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Phool Imartein Aur Bandar

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हमारे समय के सबसे बड़े साहित्यकार सोल्ज़ेनित्सिन ने ‘नोबेल पुरस्कार’ लेते समय अपने भाषण में कहा था—“अगर लेखक नहीं तो दूसरे कौन अपने यहाँ की असफल सरकारों को अपराधी ठहराएँगे और लेखकों के अलावा कौन अपने समाज को उसके भीरुताजन्य अपमान अथवा आत्मतुष्ट नपुंसकता के लिए दोषी ठहराएगा?” अपने देश में क्या हुआ कि सरकारें तो बदलीं पर कुछ नहीं बदला? अपने आठवें उपन्यास ‘फूल...इमारतें और बन्दर’ में गोविन्द मिश्र इस प्रश्न से टकराते हुए सरकार के भीतरी ढाँचे में हमें ले जाते हैं, जिसमें फँसा एक संवेदनशील अधिकारी लगातार होते हुए अपने नैतिक पतन को स्वयं देख रहा है। उस व्यक्ति के माध्यम से उपन्यासकार हमें प्रशासन के ऊपरी तंत्र के तिलिस्म के सामने ला खड़ा करता है जो बाहर से रहस्यमय, अबूझ, अभेद्य और साफ़-सुथरा लगता है, पर जो भीतर से उतना ही छिछला, गिजगिजा और भ्रष्ट है। और जो दरअसल उपन्यास का मुख्य पात्र है। उस तिलिस्म के भीतर के चतुर खिलाड़ी कौन हैं, अपने ‘पावर गेम्स’ कैसे खेलते हैं, ‘ग्रीन रूम’ में क्या-क्या और कैसे चलता है...तंत्र को अपने स्वार्थ के लिए नेता और बड़े अफ़सर कैसे और भ्रष्ट करते हैं...इस यथार्थ के कितने आयाम उपन्यास में खुलते चले जाते हैं। उन्हें जीवन के वृहत्तर सवालों से छोड़कर, नियति-न्याय के परिप्रेक्ष्य में रखकर उपन्यासकार जैसे एक सामान्य यथार्थवादी राजनीतिक उपन्यास की सीमाओं को लाँघ एक बड़ी रचना की सृष्टि अनायास ही कर गया है। पाठकों को सोल्ज़ेनित्सिन का एक और कहना याद आएगा—“वह साहित्य जो अपने समय के नैतिक और सामाजिक ख़तरों को व्यक्त नहीं करता, साहित्य कहलाने लायक़ नहीं है।” हिन्दी में अपने क़ि‍स्म का पहला उपन्यास जिसे गोविन्द मिश्र ही लिख सकते थे और उनका ‘देय’ था, एक तरह से।

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हमारे समय के सबसे बड़े साहित्यकार सोल्ज़ेनित्सिन ने ‘नोबेल पुरस्कार’ लेते समय अपने भाषण में कहा था—“अगर लेखक नहीं तो दूसरे कौन अपने यहाँ की असफल सरकारों को अपराधी ठहराएँगे और लेखकों के अलावा कौन अपने समाज को उसके भीरुताजन्य अपमान अथवा आत्मतुष्ट नपुंसकता के लिए दोषी ठहराएगा?”
अपने देश में क्या हुआ कि सरकारें तो बदलीं पर कुछ नहीं बदला? अपने आठवें उपन्यास ‘फूल...इमारतें और बन्दर’ में गोविन्द मिश्र इस प्रश्न से टकराते हुए सरकार के भीतरी ढाँचे में हमें ले जाते हैं, जिसमें फँसा एक संवेदनशील अधिकारी लगातार होते हुए अपने नैतिक पतन को स्वयं देख रहा है। उस व्यक्ति के माध्यम से उपन्यासकार हमें प्रशासन के ऊपरी तंत्र के तिलिस्म के सामने ला खड़ा करता है जो बाहर से रहस्यमय, अबूझ, अभेद्य और साफ़-सुथरा लगता है, पर जो भीतर से उतना ही छिछला, गिजगिजा और भ्रष्ट है। और जो दरअसल उपन्यास का मुख्य पात्र है। उस तिलिस्म के भीतर के चतुर खिलाड़ी कौन हैं, अपने ‘पावर गेम्स’ कैसे खेलते हैं, ‘ग्रीन रूम’ में क्या-क्या और कैसे चलता है...तंत्र को अपने स्वार्थ के लिए नेता और बड़े अफ़सर कैसे और भ्रष्ट करते हैं...इस यथार्थ के कितने आयाम उपन्यास में खुलते चले जाते हैं। उन्हें जीवन के वृहत्तर सवालों से छोड़कर, नियति-न्याय के परिप्रेक्ष्य में रखकर उपन्यासकार जैसे एक सामान्य यथार्थवादी राजनीतिक उपन्यास की सीमाओं को लाँघ एक बड़ी रचना की सृष्टि अनायास ही कर गया है। पाठकों को सोल्ज़ेनित्सिन का एक और कहना याद आएगा—“वह साहित्य जो अपने समय के नैतिक और सामाजिक ख़तरों को व्यक्त नहीं करता, साहित्य कहलाने लायक़ नहीं है।”
हिन्दी में अपने क़ि‍स्म का पहला उपन्यास जिसे गोविन्द मिश्र ही लिख सकते थे और उनका ‘देय’ था, एक तरह से।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
402 grams
ISBN-13
9788119092437
Pages
302
Reading time
~10 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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