Rangayan
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पिछला चारि दशक सँ निरंतरताक संग प्रखरतापूर्वक मैथिली रंगमंच मे प्राण फुकनिहार समर्थ नाट्य निर्देशक कुणालक नव पोथी 'रंगायन' मैथिली नाटक एवं रंगमंचक साफ-सुथरा दर्पण अछि। एहन दर्पण जाहि मे मैथिली नाटक एवं रंगमंच अपन चेहरा संपूर्ण सामथ्र्य आ सीमाक संग निहारि सकैत अछि। कोनो भाषा मे नाटक पर नीक पोथीक अकाल। एहि अकाल बेला मे कुणाल अपन पोथी 'रंगायन' सँ मैथिली रंगमंचक लगभग सब कपाट (आयाम) खोलैत छथि। नाट्यालोचन मे नाट्येतर व्यक्तिक प्रवेश आ सामान्य आलोचनाक टूल्स सँ रंग समीक्षा, एहि विधाक विडंबना। कुणाल अनुभविये टा नहि अपितु सधल आ दक्ष निर्देशक रहलाहए। ई अकारण नहि जे ओ रंगशास्त्रक औजार सँ मैथिली नाटक आ रंगमंचक गंभीर सुधि लेब' मे पूर्ण समर्थ भेलाहए। कुणाल अपन रंग-आलोचना मे रंगपरंपरा, रंगशिल्प, रंगपीठ आ रंगभाषा आदि केँ सघन रूपें सम्पूर्ण रंगकर्म सँ जोडि़ दैत छथि। मैथिली नाट्यालोचन मे बहुत रास बात विस्तृत रूपें पहिल बेर कुणालजीक माध्यम सँ आबि रहल अछि जे स्वागतेय। समकालीन मैथिली रंगमंच, नाटक आ लोकनाट्य, रंगायन आ वातायन शीर्षक सँ चारि खंड मे विभाजित ई पोथी लगभग सम्पूर्ण मैथिली रंगमंचक खाका खींचैत अछि, संगहि एकर दशा, दिशा आ संभावनाक टोह लैत बेलाग, बेबाक मंतव्य सेहो दैत अछि। मैथिली रंगमंचक संग अन्य भारतीय भाषाक रंगमंच आ किछु वैश्विक रंगमंच सँ संवाद सेहो। रंग-अध्येताक संगहि छात्र सभक लेल सेहो बहुत उपयोगी पुस्तक। कुणालक संपूर्ण व्यक्तित्व रंगमय रहल अछि। आपादमस्तक रंगकर्मी। जाहि निष्ठा, ईमानदारी आ तत्परता संग कुणाल अपन जीवन मैथिली रंगमंचक नाम कयलनि, तकर निचोड़-अभिव्यक्तिक नाम अछि— 'रंगायन'। —कमलानन्द झा
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पिछला चारि दशक सँ निरंतरताक संग प्रखरतापूर्वक मैथिली रंगमंच मे प्राण फुकनिहार समर्थ नाट्य निर्देशक कुणालक नव पोथी 'रंगायन' मैथिली नाटक एवं रंगमंचक साफ-सुथरा दर्पण अछि। एहन दर्पण जाहि मे मैथिली नाटक एवं रंगमंच अपन चेहरा संपूर्ण सामथ्र्य आ सीमाक संग निहारि सकैत अछि। कोनो भाषा मे नाटक पर नीक पोथीक अकाल। एहि अकाल बेला मे कुणाल अपन पोथी 'रंगायन' सँ मैथिली रंगमंचक लगभग सब कपाट (आयाम) खोलैत छथि। नाट्यालोचन मे नाट्येतर व्यक्तिक प्रवेश आ सामान्य आलोचनाक टूल्स सँ रंग समीक्षा, एहि विधाक विडंबना। कुणाल अनुभविये टा नहि अपितु सधल आ दक्ष निर्देशक रहलाहए। ई अकारण नहि जे ओ रंगशास्त्रक औजार सँ मैथिली नाटक आ रंगमंचक गंभीर सुधि लेब' मे पूर्ण समर्थ भेलाहए। कुणाल अपन रंग-आलोचना मे रंगपरंपरा, रंगशिल्प, रंगपीठ आ रंगभाषा आदि केँ सघन रूपें सम्पूर्ण रंगकर्म सँ जोडि़ दैत छथि। मैथिली नाट्यालोचन मे बहुत रास बात विस्तृत रूपें पहिल बेर कुणालजीक माध्यम