Deerghatapa
Author:
Phanishwarnath RenuPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
आज के युग में जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, चरित्रहीनता पराकाष्ठा पर हो, अपने और पराये का भाव-बोध जड़ जमाए बैठा हो, चारों ओर ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की अफरा-तफरी मची हो, ऐसे माहौल में शान्तिपूर्वक जीवन बसर कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं।</p>
<p>बेला गुप्त भी सहज जीवन जीना चाहती थी, लेकिन उनके साथ क्या हुआ? कई हादसों से गुज़रने के बावजूद वह टूटी नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रही। लेकिन आज...?</p>
<p>आज वह टूट चुकी है। ईमानदारी, कार्य के प्रति निष्ठा—उसके लिए अब बेमानी हो चुकी है। जैसे सारी चीज़ों पर से उसका मोहभंग हो गया हो! और यही वजह है कि दूसरों के अपराधों को स्वीकार कर वह जेल-जीवन अपना लेती है।</p>
<p>‘दीर्घतपा’ फणीश्वरनाथ रेणु का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफ़ेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है, वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है।
ISBN: 9788126715923
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘सत्यभामा’ के रूप में मुंशी जी ने ऐसी नारी का अंकन किया है जो बचपन से ही स्वयं को कृष्ण-प्रिया मानती है और फिर उनके योग्य ‘वीर-पत्नी’ बनने का संकल्प लेकर भीषण कठिनाइयों में कूद पड़ती है। महत्त्वपूर्ण यह कि ये कठिनाइयाँ उसके धनाढ्य पिता सत्राजित द्वारा खड़ी की गई हैं जो कृष्ण के प्रति घोर शत्रु-भाव रखता है और अपनी अकूत सम्पदा का उपयोग राज्य-हित के विरुद्ध अपने ही वैभव-विलास को बढ़ाने में करता आ रहा है। कृष्ण इसके विरुद्ध हैं। इससे क्षुब्ध सत्राजित स्यमंतक मणि के बहाने कृष्ण के विरुद्ध षड्यंत्र रचता है। सत्यभामा इसे जानती है, इसलिए कृष्ण को बिना बताए उनके मित्र सात्यकि को साथ लेकर उस षड्यंत्र को विफल करने के लिए अन्तहीन जोखिमों से टकराती है और अन्ततः कृष्ण का विश्वास जीत लेने में सफल होती है।
इस कथा के माध्यम से मुंशी जी ने जहाँ सम्पत्ति के धर्मसम्मत उपभोग की आवश्यकता को रेखांकित किया है, वहीं तत्कालीन वन्य जीवन के बाह्याचारों, लोक-विश्वासों और वातावरण का भी लोमहर्षक चित्रण किया है। निश्चय ही इस ग्रन्थमाला का यह एक और महत्त्वपूर्ण खंड है।
Seemant
- Author Name:
Hemangini A. Ranade
- Book Type:

- Description: कौन-सी वह तीव्र अनुभूति है जो मानव-मन को किसी स्थान विशेष की ओर अनजाने ही आकर्षित करती है? यह आकर्षण भौगोलिक हदों तक सीमित नहीं, इसका सम्मोहन देशकाल की सीमाओं से परे है। उपन्यास की नायिका एंजेलिका, जिस देश में जन्मी, पली और बढ़ी है, उस समाज और वातावरण में अपने को सर्वथा अजनबी पाती है, जहाँ हज़ारहा कोशिशों के बावजूद उसे चैन और सुकून हासिल नहीं है। वह नहीं जानती कि इस छटपटाहट के पीछे कारण क्या हैं? माता-पिता की उसके प्रति रही उदासीनता को लेकर आक्रोश या स्वयं अपने स्वभाव में एक अनाम अधूरापन जिसका निर्धारण असम्भव है। अन्ततः जब वह अपने गन्तव्य—भारत आ पहुँचती है, बकौल उसकी जापानी सहेली फ्रुमिको के, अपने भारतीय पति को ‘भारत के एक टिकट के लिए भुनाकर’, तो क्या परिपूर्णता की उसकी खोज वाकई समाप्त हो जाती है? या अभी देशकाल की कई और भौतिक सीमाओं को उलाँघना बाक़ी है? परदेस जाकर बसनेवाले लोग किन-किन कारणों से अपने-अपने देशों का त्याग करते हैं, अपनाए हुए देश से उनकी क्या और कौन-सी अपेक्षाएँ हुआ करती हैं, इस प्रश्न को भी आयरलैंड और भारत की पृष्ठभूमि पर रचित इस उपन्यास में उपस्थित किया गया है।
Kagaj Ki Nav
- Author Name:
Krishna Chander
- Book Type:

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Description:
उर्दू और हिन्दी में समान रूप से समादृत कथाकार कृश्न चन्दर का उपन्यास ‘काग़ज़ की नाव’ उनकी सशक्त लेखनी का मुखर साक्षी है। एक दस रुपए के नोट की आत्मकथा के माध्यम से उन्होंने इस उपन्यास में समाज के विभिन्न पक्षों के विभिन्न अंगों का चित्र बड़ी सरसता एवं स्पष्टता से खींचा है। आज की जीवन-प्रणाली में नोट इतना प्रधान हो गया है कि उसके आगे सभी अन्य वस्तुएँ धुँधली नज़र आती हैं। किसी की ख़ुशी का वादा एक नोट है, किसी की मुहब्बत का धोखा नोट है, किसी की मजबूर मेहनत का एक पल नोट है, तो किसी की प्रेमिका की मुस्कान भी एक नोट ही है। सच तो यह है कि संसार का हर व्यक्ति अपने जीवन के प्रति क्षण को नोट—यानी काग़ज़ की नाव में खेये चला जा रहा है। शायद यह नोट काग़ज़ का एक पुर्जा नहीं, इस युग की सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु है।
निस्सन्देह, आज के युग-यथार्थ की अगर कोई शक्ल है तो यही काग़ज़ की नाव। कृश्न चन्दर की प्रवाहमयी भाषा-शैली ने इसे जिस तेज़ी से घटनाओं की उत्ताल तरंगों पर तैराया है, उसका रोमांच बहुत गहरे तक पाठकीय भाव-संवेदन का हिस्सा बन जाता है।
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