Ghar Begana Hua Kiya
(0)
Author:
Amitava KumarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
350
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अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अंग्रेज़ी लेखक अमिताभ कुमार कथा-कथेतर दोनों विधाओं में लिखते हैं। ‘Home Products’ उनका पहला उपन्यास है जो अब हिंदी में ‘घर बेगाना हुआ किया’ नाम से उपलब्ध हो रहा है।</p> <p>इस उपन्यास के केन्द्र में बिनोद और रबिन्दर नाम के दो भाई हैं। सगे नहीं, लेकिन उनका पालन-पोषण सगे भाइयों की तरह ही हुआ, और दोनों मध्यवर्गीय आकांक्षाओं के दो लगभग विपरीत छोरों से दुनिया को देखते-समझते हैं। बिनोद का उद्देश्य है लेखक बनना, लेकिन उसकी अतिरिक्त संवेदनशीलता और चीज़ों को उनके असल रूप में देखने की उसकी प्रवृत्ति उसे उतना व्यावहारिक नहीं रहने देती कि अपने आसपास के अनुभवों और उन पर अपनी प्रतिक्रिया को तटस्थ ढंग से कथा में तब्दील कर सके। वह पत्रकारिता से जुड़ा है और एक अच्छी फ़िल्म की पटकथा लिखने की कोशिश में है, जिसके लिए उसे एक फ़िल्मकार ने कहा भी है। लेकिन फ़िल्म बनती है रबिन्दर की कहानी पर जिसका जीवन ख़ुद एक कहानी है। बिना ज़्यादा सोचे कुछ भी कर गुज़रने वाला रबिन्दर हमेशा बाहर की तरफ़ देखता है। जेल जा चुका है। अनुभवों का एक बड़ा ख़ज़ाना उसके पास है जो देखते ही देखते उसे फ़िल्म-जगत के सितारों के समकक्ष पहुँचा देता है।</p> <p>लेकिन यह कहानी सिर्फ़ इन दोनों की नहीं है; यह उस समूचे परिवेश की कथा है जिसके लिए बिहार को ख़ासतौर पर जाना जाता है—राजनीति और अपराध जिसका एक सिरा है, तो वहाँ के लोगों की सचेत-सजग-समर्थ और रचनात्मक मेधा दूसरा। यह उपन्यास इस जटिल संरचना को बेहद विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करता है।
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अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अंग्रेज़ी लेखक अमिताभ कुमार कथा-कथेतर दोनों विधाओं में लिखते हैं। ‘Home Products’ उनका पहला उपन्यास है जो अब हिंदी में ‘घर बेगाना हुआ किया’ नाम से उपलब्ध हो रहा है।</p>
<p>इस उपन्यास के केन्द्र में बिनोद और रबिन्दर नाम के दो भाई हैं। सगे नहीं, लेकिन उनका पालन-पोषण सगे भाइयों की तरह ही हुआ, और दोनों मध्यवर्गीय आकांक्षाओं के दो लगभग विपरीत छोरों से दुनिया को देखते-समझते हैं। बिनोद का उद्देश्य है लेखक बनना, लेकिन उसकी अतिरिक्त संवेदनशीलता और चीज़ों को उनके असल रूप में देखने की उसकी प्रवृत्ति उसे उतना व्यावहारिक नहीं रहने देती कि अपने आसपास के अनुभवों और उन पर अपनी प्रतिक्रिया को तटस्थ ढंग से कथा में तब्दील कर सके। वह पत्रकारिता से जुड़ा है और एक अच्छी फ़िल्म की पटकथा लिखने की कोशिश में है, जिसके लिए उसे एक फ़िल्मकार ने कहा भी है। लेकिन फ़िल्म बनती है रबिन्दर की कहानी पर जिसका जीवन ख़ुद एक कहानी है। बिना ज़्यादा सोचे कुछ भी कर गुज़रने वाला रबिन्दर हमेशा बाहर की तरफ़ देखता है। जेल जा चुका है। अनुभवों का एक बड़ा ख़ज़ाना उसके पास है जो देखते ही देखते उसे फ़िल्म-जगत के सितारों के समकक्ष पहुँचा देता है।</p>
