Puddan Katha : Corona Kal Mein Ganv-Giranv
Author:
DeveshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Available
एक रहे पुद्दन। गाँव रहा नरहरपुर। वे चले ससुराल–नौशादपुर। ब्याह था साली का। दौर था कोरोना का। वायरस की थी उत्सवों और मेलजोल से यारी। फैलाने लगा अपना पंजा। लोगों ने जिसे लिया हल्के में, वही पड़ा भारी। और उनकी बिंदास जिंदगी पर डाल दिया डर और आशंकाओं का जाल। फिर क्या हुआ? क्या हो सकी पुद्दन की साली की शादी? कथा बीच नउनिया की कथा क्या है? क्या होता है उसकी जिंदगी में? जयनाथ का आइसोलेशन गाँव में कौतूहल क्यों है? मखंचू शहर से लौटकर गाँव में क्या पाता है?</p>
<p>किरदारों की ठेलमठेल भीड़ नहीं है। जो हैं उनका असर गहरा होता है कथा पढ़ते हुए। अपनी-अपनी अच्छाई और बुराई के साथ जिंदादिल लोग हैं। धोखे और विश्वास, प्रपंच और लगाव से भरे हुए। सारी मुसीबतों के बीच वे रोते-रोते हँसी-ठट्ठा भी कर लेते हैं। गीत भी गा लेते हैं।</p>
<p>पुद्दन कथा गाँव-गिराँव की कोरोनाकालीन ऐसी कथात्मक रपट है जिसे पढ़ते हुए आँखें भर आती हैं। गुदगुदी उठती है। मुस्कान चुहल करती है।</p>
<p>एक प्राणवान देशज कथा!
ISBN: 9789391950262
Pages: 126
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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श्रीलाल शुक्ल ने अपने इस उपन्यास को राज-मज़दूरों, मिस्त्रियों, ठेकेदारों, इंजीनियरों और शिक्षित बेरोज़गारों के जीवन पर केन्द्रित किया है और उन्हें एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए एक दिलचस्प कथाफलक की रचना की है। सन्तोषकुमार उर्फ़ सत्ते परमात्मा जी की बनती हुई चौथी बिल्डिंग की मुंशीगीरी करते हुए न सिर्फ़ अपनी डेली-पैसिंजरी, एक औसत गाँव-देहात और ‘चल-चल रे नौजवान’ टाइप ऊँचे सम्बोधनों की शिकार बेरोज़गार ज़िन्दगी की बखिया उधेड़ता है, बल्कि वही हमें जसोदा उर्फ़ ‘मेमसाहब’ जैसे जीवन्त नारी चरित्र से भी परिचित कराता है। इसके अलावा उपन्यास के प्रायः सभी प्रमुख पात्रों को लेखक ने अपनी गहरी सहानुभूति और मनोवैज्ञानिक सहजता प्रदान की है और उनके माध्यम से विभिन्न सामाजिक-आर्थिक अन्तर्विरोधों, उन्हें प्रभावित-परिचालित करती हुई शक्तियों और मनुष्य-स्वभाव की दुर्बलताओं को अत्यन्त कलात्मकता से उजागर किया है।
वस्तुतः श्रीलाल शुक्ल की यह कथाकृति बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में ईंट-पत्थर होते जा रहे आदमी की त्रासदी को अत्यन्त मानवीय और यथार्थवादी फलक पर उकेरती है।
Pranveer Maharana Pratap
- Author Name:
Bharti Sudame
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महाराणा प्रताप के जीवन और संघर्ष पर केन्द्रित यह उपन्यास अपने मूल मराठी रूप में बहुत लोकप्रिय रहा है। मराठी में अब तक इसके छह संस्करण हो चुके हैं। साथ ही इस उपन्यास ने राणा प्रताप के बारे में नए सिरे से जानने की उत्सुकता बढ़ा दी है।
