Hariyal Ki Lakdi
About the book
इक्कीसवीं सदी के जगमग विकास के दौर की यह विडम्बना ही है कि जहाँ वैश्विक धरातल पर अमरीकी दादागीरी सर चढ़कर बोल रही है, वहीं भारतीय समाज की तलछट में रह रहे लोगों की ज़िन्दगी भ्रष्ट नौकरशाही और सरकारी प्रपंचों में फँसकर और भी दूभर होती जा रही है। ‘हरियल की लकड़ी’ तलछट में रह रहे ऐसे ही लोगों की कहानियाँ बयान करती हैं। उपन्यास की मुख्य पात्र बसमतिया जीवट और दृढ़ चरित्र की स्त्री है जिसका पति उसे छोड़कर कहीं चला गया और लौटकर नहीं आया। फिर भी ससुराल में वह उसका इन्तज़ार करती अपनी बूढ़ी सासू की देखभाल और मेहनत-मज़दूरी करती है। माता-पिता की समझदार सन्तान होने के कारण उसे पिता के सहयोग के लिए बार-बार मायके आना पड़ता है। सामाजिक जीवन की विभिन्न छवियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं को बारीकी से रेखांकित करनेवाली यह कृति प्रेम-घृणा, सुख-दु:ख, वासना और भ्रष्टाचार की अविकल कथा को प्रवहमान भाषा और शिल्प में प्रस्तुत करती है। गाँव के उच्चवर्ग के लोगों व सरकारी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष करती बसमतिया जीवन की बीहड़ अनुभवों से गुज़रती है लेकिन झुकना या हार मानना उसने नहीं सीखा। इस क्रम में उसे कई लोगों से सहयोग भी मिलता है और ताने-उलाहने भी सुनने पड़ते हैं। क्या बसमतिया को न्याय मिला? क्या उसका पति लौटा? गाँव के विकास के लिए उसके संघर्ष का क्या हुआ?—इन सवालों की जिज्ञासाओं को लेखक ने उपन्यास में बेहद दिलचस्प विन्यास में प्रस्तुत किया है। एक महत्त्वपूर्ण एवं संग्रहणीय कृति।
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About the Book
इक्कीसवीं सदी के जगमग विकास के दौर की यह विडम्बना ही है कि जहाँ वैश्विक धरातल पर अमरीकी दादागीरी सर चढ़कर बोल रही है, वहीं भारतीय समाज की तलछट में रह रहे लोगों की ज़िन्दगी भ्रष्ट नौकरशाही और सरकारी प्रपंचों में फँसकर और भी दूभर होती जा रही है।
‘हरियल की लकड़ी’ तलछट में रह रहे ऐसे ही लोगों की कहानियाँ बयान करती हैं। उपन्यास की मुख्य पात्र बसमतिया जीवट और दृढ़ चरित्र की स्त्री है जिसका पति उसे छोड़कर कहीं चला गया और लौटकर नहीं आया। फिर भी ससुराल में वह उसका इन्तज़ार करती अपनी बूढ़ी सासू की देखभाल और मेहनत-मज़दूरी करती है। माता-पिता की समझदार सन्तान होने के कारण उसे पिता के सहयोग के लिए बार-बार मायके आना पड़ता है। सामाजिक जीवन की विभिन्न छवियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं को बारीकी से रेखांकित करनेवाली यह कृति प्रेम-घृणा, सुख-दु:ख, वासना और भ्रष्टाचार की अविकल कथा को प्रवहमान भाषा और शिल्प में प्रस्तुत करती है।
गाँव के उच्चवर्ग के लोगों व सरकारी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष करती बसमतिया जीवन की बीहड़ अनुभवों से गुज़रती है लेकिन झुकना या हार मानना उसने नहीं सीखा। इस क्रम में उसे कई लोगों से सहयोग भी मिलता है और ताने-उलाहने भी सुनने पड़ते हैं। क्या बसमतिया को न्याय मिला? क्या उसका पति लौटा? गाँव के विकास के लिए उसके संघर्ष का क्या हुआ?—इन सवालों की जिज्ञासाओं को लेखक ने उपन्यास में बेहद दिलचस्प विन्यास में प्रस्तुत किया है। एक महत्त्वपूर्ण एवं संग्रहणीय कृति।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2023
- Weight
- 264 grams
- ISBN-13
- 9788119159758
- Pages
- 223
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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