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About the book
अनिल सिंह लन्दन में रहते हैं और पेशे से बैंकर हैं। उनकी एक महिला मित्र है पैट, जो लम्बे समय से भारत जाने की ख़्वाहिश पाले हुए है। एक दिन उन्हें ख़बर मिलती है कि उनके चाचा की मौत हो गई है, जो उत्तर भारत स्थित पालनपुर नाम के गाँव में रहते थे। अब वे ही उनकी जायदाद के इकलौते वारिस हैं। पैट के आग्रह पर अनिल भारत जाने का फ़ैसला कर लेते हैं। उनके मन में जमीन-जायदाद अपने नाम करवाने के साथ-साथ उस देश को भी थोड़ा अच्छे से जान लेने की इच्छा है जहाँ से उनके माता-पिता आए थे। फ़ोटोग्राफ़ी के शौक़ीन अनिल अपने साथ अपना कैमरा भी ले जाते हैं। उनके मन में खेती करने का ख़याल भी घुमड़ रहा होता है। गाँव के रास्ते में अनिल को पता चलता है कि उनके चाचा की तो हत्या हुई थी और पुलिस ने इस जुर्म में उनकी नौकरानी को गिरफ़्तार किया है। उसका नाम नीतू है और वह दलित है। यहाँ से खुलने वाली आगे की कहानी का एक सिरा इसी हत्या की गुत्थी में है। पालनपुर में अपने प्रवास के दौरान वे उत्तर भारतीय समाज की तमाम जटिलताओं के साथ दो-चार होते हैं, मसलन विभिन्न जाति-समूहों (ठाकुर, मुराव, दलित) की आपसी राजनीति, भ्रष्टाचार, जलनखोरी, लालफीताशाही, ग़रीबी, लैंगिक भेद, सत्ता-संघर्ष और एक बँटे हुए गाँव की तमाम उथल-पुथल। ‘लाइन पार’, जातियों में बँटे हुए एक भारतीय गाँव का यथार्थवादी, तीखा और मनोरंजक पोर्ट्रेट है। इसमें सौ साल के ग्रामीण जीवन की व्यथा-कथा है। इस कहानी में ऐतिहासिक तथ्य हैं, तो निजी अनुभव भी हैं। यह एक सनसनीखेज अपराध कथा भी है और ग्रामीण जीवन का मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ भी जिसमें आज़ादी से पहले और बाद के ग्रामीण भारत की विविध रंगी तस्वीरें दिखती है।
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About the Book
अनिल सिंह लन्दन में रहते हैं और पेशे से बैंकर हैं। उनकी एक महिला मित्र है पैट, जो लम्बे समय से भारत जाने की ख़्वाहिश पाले हुए है। एक दिन उन्हें ख़बर मिलती है कि उनके चाचा की मौत हो गई है, जो उत्तर भारत स्थित पालनपुर नाम के गाँव में रहते थे। अब वे ही उनकी जायदाद के इकलौते वारिस हैं। पैट के आग्रह पर अनिल भारत जाने का फ़ैसला कर लेते हैं। उनके मन में जमीन-जायदाद अपने नाम करवाने के साथ-साथ उस देश को भी थोड़ा अच्छे से जान लेने की इच्छा है जहाँ से उनके माता-पिता आए थे। फ़ोटोग्राफ़ी के शौक़ीन अनिल अपने साथ अपना कैमरा भी ले जाते हैं। उनके मन में खेती करने का ख़याल भी घुमड़ रहा होता है। गाँव के रास्ते में अनिल को पता चलता है कि उनके चाचा की तो हत्या हुई थी और पुलिस ने इस जुर्म में उनकी नौकरानी को गिरफ़्तार किया है। उसका नाम नीतू है और वह दलित है। यहाँ से खुलने वाली आगे की कहानी का एक सिरा इसी हत्या की गुत्थी में है। पालनपुर में अपने प्रवास के दौरान वे उत्तर भारतीय समाज की तमाम जटिलताओं के साथ दो-चार होते हैं, मसलन विभिन्न जाति-समूहों (ठाकुर, मुराव, दलित) की आपसी राजनीति, भ्रष्टाचार, जलनखोरी, लालफीताशाही, ग़रीबी, लैंगिक भेद, सत्ता-संघर्ष और एक बँटे हुए गाँव की तमाम उथल-पुथल।
‘लाइन पार’, जातियों में बँटे हुए एक भारतीय गाँव का यथार्थवादी, तीखा और मनोरंजक पोर्ट्रेट है। इसमें सौ साल के ग्रामीण जीवन की व्यथा-कथा है। इस कहानी में ऐतिहासिक तथ्य हैं, तो निजी अनुभव भी हैं। यह एक सनसनीखेज अपराध कथा भी है और ग्रामीण जीवन का मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ भी जिसमें आज़ादी से पहले और बाद के ग्रामीण भारत की विविध रंगी तस्वीरें दिखती है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2024
- Weight
- 360 grams
- ISBN-13
- 9789360863548
- Pages
- 344
- Reading time
- ~11 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था। ‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है। ‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
Chittakobara
- Author Name:
Mridula Garg
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जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से
Raat Ka Reporter
- Author Name:
Nirmal Verma
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रात का रिपोर्टर सम्भवत: आपातकाल के दिनों को लेकर लिखा गया हिन्दी में पहला उपन्यास है, और निर्मल जी के कथा-लेखन में नए मोड़ का सूचक भी। उपन्यास का कथा-नायक रिशी यहाँ एक ऐसे पत्रकार के रूप में सामने आता है, जिसका आन्तरिक संकट उसके बाह्य सामाजिक यथार्थ से उपजा है... हालात ने उसे जैसे अस्वस्थ और शंकालु बना दिया है। उसके चारों ओर अँधेरे का साम्राज्य है और उसका अन्तर्जगत भी उसकी ज़द में है। ऐसे में यदि वह अपने इर्द-गिर्द के अँधेरे को जाँचने-परखने की कोशिश करता है, तो स्वयं भी उसकी कसौटी पर होता है। वस्तुतः यह एक ऐसी कथाकृति है, जो एक बुद्धिजीवी की चेतना पर पड़ने वाले युगीन दबावों को रेखांकित करती है और उन्हें उसके व्यवहार में घटित होते हुए दिखाती है। इससे गुज़रते हुए हम जिस माहौल से गुज़रते हैं, वह चाहे हमारे अनुभव से बाहर रहा हो या हम उससे बाहर रहे हों, लेकिन वह हमारी दुनिया की आज़ादी के बुनियादी सवालों से परे नहीं है।
Naqqashidar Cabinet
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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सुधा ओम ढींगरा का उपन्यास नक़्क़ाशीदार केबिनेट वर्ष 2016 का अत्यंत सफल उपन्यास है। यह उपन्यास पेपरबैक और ऑडियोबुक में भी उपलब्ध है।
Gawah Gairhazir
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
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किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
Naukar Ki Kameez
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
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‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल मिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
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