Channa
(0)
Author:
Krishna SobtiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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कृष्णा जी का सबसे पहला उपन्यास है ‘चन्ना’ जिसे पिछली सदी के पाँचवें दशक में ही पाठकों तक पहुँच जाना था, लेकिन यह नहीं हो सका। प्रकाशक ने एक नए लेखक की भाषा में बदलाव करने की कोशिश की तो लेखक ने अपने पाठ के शील-सौन्दर्य की रक्षा हेतु उसे वापस ले लिया। तब से अब तक विभाजन-पूर्व भारत के खेतिहर समाज और उस परिवेश में जन्म लेकर पलती-बढ़ती-लड़ती चन्ना की यह गाथा लेखक के तहखाने में खामोशी से इन्तज़ार करती रही।</p> <p>अब ‘चन्ना’ पाठकों के सामने है और अपनी चेतना के रूप-स्वरूप से आपको हैरान करने जा रही है। चन्ना का पारिवारिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य भारत के उस समय का है जब दुनिया के अग्रणी मुल्कों में भी स्त्री-स्वतंत्रता की बहुत सुगबुगाहट नहीं थी। लेकिन चन्ना ठीक उन्ही अर्थों में आधुनिक है जिन्हें हम आज जानते हैं। पैदाइश के वक़्त ही माँ की छाया से वंचित, पिता के स्नेह से दूर, नाना-नानी के प्यार-तले पली-बढ़ी चन्ना आज़ाद ख़याल है, शिक्षित है, और सबसे ज़्यादा ध्यान देने लायक़ यह कि अपने अधिकार को लेकर सजग है । और यह अधिकार उसके व्यक्तित्व की हदों तक सीमित नहीं, उन ज़मीनों और खेतों तक फैला है जिन्हें वह अपने पुरखों की ओर से मिला दायित्व भी मानती है।</p> <p>कृष्णा सोबती कभी भी उन स्त्रीवादी लेखकों में नहीं रहीं जो हिन्दी में अक्सर फ़ैशन में रहे। उन्होंने स्त्रीत्व और पुरुषत्व को दो अलग खाने कभी नहीं माना। उनका ज़ोर व्यक्ति के उस आत्मबोध को जगाने पर रहा है जो किसी भी देह में प्रकट होकर प्रकाश देता है—वह देह स्त्री की हो या पुरुष की। ‘चन्ना’ इसी आत्मबोध का साकार रूप है जिसे कृष्णा जी ने आज से लगभग सात दशक पहले गढ़ा था। यह अपनी ज़मीन, अपनी विरासत से निकलती स्त्री है जिसे हम चन्ना की व्यक्ति-सत्ता में देखते हैं।
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कृष्णा जी का सबसे पहला उपन्यास है ‘चन्ना’ जिसे पिछली सदी के पाँचवें दशक में ही पाठकों तक पहुँच जाना था, लेकिन यह नहीं हो सका। प्रकाशक ने एक नए लेखक की भाषा में बदलाव करने की कोशिश की तो लेखक ने अपने पाठ के शील-सौन्दर्य की रक्षा हेतु उसे वापस ले लिया। तब से अब तक विभाजन-पूर्व भारत के खेतिहर समाज और उस परिवेश में जन्म लेकर पलती-बढ़ती-लड़ती चन्ना की यह गाथा लेखक के तहखाने में खामोशी से इन्तज़ार करती रही।</p>
<p>अब ‘चन्ना’ पाठकों के सामने है और अपनी चेतना के रूप-स्वरूप से आपको हैरान करने जा रही है। चन्ना का पारिवारिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य भारत के उस समय का है जब दुनिया के अग्रणी मुल्कों में भी स्त्री-स्वतंत्रता की बहुत सुगबुगाहट नहीं थी। लेकिन चन्ना ठीक उन्ही अर्थों में आधुनिक है जिन्हें हम आज जानते हैं। पैदाइश के वक़्त ही माँ की छाया से वंचित, पिता के स्नेह से दूर, नाना-नानी के प्यार-तले पली-बढ़ी चन्ना आज़ाद ख़याल है, शिक्षित है, और सबसे ज़्यादा ध्यान देने लायक़ यह कि अपने अधिकार को लेकर सजग है । और यह अधिकार उसके व्यक्तित्व की हदों तक सीमित नहीं, उन ज़मीनों और खेतों तक फैला है जिन्हें वह अपने पुरखों की ओर से मिला दायित्व भी मानती है।</p>
<p>कृष्णा सोबती कभी भी उन स्त्रीवादी लेखकों में नहीं रहीं जो हिन्दी में अक्सर फ़ैशन में रहे। उन्होंने स्त्रीत्व और पुरुषत्व को दो अलग खाने कभी नहीं माना। उनका ज़ोर व्यक्ति के उस आत्मबोध को जगाने पर रहा है जो किसी भी देह में प्रकट होकर प्रकाश देता है—वह देह स्त्री की हो या पुरुष की। ‘चन्ना’ इसी आत्मबोध का साकार रूप है जिसे कृष्णा जी ने आज से लगभग सात दशक पहले गढ़ा था। यह अपनी ज़मीन, अपनी विरासत से निकलती स्त्री है जिसे हम चन्ना की व्यक्ति-सत्ता में देखते हैं।
Book Details
-
ISBN9789388753357
-
Pages384
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वैदिक ही नहीं, बौद्ध और जैन दर्शनों को भी चुनौती देनेवाले गोशालक बुद्ध और महावीर के समकालीन थे। स्वभाव से विद्रोही और आचरण में तर्क तथा नवाचार की उँगली थामकर नई राहों का अन्वेषण करनेवाले गोशालक के विषय में कहा जाता है कि अपने समय में उनके अनुयायियों की संख्या बुद्ध से भी ज़्यादा थी। जनसाधारण में उनका विशेष आदर था।
एक ख़ानाबदोश जाति के निर्धन परिवार में जन्मे गोशालक ने आध्यात्मिकता के प्रति अपने जन्मजात रुझान के चलते युवावस्था के दौरान सात वर्ष भगवान महावीर के सान्निध्य में तपस्या की। लेकिन बाद में महावीर से उनके गहरे मतभेद हुए और महावीर के पुरुषार्थ के सिद्धान्त के मुक़ाबले उन्होंने नियतिवाद को स्थापित किया। कहते हैं कि महावीर से उनका विरोध इस हद तक बढ़ा कि अपनी सिद्धियों में उन्होंने महावीर पर प्राणघातक हमले भी किए, हालाँकि जीवन के अन्तिम क्षणों में उन्हें इस पर गहरा पश्चात्ताप भी हुआ जिसके प्रमाण जैन ग्रन्थों में पर्याप्त रूप में उपलब्ध हैं।
लेकिन जैन-मत के साथ बौद्ध ग्रन्थों में भी उनकी निन्दा अधिक मिलती है जहाँ न सिर्फ़ उनके विचारों की कड़ी आलोचना की गई बल्कि उनके चरित्र-हनन का भी प्रयास किया गया।
यह उपन्यास आजीवक गोशालक के बारे में सम्भवतः पहली रचना है जिनके बारे में अनेक पाठकों ने शायद कभी सुना भी नहीं होगा। आत्मकथात्मक शैली में निबद्ध यह कृति न सिर्फ़ गोशालक के जीवन-चरित्र को तमाम रंगों के साथ चित्रित करती है, बल्कि उन भ्रांतियों को भी दूर करती है जिनके आधार पर उस नवोन्मेषकारी विचारक को एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
Seva Sadan
- Author Name:
Premchand
- Book Type:

