Sobuj Shyaola Dhaka Jol
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জীবনের অতি ভয়ঙ্কর প্রতিপক্ষের বিরুদ্ধে আমৃত্যু মানুষকে সংগ্রাম করে যেতে হয়। এ লড়াই বেঁচে থাকার লড়াই। মূলত আশি-নব্বই দশকের এই লেখায় রয়েছে সমাজ-রাজনীতি, জীবনের নগ্নতা, আবেগ, দেশ ভাগের কষ্ট-যন্ত্রণা। জীবন যুদ্ধের সেই জটিলতায় মানুষ নিমিত্তমাত্র।
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জীবনের অতি ভয়ঙ্কর প্রতিপক্ষের বিরুদ্ধে আমৃত্যু মানুষকে সংগ্রাম করে যেতে হয়। এ লড়াই বেঁচে থাকার লড়াই। মূলত আশি-নব্বই দশকের এই লেখায় রয়েছে সমাজ-রাজনীতি, জীবনের নগ্নতা, আবেগ, দেশ ভাগের কষ্ট-যন্ত্রণা। জীবন যুদ্ধের সেই জটিলতায় মানুষ নিমিত্তমাত্র।
Book Details
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ISBN9788198127204
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Pages272
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम समस्या को लेकर शुरू होता है लेकिन आख़िर तक आते-आते पाठकों को पता चलता है कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या वास्तव में कुछ नहीं है, यह सिर्फ़ राजनीति का एक मोहरा है, और जो असली चीज़ है वह है इंसान के पहलू में धड़कनेवाला दिल और उस दिल में रहनेवाले जज़्बात; और इन दोनों का मजहब और जात से कोई ताल्लुक नहीं। इसीलिए साम्प्रदायिक दंगों के बीच सच्ची इंसानियत की तलाश करनेवाला यह उपन्यास एक शहर और एक मजहब का होते हुए भी हर शहर और हर मजहब का है ! एक छोटी-सी ज़िंदगी की दर्द भरी दास्तान जो ओस की बूँद की तरह चमकीली और कम-उम्र है।
Mahuacharit
- Author Name:
Kashinath Singh
- Book Type:

- Description:
वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘महुआचरित’ जीवन के अपार अरण्य में भटकती इच्छाओं का आख्यान है। मध्यवर्गीय समाज की सच्चाइयों को लेखक ने विशिष्ट कथा-रस के साथ प्रकट किया है। यह उपन्यास जिस शिल्प में अभिव्यक्त हुआ है, वह कथा-संसार में एक नया प्रस्थान निर्मित करता है। छोटे-बड़े किंचित् असमाप्त अपूर्ण वाक्य संकेतों की ओर उन्मुख विवरण और बहुअर्थी बिम्ब इस रचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। महुआ की सहेली है उसके मकान की छत जहाँ वह खुलती, खिलती और खेलती है। यह कल्पना ही अपने आपमें अनूठी और व्यंजक है।
कहना न होगा कि ‘महुआचरित’ को ‘वृत्तान्त का अन्त’ करती कथा-रचना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।
अस्सी साल के स्वतंत्रता सेनानी पिता की पुत्री महुआ की देहासक्ति से विवाह तक की यात्रा और फिर उसमें जागता अस्मिता-बोध—इस कथा को लेखक ने समुचित सामाजिक सन्दर्भों के साथ प्रस्तुत किया है। स्त्री-विमर्श की अनुगूँज के बावजूद यह प्रश्न आकार लेता है, ‘ऐसा क्या है देह में कि उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता/लेकिन मन का सारा रिश्ता-नाता तहस-नहस हो जाता है।’
सघन संवेदना और सर्वथा नवीन संरचना से समृद्ध ‘महुआचरित’ उपन्यास निश्चित रूप से पाठकों की आत्मीयता अर्जित करेगा।
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