अपनी स्वाधीनता के लिए अकबर की विशाल सेना से टक्कर लेने वाले इस योद्वा को लेकर जनमानस में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। अपने देश और अपने लोगों के लिए उनके संघर्ष को देखने के भी कई नजरिये हैं। लेकिन यह उपन्यास तथ्यों के साथ आगे बढ़ता है जिन्हें लेखिका ने अपने लम्बे अध्ययन और महाराणा प्रताप से सम्बन्धित ऐतिहासिक स्थानों की अनेक यात्राओं के दौरान एकत्रित किया। मराठी, हिन्दी और अंग्रेजी के शताधिक ग्रंथों के पारायण के उपरांत रची गई यह गाथा अपनी पठनीयता में भी उल्लेखनीय बन पड़ी है जिसे अनुवादक ने गहरे समर्पण और नितांत निजी लगाव के साथ हिन्दी में प्रस्तुत किया है।
यह उपन्यास न सिर्फ महाराणा के जीवन के कई अनजाने पहलुओं से पाठक का परिचय कराता है, बल्कि अपनी भूमि और अपने राष्ट्र पर गर्व करने की प्रेरणा भी देता है। उपन्यास के कई अंश इतने मार्मिक हैं कि लम्बे समय तक हमारे मानस को भिगोए रखते हैं, तो कई हिस्से हमें उदात्त ओज से भर देते हैं।
Anamantrit Mehman
- Author Name:
Anand Shankar Madhvan
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‘‘मानवता और उसके इस संसार में जो सत्य अनादिकाल से क्रियाशील है, उसे समझने और पाने के लिए जितना दिमाग़ी परिश्रम इस भारतवर्ष के योगी-महात्माओं ने किया है, उतना कहीं के भी महापुरुषों ने नहीं किया है। इस ओर प्रत्येक ऋषि अपने-अपने तरीक़े से, स्वतंत्र रूप से, अनुसन्धान करते आए हैं। मगर वे सभी यही अनुभव करते रहे कि प्रत्येक मार्ग एक-दूसरे का पूरक है। इस तरह अन्त में वे एक ही सत्य पर पहुँचते भी थे। तुम बच्चे हो बेटा, तुमने कुछ पुस्तकें पढ़ी हैं, वह भी अंग्रेज़ी पुस्तकों में वर्णित विचारों को पचाने का प्रयास मात्र किया है। इस तरह तुम न तो उन ऋषियों की घनघोर साधनाओं को समझोगे और न उनके अतुलनीय बुद्धि-वैभव को ही। तुम उनकी बुद्धि-शक्ति की कल्पना करो जिन्होंने अंक व्यवस्था का आविष्कार किया और शून्य का पता चलाया। तुम भारतीय ज्ञान-विद्या और अभिनय-शास्त्र को भी समझने का प्रयास करो। इस देश में धर्म सिर्फ़ राम जपना ही नहीं रहा है। मनुष्य का प्रत्येक आचरण परमेश्वर-प्राप्ति का एक साधन समझा जाता था। अतः वैद्य चिकित्सा करते समय, गायक गाते समय, गणितज्ञ किसी समस्या को हल करते समय, राजा राज्य-कार्य करते समय, पत्नी पति-सेवा करते समय, भंगी झाड़ू लगाते समय; इस तरह प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रत्येक आचरण को ही ईश्वर का एक क़दम समझता था। कम-से-कम विधि और व्यवस्था इसी ओर रही है।’’ ‘‘खैर, ऐसा ही सही; आखिर उन सब अनुष्ठानों से भारत ने क्या पाया? सैकड़ों बरस की ग़ुलामी जब मुसलमान आए तो उसका ग़ुलाम हुआ; जब अंग्रेज़ आए तो उसका ग़ुलाम हुआ। जातीय जीवन में कुछ भी शक्ति रहती तो वह इतनी जल्दी और इतने शौक से ग़ुलामी को स्वीकार नहीं करता। बाबा जी, यह सत्य है कि मैंने धर्म का अध्ययन नहीं किया, पर क्या वजह है कि हम इतने क्षीण चारित्र्य के हो गए कि अपनी स्त्रियों तक को आततायियों से बचा नहीं सके? बुरा नहीं मानिए। जानने की व्यग्रता में मेरी पवित्र वेदना सन्निहित है।’’
‘‘मैं मानता हूँ, जातीय जीवन गिर गया है। हज़ारों बरसों से गिरता आ रहा है।’’
