Trikal Sandhya
Author:
Paramjeet S. JudgePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
‘त्रिकाल संध्या’ की कथा के केन्द्र में चक दौलतराम नाम के एक गाँव का सिर्फ़ एक दिन है। कथानक गाँव के उन वृद्धों के बारे में है जो अपनी उम्र के चलते अब गाँव की उत्पादन-प्रणाली के लिए अप्रासंगिक हो चुके हैं और उनका दिन गाँव के बाहर मौजूद एक नीम के पेड़ के नीचे बीतता है। उनके जीवन में ऐसा कुछ भी घटित नहीं होता जिसे महत्त्वपूर्ण कहा जा सके, फिर भी उनके जीवन में एक गति निहित है जो गाँव की जीवनधारा और वहाँ के सामाजिक रिश्तों के लिए बहुत अहम है।</p>
<p>उपन्यास के मुख्य पात्र इंदर को अफ़ीम की लत है जिसका उसे कोई पश्चात्ताप नहीं है, लेकिन गाँव की गतिविधियों से वह बेहद जुड़ाव महसूस करता है।</p>
<p>नीम का पेड़ जहाँ बूढ़ों की ठहरी हुई ज़िन्दगी के प्रतीक के तौर पर उपन्यास में आता है, वहीं गाँव के पास से गुज़रने वाली ट्रेन उन्हें गुज़रते वक़्त का भी आभास कराती है। जीवन की सन्ध्या में पहुँचे इन लोगों की स्थिति ज़िन्दगी और मौत के बीच का एक पड़ाव है जो लज्जा और ग्लानि के क्षणों में सुन्दर सिंह द्वारा की गई आत्महत्या के रूपक में अभिव्यक्त भी होती है।
ISBN: 9788126725373
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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नीली दीवार की परछाइयाँ बहुत धीमे से मन के अन्तर्लोक में प्रवेश करती है। दो साँसों के बीच के अन्तराल में जैसे दीवार पर परछाइयाँ काँपती, सिहरती अपनी कहानी कहती हैं। रौशन बी, राहिला उर्फ़ तलजीत, अमू और अपूर्वा, इन सबके जरिए एक रहस्य बहुत परतों में, बहुत धीरे-से उजागर होता है, जैसे नेपथ्य में जो जीवन था उस पर से किसी ने पर्दा उठा दिया हो।
अनघ के पास भावों की गहराई है, शब्दों और भाषा की जादूगरी है जिसके माध्यम से बहुत मीठेपन में, बहुत बिम्बात्मक तरीक़े से परत-दर-परत कथा खुलती है। भाषा की नज़ाकत के साथ-साथ कथा का रहस्य-रूमान, अवसाद, सुख सब तरंगित होता चलता है। इस उपन्यास में गाँव है, शहर है, देश है, विदेश है, वर्तमान है, अतीत भी है। सारी दुनिया हमारे सामने कभी प्रगट तो कभी सांकेतिक रूप में किसी दृश्य-परिदृश्य की तरह से बहती चलती है। अनघ बहुत प्रत्यक्ष का शिल्प नहीं चुनते। हर बार वो उतनी ज़मीन छोड़ते चलते हैं जहाँ से पाठक भी अपनी कल्पना में उस दुनिया को अपने तरीक़े और नज़र से देखता चले। किताब जब ख़त्म होती है उसका आस्वाद आपके मन में बना रहता है।
राहिला की बीमारी और उसके पिता द्वारा छोड़े जाने की कथा, रौशन बी का अपने चाचा, ताऊ द्वारा बेचा जाना और अमू का बिन पिता के बड़े होना, इन परिस्थितियों के गिर्द अनकहे की, चुप्पियों और तकलीफ़ों की एक दुनिया अनघ बसाते हैं जिसकी उदास छाया बहुत देर तक बनी रहती है—पुराने ज़ख़्म की टीस जैसे। उनके लिखे में एक इंटेंस किस्म का रचाव दिखता है जो पाठक की उँगली थाम उसे उन बीहड़ गलियों में लिए चलता है जिसकी स्मृति में हम कभी प्रसन्न और कभी अनमने उदास हो उठते हैं।
Hostel Ke Panno Se
- Author Name:
Manoj Singh
- Book Type:

