Phool Imartein Aur Bandar
Author:
Govind MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
रे समय के सबसे बड़े साहित्यकार सोल्ज़ेनित्सिन ने ‘नोबेल पुरस्कार’ लेते समय अपने भाषण में कहा था—“अगर लेखक नहीं तो दूसरे कौन अपने यहाँ की असफल सरकारों को अपराधी ठहराएँगे और लेखकों के अलावा कौन अपने समाज को उसके भीरुताजन्य अपमान अथवा आत्मतुष्ट नपुंसकता के लिए दोषी ठहराएगा?”
अपने देश में क्या हुआ कि सरकारें तो बदलीं पर कुछ नहीं बदला? अपने आठवें उपन्यास ‘फूल...इमारतें और बन्दर’ में गोविन्द मिश्र इस प्रश्न से टकराते हुए सरकार के भीतरी ढाँचे में हमें ले जाते हैं, जिसमें फँसा एक संवेदनशील अधिकारी लगातार होते हुए अपने नैतिक पतन को स्वयं देख रहा है। उस व्यक्ति के माध्यम से उपन्यासकार हमें प्रशासन के ऊपरी तंत्र के तिलिस्म के सामने ला खड़ा करता है जो बाहर से रहस्यमय, अबूझ, अभेद्य और साफ़-सुथरा लगता है, पर जो भीतर से उतना ही छिछला, गिजगिजा और भ्रष्ट है। और जो दरअसल उपन्यास का मुख्य पात्र है। उस तिलिस्म के भीतर के चतुर खिलाड़ी कौन हैं, अपने ‘पावर गेम्स’ कैसे खेलते हैं, ‘ग्रीन रूम’ में क्या-क्या और कैसे चलता है...तंत्र को अपने स्वार्थ के लिए नेता और बड़े अफ़सर कैसे और भ्रष्ट करते हैं...इस यथार्थ के कितने आयाम उपन्यास में खुलते चले जाते हैं। उन्हें जीवन के वृहत्तर सवालों से छोड़कर, नियति-न्याय के परिप्रेक्ष्य में रखकर उपन्यासकार जैसे एक सामान्य यथार्थवादी राजनीतिक उपन्यास की सीमाओं को लाँघ एक बड़ी रचना की सृष्टि अनायास ही कर गया है। पाठकों को सोल्ज़ेनित्सिन का एक और कहना याद आएगा—“वह साहित्य जो अपने समय के नैतिक और सामाजिक ख़तरों को व्यक्त नहीं करता, साहित्य कहलाने लायक़ नहीं है।”
हिन्दी में अपने क़िस्म का पहला उपन्यास जिसे गोविन्द मिश्र ही लिख सकते थे और उनका ‘देय’ था, एक तरह से
ISBN: 9788119092437
Pages: 302
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
टंट्या भील मध्यभारत में उन्नीसवीं सदी के महान आदिवासी जननायक के रूप में जाना जाता है। बचपन तथा युवावस्था में टंट्या को असहनीय यातनाओं से गुज़रना पड़ा। टंट्या की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे, उसके परिवार और समाज को बदहाली, अन्याय और शोषण का शिकार क्यों होना पड़ा। धीरे-धीरे वह सोचने लगा, इसी सोच ने उसे अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी। उसने सामन्ती व्यवस्था तथा उस व्यवस्था की रक्षा करनेवाली ब्रिटिश राजसत्ता को गम्भीर चुनौती दी। दलितों-शोषितों और आम आदमी ख़ासकर सर्वहारा किसानों-मज़दूरों का पक्ष लेकर उन्हें इस महासंग्राम में शामिल करने के लिए टंट्या ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी। प्रचलित नीतिमूल्यों को नज़रअन्दाज़ कर गहरे मानवीय मूल्यों पर उसने अपने संघर्ष की नींव रखी। सरकार की नज़र में वह डकैतों का सम्राट था, लेकिन लोकमानस में वह ईश्वरीय अंश धारण करनेवाला जननायक माना गया। वह आज भी लोकमानस में मिथक के रूप में अमर है।
टंट्या जैसे अलौकिक जननायक पर उपन्यास लिखने का प्रयास कठिन कर्म है। टंट्या की जीवनगाथा मिथकों और लोककथाओं में इस क़दर घुल-मिल गई है कि रहस्य तथा चमत्कार को यथार्थ से अलग करना असम्भव-सा था, लेकिन उपन्यासकार ने अपने प्रामाणिक शोध के ज़रिए और रचनात्मकता के सहारे जीवन-चरित्र के यथार्थ को उजागर करने का प्रयास किया है। यह ग़ौरतलब है कि लोकप्रिय या सरलीकृत वर्णन की फिसलन इस उपन्यास में नहीं दिखती। अनावश्यक भावुकता से बचाव, चिन्तनशीलता, संयत भाषिक अभिव्यक्ति, गहन मानवीय अन्तर्दृष्टि, इतिहास और समकालीनता के बीच जटिल अन्तर्सम्बन्धों का अहसास आदि कई विशेषताओं के कारण यह उपन्यास सर्जन के सहारे इतिहास की पुनर्रचना का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है। उपन्यासों के भारतीय परिदृश्य में बाबा भांड की यह कृति निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है तथा प्रो. निशिकान्त ठकार जैसे अनुवादक के हाथों से हुआ इस कृति का अनुवाद पाठकों के लिए मूल्यवान उपलब्धि है।
—प्रो. चन्द्रकान्त पाटील
Marubhoomi
- Author Name:
Shankar
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कहते हैं, अगर व्यक्ति का उद्देश्य सिर्फ़ अपनी धन-लालसा को पूर्ण करना ही रह जाए तो फिर कोई सम्बन्ध, कोई मूल्य उसके लिए कोई मायने नहीं रखता।
बांग्ला उपन्यासकार शंकर के इस उपन्यास में भी ऐसी ही एक लिप्सा-कथा को बताया गया है। सोमनाथ जिसके दो भाई सेवा-क्षेत्र में सफलतापूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे, अपने लिए व्यवसाय का मार्ग चुनता है, और देखते-देखते वही उसका सब कुछ हो जाता है। मातृ-तुल्य कमला भाभी भी उसे उसकी व्यस्तताओं से नहीं निकाल पातीं। विवाह का उनका आग्रह भी वह कभी ठीक नहीं सुनता।
दूसरी तरफ़ सोमनाथ का मित्र है सुकुमार जो लगातार की बेकारी से मनो-चिकित्सालय में पहुँच जाता है। कणा सुकुमार की बहन है जो सोम पर विश्वास करती है, लेकिन सोम उसके भरोसे को अपनी व्यावसायिक सफलता के लिए बेच देता है। अपने घर की आर्थिक स्थिति से व्याकुल उस लड़की की पवित्रता किसी बड़े बिजनेस-ठेके की रिश्वत बन जाती है।
अपने सबसे नज़दीकी मित्र की बहन को सफलता की सीढ़ी बनाकर उसने बहुत कुछ हासिल किया। लेकिन फिर आख़िरकार उसी को अपनी पत्नी के रूप में भाभी कमला के सामने लाना पड़ा। यह उपन्यास लालच और लिप्सा की सौ जीभों वाली भूख और मनुष्य के अन्तस में बसे अनुताप की संघर्ष-कथा है, जो बताती है कि उम्मीद की एक आख़िरी किरण मनुष्य के भीतर हमेशा बची रहती है, वह चाहे कितना भी क्यों न गिर जाए। एक मार्मिक और विचारोत्तेजक उपन्यास।
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