Rukshat - The Departure
(3)
Author:
Sujit BanerjeePublisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
EnglishCategory:
Literary-fiction₹
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Where a story stops, another one begins. The thing with them is, they never walk alone. They always walk with a group of friends. Each reaches its climax. Then with a final gasp of mortality and despair, fade away. No, they never die; they multiply. To the extent that the original gets lost and new ones are born. Over and over again. Yes, they get lost. No, they never die. They live on, permanently etched in the book of time. And from there, we borrow them and bring them alive. Again. And again. Here are twenty-six of them, some standing alone and some chatting with their long-lost friends. When they depart, they leave a lingering fragrance of nostalgia and curiosity. What happened then? Twenty-six alphabets, twenty-six names, and twenty-six short stories. Each explores one unique emotion, taking you into the dark recess of the mind. Some are frothy, and most of them opaque. Most are standing alone, and some are facing a mirror, where the same story comes alive in two different ways through two other protagonists. Meet diverse characters - from the single-minded prostitute to the man on the railway's station br>Bereft of any memory; a woman desperate for a biological child to a dead man's trial. Meet a jealous lover with a twisted brain and a gay man's memory of a one-night encounter. Meet twenty-six such characters arrested and sentenced for life inside the pages of a book—each one leaving an indelible mark on your soul.
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Where a story stops, another one begins. The thing with them is, they never walk alone. They always walk with a group of friends. Each reaches its climax. Then with a final gasp of mortality and despair, fade away. No, they never die; they multiply. To the extent that the original gets lost and new ones are born. Over and over again. Yes, they get lost. No, they never die. They live on, permanently etched in the book of time. And from there, we borrow them and bring them alive. Again. And again. Here are twenty-six of them, some standing alone and some chatting with their long-lost friends. When they depart, they leave a lingering fragrance of nostalgia and curiosity. What happened then? Twenty-six alphabets, twenty-six names, and twenty-six short stories. Each explores one unique emotion, taking you into the dark recess of the mind. Some are frothy, and most of them opaque. Most are standing alone, and some are facing a mirror, where the same story comes alive in two different ways through two other protagonists. Meet diverse characters - from the single-minded prostitute to the man on the railway's station br>Bereft of any memory; a woman desperate for a biological child to a dead man's trial. Meet a jealous lover with a twisted brain and a gay man's memory of a one-night encounter. Meet twenty-six such characters arrested and sentenced for life inside the pages of a book—each one leaving an indelible mark on your soul.
Book Details
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ISBN9788194462163
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Pages250
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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दो साल से लिस्बन में रह रहे हाथी सोलोमन को अब एक लम्बे सफ़र पर जाना है। राजा डोम जुआँऊ तृतीय वियना के हैप्सबर्ग के एक आर्चदुक को उसे शादी के तोहफ़े के रूप में भेंट करना चाहता है। अपने नए ठिकाने तक पहुँचने के लिए हाथी को पैदल ही पहुँचना है। इस तरह शुरू होता है वह दिलचस्प सफ़र जो इस बहादुर हाथी को कास्टील के धूल-भरे मैदानों से होते हुए समुद्र पार जेनोआ और उत्तरी इटली तक ले जाएगा। वहाँ उसे बर्फीले आल्प्स को पार करना होगा जैसे सदियों पहले हानिबल के योद्धा हाथियों ने किया था।
यह उपन्यास एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसमें लेखक ने तथ्यों, किंवदन्तियों और कल्पना का अद्भुत मिश्रण किया है।
Parishishta
- Author Name:
Giriraj Kishore
- Book Type:

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Description:
