Sadhu Kalachand
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Author:
Shyamal GangopadhyayPublisher:
The Antonym CollectionsLanguage:
BengaliCategory:
Literary-fiction₹
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সাধু কালাচাঁদ মানে সেই ছেলেটি যে পাশ করতে না পেরে বারে বারে স্কুল বদলায়। যার বাঁ হাঁটুর মালাই-চাকিতে পার্মানেন্ট প্যাঁচড়া। ঢলঢলে প্যান্ট নেমে আসে কোমরের নিচে। বন্ধুর পায়রা সরিয়ে ফিষ্টি করে কালাচাঁদ। হুবহু নকল করে মাস্টারমশাইদের সই। তার তৈরি সলিউশনে উঠে যায় রেজাল্টের নম্বর। এই কালাচাঁদই মেদিনীপুরাণ-এর কাহিনী বলে। জঙ্গল নাইনের ট্রেনে হঠাৎই ফুটে ওঠে প্রায় সোয়াশো বছর আগের পৃথিবী। সেখানে মহারানীর পুলিশ নানাসাহেবকে খুঁজতে খুঁজতে এসে হাজির হয়। যাত্রীরা বসে বসে গিরীশ ঘোষ, দেবেন্দ্ৰনাথ ঠাকুর, শিশিরকুমার ঘোষেদের কথা বলে চলে।
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সাধু কালাচাঁদ মানে সেই ছেলেটি যে পাশ করতে না পেরে বারে বারে স্কুল বদলায়। যার বাঁ হাঁটুর মালাই-চাকিতে পার্মানেন্ট প্যাঁচড়া। ঢলঢলে প্যান্ট নেমে আসে কোমরের নিচে। বন্ধুর পায়রা সরিয়ে ফিষ্টি করে কালাচাঁদ। হুবহু নকল করে মাস্টারমশাইদের সই। তার তৈরি সলিউশনে উঠে যায় রেজাল্টের নম্বর। এই কালাচাঁদই মেদিনীপুরাণ-এর কাহিনী বলে। জঙ্গল নাইনের ট্রেনে হঠাৎই ফুটে ওঠে প্রায় সোয়াশো বছর আগের পৃথিবী। সেখানে মহারানীর পুলিশ নানাসাহেবকে খুঁজতে খুঁজতে এসে হাজির হয়। যাত্রীরা বসে বসে গিরীশ ঘোষ, দেবেন্দ্ৰনাথ ঠাকুর, শিশিরকুমার ঘোষেদের কথা বলে চলে।
Book Details
-
ISBN9789349207639
-
Pages48
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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शालडुंगरी का घायल सपना झारखंड में विकास की विडम्बना और राजनीति के विद्रूप का आईना है। लेखक ने इस क्षेत्र को बहुत क़रीब से देखा है—यह देखना किसी सैलानी की तरह देखना नहीं है बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर इसमें सक्रिय साझेदार होना है। इसलिए वे बड़ी सहजता से एक ऐसी कहानी बुन पाए हैं जो बिलकुल शुरू से अपने पाठक को बाँधे रखती है—किसी चटपटी भाषा में नहीं बल्कि बहुत सजीव ढंग से एक ऐसे पाठ में जो बीच-बीच में कारुणिक भी हो उठता है। उपन्यास जहाँ शुरू होता है वहाँ एक मंत्री गाँव के दौरे पर हैं—उनके साथ अफ़सरों और पत्रकारों की टोली है, सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर चलने वाले तमाशे की तैयारी है और महत्त्वाकांक्षाओं के जाल में जकड़ा एक पूरा समाज है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, हमारे सामने एक स्तब्धकारी, अमानुषिक व्यवस्था के कई धागे खुलते जाते हैं। उपन्यास में आदिवासी-संघर्ष और उसके इर्द-गिर्द बनती गई राजनीतिक-सामाजिक छटपटाहट है, विराट शोषण को जवाब देने की तमाम कोशिशें हैं, हॉकी खेलती लड़कियाँ और उनके विकट संघर्ष हैं, एक पूरी सांस्कृतिक चेतना को कुचलने की त्रासदी भी है। मनोज भक्त बस इस त्रासदी की कथा नहीं कहते। वे इसके समानान्तर चल रहे प्रतिरोध को भी साथ दर्ज करते हैं। उपन्यास के अन्त में हॉकी स्टिक लिये मुख्यमंत्री की ओर दौड़ती लड़की के साथ हम भी दौड़ पड़ते हैं और उसे बचाने की कोशिश में हमारी आवाज़ भी शामिल हो जाती है।
मनोज भक्त के पास बहुत समृद्ध और चाक्षुष भाषा है। वे स्थितियों को बिलकुल सजीव कर देना जानते हैं। लेकिन यह भाषा की नहीं, उस वृत्तान्त की भी ताक़त है जिसे मनोज भक्त कई स्तरों पर इस उपन्यास में घटित होने देते हैं। हिन्दी के समकालीन संसार में एक जनजातीय राज्य के बहुफलकीय यथार्थ को इस महीनी से उकेरने वाली रचनाएँ कम हैं। निस्सन्देह यह कृति अपनी विशिष्ट जगह बनाने में सक्षम है।
—प्रियदर्शन
Kuchh Din Aur
- Author Name:
Manzoor Ehtesham
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‘कुछ दिन और’ निराशा के नहीं, आशा के भँवर में डूबते चले जाने की कहानी हैं—एक अन्धी आशा, जिसके पास न कोई तर्क है, न कोई तंत्र; बस, वह है अपने-आप में स्वायत्त।
कहानी का नायक अपनी निष्क्रियता में जड़ हुआ, उसी की उँगली थामे चलता रहता है। धीरे-धीरे ज़िन्दगी के ऊपर से उसकी पकड़ छीजती चली जाती है। और, इस पूरी प्रक्रिया को झेलती है उसकी पत्नी—कभी अपने मन पर और कभी अपने शरीर पर। वह एक स्थगित जीवन जीनेवाले व्यक्ति की पत्नी है। इस तथ्य को धीरे-धीरे एक ठोस आकार देती हुई वह एक दिन पाती है कि इस लगातार विलम्बित आशा से कहीं ज़्यादा श्रेयस्कर एक ठोस निराशा है जहाँ से कम-से-कम कोई नई शुरुआत तो की जा सकती है। और, वह यही निर्णय करती है।
‘कुछ दिन और’ अत्यन्त सामान्य परिवेश में तलाश की गई एक विशिष्ट कहानी है, जिसे पढ़कर हम एकबारगी चौंक उठते हैं और देखते हैं कि हमारे आसपास बसे इन इतने शान्त और सामान्य घरों में भी तो कोई कहानी नहीं पल रही।
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