सँ आबि रहल अछि जे स्वागतेय। समकालीन मैथिली रंगमंच, नाटक आ लोकनाट्य, रंगायन आ वातायन शीर्षक सँ चारि खंड मे विभाजित ई पोथी लगभग सम्पूर्ण मैथिली रंगमंचक खाका खींचैत अछि, संगहि एकर दशा, दिशा आ संभावनाक टोह लैत बेलाग, बेबाक मंतव्य सेहो दैत अछि। मैथिली रंगमंचक संग अन्य भारतीय भाषाक रंगमंच आ किछु वैश्विक रंगमंच सँ संवाद सेहो। रंग-अध्येताक संगहि छात्र सभक लेल सेहो बहुत उपयोगी पुस्तक। कुणालक संपूर्ण व्यक्तित्व रंगमय रहल अछि। आपादमस्तक रंगकर्मी। जाहि निष्ठा, ईमानदारी आ तत्परता संग कुणाल अपन जीवन मैथिली रंगमंचक नाम कयलनि, तकर निचोड़-अभिव्यक्तिक नाम अछि— 'रंगायन'। —कमलानन्द झा
Book Details
-
ISBN9789391925673
-
Pages256
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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समकालीन मैथिली कविताक एक टा महत्त्वपूर्ण स्तंभ हरे कृष्ण झाक गद्य-लेखन मात्रा मे कम अवश्य छनि, मुदा कविक गद्यक विशिष्टता सभ सँ भरल-पुरल आ विचारशील लेखनक लेल एक टा नीक बानगी जकाँ। एहि पुस्तक मे हिनक कुल सात गोट आलेख छनि जाहि मे सँ एक हुनक कविता-संग्रह 'एना त नहि जे'क भूमिका थिक आ से अपन कथ्य-शिल्प मे हुनक आत्मकथ्य सदृश्य लगैत अछि। एक टा आरो भूमिका अछि जे विटमनक कविताक अनूदित पोथी 'ई थिक जीवन' लेल लिखल गेल छल। एहि आलेख सँ विश्व कविताक परिप्रेक्ष्य मे कवि-अनुवादक हरे कृष्ण झाक दृष्टि केँ बढिय़ा जकाँ बुझल जा सकैछ। अंतिम आलेख हुनक एक टा भाषणक अविकल प्रस्तुति थिक शेष चारि टा लेख मैथिली आलोचनाक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक। चारि मे सँ एक लेख थिक राजकमल चौधरीक कविता 'महावन' पर केंद्रित जे कि 'अंतिका'क राजकमल विशेषांक मे छपल छल आ कैक टा नव अर्थक संधान करैत ई लेख स्वतंत्र रूप सँ एक कविता पर केंद्रित आलोचनाक उत्कृष्ट आ विरल उदाहरण अछि। दोसर लेख धूमकेतुक प्रसिद्ध कथा 'छठि परमेसरी' पर केंद्रित मैथिली मे अपना तरह विशिष्ट प्रयास थिक। मनुक्खक जीवन धर्मक चक्र मे फँसि क' कोना लहूलुहान होइत अछि आ बजार तकर कोना दोहन करैत अछि, हरे कृष्ण जी तकर व्याख्या खूब गहींर जाक' सविस्तार कयलनि अछि। तकरा बाद रामकृष्ण झा 'किसुन' आ मायानंद मिश्रक कथा पर केंद्रित हुनक दू गोट महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक लेख छनि। जहिना सूझ-बूझ संग ओ किसुन जीक कथाक मर्म केँ बुझबाक प्रयास करैत छथि, प्राय: ओही आत्मीयता संग मायानंद मिश्रक कथाक सूक्ष्म पड़ताल सेहो करैत छथि। हरे कृष्ण झाक ई पुस्तक जत' हुनक विचार आ साहित्य-सरोकार केँ बुझै-जानैक कुंजी दैत अछि, ओतहि हुनक आलोचना भविष्यक आलोचक केँ बेसी ऊहिक संग काज करबाक लेल प्रेरित सेहो करैत अछि। —गौरीनाथ
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