Call me Laika
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Author:
Mojaffor HossainPublisher:
The Antonym CollectionsLanguage:
BengaliCategory:
Literary-fiction₹
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“লেখকএই উপন্যাসে একটা স্পিরিচুয়াল জার্নি সম্পন্ন করেছেন। মোজাফ্ফর তার আগের সব কাজকেইছাড়িয়ে গেছেন এই জার্নির ভেতর দিয়ে। এই উপন্যাস সময়কে অতিক্রম করবে। সব উপন্যাসসেটা করে না, ভালো উপন্যাস হলেও সব সময় করে না। এটা করবে কারণ এখানে বর্ণনার যে ধরনসেটা গল্পের তো নয়ই, এমনকি সাধারণ ফিকশন যে লেখা হয়, তেমনও না। এই উপন্যাসে যে চরিত্রগুলোআছে, প্রতিটি চরিত্রই, সে যত ছোটো ভূমিকাতেই থাকুক না কেন, প্রটাগনিস্ট হয়ে ওঠে। প্রত্যেকেরজন্য মমতা জাগে, মন খারাপ হয়। কী একটা অভিশপ্ত জীবন তাদের! শুধু মানুষ না, প্রকৃতিরসকল প্রাণই যেন একটা অভিশাপের পরম্পরা। তারপরও এই উপন্যাস ভালোবাসার কথা বলে, মমতাজাগায়। বর্ণনার মধ্যে যে মুনসিয়ানা এবং ভাষার যে আভিজাত্য সেটা একটা মহাকাব্যিক অনুভূতিদেয়। এই উপন্যাসে স্পেসডগ লাইকার প্রসঙ্গটা এনে ভালো হয়েছে। সমষ্টি বাজাতিগত স্মৃতির কথা এসেছে। জীবনকে যে কতরকমভাবে দেখা যায়, কতরকমভাবে ব্যাখ্যা করাযায়, তার এক উজ্জ্বল উদাহরণ তৈরি করলো এই উপন্যাস। আখ্যান এখানে প্রধান নয়, চিন্তাএবং দর্শনই প্রধান। সেটা এমন এক গতিশীল-প্রাঞ্জল-ঋজু-স্মার্ট-অনিন্দ্যসুন্দর গদ্যেসেসব বর্ণনা করেছেন লেখক, যে মুগ্ধ না হয়ে পারা যায় না। মোটের উপর এই উপন্যাস শুধু একজন মানুষের সেক্সুয়াল আইডেন্টিটির বিষয়না, আইডেন্টিটি এজ এ হোল। এই কারণে বইটা শেষ করে শেষ পাতায় আমি লিখে রেখেছি: The writer has completed a wonderful spiritual journey through this novel and discovered that every life is acontinuation of an unavoidable curse.” আহমাদ মোস্তফা কামাল কথাসাহিত্যিক ও সাহিত্য-সমালোচক
Read moreAbout the Book
“লেখকএই উপন্যাসে একটা স্পিরিচুয়াল জার্নি সম্পন্ন করেছেন। মোজাফ্ফর তার আগের সব কাজকেইছাড়িয়ে গেছেন এই জার্নির ভেতর দিয়ে। এই উপন্যাস সময়কে অতিক্রম করবে। সব উপন্যাসসেটা করে না, ভালো উপন্যাস হলেও সব সময় করে না। এটা করবে কারণ এখানে বর্ণনার যে ধরনসেটা গল্পের তো নয়ই, এমনকি সাধারণ ফিকশন যে লেখা হয়, তেমনও না। এই উপন্যাসে যে চরিত্রগুলোআছে, প্রতিটি চরিত্রই, সে যত ছোটো ভূমিকাতেই থাকুক না কেন, প্রটাগনিস্ট হয়ে ওঠে। প্রত্যেকেরজন্য মমতা জাগে, মন খারাপ হয়। কী একটা অভিশপ্ত জীবন তাদের! শুধু মানুষ না, প্রকৃতিরসকল প্রাণই যেন একটা অভিশাপের পরম্পরা। তারপরও এই উপন্যাস ভালোবাসার কথা বলে, মমতাজাগায়। বর্ণনার মধ্যে যে মুনসিয়ানা এবং ভাষার যে আভিজাত্য সেটা একটা মহাকাব্যিক অনুভূতিদেয়।