<p>लेकिन यह कहानी सिर्फ़ इन दोनों की नहीं है; यह उस समूचे परिवेश की कथा है जिसके लिए बिहार को ख़ासतौर पर जाना जाता है—राजनीति और अपराध जिसका एक सिरा है, तो वहाँ के लोगों की सचेत-सजग-समर्थ और रचनात्मक मेधा दूसरा। यह उपन्यास इस जटिल संरचना को बेहद विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करता है।
Book Details
-
ISBN9789395737807
-
Pages328
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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महाश्वेता देवी की रचनाओं की केन्द्रीय चेतना लोकधर्मी है। उनके लेखन का बुनियादी मन्तव्य दलितों की ज़िन्दगी को उभारकर सामने लाना है जो न केवल सामन्ती शोषण के शिकार हैं बल्कि जिन्हें तबाह करने में सरकारी नीतियों की भी बराबर की हिस्सेदारी है।
यह बात साफ़ हो चुकी है कि आदिवासी जन–जीवन की त्रासदी के बीज विषैली राजनीति में हैं और राजनीति की चालाक साज़िशों ने संगठित वर्ग–संघर्ष को विभाजित जाति–संघर्ष में तब्दील कर दिया है। ज़मींदारों ने भूमिहीन आदिवासियों के बीच धर्मों और जातियों के बँटवारे का सहारा लेकर उन्हें संगठित वर्ग की शक्ल में कभी नहीं आने दिया।
महाश्वेता जी के कथानक इन बारीक षड्यंत्रों को बेनक़ाब करते हैं। सरकारी कामकाज के असली चेहरों और ज़मींदारों के साथ सरकारी नुमाइंदों के आर्थिक रिश्तों को देखने–समझने के लिए जिस दृष्टि की ज़रूरत है, महाश्वेता जी की रचनाएँ उस दृष्टि को पैदा करती हैं।
इस पुस्तक के पृष्ठों पर तीन सशक्त उपन्यास छपे हैं। इन उपन्यासों का कथा–केन्द्र आदिवासी स्त्रियों की पीड़ित ज़िन्दगी है। तीन उपन्यासों की तीन प्रतिनिधि स्त्री पात्र हैं, दौलति, बासमती और गोहुअन। समान आर्थिक स्थितियों के बावजूद तीनों की सोच में बुनियादी फ़र्क़ है और यह फ़र्क़ आदिवासी स्त्री के मनोविज्ञान और उसकी संघर्ष–क्षमता को विभिन्न रूपों में उद्घाटित करता है।
स्त्री का क्रय–विक्रय, देह–व्यापार की कसैली विवशताएँ, ‘चुकी’ हुई वेश्याओं की तिरस्कृत वेदनाएँ और उनकी गुमनाम मौत; और इन सबके लिए ज़िम्मेवार सामन्ती व्यवस्था के दाँवपेंच—यह संक्षेप है ‘दौलति’ का।
दूसरा तेज़–तर्रार उपन्यास है ‘पलामौ’। आदिवासियों के शोषण को एक नए कोण से समझने की कोशिश, और आदिवासियों के विकास के सम्बन्ध में सरकारी दावों के खोखलेपन का पर्दाफ़ाश करनेवाला यह उपन्यास आदिवासी–जीवन का प्रतिबिम्ब है।
‘गोहुअन’ की कथा आदिवासी स्त्री के एक भिन्न स्वरूप को सामने रखती है। एक विषैले सर्प ‘गोहुअन’ के प्रतीक के ज़रिए आदिवासी स्त्री का स्वाभिमानी तेवर इस उपन्यास में बहुत गम्भीरता से व्यक्त ह़ुआ है।
Kisse mein Kissa
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Ahmed Umit
