Hindutva : Ek Jeevan Shaili
Author:
Ed. Kalraj MishraPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Unavailable
आज भारत के राजनीतिक परिवेश में चारों ओर संकट दिखाई दे रहा है। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। धर्म-जाति के नाम पर वोट पाने हेतु राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि दी जा रही है। छद्म धर्म-निरपेक्षता के नाम पर संप्रदायवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।
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जीवनपर्यंत राष्ट्रवाद की राजनीति के आदर्शों पर चलनेवाले वरिष्ठ राजनेता पं. कलराज मिश्र ने हिंदुत्व की परंपराओं, वेद, पुराणों और स्मृतियों के माध्यम से सभी समस्याओं का हल खोजने का प्रयास किया है। इस पुस्तक में सम्मिलित अनेक आध्यात्मिक गुरुओं, राजनेताओं, लेखकों के मर्मस्पर्शी लेख बालविवाह, जातिप्रथा, टूटते परिवार, भ्रष्टाचार, महिलाओं के प्रति दुराचार जैसी बुराइयों को दूर करने में अवश्य सफल होंगे।
हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा, उसकी अप्रतिम जीवन-शैली, उसकी संस्कृति का दिग्दर्शन कराती एक श्रेष्ठ कृति।
ISBN: 9789350485958
Pages: 208
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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आज वह टूट चुकी है। ईमानदारी, कार्य के प्रति निष्ठा—उसके लिए अब बेमानी हो चुकी है। जैसे सारी चीज़ों पर से उसका मोहभंग हो गया हो! और यही वजह है कि दूसरों के अपराधों को स्वीकार कर वह जेल-जीवन अपना लेती है।
‘दीर्घतपा’ फणीश्वरनाथ रेणु का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफ़ेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है, वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है।
Ji Ji Ji
- Author Name:
Pandey Bechan Sharma 'Ugra'
- Book Type:

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Description:
मुरली : मुरली ठाकुर मेरा नाम है और जीजीजी मेरी बड़ी बहन हैं, जिन्हें मेरे जनम के पहले ‘प्रभा’ कहकर पुकारा करते...अकसर मैं जीजीजी को समझाता हूँ कि वे माँ की अनुचित बातों पर विद्रोह क्यों नहीं करतीं...!
मंगला प्रसाद : अपनी प्राण से प्यारी, पुत्र की तरह पाली हुई पुत्री को मैट्रिक तक पढ़ाकर इंतेहान में नहीं बैठाया। एक-एक कर सारी मानवी स्वतंत्रताएँ उसकी अपहरण कर ली गईं।...स्त्री का प्रेम पाने के लिए उसके चुनिन्दे पुरुष को अपनी लड़की तक दे देना। स्त्री भी वह जो कन्या की माँ नहीं।
जीजीजी : एक औरत की हैसियत से मैं सदा हताश और निराश हुई और सिवा पुरुषों की रुचि रखने के दूसरी कोई गति सचमुच मुझे स्त्रियों की नज़र नहीं आई। प्रायः सारे संसार का इतिहास स्त्रियों पर पुरुषों के अत्याचार से भरा है।
नरकू : मगर उक्त सारी बातें मनगढ़ंत थीं, चित्र की युवती का मुँह तो जीजीजी की तरह मैंने बनाया था—नाक उनकी ज़रा सुधार कर। कोई दस हज़ार बार असफल स्केच करने के बाद जीजीजी का चित्र अब मेरी उँगलियों में उतर आया है।
Ek Sadhvi Ki Satta Katha
- Author Name:
Vijay Manohar Tiwari
- Book Type:

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Description:
उदयपुरम कहीं दूर एक उजाड़ गाँव है। गाँव के बाहर टीलों के बीच प्रज्ञादेवी का मन्दिर। नवरात्रि में यहाँ मेला लगता है। यहाँ आनेवाला हर श्रद्धालु प्रज्ञादेवी को अपनी कुलदेवी मानता है, जो आश्चर्यजनक है।
शताब्दियों पूर्व यह स्थान राजनीति, शिक्षा, व्यापार और संस्कृति का केन्द्र हुआ करता था। यही महानगर एक ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन का भी साक्षी रहा। जनशक्ति ने एक शासन व्यवस्था को सत्ता के शिखरों से नीचे ला खड़ा किया और यह सब किसी राजनीतिज्ञ के नहीं, एक संन्यासिन के नेतृत्व में हुआ था। जनता से मिली शक्ति से उसने सत्ता-परिवर्तन तो कर दिखाया, लेकिन सत्ता के कुटिल तंत्र को वह नहीं समझ सकी। उसके संगी-साथी सत्ता मिलते ही विलास में डूब गए और उसके विरुद्ध खड़े हो गए।
कहते हैं कि षड्यंत्रपूर्वक संन्यासिन को राजधानी से निष्कासित कर दिया गया। समाजशास्त्रियों का मत है कि वही संन्यासिन अब विभिन्न जातियों और समुदायों की कुलदेवी के रूप में पूजित है। यह उसी साध्वी प्रज्ञादेवी की कथा है, जो एक रूपक का सहारा लेकर आज की दिशाभ्रष्ट राजनीति का एक विस्तृत चित्र उपस्थित करती है।
जनसाधारण को कभी मालूम नहीं होता कि उनसे शक्ति और धन प्राप्त कर उनके प्रतिनिधि राजधर्म के अपने सुरक्षित कक्षों में क्या करते हैं। रोज़-रोज़ पक्ष-परिवर्तन और नित नूतन सन्धियाँ किसके लिए होती हैं। साध्वी के संघर्ष के साथ-साथ यह कथा उनकी भी है, जिन्हें आज हम अलग वेशभूषा में देखते हैं, लेकिन उनका चरित्र अभी भी वही है जैसा इस बृहत् उपन्यास के पृष्ठों पर अंकित है—धूल-धूसरित सड़कों पर रेंग रहे लोगों पर झपट पड़ने को तैयार गिद्धों का और चीलों का।
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