Sanskar
Author:
Chandrakant Kusnoor, U.R. AnanthamurthyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
यू.आर. अनन्तमूर्ति के इस कन्नड़ उपन्यास को युगान्तरकारी उपन्यास माना गया है। ब्राह्मणवाद, अन्धविश्वासों और रूढ़िगत संस्कारों पर अप्रत्यक्ष लेकिन इतनी पैनी चोट की गई है कि उसे सहना सनातन मान्यताओं के समर्थकों के लिए कहीं–कहीं दूभर होने लगता है।
‘संस्कार’ शब्द से अभिप्राय केवल ब्राह्मणवाद की रूढ़ियों से विद्रोह करनेवाले नारणप्पा के दाह–संस्कार से ही नहीं है। अपने लिए सुरक्षित निवास–स्थान, अग्रहार आदि के ब्राह्मणों के विभिन्न संस्कारों पर भी रोशनी डाली गई है—स्वर्णाभूषणों और सम्पत्ति–लोलुपता जैसे संस्कारों पर भी! ब्राह्मण–श्रेष्ठ और गुरु प्राणेशाचार्य तथा चन्द्री, बेल्ली और पद्मावती जैसे अलग और विपरीत दिखाई देनेवाले पात्रों की आभ्यन्तरिक उथल–पुथल के सारे संस्कार अपने असली और खरे–खोटेपन समेत हमारे सामने उघड़ आते हैं।
धर्म क्या है? धर्मशास्त्र क्या है? क्या इनमें निहित आदेशों में मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता के हरण की सामर्थ्य है, या होनी चाहिए? ऐसे अनेक सवालों पर यू.आर. अनन्तमूर्ति जैसे सामर्थ्यशील लेखक ने अत्यन्त साहसिकता से विचार किया है, और यही वैचारिक निष्ठा इस उपन्यास को विशिष्ट बनाती है।
ISBN: 9788183616225
Pages: 159
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘शादी से पेशतर’ की कई लड़कियों में एक डेज़ी कहती है, ‘‘कुछ सोचो मत बस करती चली जाओ।’’ क्या करती चली जाओ? नए-नए कोर्स—ब्यूटीशियन बनने के, कम्प्यूटर विशेषज्ञ बनने के, इंटीरियर डेकोरेटर बनने के और न जाने क्या-क्या। इस करते जाने के पीछे एक धुँधला-सा संकेत अपने पैरों पर खड़े होने का भी ज़रूर रहता है, लेकिन वह शादी को ही ‘मोक्ष’ मानने के कारण ठोस रूप ग्रहण नहीं कर पाता। ‘शादी से पेशतर’ हमें एक ऐसे अन्तःपुर के एकदम भीतर ले जाता है, जिसकी विदीर्णता का हम अनुमान भी नहीं लगा पाते क्योंकि हमें जो दिखाई पड़ता है, उसी को देख रहे होते हैं। यह एक ऐसा कोलाज़नुमा लघु उपन्यास है जो सरसरी दृष्टि से पढ़ने पर सतह पर ही तैरता मालूम पड़ता है, पर ध्यान देने पर यह बताता है कि सतह सिर्फ़ सतही नहीं होती, उसमें नीचे गहराई और डूब भी रहती है।
लेखिका बिना किसी लेखकीय टिप्पणी और गुरुगम्भीरता के शादी का इन्तज़ार करती हुई लड़कियों से हमारी इस तरह मुलाक़ात करवाती है कि हम परेशानी महसूस करने लगते हैं। वह हमें लड़की देखने आए लोगों में बैठा देती है।
Pahala Kadam
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description: भारतीय शिक्षण संस्थाओं से हम भारतीयों की त्यागनिष्ठा तथा स्वात्म समर्पण के भावों का सम्बन्ध हज़ारों-हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है। शिक्षक, गुरु, गुरुकुल में ऋषिजीवन और छात्र तपस्वी का जीवन व्यतीत करते रहे हैं। भारत के सामन्त, सम्राट, नरेश, सम्पन्न सेठ तथा वणिक दान का सर्वांश इन संस्थाओं को अर्पित करके समाज रचना की सत्त्वमयी परम्परा के निर्माण के प्रति संकल्पबद्ध थे। समाज तथा गुरुकुल ऋण से आजीवन मुक्त नहीं होता था। किन्तु आज, अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित शिक्षानीति पर विदेशी तंत्रों के प्रभावों का गहरा असर भारतीय स्वतंत्रता के छह दशकों बाद और भी गहरा होता जा रहा है। शिक्षा ज्ञानार्जन, ज्ञानवृद्धि, अन्वेषण के लिए है; शिक्षा आत्मबोध, विवेकबोध, समझ तथा संकल्पशक्ति की प्रेरणा के लिए है। सुदामा जैसा शिक्षक लोक संकटों को झेलता हुआ, उनसे मुक्ति के लिए अपने सहपाठी त्रैलोक्यस्वामी श्रीकृष्ण के पास जाने को तैयार नहीं था—यदि उसकी पत्नी उसे प्रतिदिन सुबह-शाम दुत्कारती नहीं—किन्तु आज शिक्षक संस्थाएँ कैसी हैं? शिक्षक क्यों हैं? शिक्षा कैसी है? शिक्षण का प्रबन्ध-तंत्र क्या है? सब कुछ यह उपन्यास ही बताएगा।
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