्रचेता पति के बजाय उसी कमला से हुआ जो गुलाम और गुलामी के प्रमाणस्वरूप इस नाटक के केन्द्र में है। वास्तव में विजय तेन्दुलकर की यह नाट्यरचना नारी-मुक्ति आन्दोलन के इस युग में उन बुनियादी सवालों तक ले जाती है, जहाँ से इस विषय पर एक कारगर बहस शुरू हो सकती है।
Harit Nongjabi
- Author Name:
Maharaj Kumari Binodini Devi
- Book Type:

- Description: ‘हरित नोङ्जाबी’ महाराज कुमारी बिनोदिनी देवी का बहुचर्चित नाटक है जिसकी सिर्फ उनके लेखन में नहीं अपितु आधुनिक मणिपुरी साहित्य में उल्लेखनीय स्थान है। ‘नोङ्जाबी’ शब्द का आशय वर्षा ऋतु में दिखाई देने वाले ताम्रवर्णी आभा से युक्त उन बादलों से है जिन्हें वर्षा ऋतु के विराम ले लेने का संकेत माना जाता है। वस्तुत: नोङ्बाजी का शाब्दिक अर्थ है—वर्षा या बादल का भक्षक जिसका प्रयोग लेखक ने प्रेम को खा जाने वाले समय और समाज को रूपायित करने के लिए किया है। बिनोदिनी इस नाटक में उस प्रतिगामिता को उजागर करती हैं जो न केवल प्रेम को बल्कि कला को भी हेय सिद्ध करने रीति-नीतियों का समर्थन करती है, और जीवन के प्रति रचनात्मक दृष्टि को हतोत्साहित करती हुई मनुष्य की रचनात्मकता को निरे उत्पादन में जोत देना चाहती है। इसके अलावा इस संकलन में दो रेडियो नाटक भी संकलित हैं जिनमें मणिपुरी समाज की स्थानीय परिस्थितियों, आकांक्षाओं और सपनों को कुशलतापूर्वक चित्रित किया गया है। हिन्दी में इन्हें प्रस्तुत करते हुए विशेष रूप से यह ध्यान में रखा गया है कि वे शब्द जो मणिपुरी जीवन व भाषा का आस्वाद हम तक पहुँचाते हैं, उन्हें जस-का-तस रखा जाए; और उनके अर्थ दे दिए गए हैं। सुरुचिपूर्ण ढंग से लिखित और उतनी ही सजगता से अनूदित मणिपुरी साहित्य की ये प्रतिनिधि रचनाएँ हिन्दी पाठकों को महत्त्वपूर्ण लगेंगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Son Sagar
- Author Name:
Habib Tanvir
- Book Type:

- Description: सोन सागर को हबीब तनवीर ने सन् 1981 में श्रीराम सेंटर, नई दिल्ली में प्रस्तुत किया था। इस नाटक की नायिका चन्दा एक सशक्त महिला चरित्र के रूप में सामने आती है। वह जीवनसाथी स्वयं चुनने के अधिकार की बात उठाकर एक खुली सोच का उदाहरण रखती है। यह नाटक मूलकथा लोरिक और चन्दा की प्रेम-कहानी है जो छत्तीसगढ़ में ‘चन्दैनी’ और बिहार में ‘लोरिकायन’ के नाम से प्रसिद्ध है। मूलत: एक ही कथा होने के बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में इसके भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं। नाटक में ढालने के लिए मूल कथा में रचनात्मक बदलाव किया गया। कथा एवं चरित्रों के कुछ खास पक्षों पर जोर देकर इसे समकालीन परिप्रेक्ष्य प्रदान करने के लिए इसमें गीत रखे गए। वस्तुत: गीतों में टिप्पणी के जरिये यह काम किया गया। नाटक में कहानी के ग्राम्य तत्वों को प्रमुखता दी गई है तथा कहानी के अलौकिक पक्ष को छोड़ दिया गया है। कुछेक गीतों की धुनें तो चन्दैनी की पारम्परिक धुनों पर ही आधारित हैं।
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