Haga-Saheber Train
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Author:
Biswadip ChakrabortyPublisher:
The Antonym CollectionsLanguage:
BengaliCategory:
Literary-fiction₹
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পুরুষ কত প্রকার? পাঁচ। বীরপুরুষ, উত্তরপুরুষ, মহাপুরুষ, ল্যাদপুরুষ আর বাংলার বাঘ। বীরপুরুষ আপন আপন গৃহে দু পায়ের ফাঁকে ন্যাজ নাবিয়ে ঘোরেন। কর্মক্ষেত্রের দরজা পেরিয়ে বাঘ মশাইয়ের আত্মপ্রকাশ ঘটে। মহীন ডাক্তার এবং প্রচন্ড দারোগা এই জাতীয়। এদের কাছা কোথা থেকে টানলে খোলে জানা থাকলে, মোকাবিলা করা অত কঠিন নয়। উত্তরপুরুষেরা থাকে আয়নার অন্যদিকে। নায়িকার ধারেকাছে তেনারা ভেজা ন্যাতা, আগুনে বঝাঁপানোয় রেডি সেট গো বলে দাঁড়িয়ে থাকা শ্যামা পোকা। আমাদের গল্পের হাগা আর নিক্সনকে এই জন্যেই টিকলির নাম নিয়ে যা কিছু করিয়ে নেওয়া এতই সোজা। উত্তরপুরুষেরাই কালে কালে বীরপুরুষ হন। পানু রঘু ডাকাতের সাক্ষাৎ বংশধর। জগদম্বার সংসারে তার বীরগতি প্রাপ্তি ঘটেছে। কিন্তু তাতে দমে না গিয়ে উনকি ঝুনকিতে উপগত হয়েছে। এদের দেখেই আমরা বলি ব্যাটার দম আছে। এনারা মহাপুরুষ। ল্যাদপুরুষেরা সচরাচর জীবনের পশ্চাৎপট। তারা মামুলি, পাদপূরণে নিমিত্ত বলিপ্রদত্ত। আছে কি নেই বোঝা যায় না, তাদের আত্মপ্রকাশের জন্য অনেক গ্রহ নক্ষত্রের যোগ সাজশ চাই, আর চাই লেখকের হাতের সাফাই। রাখহরি, বিফল এই দলে। বাংলার বাঘের পেডিগ্রি অন্যরকম। তারা ঘরেও সড়ষের তেল পেটে দলাই মলাই করে রোদে ছিরকুটে থাকেন। মিনিটে মিনিটে তাদের হুকুম তালিম হয়। আবার বাইরেও তাদের বিশেষ গলাবাজি চলে। তারা দিনে কালে রাজনৈতিক নেতা হন। অই, ঠিক ধরেছেন। বুদ্ধ খাসনবিশ। কিন্তু বাঘেরও টাগ থাকে।
Read moreAbout the Book
পুরুষ কত প্রকার?
পাঁচ।
বীরপুরুষ, উত্তরপুরুষ, মহাপুরুষ, ল্যাদপুরুষ আর বাংলার বাঘ।
বীরপুরুষ আপন আপন গৃহে দু পায়ের ফাঁকে ন্যাজ নাবিয়ে ঘোরেন। কর্মক্ষেত্রের দরজা পেরিয়ে বাঘ মশাইয়ের আত্মপ্রকাশ ঘটে।
মহীন ডাক্তার এবং প্রচন্ড দারোগা এই জাতীয়। এদের কাছা কোথা থেকে টানলে খোলে জানা থাকলে, মোকাবিলা করা অত কঠিন নয়।
উত্তরপুরুষেরা থাকে আয়নার অন্যদিকে। নায়িকার ধারেকাছে তেনারা ভেজা ন্যাতা, আগুনে বঝাঁপানোয় রেডি সেট গো বলে দাঁড়িয়ে থাকা শ্যামা পোকা। আমাদের গল্পের হাগা আর নিক্সনকে এই জন্যেই টিকলির নাম নিয়ে যা কিছু করিয়ে নেওয়া এতই সোজা।
উত্তরপুরুষেরাই কালে কালে বীরপুরুষ হন। পানু রঘু ডাকাতের সাক্ষাৎ বংশধর। জগদম্বার সংসারে তার বীরগতি প্রাপ্তি ঘটেছে। কিন্তু তাতে দমে না গিয়ে উনকি ঝুনকিতে উপগত হয়েছে। এদের দেখেই আমরা বলি ব্যাটার দম আছে। এনারা মহাপুরুষ।
ল্যাদপুরুষেরা সচরাচর জীবনের পশ্চাৎপট। তারা মামুলি, পাদপূরণে নিমিত্ত বলিপ্রদত্ত। আছে কি নেই বোঝা যায় না, তাদের আত্মপ্রকাশের জন্য অনেক গ্রহ নক্ষত্রের যোগ সাজশ চাই, আর চাই লেখকের হাতের সাফাই। রাখহরি, বিফল এই দলে।
বাংলার বাঘের পেডিগ্রি অন্যরকম। তারা ঘরেও সড়ষের তেল পেটে দলাই মলাই করে রোদে ছিরকুটে থাকেন। মিনিটে মিনিটে তাদের হুকুম তালিম হয়। আবার বাইরেও তাদের বিশেষ গলাবাজি চলে। তারা দিনে কালে রাজনৈতিক নেতা হন। অই, ঠিক
ধরেছেন। বুদ্ধ খাসনবিশ। কিন্তু বাঘেরও টাগ থাকে।
Book Details
-
ISBN9788198127266
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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"नीरज नीर ने कुछ ही समयावधि में एक संभावनाशील कथाकार के रूप में अपनी पुख्ता पहचान बना ली है। उनका यह पहला कथा-संग्रह इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि उनके पास कहने को भी बहुत कुछ है और कहने की भंगिमा भी। दरअसल लेखक की परख इस बात से भी होती है कि वह किन चीजों को कहाँ से देख रहा है। इस मामले में नीरज नीर की पोजिशनिंग बिल्कुल स्पष्ट है। तकरीबन सभी पात्र निम्नवर्गीय या निम्नमध्यवर्गीय हैं, जिनके हर्ष-विषाद, संबंधों के घात-प्रतिघात, सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने से उनके संघर्ष की कल्पना होती है, जैसे हर चरित्र असीम दुःख के पहाड़ को पूरी ताकत के साथ ठेलने की कोशिश कर रहा है और इस कोशिश में लहूलुहान हो रहा है। इन कहानियों में कथ्य की वैविध्यता अपने ऐश्वर्य के साथ मौजूद है। नीरज नीर की कहानियों की डिटेलिंग कभी-कभी चमत्कृत कर देती है कि लेखक अपने पात्रों के जीवन तल में कितने गहरे उतरा है और पाठक को भी हाथ पकड़कर उन गहराइयों में ले जाने को बाध्य भी करता है। नीरज नीर न तो जटिल शिल्प के आग्रही हैं और न ही अलंकृत भाषा की चकाचौंध के। बिल्कुल उनकी कहानियों के चरित्रों की तरह सादगी ही शिल्प है और जीवन की तरह प्रवाहमयी भाषा-निर्द्वंद्व, झलमल, यथानाम नीर की तरह बहती हुई। —पंकज मित्र सुप्रसिद्ध कथाकार "
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- Author Name:
Dr. Upasana Gupta
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Poetry Book
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