Sanskar
(0)
Author:
Chandrakant Kusnoor, U.R. AnanthamurthyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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यू.आर. अनन्तमूर्ति के इस कन्नड़ उपन्यास को युगान्तरकारी उपन्यास माना गया है। ब्राह्मणवाद, अन्धविश्वासों और रूढ़िगत संस्कारों पर अप्रत्यक्ष लेकिन इतनी पैनी चोट की गई है कि उसे सहना सनातन मान्यताओं के समर्थकों के लिए कहीं–कहीं दूभर होने लगता है। ‘संस्कार’ शब्द से अभिप्राय केवल ब्राह्मणवाद की रूढ़ियों से विद्रोह करनेवाले नारणप्पा के दाह–संस्कार से ही नहीं है। अपने लिए सुरक्षित निवास–स्थान, अग्रहार आदि के ब्राह्मणों के विभिन्न संस्कारों पर भी रोशनी डाली गई है—स्वर्णाभूषणों और सम्पत्ति–लोलुपता जैसे संस्कारों पर भी! ब्राह्मण–श्रेष्ठ और गुरु प्राणेशाचार्य तथा चन्द्री, बेल्ली और पद्मावती जैसे अलग और विपरीत दिखाई देनेवाले पात्रों की आभ्यन्तरिक उथल–पुथल के सारे संस्कार अपने असली और खरे–खोटेपन समेत हमारे सामने उघड़ आते हैं। धर्म क्या है? धर्मशास्त्र क्या है? क्या इनमें निहित आदेशों में मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता के हरण की सामर्थ्य है, या होनी चाहिए? ऐसे अनेक सवालों पर यू.आर. अनन्तमूर्ति जैसे सामर्थ्यशील लेखक ने अत्यन्त साहसिकता से विचार किया है, और यही वैचारिक निष्ठा इस उपन्यास को विशिष्ट बनाती है।
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यू.आर. अनन्तमूर्ति के इस कन्नड़ उपन्यास को युगान्तरकारी उपन्यास माना गया है। ब्राह्मणवाद, अन्धविश्वासों और रूढ़िगत संस्कारों पर अप्रत्यक्ष लेकिन इतनी पैनी चोट की गई है कि उसे सहना सनातन मान्यताओं के समर्थकों के लिए कहीं–कहीं दूभर होने लगता है।
‘संस्कार’ शब्द से अभिप्राय केवल ब्राह्मणवाद की रूढ़ियों से विद्रोह करनेवाले नारणप्पा के दाह–संस्कार से ही नहीं है। अपने लिए सुरक्षित निवास–स्थान, अग्रहार आदि के ब्राह्मणों के विभिन्न संस्कारों पर भी रोशनी डाली गई है—स्वर्णाभूषणों और सम्पत्ति–लोलुपता जैसे संस्कारों पर भी! ब्राह्मण–श्रेष्ठ और गुरु प्राणेशाचार्य तथा चन्द्री, बेल्ली और पद्मावती जैसे अलग और विपरीत दिखाई देनेवाले पात्रों की आभ्यन्तरिक उथल–पुथल के सारे संस्कार अपने असली और खरे–खोटेपन समेत हमारे सामने उघड़ आते हैं।
धर्म क्या है? धर्मशास्त्र क्या है? क्या इनमें निहित आदेशों में मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता के हरण की सामर्थ्य है, या होनी चाहिए? ऐसे अनेक सवालों पर यू.आर. अनन्तमूर्ति जैसे सामर्थ्यशील लेखक ने अत्यन्त साहसिकता से विचार किया है, और यही वैचारिक निष्ठा इस उपन्यास को विशिष्ट बनाती है।
Book Details
-
ISBN9788183616225
-
Pages159
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
कहा गया है कि अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह काश्मीर ही है और ‘ऐलान गली ज़िन्दा है’ उपन्यास इसी स्वर्ग के हाशिये पर दरिद्रता, अज्ञान और अभावों में पल रहे लोगों की संस्कृति और जीवन-संघर्षों को बहुत अन्तरंग विवरणों के साथ उजागर करता है। जहाँ आज धर्म, जाति और भाषा के नाम पर आदमी-आदमी के बीच दीवारें खड़ी की जा रही हों, वहाँ ऐलान गली के अनवर मियाँ, दयाराम मास्टर, संसारचन्द आदि लोग हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीक बनकर उभरते हैं। दूसरी ओर बेरोज़गारी के अन्धकार में पल रही युवा पीढ़ी है, जो रोज़गार की तलाश में बड़े शहरों की ओर दौड़ रही है। अवतारा ऐसी ही युवा पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र है, जिसे आजीविका के लिए मुम्बई जैसे महानगर में जाना पड़ता है। महानगरीय सुविधाओं और चकाचौंध के बीच वह ख़ुद को अजनबी और अस्तित्वहीन महसूस करता है, उसके ज़ेहन में ऐलान गली प्यार के समुद्र की तरह पछाड़ें मारती है।