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स्वतंत्र, स्वच्छन्द और उन्मुक्त जीवन जीने की लालसा रखनेवाले आज के युवाओं की संवेदनाओं का विश्लेषण करनेवाला एक विशिष्ट उपन्यास। इसमें बदलते समाज की उस तसवीर को चित्रित किया गया है जो वैश्वीकरण और उदारवादी संस्कृति से उत्पन्न वातावरण में दृष्टिगोचर होती है। समाज में इधर एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। नई युवा पीढ़ी निरन्तर एक खुलेपन के माहौल में जीना चाहती है जहाँ लिंग-भेद से परे जाकर समाज में एक सहज समानता हो। इस सामाजिक क्रान्ति को लेखक ने एक हॉस्टल में रहनेवाले युवाओं को केन्द्र में रखकर अभिव्यक्त किया है जो नई सोच के साथ नए विचारों को सहज रूप से स्वीकृति प्रदान करते हैं और सभ्यता, संस्कृति पर किसी भी प्रकार का प्रहार किए बिना एक सामंजस्य भी बनाते हैं।
उपन्यास इस परिवर्तन के संक्रमणकाल पर भी दृष्टिपात करता है और यह प्रश्न भी छोड़ता है कि आज जब स्कूल, कॉलेज और तकनीकी संस्थाओं तक में ‘को-एड’ है तब यह कैसे सम्भव है कि लड़के-लड़की के बीच स्वाभाविक और प्राकृतिक आकर्षण न हो?
लेखक ने वर्जनाओं से रहित जीवन जीनेवाली युवा पीढ़ी के प्रति एक सार्थक समझ को जाग्रत् करने के साथ-साथ परम्परावादी सोच की कठोर नियमावली के बीच जीनेवाले रूढ़िवादी समाज के प्रति एक समन्वयवादी सोच को बनाने का प्रयास भी किया है।
आधुनिक युवाओं की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं पर एक रोचक उपन्यास जो अपनी सहज भाषा-शैली से पाठक के अन्तर्मन को स्पर्श करता है।
Jugalbandi
- Author Name:
Giriraj Kishore
- Book Type:

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‘जुगलबन्दी’ उन द्वन्द्वात्मक स्थितियों की अभिव्यक्ति है जिनमें आज़ादी के तेवर हैं तो ग़ुलामी की मानसिकता भी। दूसरे विश्वयुद्ध से लेकर आज़ादी मिलने तक का समय जुगलबन्दी में सिमटा हुआ है। यह समय अजीब था...इसे न तो ग़ुलामी कहा जा सकता है और न आज़ादी। इसी गाथा की महाकाव्यात्मक परिणति है ‘जुगलबन्दी’।
इस उपन्यास में यह तथ्य उभरकर आया है कि रचनात्मक रूप में जो लोग क्रान्ति से जुड़े थे वे कुंठा-मुक्त नहीं थे और जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान उस व्यवस्था में अपना स्थान बना लिया था वे भी स्वयं को कुंठाग्रस्त पा रहे थे। ‘जुगलबन्दी’ में लेखक ने इसका हृदयस्पर्शी चित्रण करते हुए बहुत सजगता के साथ रेखांकित किया है कि इस द्वन्द्वात्मक स्थिति में एक तीसरी जमात भी थी जो न तो क्रान्ति में शामिल थी और न शासन में उसका कोई स्थान था। वह उस पूरे संघर्ष के दबाव को अपने शरीर और आँतों पर झेल रही थी।
टूटने और बनने की इस प्रक्रिया को ‘जुगलबन्दी’ में व्यापक कैनवस मिला है जिस पर उस पूरे युग का प्रतिबिम्बन है—आज की भाषा और आज के मुहावरों के साथ, मुग्धकारी और हृदयस्पर्शी।
Shesh Yatra
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

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अनु प्रणव के अपने फ़ैसले का शिकार हुई, वरना वैसा घर, वैसा वर न तो उसके सपनों में था, न सामर्थ्य में। गली-मोहल्लों वाले क़स्बाई परिवार से निकलकर वह लड़की अचानक अमेरिका जा बसी—डॉ. प्रणवकुमार की परिणीता बनकर। सब कुछ जैसे पलक झपकते बदल गया—घर-परिवेश, रहन-सहन, खान-पान। अनु ने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभाला और प्रणव की आकांक्षाओं, रुचियों के अनुरूप ढाल लिया। दिन-दिन डूबती चली गई प्यार की गहराइयों में। लेकिन शीघ्र ही उसे लगने लगा कि वह वहाँ अकेली है। प्रणव की तो छाया तक उन गहराइयों में नहीं। वह तो मात्र तैराक है—भावमयी लहरों को रौंदकर प्रसन्न होनेवाला एक महत्त्वाकांक्षी और अस्थिर पुरुष।
ठगी गई अनु अपनी सुन्दरता, अपने संस्कार और सहज विश्वासी मन से। लेकिन आत्महत्या वह नहीं करेगी। टूट-बिखरकर भी जोड़ने की कोशिश करेगी स्वयं को, क्योंकि दलित-आश्रित रहना ही नारी-जीवन का यथार्थ नहीं है। यथार्थ है उसकी निजता और स्वावलम्बन।
विरल कथाकार उषा प्रियम्वदा की अनु वस्तुतः नारी-मन की समस्त कोमलताओं के बावजूद उसके जागते स्वाभिमान और कठोर जीवन-संघर्ष का प्रतीक है, जिसे इस उपन्यास में गहरी आत्मीयता से उकेरा गया है। उच्च-मध्यवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज यहाँ अपने तमाम अन्तर्विरोधों, व्यामोहों और कुंठाओं के साथ मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस गहन अन्तरंगता से चित्रण किया है, उससे वे पाठकीय अनुभव का अविस्मरणीय अंग बन जाते हैं।
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