Marang Goda Neelkanth Hua
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महुआ माजी का उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ अपने नए विषय एवं लेखकीय सरोकारों के चलते इधर के उपन्यासों में एक उल्लेखनीय पहलक़दमी है। जब हिन्दी की मुख्यधारा के लेखक हाशिए के समाज को लेकर लगभग उदासीन हों, तब आदिवासियों की दशा, दुर्दशा और जीवन संघर्ष पर केन्द्रित यह उपन्यास एक बड़ी रिक्ति की भरपाई है।</p> <p>इस उपन्यास में महुआ माजी यूरेनियम की तलाश से जुड़ी जिस सम्पूर्ण प्रक्रिया को उजागर करती हैं, वह हिन्दी उपन्यास का जोखिम के इलाक़े में प्रवेश है। महुआ माजी ने गहरे शोध, सर्वेक्षण और समाजशास्त्रीय दृष्टि का सहारा लेकर इस उपन्यास के माध्यम से एक ज़रूरी हस्तक्षेप किया है।</p> <p>उपन्यास का केन्द्रीय पात्र सगेन प्रतिरोध की स्थानिकता को बरकरार रखते हुए विकिरणविरोधी वैश्विक आन्दोलन के साथ भी संवाद बनाता है। हिरोशिमा की दहशत और चेरनोबिल व फुकुशिमा सरीखे हादसे उसकी चेतना को लगातार प्रतिरोधी दिशा देते हैं। अच्छा यह भी है कि यह सबकुछ मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा एवं अन्तर्द्वन्द्व में घुल-मिलकर प्रस्तुत हुआ है। सचमुच उपन्यास में वर्णित बहुत से तथ्य व मुद्दे अभी तक गम्भीर चर्चा का विषय नहीं बन सके हैं। इस रूप में यह उपन्यास एक नई भूमिका के रूप में भी प्रस्तुत है।</p> <p>—वीरेन्द्र यादव</p> <p>
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महुआ माजी का उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ अपने नए विषय एवं लेखकीय सरोकारों के चलते इधर के उपन्यासों में एक उल्लेखनीय पहलक़दमी है। जब हिन्दी की मुख्यधारा के लेखक हाशिए के समाज को लेकर लगभग उदासीन हों, तब आदिवासियों की दशा, दुर्दशा और जीवन संघर्ष पर केन्द्रित यह उपन्यास एक बड़ी रिक्ति की भरपाई है।</p>
<p>इस उपन्यास में महुआ माजी यूरेनियम की तलाश से जुड़ी जिस सम्पूर्ण प्रक्रिया को उजागर करती हैं, वह हिन्दी उपन्यास का जोखिम के इलाक़े में प्रवेश है। महुआ माजी ने गहरे शोध, सर्वेक्षण और समाजशास्त्रीय दृष्टि का सहारा लेकर इस उपन्यास के माध्यम से एक ज़रूरी हस्तक्षेप किया है।</p>
<p>उपन्यास का केन्द्रीय पात्र सगेन प्रतिरोध की स्थानिकता को बरकरार रखते हुए विकिरणविरोधी वैश्विक आन्दोलन के साथ भी संवाद बनाता है। हिरोशिमा की दहशत और चेरनोबिल व फुकुशिमा सरीखे हादसे उसकी चेतना को लगातार प्रतिरोधी दिशा देते हैं। अच्छा यह भी है कि यह सबकुछ मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा एवं अन्तर्द्वन्द्व में घुल-मिलकर प्रस्तुत हुआ है। सचमुच उपन्यास में वर्णित बहुत से तथ्य व मुद्दे अभी तक गम्भीर चर्चा का विषय नहीं बन सके हैं। इस रूप में यह उपन्यास एक नई भूमिका के रूप में भी प्रस्तुत है।</p>
<p>—वीरेन्द्र यादव</p>
<p>
Book Details
-
ISBN9788126727612
-
Pages404
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कल्पना कीजिए कि पृथ्वी को छोड़कर मानव जाति किसी और ग्रह पर जा बसे। तकनीक इतनी विकसित हो जाए कि प्रजनन तथा उत्तरजीविता के लिए स्त्री और पुरुष एक-दूसरे पर निर्भर न हों, दोनों के दो अलग, एक-दूसरे से अनजान लोक बस जाएँ। जब जरूरत हो क्लोनिंग से नए प्राणी का सृजन कर लिए जाएँ और जब देह का कोई अंग असमर्थ लगे उसे एकदम नए अंग से और बुढ़ापे को युवावस्था से बदल लिया जाए!