ऐलान गली के निवासियों के आपसी सम्बन्धों के विविध आयामों को इस उपन्यास में इतने विस्तार और सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है कि एक समूचे समाज का रूप उभरकर सामने आता है। वस्तुतः अपने तमाम पिछड़ेपन के बावजूद ऐलान गली वहाँ के प्रवासियों और निवासियों के दिल-दिमाग़ में उसी तरह ज़िन्दा है, जिस तरह फूलों में सुगन्ध।
Mahabharat Ke Maharany Mein
- Author Name:
Pratibha Basu
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- Description: ‘महाभारत’ नामतः भरतवंश का इतिहास होकर भी, वस्तुतः सत्यवती-द्वैपायन के वंश का इतिहास है। इस ग्रन्थ में धर्म भी कुछ नहीं, अधर्म भी कुछ नहीं। जो है वह केवल सुविधावादी का सुविधाभोग। विदुर-युधिष्ठिर जैसे धार्मिक लोग एवं ईश्वर के प्रतिभू कूट-दक्ष बहुसंख्य आज भी हमारे चारों ओर विराजमान हैं। दुर्योधन स्वभाव से ही कुछ संयत एवं सहिष्णु चरित्र के हैं। प्रचार की महिमा से ठीक इसके विपरीत लोग विश्वास करते आए हैं। कुरुक्षेत्र का ‘धर्मयुद्ध’ कितनी दूर अधर्म के यूपकाष्ठ में बलि हो सकता है, यह जानकर स्तम्भित होना पड़ता है। जिस भारत में आज भी जातिभेद प्रबल है, उच्च और निम्नवर्ग का भेद शरीर के रंग में प्रतिकारित है, वहाँ क्षत्रियों की इस कहानी में सर्वत्र काले रंग का आधिपत्य दिखेगा—शुद्ध रक्त की चूड़ान्त पतन और विलोप।
Raston Par Bhatakte Huye
- Author Name:
Mrinal Pande
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- Description: जिस वक़्त गाँवों का महानगरों में, पत्रकारिता का राजनीति में और राजनीति का उद्योग-उपक्रमों में विलय हो रहा हो; रास्तों पर भटकते हुए कार्य-कारण; सही-ग़लत की खोज करना तो दुनियादारी नहीं। मगर उपन्यास की नायिका मंजरी यही करती है। उसमें एक छटपटाहट है जानने की, कि जो होता रहा है वह क्यों होता रहा है ? इस दौरान वह बार-बार लहूलुहान होती है। घर-परिवार सहकर्मी सबसे विच्छिन्न होकर भाषा की, शब्दों की आदिम खोह में छिपने की कोशिश करती है, कुछ हद तक सफल भी होती है। पर तभी बंटी उसके जीवन में प्रवेश करता है, और उसके भीतर का हिमवारिधि पिघलने लगता है। किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की रहस्यमयी रखैल का यह मासूम-गर्वीला बच्चा, उँगली पकड़कर मंजरी को अपने साथ उन रास्तों पर भटकाता है, जहाँ पैर रखने से वह कतराती रही है। पहले बंटी, और उसके बाद उसकी माँ की नृशंस हत्या, और राजधानी के सुरक्षातंत्र की रहस्यमय चुप्पी मंजरी को इन हत्यारों की तह में जाने को बाध्य करती है। बंटी की स्मृति के सहारे तब मंजरी एक स्याह पाताली गंगा के दर्शन करती है, जो देश के मर्म, उसकी राजधानी के तलघर में कई रहस्यमय भेदों को छुपाए बह रही है। चाहे न चाहे मंजरी के अपने जीवन के कई स्रोत भी इससे जुड़े हुए निकलते हैं। दो मौतों की तफ़्तीश के बहाने मंजरी अपने निजी जीवन, विवेक एवं अपनी अन्तरात्मा की परिक्रमा करते हुए रास्तों पर भटकती है।
Berozgaar Engineer aur Gungi Gun ka Insaaf
- Author Name:
Vishwas Sharma
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- Description: बेरोज़गार इंजिनियर और गूंगी गन का इंसाफ़ | लेखक: विश्वास शर्मा दिल्ली की उमस भरी अगस्त–सितंबर की रातें, झिर-झिर बरसात और गलियों की घुटन… इन्हीं के बीच चलती है यह कहानी— एक बेरोज़गार इंजीनियर, एक क़ातिल और एक पुलिसवाले की। बाबू दिलवाला जेल से सिर्फ़ तीन घंटे के लिए बाहर आया—मनचंदा का क़त्ल करने। लेकिन वह कभी लौट नहीं सका। किसने मारा उसे? उसकी प्रेमिका बेबी ने, मनचंदा ने, या हमेशा इंसाफ़ करने वाली गूँगी गन ने? पाठक को रहस्य का आधा सिरा पहले मिल जाता है, मगर किरदार अपनी ही तलाश में उलझे रहते हैं। सचाई की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और हर पन्ना दिल्ली के मौसम, बरसाती अँधेरे और बेचैन कर देने वाले माहौल से सराबोर है। यह उपन्यास केवल अपराधकथा नहीं है—यह अपने दृश्यात्मक और घटनात्मक प्रभाव से किसी फ़िल्म की तरह अनुभव कराता है।
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