এই উপন্যাসে স্পেসডগ লাইকার প্রসঙ্গটা এনে ভালো হয়েছে। সমষ্টি বাজাতিগত স্মৃতির কথা এসেছে। জীবনকে যে কতরকমভাবে দেখা যায়, কতরকমভাবে ব্যাখ্যা করাযায়, তার এক উজ্জ্বল উদাহরণ তৈরি করলো এই উপন্যাস। আখ্যান এখানে প্রধান নয়, চিন্তাএবং দর্শনই প্রধান। সেটা এমন এক গতিশীল-প্রাঞ্জল-ঋজু-স্মার্ট-অনিন্দ্যসুন্দর গদ্যেসেসব বর্ণনা করেছেন লেখক, যে মুগ্ধ না হয়ে পারা যায় না।
মোটের উপর এই উপন্যাস শুধু একজন মানুষের সেক্সুয়াল আইডেন্টিটির বিষয়না, আইডেন্টিটি এজ এ হোল। এই কারণে বইটা শেষ করে শেষ পাতায় আমি লিখে রেখেছি: The writer has completed a wonderful spiritual journey through this novel and discovered that every life is acontinuation of an unavoidable curse.”
আহমাদ মোস্তফা কামাল
কথাসাহিত্যিক ও সাহিত্য-সমালোচক
Book Details
-
ISBN9789349207721
-
Pages189
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मैं क्यों नहीं?’ उपन्यास एक बहुत त्रासद सामाजिक विडम्बना को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। पारू मदन नाईक ने भारतीय समाज में उन व्यक्तियों की व्यथा-कथा को रेखांकित किया है जो न स्त्री हैं न पुरुष। जो ‘हिजड़ा’ कहकर सम्बोधित किए जाते हैं जिनके लिए न परिवार सदय होता है न समाज उदार। हृष्ट-पुष्ट होने के बावजूद जिनके श्रम का कोई मूल्य नहीं आँका जाता। जाने कैसी-कैसी मुसीबतें झेलते हुए ‘हिजड़ा समुदाय’ के लोग अपना जीवन यापन करते हैं। यह उपन्यास इसी समुदाय के ‘भावनात्मक पुनर्वास’ का उपक्रम है।
उपन्यास नाज़ के माध्यम से आकार लेता है। नाज़ एक स्थान पर कहती है, ‘‘हमें, आपको, इस प्रकृति को ईश्वर ने ही बनाया है। हमें किसी दानव ने तो नहीं बनाया। लेकिन लोगों को इस बात का स्मरण नहीं रहता। क्या बताऊँ सर, किसी डॉक्टर के पास जाना पड़े, तो ठीक से ट्रीटमेंट भी नसीब नहीं होता। सहानुभूति से पेश आनेवाला, आप जैसा कोई, मुश्किल से ही मिलता है। शिक्षा पाना तो दूर, ऐसा ज़बरदस्त मखौल उड़ाया जाता है कि पूछिए मत!’’