- Description: कहने को बहुत सारे पात्र हैं, उनके बदलने की परिस्थितियाँ हैं, उनका जटिल जीवन-चक्र भी है। लेकिन प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन की कहानी है। एक ईमानदार दारोगा कृष्णचंद्र की प्यारी बेटी सुमन, पिता के पहले रिश्वत लेने की दुर्घटना से उलझकर वेश्यावृत्ति के रास्ते पर पहुँच जाती है। लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं हो जाती। सुमन अपनी आंतरिक ज्योति को वापस पाती है, अपने से जुड़े लोगों के जीवनोद्धार का प्रमुख कारण बनती है। कथा का अंत आते-आते बेसहारा को सहारा देने के निमित्त बने केंद्र 'सेवासदन' की निर्देशिका बनती है ।
Hiroshima Ke Phool
- Author Name:
Edita Morris
- Book Type:

- Description: हिरोशिमा के फूल एक मार्मिक उपन्यास है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु बमों का आघात सहना पड़ा था। यह आघात जापान के सिर्फ़ दो शहरों की नहीं बल्कि सम्पूर्ण मनुष्यता की त्रासदी था। इसने स्पष्ट किया कि मनुष्य यदि अपनी बुनियादी सृजनात्मक नैतिकता को भूल जाए तो वह कितना संहारक हो सकता है! यह आघात और ख़तरा ही युद्धोत्तर जापान की पृष्ठभूमि में रचे गए इस उपन्यास का प्रेरणा-बिन्दु है। इस उपन्यास के पात्र निहायत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानवीय संसार के लिए गरिमा और करुणा की अपरिहार्यता की लगातार याद दिलाते हैं।
I..The Loser
- Author Name:
Sumit Kumar Sambhav
- Book Type:

- Description: What are the ingredients of the recipe for a looser? What are the circumstances which make a person looser? Zandu Singh, who lives in Dharamshala city of Himalayan Pradesh, dips his life into hard work to make himself perfect in his penance. But a single lie he speaks to his love, jyotsna, one day becomes so big that he becomes a loser for her and throws him to the ultimate darkness of confusion. Will zandu Singh ever be able to come out of this dilemma? Will he ever succeed in making his banwari Lal master Ji's dream true? Come and know about the thousands of athletes burning themselves in the fire of hard work, devotion and sacrifice but still living unidentified lives. Come to peep into their life through India’s first sports fiction.
Bisrampur Ka Sant
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

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Description:
‘बिस्रामपुर का संत’ समकालीन जीवन की ऐसी महागाथा है जिसका फलक बड़ा विस्तीर्ण है और जो एक साथ कई स्तरों पर चलती है।
एक ओर यह भूदान आन्दोलन की पृष्ठभूमि में स्वातंत्र्योत्तर भारत में सत्ता के व्याकरण और उसी क्रम में हमारी लोकतांत्रिक त्रासदी की सूक्ष्म पड़ताल करती है, वहीं दूसरी ओर एक भूतपूर्व ताल्लुकेदार और राज्यपाल कुँवर जयतिप्रसाद सिंह की अन्तर्कथा के रूप में महत्त्वाकांक्षा, आत्मछल, अतृप्ति, कुंठा आदि की जकड़ में उलझी हुई ज़िन्दगी को पर्त-दर-पर्त खोलती है। फिर भी इसमें सामन्ती प्रवृत्तियों की ह्रासोन्मुखी कथा-भर नहीं है, उसी के बहाने जीवन में सार्थकता के तन्तुओं की खोज के सशक्त संकेत भी हैं! यह और बात है कि कथा में एक अप्रत्याशित मोड़ के कारण, जैसा कि प्रायः होता है, यह खोज अधूरी रह जाती है।
‘राग दरबारी' के सुप्रसिद्ध लेखक श्रीलाल शुक्ल की यह कृति, कई आलोचकों की निगाह में उनका सर्वोत्तम उपन्यास है।
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