‘‘कब बढ़ी हालत में थी? इतिहास में तो कुछ प्रमाण नहीं मिलता। सब आपस में लड़े-भिड़े हैं। सैकड़ों बार लड़कियों के लिए लड़ाइयाँ हुई हैं।’’ ‘‘यह तो ग़लत बात है। इतिहास सदा मात्र सच्ची और सही घटनाओं को प्रस्तुत नहीं करता।’’ ‘‘तो सही क्या है—आपकी प्रिय धारणाएँ? आपकी प्रिय विचारधाराएँ?’’ ‘‘तो तुम्हारा क्या कहना है?’’ ‘‘मेरा यह कहना है कि इन भौगोलिक प्रतिष्ठानों का कुछ भी अर्थ नहीं है। क्या अर्थ है भारत भूमि का; क्यों आप भारत को पुण्यभूमि और भगवान का प्रिय देश कहते हैं? चीनी लोगों ने कौन-सा अपराध किया कि उनके देश में कोई पुण्यभूमि की मान्यता नहीं मिलती? सच बात तो यह है कि मनुष्य जहाँ-जहाँ जमकर रहते गए, उन्होंने अपनी उसी जमाअत तथा भू-भाग को महत्त्वपूर्ण समझना प्रारम्भ किया। उसके ममत्व में जो बेमतलब और बेबुनियाद का एक भाव चढ़ता गया, उसे राष्ट्रीयता कहते हैं। जैसे-जैसे यातायात की सुगमताएँ बढ़ती जाएँगी और मानव एक-दूसरे के निकटतम सम्पर्क में आता जाएगा, वैसे-वैसे राष्ट्र और राष्ट्रीयता भी कम होती जाएगी, भाषाएँ कम होती चलेंगी, जातियाँ मिटती चलेंगी और धर्म भी घटता चलेगा। विज्ञान पूरी मानवता को एक धरातल पर खड़ा कर देगा; एक सत्य पर व्यवस्थित कर देगा। जो चीज़ भेद-भाव को प्रश्रय देती हुई उसे मान्यता प्रदान करती है, उसे मैं ग़लत, झूठ और अन्याय मानता हूँ। इससे मैं मानवता को बचाऊँगा।’’
अध्यात्म और साम्यवाद को केन्द्र में रखकर रचा गया आनन्द शंकर माधवन का विचारोत्तेजक उपन्यास है—‘अनामंत्रित मेहमान’। अपने इस पठनीय उपन्यास में लेखक ने जहाँ दो विपरीत धाराओं का अपनी तार्किक दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वहीं निश्छल प्रेम और उदारता के आगे कठोर से कठोर व्यक्ति भी किस तरह स्वयं को पराजित-सा महसूस करने लगता है, इसका बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है।
Jharokhe
- Author Name:
Bhisham Sahni
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- Description: ‘झरोखे’ एक छोटे-से परिवार की व्यथा-कथा को प्रस्तुत करनेवाला मार्मिक उपन्यास है। लेखक ने एक छोटे-से बालक की आँखों से उस परिवार में घटनेवाली छोटी-छोटी घटनाओं को देखने और उनका उल्लेख करने की कोशिश की है। एक-एक घटना एक-एक प्रबल संस्कार बनकर आती है और परिवार के बच्चों के भावी चरित्र की रूपरेखा गढ़ती चली जाती है। पारिवारिक जीवन में घटनेवाली घटनाएँ आम तौर पर अल्प और साधारण ही होती हैं, पर संस्कारों के रूप से उनका महत्त्व प्रचंड होता है। इन्हीं अल्प और साधारण लगनेवाली घटनाओं के नीचे ज़िन्दगी करवट लेती रहती है। यही छोटी-छोटी घटनाएँ पात्रों के जीवन में निर्णायक साबित होती हैं और उनकी ज़िन्दगी का रुख़ बदल देती हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी सभी की राहें अलग-अलग हैं। इसकी कथावस्तु में जहाँ एक ओर जीवन के उल्लसित क्षणों का चित्रण है, वहीं उसके दु:ख-दर्द और उसकी निर्मम गति का भी अविस्मरणीय रेखांकन हुआ है।
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