Sabke Ram
(0)
Author:
L Shri Rajeev Gupta, Dr. Pravesh KumarPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘सबके राम’ पुस्तक प्रभु श्रीराम के काज में लगे लाखों कार्यकर्ताओं के मन के भाव को उजागर करनेवाली है। पुस्तक की एक-एक पंक्ति निश्चित ही देश भर के रामभक्तों के मन में प्रभु राम के प्रति श्रद्धा, प्रेम एवं उनका जीवन कैसा बने, इसकी प्रेरणा देनेवाली होगी। पुस्तक देश भर में चले ‘निधि समर्पण अभियान’ में लगे कार्यकर्ताओं के अनुभवों को अपने भीतर समाहित करती है, वहीं प्रभु राम किस प्रकार भारत के कण-कण में व्याप्त हैं, इसे भी बताती है। हम सभी को यह विदित है कि ‘निधि समर्पण अभियान’ विश्व का सबसे बड़ा अभियान रहा है, जिसने भारत के प्रत्येक हिस्से के जनमानस को यह अवसर उपलब्ध कराया कि वह भी वर्षों से प्रतीक्षित प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण का हिस्सा बन सके। इसलिए समाज के सभी वर्गों के हर आयु के बाल, युवा, महिला, पुरुष, वृद्ध ने हृदय खोलकर अपनी क्षमतानुसार निधि समर्पित की। उत्तर-पूर्व के अंतिम छोर की 95 वर्षीय महिला का समर्पण हो अथवा भारत की समुद्री सीमा एवं तटीय प्रदेश तमिलनाडु, केरल या फिर उत्तर के हिमालयी प्रदेश जम्मू-कश्मीर, लददाख आदि हों, सभी को राम-काज से जोड़ दिया। यह पुस्तक जहाँ भारत के सभी प्रांतों से प्रभु श्रीराम के संदर्भ में प्राप्त अनुभवों का संकलन है तो वहीं भारत की अस्मिता को दुनिया से परिचित करानेवाले प्रभु श्रीराम के जीवन के विभिन्न पहलुओं का भी वर्णन करती है।
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‘सबके राम’ पुस्तक प्रभु श्रीराम के काज में लगे लाखों कार्यकर्ताओं के मन के भाव को उजागर करनेवाली है। पुस्तक की एक-एक पंक्ति निश्चित ही देश भर के रामभक्तों के मन में प्रभु राम के प्रति श्रद्धा, प्रेम एवं उनका जीवन कैसा बने, इसकी प्रेरणा देनेवाली होगी। पुस्तक देश भर में चले ‘निधि समर्पण अभियान’ में लगे कार्यकर्ताओं के अनुभवों को अपने भीतर समाहित करती है, वहीं प्रभु राम किस प्रकार भारत के कण-कण में व्याप्त हैं, इसे भी बताती है। हम सभी को यह विदित है कि ‘निधि समर्पण अभियान’ विश्व का सबसे बड़ा अभियान रहा है, जिसने भारत के प्रत्येक हिस्से के जनमानस को यह अवसर उपलब्ध कराया कि वह भी वर्षों से प्रतीक्षित प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण का हिस्सा बन सके। इसलिए समाज के सभी वर्गों के हर आयु के बाल, युवा, महिला, पुरुष, वृद्ध ने हृदय खोलकर अपनी क्षमतानुसार निधि समर्पित की। उत्तर-पूर्व के अंतिम छोर की 95 वर्षीय महिला का समर्पण हो अथवा भारत की समुद्री सीमा एवं तटीय प्रदेश तमिलनाडु, केरल या फिर उत्तर के हिमालयी प्रदेश जम्मू-कश्मीर, लददाख आदि हों, सभी को राम-काज से जोड़ दिया। यह पुस्तक जहाँ भारत के सभी प्रांतों से प्रभु श्रीराम के संदर्भ में प्राप्त अनुभवों का संकलन है तो वहीं भारत की अस्मिता को दुनिया से परिचित करानेवाले प्रभु श्रीराम के जीवन के विभिन्न पहलुओं का भी वर्णन करती है।
Book Details
-
ISBN9789355620064
