Maatigaari
Author:
Hrishikesh SulabhPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Available
‘बिदेसिया’ के विन्यास के बावजूद संरचनात्मक गठन एक नए ही शिल्प की तरफ़ इशारा करता है जो सुलभ की अपनी निर्मिति है। मौलिकता का एक सबूत तो इनकी अभिव्यक्ति है जो समकालीन जीवन की विसंगतियों के ज़बर्दस्त प्रतिरोध से जन्मी हैं। पारम्परिक प्रविधि को समकालीन सन्दर्भों में रखकर सुलभ ने उसे समकालीन बनाया है और उसकी सम्प्रेषण–क्षमता का बहुविध विस्तार किया है। एक अर्थ में यह नाटक अपनी स्थानीयता का अतिक्रमण भी है, तो दूसरे अर्थ में स्थानीयता का केन्द्रीयकरण भी क्योंकि जब तक स्थानीयता केन्द्रीयता हासिल नहीं करती, तब तक वह सार्वजनिक जीवन की समग्र प्रस्तुति नहीं बनती।</p>
<p>‘माटीगाड़ी’ में सुलभ का नाट्यकौशल अपने पूरे रंग में है। प्रेम की केन्द्रीय संवेदना लेकर सुलभ ने इस नाटक में वसन्तसेना और चारुदत्त के प्रेम सम्बन्ध में अनेक स्तरों को पिरोया है, जिससे यह नाटक जातिवादी उन्माद, राजनीतिक पाखंड, सामाजिक विडम्बनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति बन गया है।</p>
<p>—ज्योतिष जोशी; ‘कथादेश’</p>
<p>‘मृच्छकटिकम्’ की काव्यात्मक संवेदना और शास्त्रीयता से मिलकर ‘बिदेसिया’ की लोकधर्मी चेतना नई नाट्यानुभूति देती है। शूद्रक का नाटक फिर से रचे जाने के क्रम में अपने बीजतत्त्वों का विकास करता है और समसामयिक हो उठता है। ‘माटीगाड़ी’ में हिन्दी तथा भोजपुरी का प्रयोग नए भाषिक स्वाद की अनुभूति कराता है।
ISBN: 9788126722273
Pages: 100
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्रस्तुत नाट्य शृंखला समाज के विभिन्न किरदारों को माध्यम बनाकर समाज के अमानवीय कृत्यों को उजागर कर यथार्थ को परदे के सामने लाती है। साथ ही जहाँ नाटक ‘वाह रे गोविन्दा वाह में’, मर्द दिवस की गुदगुदाने वाली परिकल्पना से पाठक और दर्शकों का जमकर मनोरंजन करती है वहीं ‘मैं इकबाल’ नाटक की रचना समाज के दिग्भ्रमित युवाओं को सच्ची और उजियारी राह पर लाने के लिए मशाल का काम करती है। नाटक की विषयवस्तु में किसी तरह का पांडित्य प्रदर्शन नहीं बल्कि अनछुए विषयों को बड़ी ही रोचकता के साथ स्पर्श किया गया है।
नाटक के हर दृश्य को मंच पर बड़ी सुगमता से दर्शाया जा सकता है। इसमें सन्देह नहीं। एक में हास्य रस की चाशनी है तो दूसरे में यथार्थ का कड़ुवा घूँट...।
He Ram
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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Description:
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का साहित्य के विभिन्न विधाओं में अपना एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। रेडियो-रूपकों का यह संग्रह 'हे राम' उन्हीं में से एक है। दिनकर जी की इस पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द, महर्षि रमण एवं महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों के जीवन को आधार बनाकर रूपक लिखे गए हैं। गाँधी जी पर जो रूपक दिया गया है, वह उनके जीवन के अन्तिम चार वर्षों की झाँकी प्रस्तुत करता है। वहीं स्वामी विवेकानन्द और महर्षि रमण वाले रूपक दोनों महात्माओं के सम्पूर्ण जीवन पर प्रकाश डालते हैं। इस तरह पुस्तक में इन तीनों महापुरुषों के प्रेरक जीवन की झलकियाँ तो मिलती ही हैं, उनके जीवन-दर्शन से भी हम गहरे परिचित होते हैं।
रेडियो-रूपक अँधेरे में मंचित कला का ही एक अदृश्य रूप होता है जिसे भाषा, संवाद, ध्वनि, संगीत आदि उपकरणों के ज़रिए ही सुना-समझा जा सकता है और उनके उद्देश्यों से जुड़ा जा सकता है। ऐसे में ये रेडियो-रूपक श्रवणीय तो हैं ही, अपनी पठनीयता में भी एक मिसाल हैं।
सामान्य पाठक के अतिरिक्त दिनकर-साहित्य के शोधार्थियों के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण कृति है 'हे राम'।
Chahakata Chauraha
- Author Name:
Varsha Das
- Book Type:

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Description:
style="font-weight: 400;">रेडियो नाटक एक स्वतंत्र विधा है जिसकी सम्पूर्ण अनुभूति संगीत के साथ प्रस्तुत उसके रेडियो प्रसारण से ही होती है। लेकिन पाठ के रूप में रेडियो नाटक को पढ़ना भी एक समग्र अनुभव है जो हिन्दी पाठक अनेक वरिष्ठ लेखकों द्वारा रेडियो के लिए लिखे नाटकों के माध्यम से प्राप्त कर चुके हैं।
यह नाटक-संकलन उसी शृंखला की एक कड़ी है जिसमें अनेक विधाओं में समान कौशल से सृजनशील रहीं कला समीक्षक, कथाकार और कवयित्री वर्षा दास के तीन नाटक संकलित हैं। शिक्षा, अपने अधिकारों के प्रति सजगता, आपसी रिश्तों और महिला सशक्तीकरण को विभिन्न पहलुओं से आँकते, रेखांकित ये सरल-सहज नाटक अपनी विधा के साथ तो न्याय करते ही हैं, पठनीयता की भी तमाम शर्तों को पूरा करते हैं।
एक सिद्धहस्त रचनाकार के रूप में अपनी कला और कल्पना से दृश्यों को साकार करती हुईं वर्षा दास इन नाटकों के माध्यम से हमें अपनी रचनात्मकता के एक नए आयाम से परिचित कराती हैं।
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