अत्यन्त भावनाप्रवण उपन्यास। मराठी से अनुवाद करते समय सुनीता परांजपे ने भाषा-प्रवाह का विशेष ध्यान रखा है।
Untisvin Dhara Ka Aropi
- Author Name:
Mahashweta Devi
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बंगला की विख्यात लेखिका व सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी का यह उपन्यास अन्तर्विरोधी कर्तव्यों के आपसी द्वन्द्व और समाज के निचले तबक़े की दारुण जीवन-स्थितियों की कथा है। उन्तीसवीं धारा का अभिप्राय क़ानून के उस प्रावधान से है जो किसी अपराधी को अपनी सुरक्षा में ले जा रहे पुलिसकर्मी पर तब लागू होता है, जब अपराधी उससे बचकर भाग जाता है। इस उपन्यास का नायक अपने अपराधी को भाग जाने की स्वयं छूट देता है, और अपने आपको क़ानून का शिकार बना लेता है। यह अपराधी वही व्यक्ति था जिसने उसे सदियों से दलित-पीड़ित भूमि से उठाकर अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, आदमी की पहचान दी, लेकिन वह ख़ुद अपने उसी रास्ते पर चलता रहा जिसे आख़िरकार क़ानून और सत्ता के निशाने पर आना था। समाज की तलछट में पलती आग और उद्वेलन का विश्लेषण करती महाश्वेता जी की एक और सशक्त रचना।
Shahar Se Das Kilometer
- Author Name:
Neelesh Raghuwanshi
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‘शहर से दस किलोमीटर’ ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने सुखों, अपनी हरियाली और सूखों के साथ अपने आप में भरी-पूरी है।
वहाँ खेत है, ज़मीन है, कुछ बंजर, कुछ पठार, कुछ उपजाऊ और उनसे जूझते, उनकी वायु में साँसें भरते लोग हैं, उनकी गाएँ भैसें और कुत्ते हैं; और आपस में सबको जोड़नेवाली उनकी रिश्तेदारियाँ हैं, झगड़े हैं, शिकायते हैं, प्यार है!
शहर से सिर्फ़ दस किलोमीटर परे की यह दुनिया हमारी ‘शहरवाली सभ्यता’ से स्वतंत्र हमारे उस देश की दुनिया है जो विकास की अनेक धाराओं में अपने पैर जमाने की कोशिशों में डूबता-उतराता रहता है। इसी जद्दोजहद के कुछ चेहरे और उनकी कहानियाँ शहर के बीचोबीच भी अपने पहियों, अपने पंखों पर तैरती मिल जाती हैं। यह उपन्यास साइकिल के इश्क़ में डूबे एक जोड़ी पैरों की परिक्रमा के साथ खुलता है जो शहर के बीच से शुरू होती है और उसके दस किलोमीटर बाहर तक जाती है। यह शहर है भोपाल। पहाड़ी चढ़ाइयों और उतराइयों को सड़कों की संयत भाषा में व्याख्यायित करता शहर। सड़कों के किनारे अस्थायी टपरों में बसे लोग, तरह-तरह के कामों में लगे वे लोग जो शहरों में रहते हुए भी शहर से बाहर की अपनी पहचान को सँजोए रहते हैं। साइकिल सबका हाल-चाल दर्ज करती हुई घूमती रहती है। एक स्त्री की साइकिल, जिसका अपना एक इतिहास है, जो शहर की आपाधापी से दूर खेतों में, शहर के उन हिस्सों में बरबस निकल जाती है जहाँ शहर तो है लेकिन उसकी कोई ख़ूबी नहीं है। गाँवों की सरहदों का अतिक्रमण करता शहर यहाँ उन लोगों से बहुत बेरहम व्यवहार करता है जो गाँवों की साधनहीनता से भागकर शहर का हिस्सा होने आए हैं।
Angoor
- Author Name:
Gulzar
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साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फ़ॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामा का अन्दाज़े-बयान अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है। मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ॉर्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इजाफ़ा हो गया है। यह बेहद लोकप्रिय कॉमेडी ‘अंगूर’ का मंज़रनामा है। दो जुड़वाँ जोड़ियों के बीच बुनी घटनाओं की यह कहानी आज भी दर्शकों को उतना ही लुभाती है जितना अपने समय में लुभाती थी। शेक्सपीयर के नाटक ‘द कॉमेडी ऑफ़ एरर्स’ से प्रेरित इस फ़िल्म ने स्वस्थ और चुटीले हास्य का एक मानक फ़िल्म-उद्योग के सामने रखा था। विश्वास है, पुस्तक के रूप में इस फ़िल्म की यह प्रस्तुति पाठकों की स्मृति में रचे चित्रों को पुनः गतिमान करेगी और साथ ही एक उपन्यास का आनन्द भी देगी।
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