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- Description: पिकनिक पर आग के चारों तरफ बैठे हैं, डिनर के बाद परिवार के साथ मज़े दार समय गुजारना चाहते हैं या फिर अध्यापक हैं और बच्चों को कुछ बेहतर सुनाना चाहते हैं, तो यह किताब आप ही के लिए है। कहानियों के भीतर से निकलती हुई ये कहानियाँ, मनुष्य की अच्छायों, कमजोरियों और कोमलता की दास्तान हैं। इसका हर किरदार अपनी गलतियों में भी इतना निर्मल है कि इनमें पाठक अपने दिल की झलक पाता है। दरअसल यह सारे किरदार हमारी अलग-अलग वृत्तियों और उलझनों का विस्तार हैं। प्रश्नों में बड़ी लेकिन आकार में इतनी छोटी कि आप एक बैठकी में आसानी से पढ़ सकते हैं।
Samay Se Aage
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Sitaram Jha Shyam
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डॉ. सीताराम झा ‘श्याम’ विरचित ‘समय से आगे’ शीर्षक उपन्यास जितना ही रोचक है, उतना ही प्रेरक और प्रभावक भी। इसमें विशाल एवं विस्तृत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक-सांस्कृतिक पट-भूमि पर समग्र मानव जीवन का अभूतपूर्व चित्रण किया गया है। वस्तुतः, जीवन के सभी पक्ष अपनी परिपूर्णता में व्यंजित हैं। मानव प्रेम एवं प्रकृति-प्रेम में समवाय सम्बन्ध दिखाते हुए प्रेम को नया विस्तार प्रदान किया गया है, जो जीवन में आशा का संचार करता है, विकास की नई दिशाओं की तलाश के लिए नई दृष्टि प्रदान करता है—शोषण, उत्पीड़न, प्रपीड़न से मुक्त होने तथा समस्त प्राणियों को निर्भर रहने का अमर सन्देश देता है।
इस उपन्यास के कुछ पात्र—विभाकर, रंचना, नन्दिता, निदेश, चलित्तर, सुराजीदास, अनुपम आदि ऐसे हैं, जो धैर्य, साहस, आत्मबल, उत्साह, दूरदृष्टि, कर्मठता, दक्षता, ईमानदारी आदि मानवीय गुणों का उत्कृष्ट परिचय देकर जीवन को सफल-सार्थक बनाते हैं। इसके विपरीत, वल्लरी, सौदामिनी, पुरन्दर जैसे पात्र वर्तमान जीवन के संघर्षपूर्ण दौर में आगे बढ़ने के लिए छटपटाते तो हैं ज़रूर, पर उन्हें न तो आधार भूमि की परख है और न ही मंज़िल का पता। इसी से आगे बढ़ने की अमर्यादित इच्छा उनके वर्तमान को तो विनष्ट कर ही देती है, गौरवपूर्ण अतीत से भी प्रेरणा लेने के योग्य नहीं रहने देती। ऐसी स्थिति में प्रोज्ज्वल भविष्य के दर्शन का सुयोग कैसे मिल सकता है? उपन्यास का पहला ही वाक्य अद्भुत प्रकाश फैला देता है अतीत से भविष्य तक ‘व्यक्ति बहुत कुछ बन जाने की भाग-दौड़ में मनुष्य बनना ही भूल जाता है।’
डॉ. श्याम के इस उपन्यास में मानवीय संवेदना की अप्रतिम अभिव्यंजना है—निश्चल संवेदना की वह मार्मिक व्यंजना, जो मनुष्यता की अनिवार्य शर्त है, जिसके बिना जीवन नीरस और निरर्थक बन जाता है। सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ जाने पर किसी को भी यह कहने में संकोच का अनुभव नहीं होगा कि ‘समय से आगे’ उपन्यास लेखन के क्षेत्र में नया प्रतिमान है।
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