इस उपन्यास में इस कल्पना को हमारी मौजूदा दुनिया के समानान्तर तमाम सम्भव उपादानों के साथ रचा गया है। विज्ञान कथाओं को जो पाठक अविश्वसनीय कल्पनाओं की उड़ान मानते हैं, और दूसरे ग्रहों से आनेवाले मनुष्य-विरोधी प्राणियों, एलियनों की विचित्र शक्लों से ऊब चुके हैं, उनके लिए यह उपन्यास एक ताजा हवा की तरह है।
उपन्यास की ताकत है कल्पना का सांगोपांग और तर्कसम्मत निरूपण और उसके भीतर पैठकर कहानी को इस तरह कहना कि जब तक आप उसमें रहते हैं, अपनी वर्तमान दुनिया से बरबस परे चले जाते हैं। एक वैश्विक दार्शनिक गल्प-यात्रा पर एक प्रति-सृष्टि में जहाँ वह सब कुछ है जिसे मनुष्य अपनी प्राकृतिक सीमाओं को लाँघकर, अपनी उत्तरजीविता की अन्तहीन आशा में रच सकता है।
Godan
- Author Name:
Munshi Premchand
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- Description: गोदान' स्वंत्रतापूर्व भारतीय ग्रामीण जीवन का विश्वसनीय और सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। जमींदारी, साहूकारी और धार्मिक-सामाजिक दबाव कैसे छोटे और मझोले किसानों को कुचलकर नेस्तोनाबूद करते हैं, यह प्रेमचंद ने अपने इस उपन्यास में बड़ी सच्चाई से दर्ज किया है। इस उपन्यास में जहाँ कथित उच्च वर्ग के खोखले और निर्मम स्वरूप को उघाड़कर रख दिया गया है वहीं विधवा-विवाह और जाति समस्या पर भी विचारोत्तेजक बहसें हैं। उपन्यास के स्त्री पात्रों के विकासक्रम को देखें तो प्रेमचंद अपने युग के प्रमुख स्त्रीवादी कथाकार ठहरते हैं। कथानायक होरी अपने जटिल जीवन के बीच से, एक गाय पाल लेने का अधूरा स्वप्न लिये-लिये विदा हो जाता है। यह इस उपन्यास की प्रमुख कथा है। इससे जुड़ी हुई अनेक उपकथाएँ हैं, जो मूल कथा जितनी ही महत्त्वपूर्ण हैं, इसलिए 'गोदान' आज भी गंभीरता से पढ़े जाने की माँग करता है।
Bhairavee
- Author Name:
Shivani
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Description:
...“कैसा आश्चर्य था कि वही चन्दन, जो कभी सड़क पर निकलती अर्थी की रामनामी सुनकर माँ से चिपट जाती थी, रात-भर भय से थरथराती रहती थी, आज यहाँ शमशान के बीचोबीच जा रही सड़क पर निःशंक चली जा रही थी। कहीं पर बुझी चिन्ताओं के घेरे से उसकी भगवा धोती छू जाती, कभी बुझ रही चिता का दुर्गंधमय धुआँ हवा के किसी झोंके के साथ नाक-मुँह में घुस जाता।...”
जटिल जीवन की परिस्थितियों ने थपेड़े मार-मारकर सुन्दरी चन्दन को पतिगृह से बाहर किया और भैरवी बनने को बाध्य कर दिया। जिस ललाट पर गुरु ने चिता-भस्मी टेक दी हो क्या उस पर सिन्दूर का टीका फिर कभी लग सकता है?
शिवानी के इस रोमांचकारी उपन्यास में सिद्ध साधकों और विकराल रूपधारिणी भैरवियों की दुनिया में भटककर चली आई भोली, निष्पाप चन्दन एक ऐसी मुक्त बन्दिनी बन जाती है, जो सांसारिक प्रेम-सम्बन्धों में लौटकर आने की उत्कट इच्छा के बावजूद अपनी अन्तर्आत्मा की बेड़ियाँ नहीं त्याग पाती और सोचती रह जाती है—क्या वह जाए? पर कहाँ?
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