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘साँझ की उदास-उदास बाँहें अँधिआरे से आ लिपटीं। मोहभरी अलसाई आँखें झुक-झुक आईं और हरियाली के बिखरे आँचल में पत्थरों के पहाड़ उभर आए। चौंककर तपन ने बाहर झाँका। परछाई का सा सूना स्टेशन, दूर जातीं रेल की पटरियाँ और सिर डाले पेड़ों के उदास साए। पीली पाटी पर काले अक्खर चमके ‘तिन-पहाड़,’ और झटका खा गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ रुकी।’ इन्हीं वाक्यों के साथ नियति की यह कथा खुलती है। जया, तपन, श्री, एडना जिसके अलग-अलग छोर हैं। झील के अलग-अलग किनारे जिस तरह उसके पानी से जुड़े रहते हैं, उसी तरह आकांक्षा के भाव में एक साथ बँधे। आकांक्षा सुख की, चाह की, प्रेम की। ‘दार्जिलिंग के नीले निथरे आकाश,’ लाल छतों की थिगलियों, ‘पहरुओं से खड़े राजबाड़ी के ऊँचे पेड़ों,’ चक्करदार ‘सँकरी घुमावोंवाली चढ़ाइयों-उतराइयों,’ ‘हवाघर की बेंचों,‘ और गहरे उदास अँधेरों के बीच घूमती यह कथा जिन्दगी के अँधेरों-उजालों के बारे में तो बताती ही है, एक भीने यात्रा-वृत्तान्त का भी अहसास जगाती है। लेकिन इस उदास ‘नोट’ के साथ - ‘जिसकी साड़ी का टुकड़ा भर ही बच सका, वह इन सबकी क्या होती होगी...क्या होती होगी।’
Unmad
- Author Name:
Bhagwan Singh
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साम्प्रदायिक उन्माद को उन्माद की ही एक क़िस्म के रूप में पकड़ने की कोशिशें हिन्दी में बहुत कम हुई हैं—उँगलियों के पोरों पर भी नहीं, सिर्फ़ उँगलियों पर गिनने लायक़। भगवान सिंह का यह उपन्यास शायद पहली बार इतने सारे मानवीय ब्योरों में जाकर यह काम कर रहा है। दूसरे तमाम पहलू छोड़ भी दें तो इसका यह महत्त्व दस्तावेज़ी क़िस्म का है। एक सहज, प्यारी-सी प्रेमकथा हमारे असहज समाज में इतने सारे टकरावों का केन्द्र बन जाती है और यह अकेली गुत्थी सुलझाने के क्रम में इतनी सारी उलझी गुत्थियाँ रफ़्ता-रफ़्ता सुलझती जाती हैं कि ताज्जुब होता
है।साम्प्रदायिकता जैसी जटिल समस्या को महज़ कुछ साजिशों के ज़रिए व्याख्यायित करने का चलन कम-से-कम साहित्य में नहीं चलते रहना चाहिए। साहित्य तो चीज़ों को ज़्यादा ठोस ढंग से, ज़्यादा गहराई में और ज़्यादा ब्योरेवार पकड़ता है। साहित्य पर यही भरोसा गेटे से कहलवाता है, 'सारे सिद्धान्त धूसर पड़ जाते हैं पर जीवन का वृक्ष हमेशा हरा रहता है।' साम्प्रदायिकता की एक गहरी समझ पर केन्द्रित इस उपन्यास में आपको जीवन-वृक्ष की हरियाली मिलेगी, उसे समझने के दशकों पुराने धूसर सिद्धान्त नहीं।
एक बड़ी चुनौती यह उपन्यास हमारे सामने रखता है—अपने समाज के असहज पहलू को नए सिरे से समझने की चुनौती। अगर आप यह मानकर चलें कि आप दिमाग़ी गुत्थियों से भरे एक असहज समाज में जी रहे हैं तो अनजाने में की गई अपनी ऐसी कई हरकतों से बच सकते हैं, जो किसी को गहरा दु:ख पहुँचानेवाली और यहाँ तक कि कुछ बड़े विध्वंसों का कारण भी बन सकती हैं। प्रौढ़ता और संवेदना के अद्भुत तालमेल से जनमी यह रचना हमें पहले से ज़्यादा प्रौढ़, ज़्यादा संवेदनशील बना सकने में सक्षम है।
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