Ek Aurat Ka Chehara
(0)
Author:
Mohan Rakesh, Henry JamesPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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एक औरत का चेहरा यूरोपीय और अमेरिकी सभ्यता-संस्कृति और जीवन-शैली की भिन्नताओं को दर्शाने के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नैतिक उत्तरदायित्व और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध जैसे विषयों का बारीक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इज़ाबेल इसकी मुख्य पात्र है जो अपनी क़िस्मत ख़ुद तय करने को दृढ़-संकल्प है लेकिन वास्तव में अपनी मंज़िल से अनजान है। इज़ाबेल और उसको चाहने वालों पर दुर्भाग्य की जो छाया इस उपन्यास में दिखलाई पड़ती है, वह वस्तुतः उस समय के एक वर्ग के यथार्थ का सच्चा अंकन है जो बेचैन कर देता है।
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एक औरत का चेहरा यूरोपीय और अमेरिकी सभ्यता-संस्कृति और जीवन-शैली की भिन्नताओं को दर्शाने के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नैतिक उत्तरदायित्व और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध जैसे विषयों का बारीक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इज़ाबेल इसकी मुख्य पात्र है जो अपनी क़िस्मत ख़ुद तय करने को दृढ़-संकल्प है लेकिन वास्तव में अपनी मंज़िल से अनजान है। इज़ाबेल और उसको चाहने वालों पर दुर्भाग्य की जो छाया इस उपन्यास में दिखलाई पड़ती है, वह वस्तुतः उस समय के एक वर्ग के यथार्थ का सच्चा अंकन है जो बेचैन कर देता है।
Book Details
-
ISBN9789360869755
-
Pages656
-
Avg Reading Time22 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आधुनिक हिन्दी नाटय साहित्य और कथा की दुनिया में मोहन राकेश का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी-रंगान्दोलन को एक नई गति और समृद्धि देने में उनकी निर्णायक भूमिका रही है। ‘अंडे के छिलके : अन्य एकांकी तथा बीज नाटक’ उनके कई प्रयोगधर्मी एकांकियों का संग्रह है। प्रयोगशीलता को मोहन राकेश रंगमंच की भाषा और उसके मानवीय पक्ष की समृद्धि से जोड़कर देखते थे, अर्थात् रंगमंचीय उपकरणों की न्यूनता के बावजूद कठिन से कठिन प्रयोग कर पाने की क्षमता के साथ जोड़कर। जयदेव तनेजा राकेश के नाटकों की एक दुर्लभ विशेषता पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि, ''उनके नाटकों में मंचीय सफलता और प्रदर्शनीयता के साथ-साथ साहित्यिकता और पठनीयता का भी विलक्षण गुण विद्यमान है। उनमें इन दोनों विशेषताओं का अद्भुत सामंजस्य हुआ है। नाटकों को पद्य मानने का ही यह परिणाम है कि उनके नाट्य-संवादों और रंग-निर्देशों की भाषा में कोई अन्तर नहीं है। सम्भवत: यही कारण है कि उनके नाटकों को देखते या सुनते हुए ही नहीं, पढ़ते हुए भी बीच में छोड़ना कष्टकर प्रतीत होता है।'' संक्षेप में, इस संग्रह में शामिल नाटकों को हम राकेश के बहुस्तरीय नाट्य-लेखन के समर्थ उदाहरणों के रूप में देख सकते हैं।
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