‘दिनमान’ (5-11 अगस्त, 1984) के ‘फ़िलहाल’ स्तम्भ में, ‘परिशिष्ट’ के बारे में गिरिराज किशोर का कथन छपा था, “अनुसूचित कोई जाति नहीं, मानसिकता है। जिसे अभिजातवर्ग (जिसका वर्चस्व हो) परे ढकेल देता है, वह अनुसूचित हो जाता है।” ‘परिशिष्ट’ इसी भयानक मानसिकता को उद्घाटित करनेवाला एक महाअभियोग है। अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘यथा प्रस्तावित’ में भी गिरिराज ने इसी वर्ग की दारुण पीड़ा को चित्रित किया था। राष्ट्रीय महत्त्व की महान शिक्षा-संस्थाओं में किसी तरह दाख़िला प्राप्त करनेवाले साधनहीन और तथाकथित जातिहीन छात्रों की त्रासदी, उबलते तेल में डाल दिए जानेवाले व्यक्ति के संत्रास की तरह होती है जो पहली बार ‘परिशिष्ट’ के रूप में सामने आई है।
राष्ट्रीय स्तर पर ऊँच-नीच और छुआछूत का विष फैला है। आरक्षणवादी नीतियों के बावजूद इनसान को जिस अमानवीय स्थिति का सामना करना पड़ता है, वह हर एक को अपने गिरहबान में मुँह डालकर झाँकने के लिए मजबूर करती है। उपन्यास से पता चलता है कि लेखक उस सबका अन्तरंग साक्षी है। अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़नेवाला हर पात्र एक ऐसे दबाव में जीने के लिए मजबूर है जो या तो उसे मरने के लिए बाध्य करता है या फिर संघर्ष को तेज़ कर देने की ख़ामोश प्रेरणा देता है। यह उपन्यास गिरिराज किशोर की पहचान को ही गहरा नहीं करता बल्कि हिन्दी उपन्यास की परम्परा को समृद्ध भी करता है।
एक लड़ाकू जहाज़ की तरह ऊपर उठते-उठते फट पड़नेवाला, उसी वर्ग का एक पात्र रामउजागर आत्महत्या से पहले नोट लिखकर जेब में रख लेता है कि “मेरा जाना स्वेच्छा से है। गवेषणात्मक है। हालाँकि उसका प्रतिफल दूसरों को बाँट पाना सम्भव नहीं होगा।...किसी घृणा या शिकायत के कारण नहीं, एक आत्मीयता और आत्म-सन्तोष के कारण मेरा केवल यही प्रश्न है कि जब प्रकृति, जिससे हम सब कुछ पाते हैं, घृणामुक्त है, तो मनुष्य मुक्त क्यों नहीं?”... उपन्यास का नायक अनुकूल एक संकल्पशील व्यक्ति है जो सहता है, भोगता है और विचलित नहीं होता। वस्तुतः ‘परिशिष्ट’ संत्रास, संघर्ष और संकल्प की महागाथा है।
Gujarat Ki Lokkathayen
- Author Name:
Raghavji Madhad
- Book Type:

- Description: गुजरात वैविध्य सांस्कृतिक विरासत रखनेवाला विकासशील राज्य है। यहाँ समुद्र, रेगिस्तान, पर्वत और जंगल हैं, जो शायद ही किसी राज्य में एक साथ देखने को मिलते हैं। इन प्राकृतिक, भौगोलिक और सामाजिकता का प्रभाव जनजीवन पर पड़ता रहता है, जिसके आधार पर कला, संस्कृति और साहित्य विकसित होता रहता है। गुजरात के विविध प्रदेशों की सांस्कृतिक और मानव-महिमा को उजागर करनेवाली इन कथाओं में मानवीय गुणों के साथ भाषा व विषयों की विविधता वाली कथाएँ हैं, जिसमें लेखन की विभिन्न शैलियों एवं कथा-कौशल का अनुभव प्राप्त होगा। ये काल के प्रवाह में बह जाने के बदले लोकहृदय को आर्द्र करती रहनेवाली कथाएँ हैं। इतिहास के जर्जरित पन्नों से लगी रजकणिकाएँ हैं। शीलवंत, भटके हुए, भूले हुए, पराक्रमशील, हँसमुख और स्नेहवाले नर-नारियों के जीवन की मधुरता से महकते पात्र इन कथाओं में आलस्य छोड़कर उठ खड़े हुए हैं, जिनमें प्रकृति-प्रेम के साथ प्राणी-प्रेम भी आ जाता है। गुजरात के समृद्ध लोकजीवन की बानगी देती ये लोककथाएँ पाठकों को वहाँ की संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं से परिचित करवाएँगी और उनका ज्ञानवर्धन-मनोरंजन भी करेंगी।
Customer Reviews
4 out of 5
Book
08/12/2022
Richa
There are 26 characters in Rukhsat, each of whose names begin with a different letter of the alphabet. After reading one story, we switch to another. In another scenario, the same character appears to us at a different time and with a different name. You'll need to make the connections on your own with just a few stragglers here and there. The tales revolve around life and death, love and loss, and friendship and jealousy.One unique thing that I loved the most was the same story being told from 2 different perspective. It was like you are witnessing the same chain of events but with two narrations. beautiful writing of the author made me hear the characters and took me beyond the reality. It was totally a divine feeling. Beautifully written and immaculately expressed, each story is not more than 3 to 4 pages in length, offers a quick read yet carves a great impression on its reader’s mind and soul. The tales are short and crisp, and it’s really an art to express and convey so much in so less words. Some are interconnected and some standalone, the stories are intriguing and kept me glued till the end of each of them, yet at the end of each of it, I wanted more and flipped pages to read the next, next, and so on.