Darulshafa
Author:
Rajkrishna MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 319.2
₹
399
Available
दारुलशफ़ा, लखनऊ। यह पता है हमारी वर्तमान राजनीति का, जिसके ‘चरित्र’ का लेखा-जोखा इस किताब में दर्ज है। यानी एक स्थान विशेष, जहाँ कुछ विशेष लोग विशेष स्थितियों में विशेष समस्याओं के समाधान में जुटे हुए हैं। ये समस्याएँ निजी होकर राष्ट्रीय हैं, तो प्रादेशिक होकर अन्तरराष्ट्रीय। भारतीय राजनीति पिछले डेढ़-दो दशक से कुछ ऐसी ही समस्याओं का उत्पादन कर रही है।</p>
<p>वातानुकूलित कक्ष। लम्बे-लम्बे गलियारे। लॉन। और इस सबमें लगातार कानाफूसी करती हुई साज़िश। अपनी-अपनी रियासतों की हिफ़ाज़त के लिए चिन्तित कुर्सियाँ और उनके इर्द-गिर्द लट्टुओं की तरह चक्कर काटते चमचे।...इसी माहौल में सुपरिचित वर्तमान राजनीति के विभिन्न अँधेरे कोनों की विस्मयकारी पड़ताल की गई और वस्तुतः एक रोचक घटनाक्रम के सहारे यह उपन्यास राजनीति की जिन घिनौनी सच्चाइयों को उद्घाटित करता है, वे हमारी आँखें खोल देनेवाली है और हमें इस सारे तंत्र पर नए सिरे से सोचने को बाध्य करती है।
ISBN: 9788126712670
Pages: 346
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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वीरेन्द्र सारंग का यह नया उपन्यास इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि यह महाभारत काल और कृष्ण से जुड़े मिथकों को एक नई दृष्टि से देखता है। इसका असली सार कृष्ण के उस जननायक रूप का है जिसे बाक़ायदा राजनीति के तहत नन्द और वासुदेव समर्थकों ने उनके बचपन से ही मिथकीय रूप दिया ताकि कंस के ख़िलाफ़ जनता को एकजुट किया जा सके। कंस असुर है जो देवताओं और आर्यों के चंगुल में फँसकर क्रूर और तानाशाह हो गया है। उग्रसेन नाक़ाबिल और कमज़ोर राजा हैं जिन्हें हटाकर कंस राजा बनता है ताकि अपनी अनार्य संस्कृति की रक्षा की जा सके, जो मूलत: गोपालक और कृषक जाति है। देवता आर्य संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं जो मूलत: उपभोग की संस्कृति है।
इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि मिथकों में जिनको राक्षसों का रूप दिया जाता है, लेखक ने बहुत यथार्थवादी दृष्टि से उनका मानवीकरण कर दिया है, उनके सुख-दु:ख का भी। उपन्यास का सबसे दिलचस्प हिस्सा कृष्ण के बुढ़ापे का है जब सब कुछ उनके हाथ से निकल जाता है। द्वारका में अराजकता फैल चुकी है और कृष्ण बहुत अकेले पड़ गए हैं। वे अपनी झोली लेकर द्वारका छोड़ देते हैं। उनकी मृत्यु का प्रसंग और भी दारुण है। क्या हर क्रान्ति का यही हश्र होता है? शायद यह सत्ता का चरित्र है जो किसी को भी निरंकुश बना देती है। जिस शान्ति के लिए कृष्ण द्वारका आए, वह अराजक हो गई। उनकी अपनी ही सन्तानें उनके ख़िलाफ़। कुल मिलाकर यह उपन्यास कृष्ण-कथा का नया और दिलचस्प भाष्य प्रस्तुत करता है जो बेहद पठनीय है।
Krishnavtar : Vol. 3 : Paanch Pandav
- Author Name:
K. M. Munshi
- Book Type:

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Description:
पौराणिक चरित्रों को आधार बनाकर अनेक श्रेष्ठतर आधुनिक उपन्यासों की रचना करनेवाले सुप्रसिद्ध गुजराती कथाकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का भारतीय कथा-साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान है। अपनी कृतियों में उन्होंने सुदूर अतीत का जो विस्तृत जीवन-फलक प्रस्तुत किया है, वह जितना विराट् है उतना ही आकर्षक, साथ ही वह वैज्ञानिकता की कसौटी पर भी खरा उतरता है।
मुंशी जी का ‘कृष्णावतार’ एक वृहत् उपन्यास है—सात खंडों में विभक्त। ‘पाँच पाण्डव’ तीसरे खंड का हिन्दी रूपान्तर है। अन्य खंडों की ही तरह अगर यह परस्पर सम्बद्ध है तो अपने आपमें एक पूरी कथा भी है। पाँचों पाण्डवों के जन्म, विकास और संघर्षों-उपलब्धियों की इस रोचक-रोमांचक गाथा में आर्यावर्त्त के महान नायक श्रीकृष्ण की विलक्षण ऐतिहासिक भूमिका बड़ी कलात्मकता से रेखांकित हुई है। पुराकालीन आर्यों की संघर्षशील गतिविधियों, नागों की अरण्य-संस्कृति और ‘राक्षस’ नाम से पुकारे जानेवाले प्रस्तरयुगीन मानवों की आदिम जीवनचर्या के जीवन्त चित्र इसमें पूरी तरह से मुखर हैं।
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